बुधवार, 30 जून 2010

कुतुबमीनार को नीचा दिखाने की कोशिश भी हुई थी.

दिल्ली की कुतुबमीनार तो खैर दिल्ली की पहचान ही बन गयी है। परन्तु इसको भी पीछे छोड़ने की कोशिश की गयी थी बीते जमाने मे।
जहां कुतुबमीनार खड़ी हो आकाश से बातें कर रही है उसी प्रांगण मे और भी बहुत से बने-अधबने अवशेष बिखरे पड़े हैं। वहीं है कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को अपने मूल आकार से दोगुना बड़ा बनवा दिया था, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग नमाज अता कर सकें। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इस मस्जिद की मीनार को भी वह कुतुब से दोगुनी बड़ी बनवा दे। उसने बनवाना प्रारम्भ भी कर दिया था पर इसी बीच उसकी मृत्यु हो जाने से उसका सपना पूरा नहीं हो पाया।
कुतुब के पास ही उसकी उत्तरी दिशा मे यह अधूरी बनी मीनार खड़ी है। जिसकी ऊंचाई करीब २४.५ फिट है। यह मुश्किल से पहली मंजिल ही बन पाई थी कि अलाउद्दीन को ऊपर से बुलावा आ गया था।

इसे अलाई मीनार के नाम से जाना जाता है।

मंगलवार, 29 जून 2010

वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था.

जो पिछले महीने की तेइस तारीख से तबीयत ढीली हो लटकने लगी तो लटकती ही चली गयी। पहले तो लगा कि ऐसे ही है ठीक हो जाएगा जैसे पहले भी होता आया था। पर इस बार अगला भी पटकनी देने के मूड़ मे था। वैसे चेतावनी तो 10-12 दिन पहले से ही मिल रही थी कि कुछ होने वाला है पर ध्यान नही दिया गया यह जानते हुए भी कि अब वो दिन नही रहे जब पसीना गुलाब था। इस बीच पाबलाजी को अंदेशा हुआ और उन्होंने फोन कर पूछा कि क्या गड़बड़ है तो उन्हें बताया कि जिद के कारण भोग भोगना पड़ रहा है।
घर के सारे जनों का छुट्टियों मे बाहर जाने का प्रोग्राम था। "इनक्लुडिंग मी"। बनाया भी मैंने ही था, तीन महीने पहले से। पर ऐन मौके पर मुंह से निकल गया कि मैं ना जा पाऊंगा, कर्म क्षेत्र में मेरा रहना जरूरी है (अब बीस दिन नहीं रहा तो जैसे काम ही बंद हो गया हो)। पर जब ब्रह्मवाक्य निकल गया तो उस पर अड़ना ही था।

कुछ दुखी, कुछ परेशान, कुछ गुस्से में सारे लोग निकल लिए और अकेले देख धर दबोचा बिमारी ने। अब लो मजा, ना जाने लायक ना रहने लायक। पर घर वाले समझदार होते हैं। समझ गये थे कि करेला नीम चढा और पंजाबी बात पर अड़ा बराबर ही होते हैं (बतर्ज पाबलाजी)। तो कुछ ऐसी परिस्थिति बनाई कि सांप भी ना मरे और लाठी भी टूट जाए। सांप को तो बाद में काम में लाया जाएगा आगामी किसी अकड़ को ढीला करवाने में।

तो सुखी-सांदी तीन को दिल्ली चला गया। हवा, पानी, धूल, मिट्टी, माहौल बदला। सुर्त आई (पंजाबी में)। राजनीति - रावण वगैरह देख, बिना दूसरे दिन जल्दि उठने की चिंता के फुटबाल को गोल-गोल करते कल लौटा हूं।

मेरा ऐसा सोचना था कि किसी के कहीं जाने-वाने से अपनी इस ब्लागिंग की दुनिया में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसे फुर्सत है कि देखे कौन आया कौन नहीं आया। इसीलिए मैंने कभी अनुपस्थित होने का जिक्र नहीं किया। पर इस बार ललितजी ने दूरभाष पर जब पूछा कि भाई कहां हो तीन तारीख से, तो मन में आया कि नहीं ये अनजाने देखे रिश्ते नाते महज औपचारिक नहीं हैं इनमें लगाव है, अपनत्व है, जिज्ञासा है, फिक्र है। और यह ऐसी ही बनी रहे यही तहे दिल की तमन्ना है।

तो लीजिए फिर शुरु होता है वही बैल का कोल्हू, कोल्हू का चक्कर।

गुरुवार, 3 जून 2010

लटकाना हमारी आदत में शूमार हो गया है.

