मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

सोच, पहली बार मतदाता बने युवाओं की

 इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  

अभी-अभी संपन्न हुए चुनावों में लाखों युवाओं को, जो एक आंकड़े नुमी उम्र को पार कर गए थे, शिरकत करने का सिर्फ उस आंकड़े को पार करते ही अवसर मिल गया। आज नहीं तो कल उन्हें इस प्रक्रिया में आना ही था। पर सवाल यह उठता है कि क्या उस आंकड़े को छू जाने से ही बालक से युवा हुआ व्यक्ति क्या इतना परिपक्व हो जाता है कि वह अपनी बुद्धि से अच्छे-बुरे, हानि- लाभ की पहचान बिना किसी बाहरी प्रभाव के कर सके ? बालपन में अपनी ही दुनिया में रहने वाले को अचानक बड्डपन का भार दे क्या उससे यह आशा की जा सकती है कि वह देश की भलाई के लिए देश पर शासन करने वालों का चुनाव कर देश का भविष्य निर्धारित कर सके ? कहने का मतलब यह नहीं है कि यह उम्र अभी कम है या सारे युवा परिपक्व नहीं होते। कभी न कभी तो उन्हें यह भार अपने कंधों पर लेना ही है पर अधिकाँश ऐसे नए मतदाता पेशोपेश में रहते हैं. अपनी समझ, अपनी बुद्धी या अपनी सोच पर दृढ नहीं होते। ज्यादातर अपने परिवार के बड़ों का अनुसरण करते हैं।  कुछेक अपने साथियों के कहने पर चलते हैं, कुछेक के लिए यह छुट्टी की मौज-मस्ती का एक मनोरंजक पहलू होता है।  

यह सत्य मेरे सामने तब आया जब मैंने पहली बार मतदाता बने अपने भतीजे से पूछा कि उसने किसे वोट दिया। उसका जवाब बड़ा अप्रत्याशित था, उसने कहा कि वह सब को खुश रखने के लिए हर बार अलग-अलग दलों को वोट देगा। इस बार "इस" को दिया है अगली बार "उस" को और फिर किसी तीसरे को।  मैंने पूछा ऐसा क्यों ? तो बोला हमारे ग्रुप ने ऐसा ही फैसला किया है। हो सकता है कि अगले एक दो साल में उसे मतदान का महत्व समझ में आ जाए पर उसके पीछे आने वाली पीढ़ी भी क्या ऐसा ही करेगी? 
   
यह सुन मेरे में एक जिज्ञासा जगी कि कुछ ऐसे ही बच्चों से बात की जाए। यह कोई "सर्वे" नही था नहीं किसी नतीजे पर पहुँचने का मार्ग, सिर्फ एक जिज्ञासा को शांत करने का जरिया था। मैंने अलग-अलग जगहों के 100  बच्चों का लक्ष्य रखा था पर समयाभाव के कारण  63 से ही बात कर सका, जिनके जवाब गरीब तो नहीं अजीब जरूर थे।  इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी या शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही नहीं बनती कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने के पहले उस पौध को उसकी गंभीरता से अवगत करवा दिया जाए? उसे बताया और समझाया जाए कि इस जिम्मेदारी की  देश के भविष्य को तय करने में कितनी अहम् भूमिका है।  उनकी नासमझी कितने गलत हाथों को सक्षम बनाने की उत्तरदायी हो सकती है।  

यह तो शहर के पढने-लिखने वाले स्कूली शिक्षा पाने वाले बच्चों का हाल है. सोच कर ही मन घबड़ाता है कि दूर-दराज के ज्यादातर उचित शिक्षा विहीन उम्र के इस आंकड़े को प्राप्त करने वाले युवा कैसे-कैसे प्रलोभनों से और किस-किस से प्रभावित हो कैसे-कैसे लोगों को अधिकार सौंप देते होंगे।    

                 

3 टिप्‍पणियां:

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12-12-13 के चर्चा मंच पर दिया गया है
कृपया पधारें
आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Dilbag ji, aabhar

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

युवा में शक्ति है, ऊर्जा है, अनुभव आते ही दिशा भी मिलने लगती है।