गुरुवार, 24 मार्च 2011

सोमनाथ के दरवाजे स्वर्ण मंदिर में

भारत की समृद्धि और वैभव के चर्चे सुन कर बाहर से बार-बार आतंकियों के हमले हुए हैं। खण्ड़-खण्ड़ में बिखरे राज्यों और उनके, एक-दो को छोड़, शासकों को बहुतेरी बार जलील होना पड़ता रहा है। पर उनके गरूर और अहम के कारण कभी भी पूरे देश में एका नहीं हो पाया और इसी का फायदा बार-बार लुटेरे उठाते रहे। कैसे-कैसे नहीं लूटा उन्होंने, यहीं के मवेशियों पर यहीं के लोगों के सहारे जितना भी जैसा भी जो भी बन पाया उठा कर ले गये। और हम आशा करते रहे कि भगवान खुद आ कर हमारी रक्षा करेगा।

अठारहवीं शताब्दी में अहमद शाह अब्दाली यहां आ घुसा और मनमर्जी से लूट-पाट की। उसका सारा ध्यान उस समय के सबसे समृद्ध सोमनाथ के मंदिर पर था। उसके हमले की खबर पा आस-पड़ोस के राजाओं ने सैन्य सहायता की पेशकश की थी। पर कहा जाता है कि मंदिर के कर्ता-धर्ताओं ने उनकी पेशकश यह कह कर नामंजूर कर दी थी कि भगवान खुद अपनी रक्षा में सक्षम हैं।

हुआ वही जो होना था। अब्दाली ने पूरे मंदिर को खाली कर दिया, यहां तक कि उसके सुंदर और खूबसूरत दरवाजों को भी नहीं छोड़ा। यह बात जब पंजाब के शूरवीरों को पता चली तो वे आगबबूला हो गये। उन्होंने अब्दाली को ललकारा और युद्ध कर उससे वे दरवाजे वापस प्राप्त कर लिए। पर जब वे उन दरवाजों को सोमनाथ मंदिर के पुजारियों को लौटाने गये तो उन्होंने यह कह कर दरवाजे वापस लेने से इंकार कर दिया कि मलेच्छों के हाथ लगने से ये द्वार अपवित्र हो गये हैं, इसलिए इन्हें मंदिर में पुन: स्थापित नहीं किया जा सकता। तब उन दरवाजों को पंजाब ले आया गया तथा उनमें और मीनाकारी करवा, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की दर्शनी ड़्योढी में प्रतिस्थापित कर दिया गया।

तब से लेकर आज तक वे सोने और हाथी दांत से जड़े विशाल दरवाजे मंदिर की शोभा बढाने में अपना योगदान दे रहे हैं।

मंगलवार, 22 मार्च 2011

इस सीख के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ?

बहुत दिनों से बहुत बार यह बात मन में आती रही थी कि जब छोटे से छोटे "कार्टून कैरेक्टर" का भी कोई नाम होता है तो गांधी जी के तीन बंदरों का भी कोई नाम तो जरूर होगा। पर ख्याल आ कर ऐसे ही चला जाता था।आज अचानक उनसे परिचय हो गया तो सोचा उन प्रसिद्ध हस्तियों का आपसे भी परिचय करवा दूं।
चीन में हजारों सालों से प्रचलित उपदेशों को करीब पांच सौ साल पहले जापान में मूर्त रूप दिया गया तीन बंदरों के द्वारा। जो अपना आंख, कान तथा मुंह ढक कर यह संदेश देते हैं कि बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो। इनके नाम क्रमश: इस तरह हैं :-
# मिज़ारू (बुरा मत देखो)
# कीकाजारु (बुरा मत सुनो)
# इवाज़ारु (बुरा मत कहो)

पर एक बात जो समझ में नहीं आई वह यह है कि इस उपदेश के लिए बंदरों को ही क्यों चुना गया ? आप को ज्ञात हो तो !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

