pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

नहीं भूलता बचपन का वह रिक्शेवाला

हमारे धमा-चौकड़ी मचाते  तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की ? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की ? हमें हंसता-खुश होता देखने की ? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की ? वह भी बिना किसी आर्थिक लाभ के !    

समय के साथ-साथ मनुष्य के मन की कोमल भावनाएं कैसे तरोहित होती चली गयीं पता ही नहीं चला। बच गयी तो प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य, व्यवसायिकता। किसी के पास क्षण भर को ठहर कर अपने चहुं ओर देखने का समय ही नहीं बचा। लोग अपना ही ख्याल नहीं रख पा रहे हैं तो दूसरों का हाल क्या पूछेंगे ! और-और पाने की चाह में एक अंधी दौड़ चल पड़ी है।  

पिछले अंक में रिख्शे वालों की बात कर रहा था, जो मुझे और मेरे  हमउम्र साथियों को स्कूल ले जाया करते थे।कितनी आत्मीयता होती थी उन दिनों उनकी बच्चों के प्रति। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। अभिभावक भी उनके संरक्षण में बच्चों को छोड़ निश्चिन्त रहते थे। हमारा स्कूल कोई कोई सात-आठ किमी दूर था। जितना याद पड़ता है, मेरे रिक्शे वाले की उम्र ज्यादा नहीं थी, कोई तीसेक साल का होगा। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है। हमारे यहां से स्कूल की तरफ चार या पांच रिक्शा वाले अपनी-अपनी "बच्चा सवारियों" के साथ निकलते थे। बहुतेरी बार अपने रिक्शे से किसी और रिक्शे को आगे होते देख बाल सुलभ इर्ष्या के कारण हम शिबु को और तेज चलाने के लिए उकसाते थे और इस तरह रोज ही ‘रेस-रेस खेल’ हो जाता था। स्कूल आने-जाने के दो रास्ते थे। एक मुख्य  सड़क से तथा दूसरा  भीतर ही भीतर घुमावदार, कुछ लंबा। शिबु अक्सर हमें लंबे रास्ते से वापस लाया करता था। उस रास्ते पर एक बड़ा बाग हुआ करता था। बाग में एक खूब बड़ी सीमेंट की फिसलन-पट्टी थी। हमें खुश करने के लिए वह अक्सर वहां घंटे-आध-घंटे के लिए रुक जाता था। जब तक हम वहां धमा-चौकड़ी मचाते थे तब तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आजकल साबुन के घोल से जैसे बनाते हैं वैसे ही। उन दिनों यह सब सामान्य लगता था। पर आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की? हमें हंसता खुश होता देखने की? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की? खूद गीले होने की परवाह ना कर बरसातों में हमें भरसक सूखा रखने की? जबकी इसके बदले नाही उसे अलग से पैसा मिलता था नाही और कोई लाभ। जबकि इन सब में व्यतीत हुए समय का उपयोग कर वह कोई और सवारी ले कुछ आमदनी कर सकता था। कभी देर-सबेर की कोई शिकायत नहीं। क्या ऐसी बात थी कि उसके रहते हमारे घरवालों को कभी हमारी चिंता नहीं रहती थी। उसके इसी स्नेह से हम रोज स्कूल जाने के लिए भी उत्साहित रहते थे। आज के युग में ऐसा होना तो छोड़ कोई शायद इस तरह की कल्पना भी नहीं कर सकता। 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मासूमों को कब निजात मिलेगी !

