शनिवार, 16 मार्च 2013

साईयाँ भी जाको रख लेता है, उसका .........


भारत दास वैष्णव।
हमारे संस्थान में कार्यरत एक सज्जन। प्रभू की गाय। ज्यादातर "फिजिकली प्रेजेंट, माइंडली एबसेंट" अपने में मग्न। संस्थान में तो सभी के कृपापात्र हैं। पर अभी दो-तीन दिन पहले ही पता चला कि उपरवाला भी उन पर खास मेहरबान है (तभी तो पहलवान हैं) इसके साथ ही यह भी सत्य सामने आया कि कहावतें यूँही नहीं बनी उनके पीछे भी ठोस कारण हुआ करते थे। जैसे बंगाली भाषा में एक कहावत है कि  "जिस दिन तकदीर खराब हो उस दिन यदि ऊंट पर भी बैठे हों तो कुत्ता काट लेगा।"  
  
हुआ यह कि अपने भारत दास जी (भरत नहीं) अपने में खोये, मग्न चले जाते हुए सडक विभाजक पर बिना देखे-सुने सायकल समेत दूसरी तरफ अवतरित हो गये। उधर से एक युवक जो बैठा तो अपनी बाइक पर था पर सवार हवा पर था, आंधी की तरह उड़ा आ रहा था।  इन्हें अचानक सामने पा ब्रेक लगाने की गलती कर बैठा, फलस्वरुप वह कहीं गया उसकी गाडी कहीं गयी। गनीमत रही कि उसका रंग ही रतनारा हुआ, कोई अंग भंग नहीं हुआ अलबत्ता उसके कपडे जरूर "डिजायनर और हवादार" हो गये। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, उस दिन तो उसका राहू, शनि पर सवार था। वह अभागा  पीछे एक पुलिस की गाडी को "ओवरटेक" कर भागा आ रहा था। उसके गिरने पर पीछे आती पुलिस कर्मियों को मौका मिला, उसे धर दबोचा और दो-चार  हाथ लगा दिए।

इधर इतना सब होने के बावजूद जिसके कारण यह सब हुआ वह भारत दास जी "ओह, ओह, बेचारा" कहते हुए निरपेक्ष भाव से अपने रास्ते चल दिए। उन्हें पता ही नहीं चला कि वह आज प्रभू कृपा से चोट-ग्रस्त होने से बाल-बाल तो बचे ही, पिटने से भी बच गये हैं। 



शुक्रवार, 8 मार्च 2013

पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता?

कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को दिल से बराबरी का हकदार मानता है? वैसे ऐसे समाज, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का? आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। यह इतना आसान नहीं है, हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं।

 यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है? यदि ऐसा नहीं है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता? पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।

आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में  उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की. अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की।
कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

बुधवार, 6 मार्च 2013

नियामत हैं आँखे, सम्भाल कर रखें

आंखें, इंसान को सौंदर्यबोध कराने के लिए प्रकृतिप्रदत्त एक अजूबा अंग। सोच के ही सिहरन होती है कि यदि ये ना होतीं तो दुनिया कितनी बेनूर होती। पर जब यह अनमोल चीज हमारे पास है तो हम इसकी कीमत ना जान इसकी उपेक्षा करते रहते हैं।       

आज प्रदूषण, कम्प्यूटर, टी.वी., सेलफोन, धूल-मिट्टी, तनाव और भी ना जाने क्या-क्या, यह सब धीरे-धीरे हमारी आंखों के दुश्मन बनते चले जा रहे हैं। पहले जरा से साफ पानी के छीटों से ही ये अपने आप को दुरुस्त रख
लेती थीं। पर लगातार इनकी अनदेखी अब इन पर भारी पड़ने लगी है। काम में मशगूल हो, "जंक फूड़" खा, विपरीत परिस्थितियों में देर तक काम कर लोग अंधत्व को न्यौता देने लग गये हैं। लगातार कम्प्यूटर आदि पर काम करने से आंखों के गोलकों पर भारी दवाब पड़ता है जिससे छोटी-छोटी नाजुक शिरायें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं इससे खून का दौरा बाधित हो नुक्सान पहुंचाता है और मजे की बात यह कि इतना सब घट रहा होता है पर हमें इसका पता भी  नहीं चलता। आज के व्यस्तता पूर्ण समय में हम  काम में ड़ूब कर पलकें झपकाना ही भूल जाते हैं जो की आंखों की बिमारी का एक बड़ा कारण है। इससे आंखों में सूखापन बढ जाता है जो इनकी सफाई और तरलता बनाए रखने में बाधा उत्पन्न करता है। डाक्टरों के अनुसार रोज कम से कम 15 मिनट का आंखों का व्यायाम और थोड़ी सी देख-भाल कर इन्हें छोटी-मोटी बिमारियों से दूर रखा जा सकता है। उम्र के साथ-साथ सफेद मोतीया उतरना एक  आम बात है, जिसका इलाज आजकल बहुत आसान भी हो गया है। पर     ग्लौकोमा   जिसे आम भाषा में काला मोतिया कहा जाता है वह अभी भी आंखों का सबसे बडा दुश्मन है। गुप-चुप रूप में बढने वाला यह रोग बच्चों को भी हो सकता है।  
 