इसके पहले कि "होली" हो ले

होली का त्यौहार कबसे शुरू हुआ यह कहना बहुत ही मुश्किल है। पुराणों व पुराने कथानकों में इससे संबंधित अनेकों कथाएं मिलती हैं।

महाभारत मं उल्लेख है कि ढोढा नामक एक राक्षसी ने अपने कठोर तप से महादेवजी को प्रसन्न कर अमर होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। अंधेरे में रहने के कारण उसे रंगों से बहुत चिढ थी। उसने अपने स्वभावानुसार चारों ओर अराजकता फैलानी शुरू कर दी। तंग आकर लोग गुरु वशिष्ठजी की शरण में गये तब उन्होंने उसे मारने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि सिर्फ निष्पाप बच्चे ही उसका नाश कर सकते हैं। इसलिये यदि बच्चे आग जला कर उसके चारों ओर खूब हंसें, नाचें, गाएं, शोर मचाएं तो उससे छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसा ही किया गया और ढोढा का अंत होने पर उसके आतंक से मुक्ति पाने की खुशी में रंग बिखेरे गये। तब से दुष्ट शक्तियों के नाश के लिये इसे मनाया जाने लगा।

दूसरी कथा ज्यादा प्रामाणिक लगती है। कहते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने देवताओं, सूर्य, इंद्र, वायू, की कृपा से प्राप्त नये अन्न को पहले, धन्यवाद स्वरूप, देवताओं को अर्पित कर फिर ग्रहण करने का विधान बनाया था। जाहिर है नया अन्न अपने साथ सुख, स्मृद्धि, उल्लास, खुशी लेकर आता है। सो इस पर्व का स्वरूप भी वैसा ही हो गया। इस दिन यज्ञ कर अग्नि के माध्यम से नया अन्न देवताओं को समर्पित करते थे इसलिये इसका नाम ”होलका यज्ञ” पड़ गया था। जो बदलते-बदलते होलिका और फिर होली हो गया लगता है।

एक और उल्लेख भी मिलता है। जिसके अनुसार वैदिक काल में एक अनुष्ठान किया जाता था, जिसे सोमयज्ञ कहते थे। यह अपने आप में अनूठा तथा विशेष प्रकार का यज्ञ होता था। इसे संपन्न करवाने के लिए कर्मकांडी वेद पाठी दूर-दूर से बुलाए जाते थे। जो करीब साल भर कठोर नियमों से बंधे रह कर इसे पूरा करते थे। इसे पूरा करने के नियम बहुत कठोर हुआ करते थे जिनमें भूल और छूट की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। इसीलिए इस यज्ञ के सफलता पूर्वक पूर्ण होने पर खूशी का माहौल बनता था और इतने दिनों तक नियम-कायदे से बंधे लोग अपनी शारीरिक और मानसिक थकान मिटाने के लिए सारे वातावरण को उल्लास और आनंद से भर देते थे।

इस पर्व का नाम होलका से होलिका होना भक्त प्रह्लाद की अमर कथा से भी संबंधित है। जिसमें प्रभु भक्त प्रह्लाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप के जोर देने पर उसकी बुआ होलिका उसे गोद में ले अग्नि प्रवेश करती है पर प्रह्लाद बच जाता है।

इसी दिन राक्षसी पूतना का वध कर व्रजवासियों को श्री कृष्ण जी ने भयमुक्त किया था। जो त्यौहार मनाने का सबब बना।

पर इतने उल्लास, खुशी, उमंग, वैमन्सय निवारक त्यौहार का स्वरूप आज विकृत होता या किया जा रहा है। हंसी-मजाक की जगह अश्लील गाने, फूहड़ नाच, कुत्सित विचार, द्विअर्थी संवाद, गंदी गालियों की भरमार, काले-नीले ना छूटने वाले रंगों के साथ-साथ वैर भुनाने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर इस त्यौहार की पावनता को नष्ट करने की जैसे साजिश चल पड़ी है। समय रहते कुछ नहीं हुआ तो धीरे-धीरे लोग इससे विमुख होते चले जायेंगे।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

जापानियों, तुम्हें सलाम है.