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। 

नए सत्र के साथ फिर स्कूल खुल चुके हैं। उत्तीर्ण हो आगे की कक्षाओं में बढ़ गए बच्चों के रिक्त स्थानों की पूर्ती के लिए नई खेप आ चुकी है। आजकल "शिक्षालय" या "विद्यालय" पूर्णतया "स्कूलों" में परिवर्तित हो चुके हैं। समय ने हर चीज को बदल कर रख दिया है। स्कूलों द्वारा अभिभावकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की सहूलियतें बखान की जाती हैं। जिसमें पढ़ाई का स्तर या उसकी बात गौण होती है तथा उसका नंबर काफी बाद में आता है। आज हर नामी स्कूल के पास बच्चों को लाने ले जाने के लिए अपनी बस सेवा उपलब्ध होती है। आज स्कूलों में दाखिले के साथ-साथ वहाँ बच्चों को पहुंचाना भी अभिभावकों के लिए एक समस्या है, इसलिए वे इस सुविधा का लाभ, मंहगी होने के बावजूद, ले कुछ हद तक तनाव मुक्त हो जाते हैं। वैसे स्कूल पहुँचने का हर जरिया अभिभावक की जेब पर भारी ही पड़ता है।

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। कभी-कभार किसी रिक्शे वाले के मजबूरीवश न आ पाने के कारण दो की जगह तीन बच्चे बैठ जाते हों पर उससे ज्यादा कभी नहीं। मुझे याद है, तब मेरे बाबूजी, तबके कलकत्ता, के पास कोननगर में लक्ष्मी नारायण जूट मिल में कार्यरत थे। वहाँ से करीब आठ-दस बच्चे पांच-सात किलोमीटर दूर रिसड़ा विद्यापीठ में पढने जाते थे। दो-दो बच्चों के हिसाब से चार या पांच रिक्शे रोज वहाँ से निकलते थे। उन दिनों निजी वाहन बहुत कम हुआ करते थे। रिक्शों का चलन आम था। मेरा हमजोली मंजीत सिंह नाम का साथी था। स्कूलों में भी आजकल जैसी अफरातफरी का माहौल नहीं हुआ करता था। नाही बस्तों का बोझ आज
जैसा था। सही मायनों में शिक्षा देने की परंपरा थी। गर्मियों में बच्चों का ध्यान रखते हुए स्कूल सुबह के हो जाते थे, सात से ग्यारह। बाकी महिनों में वही दस से चार का समय रहता था। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। रिक्शे वाले भी बच्चों का बहुत ध्यान रखते थे।  मजाल है कि कोई ऊँच-नीच हो जाए। इसीलिए माँ-बाप भी उन्हें बच्चों को सौंप कर निश्चिन्त रहा करते थे। मुझे लाने-ले जाने वाला रिक्शाचालक उड़ीसा का था। उम्र रही होगी कोई तीस के आस-पास की। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। नाम तो शायद उसका शिव रहा होगा, पर जैसा कि बंगला या उड़िया उच्चारणों में होता है, वह शिवो और शिवो से शिबु हो गया होगा। जैसा अब समझ में आता है। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है।

आजकल रिक्शों की जगह ज्यादातर ऑटो ने ले ली है। अब चाहे ऑटो हो या रिक्शा बच्चे बैठे नहीं ठूंसे रहते हैं।
इस तरह की यात्रा जाहिर है शरीर में थकान पैदा कर देती है, रही सही कसर बस्तों का भार पूरा कर देता है। तो स्कूल की पढ़ाई के लिए जो ताजगी शरीर और दिमाग में होनी चाहिए वह स्कूल पहुँचने के पहले ही उड़नछू हो जाती है। स्कूलों के खुलने के आस-पास इस सब पर हाय-तौबा मचती है फिर सब कुछ यथावत चलने लगता है। बड़ों की लापरवाही का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। पता नहीं कब सच्चे दिल से कोई इस ओर ध्यान देकर मासूमों को निजात दिलवाएगा !     

