रविवार, 6 मई 2012

आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध है।

 कुछ वर्षों पहले बुजुर्गों से आशीर्वाद मिला करता था 'जुग-जुग (युग-युग)जीयो' यानि जीवेम शरद: शतम। उस समय स्वस्थ रहना एक आम बात थी, जो शुद्ध जल, वायु तथा अन्न का प्रदाय थी। हमारे पौराणिक नायक अपने उत्कर्ष के समय में 80-100 साल के होते थे ऐसा वर्णन मिलता है, तो उस समय औसत आयु 150-200 साल की होती होगी। जो आज सिमट कर औसतन 60-65 के आस-पास आ गयी है। वह भी दवा-दारू के भरोसे।

उम्र का सीधा संबंध तन से है और तन को स्वस्थ रखने के लिए शुद्ध आहार की अति आवश्यकता होती है। पर आज जैसा हाल और माहौल है उसमें तो शुद्धता का अर्थ ही बदल गया है। कहावत है कि "जैसा अन्न वैसा मन" पर इसमें आज संशोधन की जरूरत आन पडी है, जिससे अब यह "जैसा अन्न वैसा तन" हो जानी चाहिए। ऐसा दिख भी तो रहा है। आज शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां आए दिन कोई मिलावटी खाद्य पदार्थ से अस्वस्थता महसूस ना करता हो। विडंबना तो यह है कि हमारे देश में मिलावटी भोज्य पदार्थ खा कर बीमार हुए इंसान को दवा भी नकली मिलती है, जो करेले की बेल को नीम के पेड पर चढा दोहरी मार दिलवाती है। इस जघन्य अपराध का खात्मा होना तो दूर पहुंच वालों की मिली-भगत से दिन प्रति दिन बढोत्तरी होती ही दिखती है। इसी कारण आम इंसान की बात ही क्या, साधू-संत और नियम-बद्ध जीवन यापन करने वाले स्त्री-पुरुष भी रोगों की चपेट से खुद को नहीं बचा पाते।

आदमी तंदरुस्त रहता है तो स्वयं की देख-रेख में हर पैथी, हर नुस्खा या सुझाव उसे स्वस्थ रहने में सहायक होते हैं। पर इतने बडे शरीर रुपी यंत्र का एक अदना सा पुर्जा भी बेकाबू हो जाए तो फिर उसके तन और धन का भगवान ही मालिक होता है। क्योंकि आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध के ताई हो गया है। बीमारी के दौरान दवा-दारू का अतिरिक्त बोझ संभालना अब सब के वश की बात नहीं रह गयी है। सरकारी अस्पतालों की हालत तो जग जाहिर है, जहां अच्छा-भला आदमी बीमार सा लगने लगता है तो दूसरी ओर निजी क्लिनिकों में बीमारी का कम जेब का सफाया ज्यादा होने लगा है। चार-पांच दिन की दवाएं ही आधे महीने के राशन का बजट बिगाड कर रख देती हैं।

इसी सब को ध्यान में रखते हुए अब एहतियात बरतना जरूरी हो गया है कि हम अपनी दिनचर्या और खान-पान का पूरा ख्याल रखें जिससे बीमार पडने के अपराध से बचे रहें।

आगे प्रभू राक्खा।

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

घिसट घिसटकर जीना तो बहुत ही अखरता है।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सहमत हूँ आपसे ...

इस पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार - आपकी पोस्ट को शामिल किया गया है 'ब्लॉग बुलेटिन' पर - पधारें - और डालें एक नज़र - लीजिये पेश है एक फटफटिया ब्लॉग बुलेटिन

देवांशु निगम ने कहा…

निश्चित ही संयमित दिनचर्या बहुत ज़रूरी है अभी तो | बाकी मिलावट के लिए तो क्या कहा जाए "जब सैंया भये कोतवाल, फिर डर काहे का"