दूसरा विश्वयुद्ध लाया था जापान के लिए तबाही और सिर्फ़ तबाही। हिरोशिमा तथा नागासाकी जैसे शहर तबाह हो गये थे। सारे देश की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी। किसी भी संस्था के पास अपने कर्मचारियों के लिये पूरा काम न था। इसलिए एक निर्णय के तहत काम के घंटे 8 से घटा कर 6 कर दिए गये तथा साप्ताहिक अवकाश भी एक की जगह दो दिनों का कर दिया गया। नतीजा क्या हुआ: अगले दिन ही सारे कर्मचारी अपनी बांहों पर काली पट्टी लगा काम पर हाजिर हो गये। ऐसा विरोध ना देखा गया ना सुना गया। उनकी मांगें थीं कि देश पर विप्पतियों का पहाड टूट पडा है तो हम घर मे कैसे बैठ सकते हैं। इस दुर्दशा को दूर करने के लिए काम के घंटे घटाने की बजाय बढा कर दस घंटे तथा छुट्टीयां पूरी तरह समाप्त कर दी जाएं। सब की एक ही हार्दिक इच्छा थी कि हम सब को मिल कर अपने देश को फिर सर्वोच्च बनाना है। यही भावना थी, जिससे जापान गर्व से सिर उठा कर फिर खड़ा हो सका था।
आज फिर वैसी ही आपदा का सामना कर रहा है जापान। फर्क यह है कि इस बार प्रकृति विनाश पर उतारू है। आग, हवा, पानी, जैसे सारी दैवीय शक्तियाँ परीक्षा लेने पर आमादा हैं। पर सारी दुनिया को विश्वास है कि यह जुझारू देश फिर उठ खडा होगा सारी परेशानियों, मुसीबतों की धूल झाड कर। जापानी कभी हार नहीं मानते, इसका प्रमाण उन्होंने बार-बार दिया है। फिर इस बार तो सारा विश्व उनके साथ है।

बुधवार, 16 मार्च 2011

जमुहाईयाँ कैसी-कैसी






अंतरजाल का धन्यवाद।
होली मुबारक हो ।














सोमवार, 14 मार्च 2011

"हर क्षेत्र में" महिलाओं को बराबरी का दर्जा हासिल है. कोई शक? :-)

कुछ दिनों पहले एक पोस्ट डाली थी, जिसमें एक 'सज्जन' द्वारा प्लेन की महिला पायलट होने के कारण सफर से इंकार कर दिए जाने की खबर थी। काफी लानत-मलानत भी हुई थी उस यात्री की। पर आज की एक और चौंका देने वाली खबर ने तो बहुतों के होश उड़ा कर रख दिए होंगे और वे भी ऐसी पायलट वाली उड़ान से तौबा करने की सोचने लगे होंगे, जब उन्हें पता चला होगा कि एक महिला फर्जी अंकशीट लेकर हवाई नौकरी कर रही थी। पता नहीं कबसे सैंकड़ों लोगों की जान को दांव पर लगा कर। एक उसकी ही हमपेशा फरार है।

तो क्या उस यात्रा ना करने वाले महाशय को पता था इन कारस्तानियों का? :-)

क्या अब भी किसी को शक है कि हमारे देश में महिलाओं को बराबर का दर्जा नहीं दिया जाता या वे "किसी भी क्षेत्र में" " पुरुषों से कमतर हैं।

शनिवार, 12 मार्च 2011

मैं कुछ नहीं कहना चाहता !! आप भी कुछ न कहें !!!