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

"बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ, फिर भी खरीददार हूँ",

कहा जाता था कि "बाज़ार से गुजरा हूँ, पर खरीददार नहीं हूँ" पर उपभोक्ता संस्कृति ने उसे उलट कर "बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ फिर भी खरीददार हूँ", कर दिया है। मैं ऐसी जगह जाने से कतराता हूँ, जहां फांसने की पूरी चाक-चौबंद तैयारी कर रखी गयी हो।  इस कतराहट को जानते हुए भी जब कभी श्रीमती जी कुछ अलग अंदाज में कहती हैं कि चलो न ज़रा मॉल से कुछ सामान ले आएं, तो समझ में आ जाता है कि फिर छुरी पर खरबूजे को गिराने की तैयारी हो चुकी है, फिर रात के भोजन को बेस्वाद होने से भी बचाना होता है सो  !!!

पिछले दस-पंद्रह सालों में कितना कुछ बदल गया है हमारे चारों ओर के परिवेश में। वह भी बिना किसी शोर-शराबे के। रहन-सहन, चाल-ढाल, सोच-विचार हर चीज में परिवर्तन हुआ है। जीवन कुछ आसानी महसूस करने लगा है। रोजमर्रा की जद्दो-जहद कुछ कम हो गयी है। सारे बदलाव अच्छाइयों के लिए ही किए जाते हैं पर क्या ऐसा हो पाता है? अच्छाइयों के साथ कुछ बुराइयां भी दबे पांव, बिन बुलाए चली आती हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे।

अब बाज़ार को ही लीजिए। उसने तो शायरों की धारणाएं ही बदल कर रख दी हैं। कहा जाता था कि "बाज़ार से गुजरा हूँ, पर खरीददार नहीं हूँ" पर उपभोक्ता संस्कृति ने उसे उलट कर "बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ, फिर भी खरीददार हूँ", कर दिया है। अपनी घरेलू ख़रीददारी को ही लें। पहले हर छोटी-बड़ी परचून या रोजमर्रा के सामान की दुकान पर ग्राहक को बाहर ही खड़े हो कर अपनी जरुरत बतानी होती थी जिसके अनुसार, उसके बजट के दस-पांच रूपये ऊपर-नीचे में सामान मिल जाता था। पर अब तो आधुनिक दुकानों को आपके सामने पूरी तरह बिछा दिया जाता है। हमें लगता है कि अब अपनी मर्जी से हम चुनाव कर सकते हैं। पर इनके तरह-तरह के प्रलोभन और सहूलियतें अपने मकड़जाल में अच्छे-अच्छों को चकरघिन्नी बना डालते हैं। ये मॉल हमारी जेब का माल इतनी खूबी से निकलवा लेते हैं कि हमें कानों-कान खबर नहीं हो पाती। आप बाज़ार भाव के अनुसार कैसा भी बजट बना कर जाएं, पांच-सात सौ ऊपर लगना तय है। पुरानी दुकानों में हर चीज अपनी जगह पर स्थायी तौर पर रखी जाती थी जिससे दूकान के सहायकों को उसे खोजने में दिक्कत न हो और ग्राहक  को भी जल्दी सामान मिल जाए। पर अब जान-बूझ कर सोची-समझी रणनीति के तहत एक निश्चित अवधि के पश्चात जिंस का स्थान बदल दिया जाता है, जिससे कि आप सिर्फ अपने मतलब का सामान ले कर ही न चलते बनें, उसे खोजने के दौरान और भी जरुरी-गैरजरूरी वस्तुएं आपकी नज़र के दायरे में आती रहें, जिससे जरुरत होने ना होने पर भी आपको भर्मित कर आपकी खरीददारी का दायरा कुछ और बढ बाजार को फायदा दिला सके।और इसके लिए सामानों को भी "आधुनिक लुक" प्रदान कर दिया जाता है। अब जैसे भुट्टे को ही लें, मॉल में जब ग्राहक उसे अपनी  प्राकृतिक पोशाक के बदले डिजायनर परिधान में देखता है तो उसे लपक लेने से अपने को नहीं रोक पाता और अपनी जेब का छेद और बड़ा कर लेता है।
मैं ऐसी जगह जाने से कतराता हूँ, जहां फांसने की पूरी चाक-चौबंद तैयारी कर रखी गयी हो।  इस बात को जानते हुए भी जब कभी श्रीमती जी कुछ अलग अंदाज में कहती हैं कि चलो न ज़रा मॉल से कुछ सामान ले आएं, ज्यादा नहीं है बस पांच-सात चीजें ही हैं। उस समय यदि मैं कहूँ भी कि लिस्ट भेज दो या किसी से मंगवा लो तो उलटे असर की संभावना बढ़ जाती है और रात के खाने के बेस्वाद हो जाने के डर से गाडी निकलनी पड़ती है साथ ही समझ भी आ जाता है कि फिर छुरी पर खरबूजे को गिराने की तैयारी हो चुकी है। इन मॉल्स की महिमा तो इतनी अपरंपार है कि बाबा रामदेव, जिनका अपना खुद का इतना बड़ा "नेटवर्क" है ग्राहकों को घेरने के लिए, वे भी मॉल के मायाजाल को समझते हुए अपने उत्पादन वहां रखवाने लगे हैं।