आंखों के अंदर एक तरल पदार्थ का निर्माण व निकास लगातार होता रहता है। यह प्रक्रिया आखों में  एक निश्चित दबाव बनाए रखती है, पर जब किसी कारणवश इस तरल पदार्थ के निकास में अवरोध उत्पन्न होता है तो आखों का दवाब  बढ़ जाता है जिससे ऑप्टिक नर्व को स्थायी नुकसान पहुँच सकता है। ऑप्टिक नर्व के कारण ही हम किसी वस्तु या व्यक्ति को देखने में सक्षम हो पाते हैं। आखों के दबाव के बढ़ने के कारण ऑप्टिक नर्व के क्षीण होने को ही  ग्लौकोमा या काला मोतिया कहा जाता है। यह रोग आखों की रोशनी को पूर्णतया समाप्त कर सकता है और अंधापन ला सकता है। इसकी रोक-थाम शुरुआती दौर में हो सकती है पर इसका पता ज्यादातर तभी चलता है जब काफी हानि हो चुकी होती है और आँख  दृष्टिविहीन हो चुकी होती है। इसकी भयावता का पता इसी से लगाया जा सकता है कि खुद डाक्टरों तक को खुद  के इससे पीडित होने का भी  पता नहीं चल पाता। वैसे आखों में लाली, अत्यधिक पीड़ा, सिरदर्द, उल्टी आना, रोशनी में अचानक कमी या रंगीन
गोले दिखना आदि  ग्लौकोमा  की गंभीर स्थिति के लक्षण हैं। इसलिए ऐसे लक्षणों के दिखते ही या फिर 45 की उम्र पार
करने के बाद नियमित रूप से आखों की जांच करवाते रहना चाहिए। अगर चश्मे का नम्बर बार-बार बदल रहा हो, रात में अंधेरे में देखने में दिक्कत हो रही हो, जब सीधे देखने पर आखों के किनारे से न दिखायी दे रहा हो, आखों और सिर में दर्द रहता हो तो इन बातों को  नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 

वैसे भी आंखों की कुछ देख-भाल खुद भी करते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते समय 15-20 मिनटों के बाद कुछ देर के लिए विश्राम जरूर लें। रोज 15 मिनट का आंखों का व्यायाम काफी है इन्हें सुरक्षित रखने के लिए।

* एक बड़ी सी घड़ी की कल्पना करें। फिर आंखें बंद कर उसके हर अंक पर नजर ड़ालें,  तीन सेकेंड़ रुकें फिर घड़ी के मध्य में आ जाएं। इस तरह सारा चक्कर पूरा कर आंखों पर बिना जरा सा भी दवाब ड़ाले हथेलियां रख पांच बार घड़ी की दिशा में और पांच बार विपरीत दिशा में आंखें घुमाएं। फिर हाथ हटा जल्दी-जल्दी बीस बार पलकें झपकाएं।

* हाथ में एक पेंसिल ले बांह पूरी खोल लें, सांस खीचें पेंसिल पर नज़र जमा उसे धीरे-धीरे अपनी ओर ला नाक से छुआएं, सांस छोड़ते हुए फिर पेंसिल को दूर ले जाएं। ऐसा पांच बार करें।

* आंखों के गढ्ढों के ऊपर सावधानी से उंगलियों से दवाब डालें, पांच सेकेंड रूकें फिर दवाब हटा लें ऐसा पांच मिनट तक करें।

* जब भी बाहर से आएं या घर पर भी हों तो साफ पानी से दिन में चार-पांच बार आंखों पर छीटें मारें। ठंड़े पानी की पट्टी रखने से भी बहुत आराम मिलता है। पर सब कुछ ठीक होने पर भी साल में एक बार डाक्टर से जांच जरूर करवा लेनी चाहिए।  क्योंकि आँख है तभी जहान  है.

