गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तीन टन की मूर्ति, जो हवा के झोंके से घूमती है


इस  इमारत की  सबसे   अनोखी,   आश्चर्यजनक,   अनूठी  तथा   हैरतंगेज वस्तु है,  मेमोरियल  के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति, जिसके एक हाथ में बिगुल है।  काले  कांसे से  बनी   इस मूर्ति  का वजन तीन टन है। इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की  गति से  हवा के  चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। इंजीनियरिंग का यह बेजोड़ और अनूठा कमाल है

विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता की शान और पहचान। जिसे अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्ञी रानी विक्टोरिया और अंग्रेजों के स्वर्णिम शासन काल की याद में उस समय की भारत की राजधानी में इस भव्य इमारत को बनवाया था। उनकी इच्छा थी कि यह इमारत आगरे के ताजमहल से भी ज्यादा भव्य हो। संसार के कुशलतम शिल्पी विलियम एमर्सम के अथक प्रयास और देश के सबसे उत्तम मकराना के संगमरमर से सजने के बावजूद, अपने आप में शिल्प और कला का यह नायाब नमूना ताज की बराबरी तो नहीं कर पाया पर संसार की सुंदरतम इमारतों में अपने आप को शुमार जरूर करवा लिया। इसके अंदर एक छोटा सा पर बहुत खूबसूरत सलीके से सजाया गया म्यूजियम भी है जहां विक्टोरिया युग के आयुध, पेंटिंग, मुर्तियां, सिक्के, डाक-टिकट, कपडे, कलाकृतियां आदि बडे आकर्षक तरीके से लोगों के ज्ञानार्जन के लिए रखे गये हैं।       

ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोलकाता आने वाला कोई भी पर्यटक इस 338x228 और 184 फिट की कलाकृति को देखे बिना वापस चला जाए। बाहर से आने वालों को छोडिए बंगवासी यहां के रहवासी भी यहां बार-बार आने का मोह छोड नहीं पाते हैं। 

पर इस इमारत की सबसे अनोखी, आश्चर्यजनक, अनूठी तथा हैरतंगेज वस्तु है, मेमोरियल के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति जिसके एक हाथ में बिगुल है। इसे "एंजल आफ़ विक्टरी" के नाम से जाना जाता है। काले कांसे से बनी 16 फिट की इस मूर्ति का वजन तीन टन है। 23 बाल-बेयरिंगों की सहायता से इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की गति से हवा के चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। यानि यह हवा की दिशा बतलाने वाला यंत्र यानि  "Weather-Cock"  है। इतने ज्यादा वजन के बावजूद हवा के झोंके से घूम जाने वाला इंजिनियरिंग का कमाल। जो पूरे ३६० डिग्री तक घूमने की क्षमता रखता है.   

1921 में बनाया गया यह अजूबा वर्षों-वर्ष बिना किसी खराबी के अपनी कसौटी पर खरा उतरता रहा। पहली बार 1985 में इसके घूमने में रुकावट आयी थी, वह भी इमारत का रख-रखाव करते हुए धूल-मिट्टी के कारण इसके बेयरिंग के जाम होने से। उसे तुरंत ठीक भी कर लिया गया था। पर 1999 में आकाशीय बिजली के गिरने से इसका घूमना बिल्कुल बंद हो गया था। पर 6 सालों की अथक मेहनत से इसे फिर अपनी पूर्वावस्था में लाने में कामयाबी हासिल कर ली गयी।  पूरा काम बहुत जोखिम भरा था जरा सी चूक इस ऐतिहासिक  इमारत को मंहगी पड सकती थी। इसी लिए बहुत सावधानी पूर्वक हर कदम को फूंक-फूंक कर रखते हुए सारे काम को अंजाम दिया गया था। 

बंगवासी बेहद संवेदनशील होते हैं। मूर्ति  भले ही अंग्रेजों की देन हो पर उससे सारे बंगाल के रहवासियों को हार्दिक लगाव था तभी तो उसके खराब होने पर पूरे बंगाल में जैसे शोक की लहर दौड गयी थी। पर उसका ठीक होना भी किसी उत्सव से कम नहीं रहा।




8 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

वाकई यह उत्तम इंजिनियरिंग की मिसाल है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, गति बनी रहे..

mahendra mishra ने कहा…

abhaar janakari dene ke liye...

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सन 1996 के मई के महीने मे आखिरी बार गया था विक्टोरिया मेमोरियल ... उसके बाद जाना नहीं हुआ ... अब जब भी जाना हुआ कलकत्ता तो जरूर जायुंगा !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

प्रवीण जी, किसकी :-)

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शिवम जी, वही बात है न, जब चीज पास होती है तो उसकी कदर नहीं होती। जब वहां थे तो रोज ही इधर-उधर गुजरना होता था, पर रुक कर कहां इन सब पर ध्यान दिया जाता था। अब दूर हैं तो सबकी याद आती है।

P.N. Subramanian ने कहा…

बेहद सुन्दर इमारत है. मूर्ती के बारे में कम जानकारी थी. वहां का संग्रहालय भी अच्छा लगा था. आभार. .