अब मैं और आप तो यही गुनगुना सकते हैं, "मॉल अनंत मॉल 'महिमा' अनंता।
जय हो !!!  
               

रविवार, 28 जून 2015

अपनी भावनाओं को बड़े बच्चों के साथ भी साझा करें

हमारे ग्रंथ भी इस रिश्ते की नाजुकता को परिभाषित करते है, उनके अनुसार यह रिश्ता प्रत्यंचा की तरह होता है, ढीली रह गयी तो लक्ष्य-भेद नहीं हो पाएगा और ज्यादा कस गयी तो टूटने का भय। कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने पूछा, ठाकुर जी एक बात बताएं, क्या आपने कभी खुल कर बिट्टू से अपने प्यार का इजहार किया है ? नहीं ना !    

रविवार, सूकून का दिन। इसलिए प्रात: भ्रमण के पश्चात ठाकुर जी को साथ ही ले आया चाय के लिए। तभी छोटे बेटे को अपनी माँ से बात करते देख ऐसे ही मैंने पूछ लिया क्या बात है, पर जवाब आया कि कुछ नहीं ऐसे ही ! यह देख ठाकुर जी बोले, सभी घरों में ऐसा ही हाल है। बाप की जगह माँ को ही विश्वास में लिया
जाता है। कोई भी बात हो माँ से ही शेयर की जाती है और तो और इन्हें सारे दिन भले ही भूल जाएं पर मदर्स डे जरूर याद रहता है। मैंने पूछा, क्यों कोई ख़ास बात हुई है क्या? ठाकुर जी बोले, नहीं ख़ास तो नहीं पर पिछले दिनों फादर्स डे भी तो आया था पर मेरे बिट्टू ने मुझे विश तक नहीं किया। शर्मा जी, इसे अन्यथा ना लें,  ऐसी बातों को मैं बाज़ार के चोंचले ही मानता हूँ पर पता नहीं क्यों दिल में एक उत्सुकता, एक चाहत रहती है कि बेटा, बाप से अपने प्यार का इजहार तो करे !         

बात हल्की-फुल्की थी पर उसमें कहीं गंभीरता भी थी। आज भले ही नई पीढ़ी में बाप-बेटे एक दूसरे के नजदीक आ गए हों, उनका व्यवहार कुछ दोस्ताना हो गया हो पर अभी भी अधिकांश परिवारों में बेटे अपने पिता से बात करने में झिझकते हैं। माँ से ही अपनी समस्यायों को शेयर करने में उन्हें सहूलियत होती है। मैं
अपनी तरफ देखता हूँ तो पचास पार करने के बावजूद बाबूजी से कोई बात करने में दस बार सोचना पड़ता था, एक झिझक सदा तारी रहती थी। इसीलिए माँ को सदा ढाल बनाया जाता था। पर ऐसा नहीं था कि उनको हमारा ध्यान ना रहता हो, वे भी माँ के मार्फ़त ही हमारी जानकारी हासिल किया करते थे। हमसे लगाव तो बहुत था पर जाहिर नहीं करते थे। आज के दिन बदलाव आया है, रिश्तों की बर्फ पहले की तरह एकदम ठोस नहीं रह गयी है। बच्चे अपने मन की बात सामने रखने लग गए हैं। यही बात मैंने ठाकुर जी से भी कही कि भले ही आपस में वार्तालाप न होता हो पर एक-दूसरे की चिंता किसे किस दिन नहीं रहती ? इस लिहाज से तो हर दिन फादर्स डे है। 