शनिवार, 2 मार्च 2013

कलकत्ते का राजभवन

इसको देखने के लिए आम जनता को अनुमति नहीं होने के कारण देश की यह भव्य इमारत उतनी मशहूर नहीं हो सकी है जितनी प्रसिद्धि दिल्ली के राज भवन को प्राप्त है। पर इससे इसकी भव्यता, सुंदरता या कलात्मकता को कम कर के नहीं आंका जा सकता। 

 दिल्ली के राजधानी बनने के पहले अंग्रेजों ने कलकत्ते को अपनी राजधानी बना रखा था। आज भी उनके द्वारा बनाई गयी सरकारी इमारतें, रिहायशी भवन, पुल, सडकें अपनी मजबूती और भव्यता की कहानी आप कह रहे हैं। इन्हीं वास्तु-कला के भव्य, विशाल, अनुपम नमूनों के कारण आज भी कलकत्ता, जो अब कोलकाता हो गया है, को महलों के नगर के रूप में जाना जाता है। अपनी सुंदरता के कारण इसे पूर्व का पीटर्सबर्ग भी कहा जाता रहा है। उस समय यह देश का सबसे बडा, सुंदर, धनी और सुरुचिपूर्ण शहर था।   
आजादी के पहले की बात है। बंगाल में ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज था। पर वहां का गवर्नर जनरल रहता तो था एक आलीशान बंगले में पर वह था किराए का। अंग्रजों का मानना था कि उन्हें इस देश में सदा के लिए रहना है सो गवर्नर जनरल के लिए एक महल की आवश्यकता महसूस होने लगी। उसी को पूरा करने के लिए विशाल पैमाने पर एक भव्य इमारत का निर्माण कैप्टन चार्ल्स वाट की देखरेख में 1799 में शुरु किया गया जो 1803 में जा कर पूरा हुआ। उस समय 27 एकड में 84000 स्क्वा. फुट पर बने इस महल पर आज के हिसाब से करीब चार मिलियन पाउंड का खर्च आया था। इस तब तक के सबसे सुंदर भवन के खिताब वाले महल के प्रतिष्ठापन पर 800 अतिथि आमंत्रित किए गये थे।  

पर तब से अब तक इसका नाम परिस्थितियों वश कई बार बदला जा चुका है। निर्माण के बाद इसे गवर्मेंट हाउस का नाम दिया गया था। फिर जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बाद में राज-काज ब्रिटिश हुकुमत को 1858 में सौंपा तो इसे वायसराय निवास बना दिया गया। फिर जब राजधानी कलकत्ते से दिल्ली चली गयी तो फिर यह महलनुमा इमारत बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर का आवस बनी और आखिरकार आजादी के बाद से अब तक और प्रदेशों की तरह यह बंगाल के गवर्नर के निवास "राज भवन" के रूप में विख्यात है। 

शहर के बीचोबीच "मैदान यानि ईडेन गार्डेन" और "राइटर्स बिल्डिंग" के पास, कोलकाता के दिल धर्मतल्ला यानि एस्प्लैनेड से मुश्किल से पैदल दस मिनट की दूरी पर बने इस भवन में प्रवेश के छह रास्ते हैं। जिन पर उत्तर-दक्षिण दिशा में एक-एक तथा पूर्व और पश्चिम दिशा में दो-दो विशाल "गेट" बने हुए हैं। पूर्व और पश्चिम के गेटों पर विशाल मेहराबों पर शेर की मुर्तियां बनी हुई हैं। बाकि छोटे गेटों पर स्फिंक्स की मूर्तियां स्थापित हैं। बाहर से भवन का सबसे सुंदर रूप उत्तरी दरवाजे से दिखता है जो कि अंदर जाने का प्रमुख द्वार भी है। इसका केंद्रीय भवन जो एक सुंदर गुंबद से आच्छादित है, चारों  ओर से गोलाकार निर्माणों से घिरा है। जिसमें दफ्तर तथा रिहायशी जगहें शामिल हैं। उस समय भी जब वातावरण इतना दुषित नहीं होता था तब भी इसमें प्राकृतिक हवा के आवागमन का पूरा ख्याल रखा गया है। तीन मंजिला भवन के उपर जाने के लिए चार कोनों में चार सीढियां बनी हुई हैं।      

