शनिवार, 19 अप्रैल 2014

रति में ज्यादा सुख किसे प्राप्त होता है? नर को या नारी को ?

स्त्री-पुरुष के आपसी संयोग में किसे ज्यादा सुख की अनुभूति होती है, ऐसा प्रश्न धर्मराज युधिष्ठिर के मन में कैसे आया, इसका जवाब तो खुद उनके पास भी नहीं था  !!!

प्रकृति द्वारा स्त्री-पुरुष की रचना इस लिए की गयी है कि इस धरा पर इनके प्रजनन के फलस्वरूप सदा जीवन बना रहे. इसके लिए दोनों में लगाव को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यही लगाव दोनों को करीब लाता है, इसमें उन्हें जो सुख मिलता है उसे पाने के लिए प्रजनन के समय मर्मांतक पीड़ा के बावजूद इससे कोई मुंह नहीं मोड़ता। पर इसमें ज्यादा आनंद की अनुभूति किसे होती है यह प्रश्न सदियों से सर उठाता रहा है. यह  विषय बड़ा नाजुक है। पर जिज्ञासा तो जिज्ञासा है ! 

यह बात किसी आम इंसान को नहीं धर्मराज युधिष्ठिर के मष्तिष्क को भी मथती रहती थी. तभी तो महाभारत के भीष्म पर्व में, जब महामहिम भीष्म शरशय्या पर अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे तब उनसे ज्ञान पाने के लिए तमाम राजकुमार अपने-अपने प्रश्नों का समाधान प्राप्त कर रहे थे तब अचानक युधिष्ठिर ने यह प्रश्न उनके सामने रख दिया की आपसी संयोग में ज्यादा सुख किसे प्राप्त होता है? नर को या नारी को ? सवाल सुन एक बार तो भीष्म पितामह भी चौंक गए की युधिष्ठिर जैसे नीतिवान, ज्ञानी, संयमी इंसान की यह कैसी जिज्ञासा !!  पर प्रश्न तो प्रश्न था उत्तर तो देना ही था।  तब उन्होंने इससे संबंधित एक कथा सब को सुनाई।  

प्राचीन काल में भंगस्वर नामक एक बड़ा प्रतापी राजा था, पर संतान न होने के कारण सदा चिंतित रहता था. एक बार अपने गुरु के कहने पर उसने पुत्र प्राप्ति के लिए अग्निस्तुत यज्ञ किया, इस यज्ञ के विधान स्वरूप इसकी हवि सिर्फ अग्नी देव को ही दी जाती थी. यज्ञ सफल रहा और उसके फलस्वरूप राजा को सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई।  पर यज्ञ में खुद को हिस्सा न मिलने के कारण देव राज इंद्र नाराज हो गए और उसने राजा को दंड देने की ठान ली।  कुछ दिनों बाद एक बार राजा शिकार के लिए जंगल में गया और रास्ता भटक गया. चलते-चलते थकान और प्यास के मारे बुरे हाल राजा को एक झील दिखाई दी, राजा ने आव देखा न ताव और झील के पानी में कूद पड़ा. वह झील मायावी थी और उसमें डुबकी लगाने वाला पुरुष नारी और नारी पुरुष बन जाता था। जब राजा पानी के बाहर आया तो उसने अपने आप को एक नारी के रूप में पाया। यह देख उसकी शर्मिंदगी की हद न रही. इस रूप में अपने राज्य में तो वह कतई नहीं जा सकता था सो इस महान दुःख के बावजूद कि उसे अपने बच्चों से अलग रहना पडेगा  उसने वन में रहने का ही निश्चय कर लिया। उसने अपने बच्चों और रानियों को सारी घटना का ब्योरा बताते हुए अपना संदेश घोड़े के माध्यम से अपने राज्य भिजवा दिया।

कुछ दिनों बाद उसकी भेंट एक तपस्वी से हुई और दोनों साथ-साथ रहने लगे। समय के साथ इनके भी सौ पुत्र हुए पर इस बार बिना किसी यज्ञ के।  पर इतने बच्चों का लालन-पालन जंगल में करना बहुत कठिन था सो महिला बने राजा ने अपने इन पुत्रों को साथ ले अपने राज्य जा कर अपने पुरुष योनी से उत्पन्न पुत्रों का सबसे परिचय करवाया और इन सौ भाइयों का भी वहीं रहने का प्रबंध कर वापस जंगल लौट आया।  पर राजा की यह खुशी भी इंद्र को बर्दास्त नहीं हुई. उसने सोचा कि मैंने राजा को दंड दे दुखी करने का सोचा था पर यहां तो इसके सुख का भंडार ही भरता जा रहा है. उसने क्रोधित हो राजा के राज्य में जा उसके पहले के पुत्रो को भड़का कर उन दो सौ राजकुमारों में युद्ध करवा उन सब को मरवा डाला।  जब राजा को इस सब का पता चला तो वह बड़ा दुखी हुआ और इंद्र से इस नाराजगी का कारण जानना चाहा।  इंद्र ने कहा तुमने अपने यज्ञ में मेरा हिस्सा न दे जो अनादर किया था, यह उसी का फल है।
राजा ने उससे क्षमा याचना की. इंद्र ने खुश हो कहा मैं तुम्हारे सौ पुत्रों को जीवित कर सकता हूँ, बताओ कौन से सौ पुत्रों का जीवन तुम्हें चाहिए ?
राजा ने कुछ देर सोचा और फिर कहा की माँ  के रूप में मैंने जिन्हें जन्म दिया है, उनका जीवन लौटा दें।  इंद्र ने पूछा ऐसा क्यों ? तो राजा ने जवाब दिया कि माँ की ममता अपने बच्चों पर अधिक होती है इसलिए।
इंद्र ने खुश हो उसके सारे पुत्रों को जीवन दान दे कर कहा कि मैं तुम्हारा पुरुषत्व भी लौटा देता हूँ.
पर राजा ने उनकी बात नहीं मानी और कहा देव, आपसी संयोग में पुरुष की बजाए नारी को अधिक सुख प्राप्त होता है इसलिए मैं नारी ही बना रहना चाहता हूँ।

पूरी कहानी सुना भीष्म पितामह ने, युधिष्ठिर जो सारे राजकुमारों के साथ सर झुकाए खड़े थे की ओर देखा और कहा, लगता है तुम्हारी जिज्ञासा का शमन हो चुका होगा, पर ऐसे प्रश्न का विचार तुम्हारे मन में कैसे आया ? इस बात का जवाब शायद युधिष्ठिर के पास नहीं था।   

4 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज कि बुलेटिन वोट और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति व लेखन , धन्यवाद !
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गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हर्षवर्धन जी,
हार्दिक धन्यवाद।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आशीष जी,
यूं ही प्रेम-भाव बना रहे।