हमारे ग्रंथ भी इस रिश्ते की नाजुकता को परिभाषित करते है, उनके अनुसार यह रिश्ता प्रत्यंचा की तरह होता है, ढीली रह गयी तो लक्ष्य-भेद नहीं हो पाएगा और ज्यादा कस गयी तो टूटने का भय।  कुछ देर चुप रहने के बाद मैंने पूछा, ठाकुर जी एक बात बताएं, क्या आपने कभी खुल कर बिट्टू से अपने प्यार का इजहार किया है ? नहीं ना ! तो उससे बात करने की आप ही पहल कर देखिए, उसके प्रति अपने प्यार को खुल कर सामने आने दीजिए, उसकी समस्यायों का पता कर हल सुझाईये, खेलों, फिल्मों जैसे हलके-फुल्के विषयों पर बातें करिए, अपनी किसी बात को उससे शेयर करें उसके बारे में राय पूछें। अपने बुर्जुआ खोल से बाहर आ एक मर्यादित दोस्ताना माहौल का निर्माण करें।  मुझे विश्वास है कि अगले फादर्स डे का उसे बेसब्री से इंतजार रहेगा।      
            

बुधवार, 24 जून 2015

दाढ़ी बनाएं, मूड़े नहीं

अपने चेहरे पर सब को नाज होता है, इसे हर कोई दिलकश बनाए रखना चाहता है।  पचासों तरह के जतन किए जाते हैं इसे संवारने के वास्ते। पर कभी-कभी जाने-अनजाने इस पर ज्यादती भी हो जाती है खासकर दाढ़ी बनाते समय, जब लोग समयाभाव के कारण इसे बनाने की बजाए "मूड़ने " लगते है ! 

पिछले रविवार को योग शिविर से लौटते हुए ठाकुर जी के यहां रुक गया। वे क्षौर-कर्म निपटा रहे थे। उसी दौरान देखा कि उन्होंने तीन बार चेहरे को रेजर से 'खुरचा'। जब मुंह वगैरह धो कर बैठे तो मैंने पूछा तीन-तीन बार क्यों दाढ़ी बनाते हैं ? जब कि यह काम ज्यादा से ज्यादा दो बार में हो जाता है। ठाकुर जी बोले, नहीं तीसरी बार ही चेहरा पूर्णतया बालों से मुक्त हो पाता है।   

तभी ऐसा लगा कि ढाढी को लेकर भी काफी असमंजस में हैं लोग ! वैसे तो हर इंसान अपने चहरे को सदा दिलकश देखना चाहता है, उसके लिए पचासों यत्न भी करता है। पर इसी सार-संभाल में उस पर ज्यादती भी

करता रहता है। अब दाढ़ी की ही बात को लें, जिन्हें रखने का शौक है वे तो उसे सजा-संवार कर ही रखते हैं। जिन्हें सफाचट रहना अच्छा लगता है, उनमें से कई नाई का द्वार खटखटाते हैं पर अधिकांश घर पर खुद ही इसे मुसीबत समझ कर हटाते रहते हैं। जैसे ठाकुर साहब जो दाढ़ी बना नहीं रहे थे उसे मूड़ रहे थे। बिना यह सोचे कि इस तरह चेहरे की चमड़ी पर विपरीत असर पड़ता है। दाढ़ी बनाते समय हरदम हलके हाथ से रेजर चलाना चाहिए नाकि दबाते हुए। 