करीब साठ कमरों वाले इस भवन को सुंदर और भव्य बनाने के लिए हर संभव कोशिश की गयी है। यहां की कलाकृतियां, मुर्तियां, चित्र, पेंटिंग्स, फर्निचर, बागीचे उनका रख-रखाव हर चीज अनमोल, भव्य और अनूठी है। जगह-जगह से अनुठी वस्तुएं ला कर यहां संग्रहित की गयी हैं। कलकत्ते की पहली स्वचालित सीढी भी सर्वप्रथम यहीं लगाई गयी थी। इसको देखने के लिए आम जनता को अनुमति नहीं होने के कारण देश की यह भव्य इमारत उतनी मशहूर नहीं हो सकी है जितनी प्रसिद्धि दिल्ली के राज भवन को प्राप्त है। पर इससे इसकी भव्यता, सुंदरता या कलात्मकता को कम कर के नहीं आंका जा सकता। यह बंगाल का ही नहीं देश का भी गौरव है।  काश इसे आम जनता भी निहार पाती !!!

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

रेल की पटरियों पर दौड़ती सियासत

चारों फोटो ३६ गढ़ से चलने वाली उपेक्षित राजधानी एक्स. के है।
भारतीय रेल। राजनीतिक दलों के लिए कामधेनू. कोइ भी क्षेत्रीय दल जो केंद्र को हड़काने की क्षमता पा जाता है उसकी पहली मांग रेल मंत्रालय ही होता है. इसे पाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। क्योंकि इसका सीधा संबंध जनता से होता है इसलिए जो भी इसे हथियाता है वह अपने क्षेत्र के लोगों को बरगलाने के लिए अपने इलाके में "पटरियां बैठाना" शुरू कर देता है. भले ही वहाँ जरूरत या गुंजायश हो या ना हो. 


बाहर के हाल से अन्दर का मजमून भांपा जा सकता है 

इस बार 17 सालों के बाद फिर कांग्रेस को मौका मिला है इसे दूहने का। सियासत तो सियासत ही होती है . जब इतने वर्षों तक क्षेत्रीय दल इसके बूते अपने इलाकों का तथाकथित भला करते रहे तो कांग्रेस कैसे पीछे रह सकती थॆ. संबंधित महोदय ने इस बार मौके का फ़ायदा उठा अपने आकाओं को खुश करने का जैसे जरिया पा लिया और कांग्रेसी रेल चला डाली   

विडंबना है कि इस गाय का दूध तो सब पीना चाहते हैं पर उसको चारा कोई नहीं डालना चाहता। उसके दिन प्रति दिन क्षीण होती अवस्था का रोना सभी रोते हैं पर इलाज कोई नहीं करना चाहता। इलाज हो भी कहां से जब उसकी देख-भाल करने वाले ग्वालों की फौज पर ही आमदनी का 80'/. खर्च हो जाता हो। 

