सोमवार, 14 जुलाई 2014

"माले मुफ्त का" ऐंटी रिएक्शन

दृश्य एक :- सात-आठ एकड़ की खेती लायक जमीन के मालिक श्री साहू जी अपनी सेहत ठीक न होने के कारण किसी सहायक के न मिलने से परेशान थे।  एक दिन उन्हें अपना पुराना कामदार दिखाई पड़ा तो उन्होंने उसे फिर काम पर रखना चाहा तो उसने साफ मना कर कहा कि वह अब बेगार नहीं करता। एक ही गांव के होने के कारण साहू जी जानते थे कि वह दिन भर निठ्ठला घूमता है, नशे का भी आदी है. पर कर क्या सकते थे. एक दो साल के बाद तंग आकर मजबूरी में उन्होंने दुखी मन से अपनी आधी जमीन एक बिल्डर को बेच डाली। अब वहाँ धान की जगह कंक्रीट की फसल उगेगी।                 

दृश्य दो :- शहर के करीब रहने वाले श्री पटेल जी को अपने घर में बरसात का पानी इकट्ठा होने के कारण उसकी निकासी के लिए एक पांच-सात फुट की छोटी नाली निकलवानी थी।  पर छोटे से काम  को करने के लिए कोई तैयार नहीं हो रहा था। किसी तरह एक पलम्बर राजी हुआ, उतने से काम के लिए उसने हजार रुपयों की मांग की, ले-दे कर नौ सौ रुपये पर राजी हुआ, जबकि सारा काम बेढंगे तरीके से उसके सहयोगी एक किशोर ने किया। सिमित आय वाले पटेल जी कसमसा कर रह गए।  

तीसरा दृश्य :- शर्मा जी के फ्लैट के बाहर के पाइप में दीवाल में उगे एक पौधे ने किसी तरह पाइप के अंदर जगह बना उसे पूरी तरह  "चोक"  कर दिया। नतीजतन ऊपर के फ्लैट के साथ-साथ अपना पानी भी घर के अंदर बहने लगा. जमीन से ज्यादा ऊंचाई भी नहीं थी जो सीढ़ी इत्यादि की जरुरत पड़ती फिर भी न पलम्बर मिल रहा था न सफाई कर्मचारी। बड़ी मुश्किल से तीन सौ रुपये दे कर यह 15 - 20 मिनट का काम करवाया जा सका।  जो हर लिहाज से ज्यादा कीमत थी।     

चौथा दृश्य :- मिश्रा जी को दूध-दही का शौक है।  सो घर पर सदा एक-दो दुधारू पशु बंधे रहते थे। अब मजबूरन सबको हटा बाजार का मिश्रित दूध लेना पड़ रहा है, कारण पशुओं के रख-रखाव, दाना-पानी, साफ-सफाई के लिए किसी का उपलब्ध न हो पाना था. मजबूरन ऐसे लोगों को या तो ब्रांडेड कंपनियों के उत्पाद खरीदने होंगे या फिर डेयरी का व्यवसाय करने वालों के रहमो-करम पर अपना स्वास्थय गिरवी रखना होगा।  

पांचवां दृश्य :-  एक गांव में एक कौतुक दिखाने वाला आया. खेल दिखाने के बाद जब उसे कुछ लोग धान देने लगे तो वह ऐसे बिदका जैसे सांड को लहराता लाल कपड़ा दिखा दिया हो. कुछ नाराज सा हो बोला, मुझे सिर्फ पैसे चाहिए  दो, धान कितना चाहिए मुझसे ले लो. 

इन सारे दृश्यों में एक वजह कॉमन है. वह है, काम करने वालों की कमी और दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाने की प्रवृत्ति।  ये सरकारों द्वारा लाई जा रही खुशहाली की तस्वीर नहीं है यह है मुफ्तखोरी के कारण उपजी जहालत और काम न करने की प्रवृत्ति की.  कुछ लोगों को ये बातें गरीब विरोधी लगेंगी, पर भयावह सच्चाई यही है कि मुफ्तखोरी ने आज समाज में निष्क्रिय लोगों का एक अलग तबका बना दिया है। कहते हैं न, "माले मुफ्त दिले बेरहम" तो इसमे कोई भी अतिश्योक्ति नहीं है।  हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि मुफ्त और आसानी से मिली वस्तु की हम कदर नहीं करते।  उदाहरण के लिए पानी, हवा और हरियाली का हश्र हमारे सामने है। हर धर्म के ग्रंथ में, बड़े बुजुर्गों ने, गुरुओं ने अन्न का निरादर न करने की बात कही है। क्योंकि इसके बिना जीव जगत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर आज दुखद स्थिति यही है कि पूरे देश में बड़ी निर्दयता के साथ अन्न का निरादर किया जा रहा है.      

हालांकि इन योजनाओं और उन्हें लागू करने वालों की मंशा समाज के निचले वर्ग की बेहतरी चाहने की ही है. पर सचमुच के गरीब और बने या बनाए हुए ग़रीबों में जमीन-आसमान का फर्क होता है और उन्हीं बने हुए ग़रीबों ने सब बंटाधार किया हुआ है। अच्छी योजनाएं भी इस तरह के मौकापरस्तों और उनके आकाओं के कारण अपने लक्ष्य तक न पहुँच आलोचनाओं का शिकार हो अप्रियता को प्राप्त हो जाती हैं।             

5 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, निश्चय कर अपनी जीत करूँ - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

अन्तर सोहिल ने कहा…

एक वैज्ञानिक ने एक मेंढक को उबलते हुये पानी में डाला, मेंढक तुरंत फुदक कर बाहर। फिर उसने मेंढक को सामान्य तापमान वाले पानी में डाला और धीमी सी आग जला दी नीचे, मेंढक आराम से तैरता रहा। पानी उबलने लगा लेकिन मेंढक तैरता रहा। वो अनुकूल हो गया धीरे-धीरे गर्म पानी में।
ऐसे ही 60 सालों में भारतीयों को आलसी, मुफ्तखोर बनाने की कोशिशें की जाती रही हैं। सब्सिडी दे, पेंशन दे, खाना दे, सस्ता दे सबकुछ लेकिन सरकार दे, हम हाथ-पैर नहीं हिलायेंगे।
पादे से ही काम चल जाये तो हगने की क्या जरुरत

अन्तर सोहिल ने कहा…

बहुत अच्छी और सच्ची पोस्ट
छोटी-छोटी समस्याओं के लिये तो मिस्त्री, कारीगर मिलने बहुत ही मुश्किल हैं। खाली बैठे रहते हैं लेकिन काम करके राजी नहीं हैं। मंहगाई का रोना सब रोते रहेंगे। काम चाहे केवल बिजली का एक तार जुडवाना हो, अव्वल तो करके ही नहीं राजी और करेंगे भी तो 100 रुपये कम से कम

प्रणाम स्वीकार करें

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सोहिल जी, यही तो विडंबना है ! न देने वाले का धेला लग रहा है और लेने वाले का तो क्या ही लगना है. जिनके बल पर दोनों तरफ का "पक्षी" सीधा हो रहा है, वे सिर्फ कुढ़ रहें हैं, धांधली देख-देख कर.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी, हौसला-अफ़जाई के लिए आभार.