दाढ़ी बनाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि चेहरे के बाल अच्छी तरह गीले हों, यदि उन्हें कम से कम तीन-चार मिनट तक भीगा रहने दिया जाए तो वे काफी पानी सोख लेते हैं और ढीले पड़ जाते हैं जिससे उन्हें आसानी से काटा जा सकता है। ऐसे में तो किसी क्रीम या साबुन की भी जरुरत नहीं रहती। यदि क्रीम लगा कर शेव की जाती है तो जरूरी नहीं कि वह मंहगी ही हो। क्रीम वह अच्छी होती है जो एक लेप की तरह बालों पर परत बनाए जिससे बालों को ज्यादा से ज्यादा नमी मिले, चमड़ी स्नेहित हो सके। इसके लिए रेजर के इस्तेमाल के पहले क्रीम को चेहरे पर डेढ़-दो मिनट तक लगा रहने देना चाहिए। ज्यादा झाग बनाने वाली क्रीम या साबुन ठीक नहीं रहते। उनसे बालों को यथोचित नमी नहीं मिल पाती।  ध्येय है बालों की नर्माहट, बाकी सब बेकार ही है। बाल जितने नरम होंगे उतना ही ब्लेड का घर्षण कम होगा, उतना ही चमड़ी का छिलना कम होगा, उतनी ही ब्लेड या रेजर की उम्र बढ़ेगी। सही बात तो यह है कि मंहगी क्रीम या साबुन लेने से अच्छा है कि एक बढ़िया रेजर लिया जाए। कोई जरूरी नहीं कि वह दो या तीन ब्लेड वाला हो पर हो अच्छे स्तर का। कई बार हम कुछ भोथरे हो जाने पर भी उसका इस्तेमाल करते रहते हैं जोकि चेहरे की त्वचा के लिए काफी हानिकारक होता है। ऐसे ही ब्लेड से त्वचा में जलन या खराश होने लगती है। इसीलिए एक निश्चित अवधि के बाद उसे बदल देना चाहिए। दाढ़ी बनाते समय भी उसे गर्म पानी में, हो सके तो डेटॉल मिले पानी में डुबा कर साफ करते रहना चाहिए जिससे उसमें लगे बाल, साबुन का लेप इत्यादि साफ हो जाएं। 

सबसे बड़ी बात यह है कि हम चेहरे के बालों की उगने की दिशा के बारे में अनजान होते हैं। सब को लगता है कि बाल एक ही दिशा में उगे हुए हैं जबकि ये अलग-अलग चेहरे पर अलग-अलग ढंग से अलग-अलग दिशा में उगते हैं। इसको आसानी से परखा जा सकता है। इसलिए बेहतर है कि रेजर या ब्लेड को सीधे-उलटे न चलाया जाए। कभी भी चहरे को अंडे के छिलके की तरह चिकना करने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए इससे चमड़ी की परत को बहुत नुकसान पहुंचता है। बालों का उगना एक सतत क्रिया है दाढ़ी बनाते ही बालों का बढ़ना फिर शुरू हो जाता है तो फिर क्यों चमड़ी पर जुल्म ढाना ! 

"शेव" करते समय यदि हम कुछ बातों का ध्यान रखें तो यह हमारे ही चेहरे के लिए फायदेमंद होगा। जैसे शेव के पहले बाल अच्छी तरह भीगे हुए हों। क्रीम या साबुन की परत चहरे पर डेढ़-दो मिनट लगी रहे। रेजर हलके हाथ से चलाया जाए। जिससे वह सिर्फ बालों को हटाए नाकि त्वचा को खुरचे। कभी भी सूखी और ठंडी त्वचा पर रेजर ना चलाएं। शेव के दौरान बीच-बीच में उसे साफ़ भी करते रहें। किसी और का रेजर इस्तेमाल ना करें। क्रीम को समय-समय पर बदलते रहें जिससे अपनी त्वचा के अनुरूप इसका चुनाव हो सके। शेव करने के बाद चेहरे को गुनगुने पानी से साफ़ कर कोई लोशन लगा लें। लोशन की जगह पानी में डेटॉल जैसी किसी चीज की कुछ बूँदें भी वही काम करेंगी। फिर ठंडे पानी के छींटे मार चेहरा धो लें।                    

बुधवार, 17 जून 2015

दिल्ली का धौला कुआँ, कहाँ है धौलापन?