जंग लगे खस्ता हाल डिब्बे 
इस बार भी कुछ आश्चर्य चकित करने वाले उल्टे-सीधे निर्णय लिए गये, पर पूछे कौन कि मंत्री महोदय जब अनगिनत प्लास्टिक की बोतलों में पानी का व्यापार करने वाली कंपनियां लाइन लगाए खडी हैं तो आप क्यों अपना पानी जबरदस्ती पिलवाना चाहते हैं? क्यों नहीं बिना साफ किए ही उस पानी का उपयोग गाडियों और खासकर उनके बजबजाते शौचालयों को साफ कर यात्रियों को बेहतर परिवेश मुहैया करवाने की कोशिश करते? क्यों नहीं एक सुराख को शौचालय का नाम देने के बदले बायो शौचालयों की शुरुआत की जाती जिससे भारतीय पटरियां खुले 'टायलेट' के नाम से और वातावरण प्रदूषण से मुक्ति पा सकते? क्यों नहीं रखरखाव पर और ध्यान दिया जाता जिससे राजधानी जैसी गाडियों को चूहों और काक्रोंचों से मुक्ति दिलाई जा सकती? क्यों नहीं कोई आप का ध्यान इस ओर दिलाता कि जब इन प्रतिष्ठित गाडियों का यह हाल है तो साधारण गाडियां कैसे होंगी? यात्री  क्यों नहीं बिना किसी को बताए कभी साधारण गाडी में सफर कर उसकी हालत का जायजा लेते? क्यों नहीं चमकीले रैपरों में लिपटे बेस्वाद, बदरंग खाने का स्वाद चखते? क्यों पहले से ही ना संभल रही गाडियों की स्थिति सुधारने की बजाय और गाडियों की भीड बढाते हैं? दलालों पर अंकुश लगना तो बहुत जरूरी है पर क्यों नहीं दौडती गाडी में अनाप-शनाप "दौलत" कमाते टिकट चेकरों पर लगाम कसते?  सवाल अनगिनत हैं इतने कि जवाब देते-देते इनका कार्यकाल पूरा हो जाए। 
कितने सुरक्षित हैं ये? 

पर यदि सभी दलों को इसकी इतनी चिंता है कि इसे अपने वश में कर इसका, देश का, देश की जनता का, भला करना चाहते हैं तो इसे क्यों नहीं "प्रायवेट सेक्टर" को दे देते। भले ही उन्हें इसे सुधारने की एक निश्चित अवधी भी दे दी जाए, पांच साल या दस साल की। दसियों ऐसी कर्मवीर कंपनियां मिल जाएंगी जो किराये का बोझ जनता पर डाले बिना इसकी सेहत सुधारने का वचन दे सकती हैं। पर इस दूधारू की ऐसी किस्मत कहाँ ? कामधेनू  के लिए तो महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र तक में ठन गयी थी, ये तो हाड-मांस के बने साधारण इंसान हैं। इसके बिना राजनीति की गाडी नहीं चलने की।

सोमवार, 25 फ़रवरी 2013

जीवन को जीएं, काटें नहीं

अपनी दिनभर की दिनचर्या में रोज ही ऐसे कई युवा मिलते हैं जो निढाल, निस्तेज, सुस्त नजर आते हैं। जैसे जबरदस्ती शरीर को ढो रहे हों। अधिकांश नवयुवकों को किसी ना किसी व्याधि से ग्रस्त दवा फांकते देखना बडा अजीब लगता है। आज के प्रतिस्पर्द्धात्मक समय में हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जुझता हुआ किसी यंत्र की कसी हुई तार की तरह हर वक्त तना रहता है। जिसके फलस्वरूप देखने में बिमारी ना लगने वाली, सर दर्द, कमर दर्द, अनिद्रा, अपच, कब्ज जैसी व्याधियां उसे अपने चंगुल में फंसाती चली जाती हैं, जिससे अच्छा भला युवा उम्रदराज लगने लगता है।

सदियों से हमारे यहां प्रभू से प्रार्थना की जाती रही है कि "हे प्रभू हमें सौ साल की उम्र प्राप्त हो"। पर यदि 30-35 साल के बाद ही रो-धो कर, दवाएं फांक कर, ज्यादातर समय बिस्तर पर गुजार कर जीना पडे तो ऐसे जीवन से क्या फायदा।      

निश्चिंतता 
पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। अनियमित दिनचर्या, कुछ भी खाने-पीने का शौक, लापरवाही, मौज-मस्ती युक्त अपना रख-रखाव इस मशीन को भी बाध्य कर देता है अपने से ही विद्रोह के लिए। युवावस्था में यदि थोडी सी भी "केयर" अपने तन-बदन की कर ली जाए तो यह एक लम्बे अरसे तक मनुष्य का साथ निभाता है। लोग भूल जाते हैं कि मौज-मस्ती भी तभी तक रास आती है जब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। 