एक चौथी-पांचवीं का बच्चा भी जब स्कूल में परीक्षा देने जाता है तो पूरी तैयारी से जाता है। उसे पता होता है कि उसे किस विषय की परीक्षा देनी है और क्या लिखना है।

एक युवक जब नौकरी के लिए साक्षात्कार के लिए जाता है तब वह भी काम से संबंधित हर संभावित विषय की पूरी तैयारी कर घर से निकलता है।

इनकी तो छोड़िए, एक साधारण गृहिणी भी घर का सामान लेने बाहर जाती है तो उसके दिमाग में लेने वाली वस्तुओं और अपने बजट का पूरा खाका बना कर ही चलती है।

पर क्या कहेंगें प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) के जिम्मेदार अफसरों को जो साठ अरब के करीब के घोटाले का पर्दाफाश करने कोर्ट में साठ रुपये का केस भी ना पेश कर सके। कोर्ट की लताड़ तो मिलनी ही थी।
माननीय जज महोदय ने झुंझलाते हुए उनकी जमानत ना देने की अर्जी पर कहा "आप लोग कोई एक, सिर्फ एक केस तक तो बना नहीं पा सके तो किस बिना पर उसे रिमांड पर रखना चाहते हैं? किस बात की तफ्तीश करना चाहते हैं?

फिर पूरे फिल्मी लहजे में घोड़ों और भू-संपत्ति का विवादित व्यवसायी हसन अली खान, जिस पर इस सदी के सबसे बड़े घोटाले का केस दर्ज है, मुस्कुराते हुए अपनी चमचमाती कार में बैठ ये गया वो गया।
अब अंग्रजों के जमाने के जासूस खोजते रहें फिर से सबूत।

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

इस (भ्रष्ट)अचार का स्वाद लेना चाहेंगे ?

अभी-अभी ई-मेल से यह अचार मिला है। सोचा आप भी चटकारा लगा लें।


इस अचार का निर्माता भारतीय मतदाता।








गुरुवार, 10 मार्च 2011

जनाब, जिनके साथ आप लाईन में खडा नहीं होना चाहते उन्हीं के पैसों से यह मौज ले पा रहे हो

आज अखबार की दो खबरों ने दिमाग को परेशान कर रख दिया। सोचा आप सब की राय भी ले ली जाए।

पहली खबर थी :-
"आई सी एस ई" की कक्षा 10 के इतिहास और नागरिक शास्त्र के अध्यायों में शहीद भगत सिंह, राजगुरु तथा सुखदेव को देशभक्त ना होकर आतंकवादी बताया गया है। इसके अलावा देश के लिए अपना सब कुछ त्यागने वाले बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल को चरमपंथियों की संज्ञा दी गयी है। यह है हमारी शिक्षा प्रणाली और उसको चलाने संवारने वालों का हाल। देश के बच्चों को जो ज्ञान बांटा जा रहा है उससे कौन सी पीढी तैयार होगी या किस दिशा में ले जा रहे हैं ये कर्णधार आने वाली नस्ल को, यह उसका एक छोटा सा नमूना है। न्यायालय के आदेश पर अब जांच होगी। सुधार हुआ भी तो अगले साल।
जरा सोचिए वह कौन सा शख्स है जिसने ऐसा लिखने की जुर्रत की। क्या उसने किसी के इशारे या शह पर ऐसा किया ? वह कौन से महानुभाव हैं जिन्होंने पुस्तक को पाठ्यक्रम में रखने की इजाजत दी। वे कौन से महान शिक्षक हैं जो आंख बंद कर रट्टू तोते की तरह कुछ भी रटवाते चले गये, बिना कुछ समझे या पढे ? क्या शिक्षकों का विद्या से सिर्फ पैसे का ही नाता बचा है।
सिर्फ पुस्तक से वह अध्याय हटा या सुधार देने से ही बात खत्म नहीं होती, सारे के सारे दोषियों को भी कटघरे में खड़े करवाना जरूरी है जिससे आइंदा कोई ऐसी हरकत करने के पहले दो बार सोचे।