धौला कुआँ, पहले  
दिल्ली का धौला कुआँ। कभी न कभी हर दिल्लीवासी यहां से गुजरता ही है। चाहे पंजाबी बाग़, राजौरी गार्डन से किसी को दक्षिणी दिल्ली जाना हो या फिर चाणक्यपुरी वालों को हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे जाना हो सबको इसके दर्शन कर ही जाना पड़ता है। एक तरफ मोती बाग़, दूसरी तरफ दिल्ली कैंट, बीच से पालम हवाई अड्डे के लिए गुजरती सड़क। राजस्थान और हरियाणा के लिए बसों का शहर के अंदर मुख्य अड्डा। दिल्ली गेट, कश्मीरी गेट, अजमेरी गेट, चांदनी चौक, कनॉट प्लेस की तरह ही इस नाम के भी आदी हो चुके हैं लोग पर अनजान हैं इसकी जानकारी के बारे में। कारण भी तो है। किसी जगह का नाम किसी विशेष परिस्थिति या कारण या जगह की विशेषता के कारण पड़ जाता है या रख दिया जाता है। पर आज समय की मांग के अनुसार  महानगरों और मेट्रो शहरों का भूगोल इतनी तेजी से बदल रहा है कि वहाँ के रहने वाले ही यदि किसी इलाके की तरफ कुछ अरसे के बाद जाते हैं तो जगह को कुछ तो बदला हुआ ही पाते हैं। और इस जगह पर तो इतने बदलाव हुए हैं कि आठ-दस साल पहले धौला कुआँ को देखने वाले को आज इसे देख हैरत होती है। तो करीब दो सौ साल पहले बने कुएं की क्या बिसात। कौन सा कुआँ, कैसा कुआँ ?       

करीब दो सौ साल पहले यहां के एक छोटे से इलाके, लाल किले से पालम तक, पर राज करने वाले शाह
धौला कुआँ का उड़न-पथ 
आलम द्वितीय (1761-1806) द्वारा जन-हित के लिए बनवाए गए इस कुंए का नाम धौला कुआं यानी सफ़ेद कुआं यहां पाए जाने वाली सफ़ेद रेत के कारण पड़ा बताया जाता है। शाह आलम अक्सर अपनी छोटी सी रियासत का चक्कर लगाया करता था। यह भी एक वजह थी कि उसने अपने यात्रा-मार्ग के बीच कुआं और वृक्ष लगवाए थे जहां कुछ देर आराम किया जा सके।   

आज मुख्य सड़क से थोड़ा हट कर बने एक बगीचे में यह स्थित है। जहां एक झील भी है जिसका पर्यावरण के मद्दे नज़र D.D.A. ने निर्माण करवा दिया था जिसमें इसी कुएं से पानी पहुँचाने की व्यवस्था थी। पर अब इसका हश्र भी बड़े शहरों के कुअों-बावड़ियों की तरह हो चुका है। देख-रेख के अभाव में बगीचे के साथ-साथ दूसरों को पानी देने वाला अब खुद उसके लिए तरस रहा है। झील को भी अपने को कुछ हद तक भरने का मौका बरसात में ही मिल पाता है। पहले तो इसके अस्तित्व का पता सड़क से चल भी जाता था पर इधर मेट्रो के गुजरने का मार्ग बनने के बाद यह और भी ओट में हो गया है। कुछ कोशिशें हुईं भी हैं इसे नया रूप देने को पर वे ना के बराबर ही रहीं। शेख्सपीयर की ना माने तो अब बस नाम ही है जो इसे जिन्दा रखे हुए है।             