पर इस नैराश्य पूर्ण स्थिति में भी आप अपने चारों ओर देखें तो आपको ऐसे अनेक लोग दिख जाएंगे जो अपने कर्मों से, अपने आचरण से, अपने अनुभवों से हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। जिन्हें देख जिंदगी को खुशहाल बनाने के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है, उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ऐसे ही एक शख्स हैं मेरे मामा जी। जो 82 साल के होने के बावजूद किसी 35 साल के युवा से कम नहीं हैं। आज देश-प्रदेश के लोगों के बीच बहुचर्चित शतायु मैराथन धावक फौजा सिंह के प्रांत पंजाब के एक कस्बे फगवाडा के पास के गांव हदियाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में श्री प्यारे लाल सुंधीर बचपन से ही सामान्य कद-काठी के इंसान रहे। पर लाख विषमताओं, हजारों अडचनों, सैंकडों परेशानियों के बावजूद उन्होंने अनियमितता का सहारा नहीं लिया। यहां तक कि छोटी उम्र में ही जीवनसाथी की असमय मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने को संभाले रखा और अपने बच्चों को सही तालीम दिलवा कर उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर और स्थापित किया। आज जब वे हर तरह से सम्पन्न हैं, घर में हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है फिर भी इस उम्र में में भी उन्हें खाली बैठना ग्वारा नहीं है। आज भी सिर्फ व्यस्त रहने के लिए उन्होंने अपने व्यवसाय को तिलांजली नहीं दी है।  घर में कार होने के बावजूद अपनी सेहत की खातिर इस उम्र में भी रोज 10 से 15 की.मी. सायकिल पर चलना उनका शौक है। किसी भी तरह की चिंता, फिक्र, तनाव को वे पास नहीं फटकने देते। इसी वजह से बिना किसी का साथ ढूंढे अपनी बिटिया के पास नार्वे तक हर ढेढ दो साल बाद चक्कर लगाने से नहीं घबराते। वहा भी घर पर नहीं रुकते, आस-पास के दूसरे देशों को देखना, घूमना भी उनका शगल है, फिर चाहे किसी का साथ मिले या ना मिले। अपना देश तो इनका घूमा हुआ ही है वह भी अकेले. हमारे यहां तो उनका हर साल आना हमारी जरूरत है। उनके 10-15 दिनों का प्रवास हमें एक नई शक्ति प्रदान कर जाता है।  यह सब उन लोगों के लिए सबक है जो बचपन के खान-पान की कमी, अपनी उम्र, किसी का सहारा ना होने या अपनी जीवन में ना टाली जा सकने वाली मुसीबतों को अपने द्वारा पैदा की गयीं मुसीबतों का जिम्मेदार मानते हैं। सीधी  सी बात है जिसमे जीने की उद्दाम इच्छा हो उसके लिए कोइ बाधा कोइ मायने नहीं रखती।    

सोचिए जब होनी को टाला नहीं जा सकता तो फिर परेशान क्यों? जब जो होना है, हो कर ही रहना है तो फिर नैराश्य क्यों? जब भविष्य अपने वश में नहीं है तो उसके लिए वर्तमान में चिंता क्यों?
जरा सोचिए, मैं भी सोचता हूं। कठिन जरूर है पर मुश्किल नहीं.

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

समय तो आम आदमी का भी कीमती है भाई


वो दिन इतिहास बन गये हैं जब नेता आदरणीय हुआ करते थे। खुल कर लोगों से मिला करते थे। कोई ताम-झाम नहीं होता था खुली गाडियों में उन्हें आसानी से देखा पहचाना जा सकता था। अब तो गाडी को देख कर उसमें सफर करने वाले का अंदाज लगाना पडता है।