आप मेरी और किसी बात से सहमत हों ना हों पर इस बात से तो सहमत होंगे ही कि हमें किसी भी चीज को लटकाने की आदत सी पड़ गयी है। मैं कंधे पर शाल या गले में टाई या खूंटी पर कपड़े लटकाने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं कुछ ऊंची आदतों की बात कर रहा था। जैसे किसी योजना की शुरुआत की बात हो, सर पर मंड़राते जल संकट की बात हो, खाद्य समस्या की बात हो, दिन पर दिन फैलते आतंक की बात हो, दफ्तर में कछुए की पीठ पर रखी फाईलों की बात हो, सरहद की बात हो, आंतरिक सुरक्षा की बात हो, कोर्ट में शहतीरों से लटकते-लटकते दम तोड़ते केसों की बात हो, यह बात हो, वह बात हो कोई भी बात हो हम उसे लटकाए रखने में विश्वास करते हैं।

आजादी के बाद से शुरू हुई समस्याएं वैसे ही लटकते-लटकते फलती फूलती आ रहीं हैं। तरह तरह के नेता आये और गये, किसीने थोड़ी बहुत कोशिश की भी होगी पर ज्यादातर तो जैसे हवन के बाद लाल कपड़े में नारियल बांध कहीं लटका देते हैं वैसे ही वे भी कुछ ना कुछ नया लटका कर अपने रास्ते चल दिए या भेज दिए गये।
इस लटकन से कोई भी पीछा नहीं छुड़ा पाया। इन चारों ओर लटकती लटकनों से आम आदमी का सर टकराता रहता है। कभी-कभी लहूलुहान भी हो जाता है पर हम यह संस्कृति नहीं छोड़ते, शायद छोड़ना ही नहीं चाहते। आजादी के बाद तो यह लटकन क्रिया अमरबेल हो गयी है। किसी भी सरकारी दफ्तर में जाईए किसी काम को लेकर, पहले यही सुनाई पड़ेगा, कल आईएगा।
यह शब्द "काल होबे" याने यह काम "कल होगा" बंगाल की देन है। कहा जाता था कि आज जो बंगाल सोचता या कहता है वही बाकि देश भविष्य में कहता है। वहीं से चल कर यह "काल होबे" सारे देश का कल आईएगा बन कर अपना लिया गया है।


लीजिए एक और लटकन।
तिमारपुर्सी के लिए एक सज्जन आये हैं। बिमार का हालचाल पूछने।

तो लटक गयी ना यह भी पोस्ट.............

बुधवार, 2 जून 2010

इंसान ही नहीं वस्तुएं भी बदकिस्मत होती हैं.

सन 1733।
क्रेमलिन के आइवान वैलिकी के गिरजाघर में एक विशालकाय घंटे को लगाने का प्रस्ताव पास हुआ। सोचा गया कि घंटा इतना बड़ा हो कि दुनिया भर में उसकी चर्चा हो। अंत में 200 टन भार के घंटे को बनाने की सोची गयी। नक्शा बन गया। सांचा भी तैयार हो गया। घंटे को ढालने का काम भी शुरू हो गया। पर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। जहां घंटे की ढलाई हो रही थी उस कारखाने में भीषण आग लग गयी। सारा कुछ जल कर राख हो गया।
लगभग बन चुका घंटा भी टूट गया और कारखाने के मलबे के नीचे दब गया।

करीब सौ साल बाद फिर उसकी याद आई। राजा निकोलस के शासन काल में मलबा साफ किया गया और उस घंटे को एक चबूतरा बना उस पर स्थापित कर दिया गया। दुर्घटना में घंटे का एक टुकड़ा टूट कर अलग हो गया था, उसे भी चबूतरे पर रख दिया गया।

इस घंटे की ऊंचाई 19 फुट तथा घेरा करीब 60 फुट और इसकी दिवार की मोटाई करीब 2 फुट है। इसके अंदर इतनी जगह है कि बीस आदमी वहां खड़े हो सकते हैं। इसके ऊपर सुंदर नक्काशी की गयी है तथा बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र बनाए गये हैं। सबसे ऊपर रूस के राष्ट्रीय पक्षी बाज का चित्र बना हुआ है।

इस बदकिस्मत घंटे के टूट जाने के पश्चात एक दूसरा घंटा बनाया गया जिसका वजन 128 टन है। जो आज भी गिरजे के ऊपर उसी मीनार में लगा हुआ है जहां उस दुनिया के सबसे बड़े घंटे ने होना था।

मंगलवार, 1 जून 2010

तंग आ कर नूरे ने लड़का किडनैप किया, पर :-)