दूसरी खबर हमारे एक नेताजी की है :-
आजकल दक्षिण के एक सांसद महोदय सरकार से बहुत खफा हैं। हुआ क्या कि दिल्ली एयरपोर्ट पर इन महोदय को आम आदमियों के साथ लाइन में लगना पड़ गया। बस जनाब हत्थे से उखड़ गये। ये चाहते थे कि उन्हें बिना लाइन में लगे हवाई जहाज तक सीधे जाने दिया जाए। सांसदों की इतनी साख तो होनी चाहिए। उनका कहना है कि नियम बदल कर सांसद को लाईन में लगने के बजाय उसके सचिव को लाईन में खड़े होने की इजाजत होनी चाहिए जिससे सांसद को लाईन में खड़े होने की शर्मिंदगी ना उठानी पड़े। सोचने की बात है, जिन लोगों की कृपा से आप सांसद बने, जिनका आपने प्रतिनिधित्व करना है, उन्हीं के साथ खड़े होने में आप को शर्म आ रही है। जनाब आपको तो लज्जित होना चाहिए अपनी सोच पर, जिनके साथ आप खड़े नहीं होना चाहते उन्हीं के पैसों से आप हवाई उड़ान का मजा ले रहे हो। अपनी दमड़ी खर्च करो तो पता भी चले।

बुधवार, 9 मार्च 2011

विष्णूजी की मजबूरी सुनते ही भक्त आपे से बाहर हो गया

वैसे तो स्वर्ग में सदा ही वसंत छाया रहता है। पर फिर भी आजकल कुछ खास दिनों को और भी मौज-मस्ती के हवाले कर दिया जाता है। स्वर्ग को स्वर्ग से भी सुंदर बनाने की हर कवायद पूरी की जाती है। सारे देवी-देवता इकट्ठा हो कर रंगरेलियों, नृत्य-गीत, रासक्रियाओं में रत हो सारी सुध-बुध भूल मस्त हो जाते हैं। इस मौके पर तीनों परम देव, ब्रह्मा, विष्णू, महेश भी सपत्निक उपस्थित रहते हैं।

आज भी सारे जने आनंद के सागर में सब कुछ भुला आकंठ ड़ूबे हुए थे। तभी विष्णूजी के चेहरे पर कुछ व्याकुलता के लक्षण उभरे। कुछ देर वे किसी सोच में ड़ूबे रहे जैसे ठीक ना कर पा रहे हों कि क्या करूं क्या ना करूं। पर फिर वे उठ कर कहीं चल दिए। सोमरस के नशे में ड़ूबे किसी भी देवता की नजर उन पर नहीं पड़ी। यहां तक कि देवी लक्ष्मी को भी उनके जाने का अहसास नहीं हो पाया। कुछ ही देर में वे वापस आ अपने स्थान पर चुपचाप बैठ गये। पर चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी। कुछ देर पहले का उल्लास गायब था। थोड़ी देर बाद लक्ष्मीजी की नजर उन पर पड़ी और उनकी हालत देख वे परेशान हो गयीं। तुरंत उनके पास आ उनकी बेचैनी का सबब पूछने लगीं। स्थिति को देख और भी देवता उनके पास चले आए। सबके आग्रह करने पर विष्णूजी ने कहना आरंभ किया "काफी देर से मुझे पृथ्वी लोक से अपने भक्त की करुण पुकार आ रही थी। पर इधर उत्सव से उठ कर जाने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। पर जब काफी देर तक वह मुझे पुकारता रहा तो अंत में मुझे जाना पड़ा। वहां पहुंचा ही था कि उसने शिकायतों के ढेर लगा दिए कि आज-कल आप हमारी परेशानियां, दुख, तकलीफ दूर करना तो अलग, पुकार भी नहीं सुनते। मैंने कहा कि ऐसा नहीं है, जरा अपनी व्यस्तता के कारण मजबूर था। वैसे तुम्हारी हालत का मुझे पता भी नहीं चल पाया नहीं तो मैं पहले ही कुछ करता। मेरा इतना कहना था कि वह भक्त आपे से बाहर हो गया, बोला "प्रभू हम ने ही देवता बनाए हैं। वही यदि हमारी सुध नहीं लेंगें तो हम उनका त्याग कर नये देवता गढ लेंगे जो हमारा दुख दर्द समझते हों, विपत्ति-कष्ट में हमारे साथ रहें, हमारी जिंदगी को कष्टमय होने से बचाएं। यह तो हमारी दरियादिली है कि सब कुछ देखते समझते भी हम अपने मुश्किल से जुटाए भोजन मे से भी आपको भोग लगाते हैं जिसे आप अपना हक समझने लग गये हैं। यदि हमारे बनाए देव हमारी ही खबर नहीं लेंगे तो उनको स्वर्ग से हटा कर किसी संग्रहालय में पटकने में भी हम देर नहीं करेंगे।" इतना कह विष्णूजी चुप हो गये।