हर प्रांत की राजधानी में मुख्य सडकों पर सायरन बजाती पुलिस की गाडियों के साथ हमारे नेताओं का गोली रोधक कारों में दुबक कर फर्राटे से निकलना एक आम बात है। आदत पड गयी है जनता को, इनके कारण, अपने जरूरी से जरूरी काम को दोयम दर्जे पर रखने की। आदत पड गयी है उसे अपनी सुरक्षा की चिंता आप करने की। आदत पड गयी है उसे अपने ही द्वारा चुने गये अपने प्रतिनिधि को अपने से ही डरता देखने की। आज अति व्यस्तता का समय है। काम-काजी आदमी के पास जरा भी फाल्तु वक्त नहीं होता कहीं ठहरने, रुकने, इंतजार करने का। अफरा-तफरी मची रहती है अपने काम पर पहुंचने और उसे पूरा करने की। ऐसे में एक बात बडी अखरती है कि जब कोई विशिष्ट व्यक्ति बंदुकों के साये में, बख्तर बंद गाडियों में बंद हो निकलता है तो आम जनता को हर मोड-चौराहे पर रोक दिया जाता है। उन लोगों में अधिकांश किसी ना किसी जरुरी काम से निकले होते हैं,किसी को दूरगामी ट्रेन पकडनी होती है, कोई किसी बिमार अस्पताल ले जा रहा होता है, कोई अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए निकला होता है, किसी को परीक्षा भवन में जाने में देर हो रही होती है। समझ में नहीं आता कि जब सारी सडक पडी होती है तो उनका दक्ष ड्रायवर सायरन बजा दाहीने तरफ से क्यों नहीं निकल जाता? क्यों पायलेट जीप में बैठा कोई काफिले के आगे-आगे गाडी दौडाते हुए बाहर हाथ निकाले डंडा लहरा कर जबरदस्ती भय का महौल उत्पन्न करता जाता है। क्यों अपनी ही जनता से लोग दूरीयां बना कर रुआब दिखाना चाहते हैं? काले शीशों के पीछे बैठे आम से ही खास बने लोगों को भी जनता की परेशानी समझनी चाहिए। रास्ता चलता रहे तो किसी को कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी और विशिष्ट व्यक्ति भी जनता की मन ही मन निकलती गालियों से बचे रहेंगे।  

वो दिन इतिहास बन गये हैं जब नेता आदरणीय हुआ करते थे। खुल कर लोगों से मिला करते थे। कोई ताम-झाम नहीं होता था खुली गाडियों में उन्हें आसानी से देखा पहचाना जा सकता था। अब तो गाडी को देख कर उसमें सफर करने वाले का अंदाज लगाना पडता है। धर्म, जाति, भाषा, को मुद्दा बना, धन,बल से सिंहासनारूढ होने वाले से वैसे खुलेपन की आशा भी बेमानी है। मन ही मन शायद वह भी अपनी कारस्तानियों से डरा रहता है। उसे लगता है कि उसके झूठ को जनता जानती है। इसीलिए उसे अपनी सुरक्षा की चिंता होने लगती है।  

जिस देश के हर प्रांत में बलात्कार, लूट, डकैती, अपहरण जैसी घटनाओं से आम इंसान त्रस्त हो। जहां 761 लोगों के पीछे एक पुलिसकर्मी होने के कारण उसे ठीक से और समय पर मदद ना मिल पाती हो, वहीं के एक विशिष्ट व्यक्ति के लिए दर्जनों सुरक्षा-कर्मी उसे  सुरक्षित रखने को तैनात हों तो ऐसी व्यवस्था को क्या कहा जाएगा। इसी अव्यवस्था पर सर्वोच्च न्यायालय ने सवाल उठाया है। कुछेक लोग तो सिर्फ अपने अहम, रुतबे, और रौब को दिखाने के लिए ही इन सुविधाओं के लिए अड जाते हैं। फिर उन्हीं सुविधाओं, लाल बत्ती और विशेष सुरक्षा घेरे का भय दिखाकर रौब गांठने से बाज नहीं आते। इसी का नतीजा है कि एक बार फिर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को आम आदमी की सुरक्षा का एहसास कराया है और जानना चाहा है कि वे कौन अति विशिष्ट लोग हैं और उनकी सुरक्षा पर किस आधार पर कितना खर्च किया जा रहा है? साथ ही यह भी जानकारी चाही है कि जिन लोगों को सुरक्षा मुहैया कराई जा रही है, उनमें ऐसे कितने लोग हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। यह भी विडंबना ही है कि देश और देश की जनता की सुरक्षा, रख-रखाव, उसकी प्रगति, उसके सुख-चैन की जिम्मेदारी का वचन देने वालों की जगह सर्वोच्च न्यायालय को हर हफ्ते, पखवाडे देश मे पनपते नासूरों की रोक-थाम करने के लिए हिदायत देनी पडती है।

इसके पहले कि यह चाहत और शौक, समस्या बन विकराल रूप ले ले, उन विशिष्ट लोगों खासकर राजनितिक वर्ग को भी समय की नब्ज को समय रहते आंक लेना चाहिए कि उनके प्रति लोगों के घटते विश्वास की एक वजह क्या यह भी तो नहीं है।

विशिष्ट पोस्ट

यूपी का रहस्यमयी मंडुक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...