शुक्रवार, 12 जून 2015

रहस्यमयता को श्रद्धांजलि

दो शख्शियतें, एक रहस्यमय माहौल में रहने वाली तथा दूसरी ऐसे ही माहौल को रचने वाली, चार-पांच दिनों के अंतराल में एक तीसरे रहस्यमय माहौल की ओर अग्रसर हो गयीं। श्रद्धांजलि। 
    
क्रिस्टोफर ली 
पचास-साठ का दशक। जेम्स बॉन्ड की फिल्मों के साथ ही एक और तरह की फिल्मों का भी इंतजार रहा करता था और वे थीं ड्रैकुला के चरित्र वाली डरावनी फिल्में। उनमें ड्रैकुला के पात्र को सजीव किया करते थे क्रिस्टोफर ली। वैसे तो   उन्होंने  फिल्मों  और   टी.वी.पर करीब 250 चरित्र अभिनीत किए जिनमें ममी और ड्रैकुला जैसी रहस्यमयी फिल्मों के साथ-साथ द मैन विद द गोल्डन गन,स्टार वॉर,लार्ड ऑफ द रिंग्स,जैसी अनेकों सफल हैं। पर उन्हें ख्याति मिली ड्रैकुला के चरित्र के कारण। इतनी गहराई से उन्होंने इसे निभाया था कि वे एक दूसरे के पर्याय ही बन गए थे। छह फुट से ऊपर निकलते कद, भारी गंभीर आवाज और मंजे हुए अभिनय के कारण उनकी अपनी पहचान बन चुकी थी। उन्हें "नाइट" की उपाधि से भी नवाजा जा चुका था। पिछले रविवार,सात जून को 93 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया।      

नेक चंद सैनी 
वही पचास-साठ का दशक, किसे पता था कि पंजाब के गुरदासपुर में जन्मे नेक चंद सैनी नामक युवक में, जो चंडीगढ़ में रोड इंस्पेकटर के साथ ही पब्लिक वर्क्स विभाग में काम करता था, टूटे-फूटे, बेकार, लोगों द्वारा फेंक दिए गए कबाड़ में भी सौंदर्य खोज उसे एक अनोखा रूप देने की  निकालने की क्षमता है। अपने खाली समय में वे कबाड़ को इकट्ठा कर उसे नया रूप देते रहते थे तथा उसे सुखना झील के पास की वीरान जगह पर अपने तरीके से सजाते रहते थे। पर इस क्षमता को आंकने में सरकार को करीब बीस साल लग गए। जब नेक चंद ने 13 एकड़ पर एक सपनों की नगरी बसा डाली थी।  भले ही सरकार को इतना समय लगा हो पर लोगों ने नेक चंद की मेहनत पर सफलता की मोहर बहुत पहले लगा दी थी।  चंडीगढ़ में उनका सपना "रॉक गार्डन" के रूप में साकार हो चुका था। समय के साथ नेक चंद की ख्याति सात समुन्द्र भी लांघ गयी जब उन्हें अमेरिका तथा इंग्लैण्ड में वैसा ही म्यूजियम बनाने का प्रस्ताव दिया। 

1984 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा। पिछले गुरुवार 11 जून को उन्हें शायद ऐसा ही कुछ रचने के लिए स्वर्ग बुला लिया गया। 

इस तरह दो शख्शियतें, एक रहस्यमय माहौल में रहने वाली तथा दूसरी ऐसे ही माहौल को रचने वाली, चार-पांच दिनों के अंतराल में एक तीसरे रहस्यमय माहौल की ओर अग्रसर हो गयीं। श्रद्धांजलि।      

विशिष्ट पोस्ट

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...