हमारा नूरा जब से दिल्ली घूम कर अपने पिंड़ लौटा है तब से उसे शहर में कुछ करने का कीड़ा काट गया है। गांव के अपने तीनों लंगोटियों के साथ माथा पच्ची करने के बाद वे चारों इस नतीजे पर पहुंचे कि मां-बाप पर बोझ बनने से अच्छा है कि एक बार चल कर किस्मत आजमाई जाए।
हिम्मत है, लगन है, पैसा है, मेहनती हैं, भगवान जरूर सफल करेगा। पर सामने सवाल था कि करेंगे क्या?
अपने नूरा ने बताया कि दिल्ली में इतनी गाड़ियां हैं कि आदमी तो दिखता ही नहीं। गाड़ी पर गाड़ी चढी बैठी है। समझ लो जैसे अपने खेतों में धान की बालियां। अब जैसे इतने बड़े खेत में एक ही पानी का पंप होता है वैसे ही वहां गाड़ियों के लिए दूर-दूर पेट्रोल पंप होते हैं। अरे लाईनें लग जाती हैं, नम्बर नहीं आता। हम पेट्रोल पंप खोलेंगे।
पर लायसेंस कैसे मिलेगा? एक सवाल उछला।
घबड़ाने की बात नहीं है। वहां सिन्धिया हाऊस में मेरे मामाजी रहते हैं। बहुत पहुंच है उनकी, क्या वे इतना सा काम नहीं करवा पायेंगे। जवाब भी साथ-साथ आया।
बात तय हो गयी। चारों चौलंगे पहुंच गये दिल्ली। दौड़ भाग शुरु हुई, पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी कोटे में एक पंप का आवंटन बचा है। सारे खुश। पहुंचे इंटरव्यू देने। पूछा गया कि आपके परिवार में किसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था?
नूरे ने जवाब दिया "जनाब, और परिवारों में तो कोई एक ऐसा बंदा होता है जिसने देश के लिए जान कुर्बान की हो। मेरे परिवार में तो ऐसा बंदा खोजा जाता है, जिसने अपनी मातृभूमि के लिए खून ना बहाया हो.......................

फटाफट सारी औपचारिकताएं निपटा दी गयीं और इन चारों भोले बंदों ने जनता के हित को ध्यान में रख ऐसा इंतजाम किया कि इनके काम से रास्ता वगैरह जाम ना हो और पंप खोल दिया गया।
आश्चर्य हफ्ता भर बीत गया पर एक भी ग्राहक नहीं आया।
क्यूं ? क्योंकि भोले बंदों ने पंप पहली मंजिल पर खोला था।

पर जो हिम्मत हार जाए वह नूरा कैसे कहलाए।
उद्यमी बंदों ने सोच विचार कर उसी जगह एक रेस्त्रां का उद्घाटन कर दिया। पर भगवान की मर्जी यह भी ना चला।
अब क्या हुआ था, कि ये पेट्रोल पंप का बोर्ड़ हटाना भूल गये थे। हां बोर्ड़ बदल कर काम किया जा सकता था। पर जिद। जिस काम ने शुरु में ही साथ नहीं दिया वह काम करना ही नहीं। यह जगह ही ठीक नहीं है। ऐसा सोच सब बेच-बाच कर इस बार चारों ने एक सुंदर सी मंहगी गाड़ी खरीदी जिसे टैक्सी के रूप में चला कर पैसा कमाया जा सके। गाड़ी आ गयी पूजा-पाठ कर सड़क पर उतार दी गयी। पर फिर दिन पर दिन बीत गये एक भी सवारी इन्हें नहीं मिली। कारण ? चारों भोले बंदे, दो आगे, दो पीछे बैठ कर ग्राहक ढूंढने निकलते रहे थे।

हद हो गयी। यह शहर शरीफों का साथ ही नहीं देता। ईमानदारी से इतने काम करने चाहे, किसी में भी कामयाबी नहीं मिली। ठीक है हमें भी टेढी ऊंगली से घी निकालना आता है।
अब चारों मित्रों ने गुनाह का रास्ता अख्तियार करने की ठान ली। दूसरे दिन रात को सारा प्लान बना एक लड़के को अगवा किया गया। एकांत में ले जा उससे कहा कि घर जाए और अपने बाप से चार लाख रुपये देने को कहे ऐसा ना करने पर तेरी जान ले ली जाएगी यह भी बता देना।
लड़का घर गया, अपने बाप को सारी बात बता दी। लड़के के बाप ने पैसे भी भिजवा दिए।
अरे!!!! ऐसा कैसे भाई?
ऐसा इसलिए क्योंकि लडके का बाप भी तो भोला बंदा ही था ना। :-) :-) :-)