सारे देवी-देवताओं के चेहरे फक्क पड़ गये थे। उन्हें अपना अस्तित्व और देवलोक का भविष्य संकट में पड़ता दिखने लगा था।

सोमवार, 7 मार्च 2011

बेसब्रों की लार ने सदन के गलीचों को गीला करना शुरू कर दिया है.

खाए-पीए को हजम करने तथा फिर अपनी व्यक्तिपूजक, लघुस्मृति वाली जनता के बीच जाने के पहले कुछ मुद्दों को तलाशने में लगाने वाले जरूरी वक्त को हासिल करने के लिए, हर मौके को लपकने की आदत वाले "देर मत कर" नामी पारिवारिक दल ने केंद्र से 'एच्छिक सेवानिवृति' लेने की इच्छा जाहिर कर दी है. सही भी है वहां और बने रह कर किसी भी तरह का फ़ायदा अब नजर नहीं आ रहा था. इसके अलावा घर आ चुके "फार्चून" से आने वाली फसल को भी लहलहाने की कोशीश करनी थी.
इधर केंद्र को इसलिए चिंता नहीं है क्योंकि आसपास जीभ लपलपाते या पेड़ों की फुनगियों पर अपनी चोंच तीक्ष्ण करते मौकापरस्तों की उसे पूरी गिनती और जानकारी है. जो पता नहीं कब से छींका टूटने और ऊंट की करवट का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं. अभी स्तीफे आए भी नहीं हैं पर बेसब्रों की लार ने टपक-टपक कर सदन के गलीचों को गीला करना शुरू कर दिया है. वैसे नाटक में इस बार भी वही "कैरेक्टर आर्टिस्ट" हैं जो हर बार, बार-बार आजमाए जा चुके हैं. अनेकों बार पीठ लाल हुई है. पर कुछ मजबूरी है, कुछ आदत है, कुछ खुशफहमी है, कुछ पूर्वाग्रह हैं, कुछ गरूर है कि हमारे बिना इस बदकिस्मत देश को और कोई घसीट नहीं सकता. मुई कुर्सी का यही तो करिश्मा है कि अच्छे, भले, कर्मठ इंसान को भी "मजबूर" बना कर छोड़ती है. वैसी ही मजबूरी जैसी ट्रेनों में लिखी रहती हैं कि आप अपने सामान की हिफाजत खुद करें. फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ सामान की जगह यहाँ आपकी रोजमर्रा की जिन्दगी है.
इधर जनता तमाशा देख रही है, समझ रही है उन मजबूरियों को जो दूरियों को नजदीकियों में बदलने में ही अपना वक्त जाया कर रही हैं.

मंगलवार, 1 मार्च 2011

एक शिव मंदिर, जहां एक करोड़ शिव-लिंग स्थापित हैं.

