शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

छौंक, तड़का या बघार का वैज्ञानिक आधार है

बघार से न केवल स्वाद और सुगंध में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि भोजन भी दोष रहित तथा सुपाच्य बन जाता है. कहते हैं एक राजा के रसोइये ने राजा के खाने पर आने में विलंब करने के कारण अपनी बघारी हुई दाल को एक सूखे पेड़ की जड़ों में डाल दिया था, जिससे वह पेड़ कुछ दिनों बाद फिर हरा-भरा हो गया था।  

बघार 
भारतीय रसोईघरों में सब्जियों और दालों वगैरह को छौंक लगाने की प्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी वर्षों से चली आ रही है. समय के साथ खाना बनाने और खाने का तरीका भले कितना ही बदल गया हो पर छौंकने या बघारने की महत्ता अपनी जगह बरकरार है. इससे न केवल स्वाद और सुगंध में बढ़ोत्तरी होती है बल्कि भोजन भी दोष रहित तथा सुपाच्य बन जाता है. सेहत और पाचन के लिए भी यह विधी बहुत फायदेमंद रहती है। कहते हैं एक राजा के रसोइये ने राजा के खाने पर आने में विलंब करने के कारण अपनी बघारी हुई दाल को एक सूखे पेड़ की जड़ों में डाल दिया था, जिससे वह पेड़ कुछ दिनों बाद फिर हरा-भरा हो गया था।  

हमारे देश में जहां अलग-अलग मौसम, वातावरण और खान-पान के तरीके भिन्न-भिन्न हैं वहीं बघार देने की वस्तुओं में भी खाद्य पदार्थ की प्रकृति के अनुसार घट-बढ़ और बदलाव होता जाता है. हमारी रसोई में कुछ रोजमर्रा के खाद्य और उनमें लगने वाले बघार कुछ इस तरह के हैं :-

लहसुन 
* सरसों के साग और मक्की की रोटी ने कब की पंजाब की सीमाएं लांघ सारे देश के लोगों को अपना मुरीद बना लिया है. पर सरसों का साग वायु विकार को पेट में जगह देता है, जिससे बचने के लिए इसमें प्याज, लहसुन और अदरक का तड़का लगा इसे सुपाच्य तो बनाया ही जाता है इससे उसके स्वाद में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है। 

* राजमा, उड़द, सफेद चने, फूल गोभी यह सब देर से पचने वाले खाद्य पदार्थ हैं तथा इनसे वायु-विकार की भी संभावना रहती है, इसलिए इनके इन दोषों को दूर करने के लिए इनमें  लहसुन-अदरक का बघार दिया जाता है. 

* कढ़ी जो अत्यंत लोकप्रिय खाद्य तो है पर इससे बादी होने का डर भी बना रहता है इसीलिए बनाने के बाद उसमें मेथी-दाना, राई, तेज-पात और मीठी नीम का छौंक लगाया जाता है. जिससे यह सुपाच्य हो जाती है।  

छौंक में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न मसाले 
* देर से पचने वाली सब्जियों जैसे सीताफल या कद्दू , अरबी, भिन्डी इत्यादि को मेथी के दानों या अजवायन का तड़का  लगा सुपाच्य बना लिया जाता है।   

* वायु तथा कफ उत्पन्न करने वाली दालों में जीरे और हींग का छौंक लगाने की परम्परा रही है।  

हमारे मनीषियों ने समाज और परिवार को सुचारू रूप से चलाने के लिए कई उपाय ईजाद किए थे उन्हीं में
खान-पान के तरीके तथा भोजन द्वारा स्वस्थ रहने के नुस्खे भी शामिल हैं. यदि हम अपना खान-पान दुरुस्त रखें तो कई तरह की दवाईयों से छुटकारा मिल सकता है, जो पाचन दुरुस्त करने  के नाम पर हमारे शरीर पर विपरीत असर डालती हैं।        

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-07-2014) को "संस्कृत का विरोध संस्कृत के देश में" (चर्चा मंच-1679) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, गाँधी + बोस = मंडेला - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

अच्छी जानकारी !!