गुरुवार, 17 जुलाई 2014

हम पर छाते, "छाते"

सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर इसकी इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं. 


काफी इंतजार करवाने के बाद बरखा रानी मेहरबान हुई हैं।  अब जब वह अपना जलवा बिखेर रही है तो हमें अपनी बरसातियां, छाते याद आने लगे हैं. बरसातियां तो खैर बहुत बाद में मैदान में आईं, पर छाते तो सैंकड़ों सालों से हम पर छाते रहे हैं. छाता जिसे दुनिया में ज्यादातर "umbrella" के नाम से जाना जाता है, उसे यह नाम लैटिन भाषा के "umbros" शब्द, जिसका अर्थ छाया होता है, से मिला है. समय के साथ इसका चलन कुछ कम जरूर हुआ है. पहले ज्यादातर लोग पैदल आना-जाना करते थे तब धूप और बरसात में इसकी सख्त जरूरत महसूस होती थी. पर फिर बरसातियों के आगमन से या कहिए कि मोटर गाड़ियों की सर्वसुलभता के कारण इसकी पूछ परख कुछ काम हो गयी. वैसे मौसम साफ होने पर यह एक भार स्वरूप भी लगाने लगता था फिर भी हजारों सालों से यह हमारी आवश्यकताओं में शामिल रहने के लिए जी-तोड़ कोशिश करता रहा और सफल भी रहा ही है.     

खोजकर्ताओं का मानना माना है कि मानव ने आदिकाल से ही अपने को तेज धूप से बचाने के लिए वृक्षों के
बड़े-बड़े पत्तों इत्यादि का उपयोग करना शुरू कर दिया होगा। आज के छाते के पर-पितामह का जन्म कब हुआ यह कहना कठिन है, फिर भी जो जानकारी मिलती है वह हमें 4000 साल पहले तक ले जाती है। उस समय छाते सत्ता और धनबल के प्रतीक हुआ करते थे और राजा-महाराजाओं की शान बढ़ाने का काम करते थे। शासकों और धर्मगुरुओं के लिए छत्र एक अहम जरूरत हुआ करती थी। धीरे-धीरे इसे आम लोगों ने भी अपनाना शुरू कर दिया। 

ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले चीन ने करीब तीन हजार साल पहले पानी से बचाव के लिए जलरोधी छतरी बनाई थी। समय के साथ-साथ छोटे छातों का चलन शुरू हुआ तो उसमें भी फैशन ने घुस-पैठ कर ली, खासकर  ग्रीस और रोम की महिलाओं के छातों में, जो उनके लिए एक जरूरी वस्तु का रूप इख्तियार करती चली जा रही थी. उस समय छाते को महिलाओं के फैशन की वस्तु ही समझा जाता था. ऎसी मान्यता है कि किसी पुरुष द्वारा सार्वजनिक स्थान पर सबसे पहले इसका उपयोग अंग्रेज पर्यटक और मानवतावादी "जोनास हानवे" ने करना आरंभ किया था. जिसकी देखा-देखी अन्य लोगों ने भी पहले इंग्लैण्ड और बाद में सारे संसार में इसका उपयोग करना शुरू कर दिया.  

लोगों की पसंद और इसकी उपयोगिता को देखते हुए इस पर तरह-तरह के प्रयोग भी होने शुरू हो गये. इसका
रंग-रूप बदलने लगा. इसके कई तरह के "फोल्डिंग" प्रकार भी बाजार में छा गए. जिनका आविष्कार 1969 में हुआ.  इसकी यंत्र-रचना और इसमें उपयोग होने वाली चीजों में सुधार तथा बदलाव आने लगा. सबसे ज्यादा ध्यान इसके कपडे पर दिया गया जिसे आजकल टेफ्लॉन की परत चढ़ा कर काम में लाया जाता है, जिससे कपड़ा पूर्णतया जल-रोधी हो जाता है. 

धीरे-धीरे छाता जरुरत के साथ-साथ फैशन की चीज भी बनता चला गया. आजकल इसके विभिन्न रूप यथा पारम्परिक, स्वचालित, फोल्डिंग, क्रच (जिसे चलते समय छड़ी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है) इत्यादि  तरह-तरह के आकारों तथा रंगों में उपलब्ध हैं. इसके साथ ही इसका उपयोग नाना प्रकार के अन्य कार्यों जैसे फोटोग्राफी, सजावट या किसी  वस्तु की तरफ ध्यान 
आकर्षित करवाने के लिए भी किया जाने लगा है. सबसे ज्यादा सुंदर, कलात्मक और आधुनिक छाते चीन में बनाए जाते हैं जहां इसको बनाने वाले हजारों कारखाने दिन-रात काम करते हैं. पर इसकी इसकी बिक्री में अमेरिका सबसे आगे है जहां लाखों छाते हर साल खरीदे-बेचे जाते हैं. 

अपने यहां छाते की लोकप्रियता बंगाल में 80 के दशक तक चरम पर थी जब दफ्तर जाते समय बंगाली बाबू के पास एक थैले, छाते और अखबार का होना निश्चित सा होता था.   

2 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर जानकारी.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (18-07-2014) को "सावन आया धूल उड़ाता" (चर्चा मंच-1678) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'