महाशिवरात्रि पर विशेष :

श्री 'कोटिलिंगेश्वर' महादेव

कर्नाटक के कोलार जिले के एक गाँव काम्मासांदरा में एक अद्वितीय शिव मंदिर है, जो 'कोटिलिंगेश्वर' के नाम से जाना जाता है. बेंगलुरु-चेन्नई रोड पर यह बेंगलुरु से ८७ की.मी. तथा कोलार की सोने की खदानों से ६ की.मी. की दूरी पर स्थित है.
१५ एकड़ के परिसर में स्थित यह मंदिर कई मायनों में अनूठा है. यहाँ अपनी तरह का दुनिया का सबसे ऊंचा शिव-लिंग स्थापित है. जिसकी ऊंचाई १०८ फुट है. इसके अलावा यहाँ तकरीबन रोज ही यहाँ आने वाले भक्तों के द्वारा शिव-लिंगों की स्थापना की जाती है. जिनकी संख्या अब करीब एक करोड़ तक पहुँच चुकी है. यहाँ स्थापित शिव-लिंगों को गिनना किसी अकेले के वश का नही है. मंदिर के ही पूरे दर्शन में करीब ६-७ घंटे लग जाते हैं. चारों ओर सुरम्य हरियाली से घिरे इस मंदिर में यहाँ आने वाला कोई भी श्रद्धालू, यहाँ उपलब्ध एक फुट से तीन फुट के आकार के शिव-लिंगों में से अपनी सामर्थ्य के अनुरूप उसका मूल्य चुका कर, अपने नाम से स्थापित करवा सकता है.




इस विशाल शिव-लिंग के सामने भव्य नंदी की प्रतिमा स्थापित है. जिसकी ऊंचाई ३५ फुट है और वह एक ६० फुट लंबे, ४० फुट चौड़े और ४ फुट ऊंचे चबूतरे पर स्थित है. इस विशाल शिव-लिंग के चारों ओर देवी माँ, श्री गणेश, श्री कुमारस्वामी और नंदी महाराज की प्रतिमाएं ऐसे स्थापित हैं जैसे वे अपने आराध्य को अपनी पूजा अर्पण कर रहे हों




वहाँ ग्यारह मंदिर और भी हैं. जिनमे ब्रह्माजी, विष्णुजी तथा मुख्य देव 'कोटिलिंगेश्वर' की प्रतिमाएं हैं. इनके अलावा अन्न्पूर्नेश्वरी देवी, वेंकटरमानी स्वामी, पांडुरंगा स्वामी, पंचमुख गणपति, राम-लक्ष्मण-सीता, आंजनेय स्वामी, देवी परमेश्वरी तथा देवी करुमारी अम्मा के मंदिर भी हैं.
मान्यता है की परिसर में स्थित दो वृक्षों पर मंदिर से ही उपलब्ध पीले धागे को बाँधने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है. ख़ास कर शादी-ब्याह में आने वाली अड़चने दूर हो जाती हैं. मंदिर की तरफ से भी निर्धन-गरीब परिवारों की कन्याओं का विवाह नाममात्र का शुल्क ले कर करवाया जाता है. सारी व्यवस्था मंदिर की तरफ से की जाती है. दूर से आने वाले भक्तों के रहने-खाने का भी यहाँ समुचित निशुल्क इंतजाम है.
महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर यहाँ आक़र अपने आराध्य देव को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण कर पुन्य लाभ कमाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दो लाख तक पहुँच जाती है।


*हिंदी "अस्त्र-शस्त्र" साथ नहीं दे रहे इसलिए हुई अशुद्धियों के लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ।
















































































भगवान ने भी क्रैश कोर्स करवाया

धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाले वहां की एक जैसी जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गये थे। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती। समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन। फिर वही हुआ जो होना था। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर चुका होता है।अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है।
भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे। इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो पृथ्वी का निर्माण किया गया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति। इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी जिसमें स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।
अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं। अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भुला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया।
अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।
प्रभू आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।