गुरुवार, 3 मार्च 2016

कौवे का पीछा छोड़ पहले अपना कान टटोल लें

यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है। उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर गलत हरकतें या बातें  कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो।   इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए.... 

कहा गया है, "नीम-हकीम खतराए जान।" यानी आधी-अधूरी जानकारी सदा से ही खतरनाक रही है, फिर वह चाहे किसी भी विषय की हो, किसी भी विधा की हो, किसी के भी बारे में हो। कटु सत्य यह भी है कि कमजोर यादाश्त के साथ-साथ अवाम का एक अच्छा खासा प्रतिशत इस कमी से भी ग्रस्त है, जिसका फ़ायदा, माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए, कुछ लोगों द्वारा सदा से उठाया जाता रहा है। ऐसे लोग भीड़ में यदि कह देते हैं कि, तुम्हारा कान कौवा ले उड़ा है तो भीड़ पहले कान टटोलने की जगह कौवे के पीछे दौड़ पड़ती है। जब तक
बात समझ में आती है तब तक तो बंटाधार हो चुका होता है। इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए।      
                दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों में कुछ ऐसे चरित्रों का उल्लेख है, जिन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ मानवता और समाज के लिए अपना सारा जीवन खपा कर लोगों को जीने की सही राह दिखाई। उनके कर्मों, उनके आदर्शों, उनके उपदेशों के कारण उन्हें मानव से इतर देवताओं या संतों का दर्जा मिला। आज भी लोग जात-पांत से परे उन्हें अपना इष्ट, अपना आदर्श, अपना संबल मान उनकी पूजा-अर्चना-इबादत करते हैं। पर कुछ मनोविकारी लोग अवाम की इसी आस्था को खंडित कर उसमें जाति-धर्म, भेद-भाव के विषाणु डाल समाज के टुकड़े-टुकड़े कर अपने घृणित मनसूबे पूरा करना चाहते हैं। इस तरह के घृणित कृत्यों के लिए ज्यादातर देवी-देवताओं को निशाने पर रखा जाता है।   
                    रविवार सुबह की सैर करने के दौरान ठाकुर जी ने एक एस.एम.एस. दिखाया। उसे पहले भी मैं देख चुका था और भी कई लोगों ने इस जहर फैलाते संदेश की शिकायत की थी। इसमें वर्ग विशेष को संबोधित कर उन्हें सचेत और जागरूक करने का दिखावा करते हुए प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं को सच-झूठ की मिक्सी में तोड़-मरोड़ कर ऐसे सामने रखा गया था, जिससे उन कथाओं की सीख, उनका अर्थ, उनका संदेश बिलकुल ही अलग और विवादास्पद लगने लगे। ठीक उसी तरह जैसे आजकल ऑडिओ-विडिओ टेप के साथ छेड़-छाड़ कर अपने मतलब की बात रेकॉर्ड कर ली जाती है।
                        उदाहरणार्थ संदेश में ऋग्वेद का उल्लेख कर श्री कृष्ण जी को असुर बताया गया है। किसी को भी भड़काने के लिए यह बात काफी है, क्योंकि आज की पीढ़ी के अधिकांश सदस्यों को तो शायद इस ग्रंथ का नाम ही मालुम नहीं होगा, तो उसमे लिखा क्या है इसको जानने की जहमत कौन उठाएगा ! इसी कमजोरी के कारण विष-बीज-रोपण का दुःसाहस किया गया है। जबकि उसी ग्रंथ में साफ़ शब्दों में बताया गया है कि असुर, वह जो सुर यानी देवता न हो। असु+र से बनने वाले इस शब्द का अर्थ बनता है, प्राण+वाला = प्राणवान या शक्तिमान। ऋग्वेद में ही इसका प्रयोग वरुण देव और अन्य देवों के साथ-साथ मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों के लिए भी किया गया है। यह अलग बात है कि समय के साथ इसका अर्थ भौतिक शक्ति मान लिया गया। 
                        ऐसे ही बहुत सफाई से "अबीर" को "अवीर" यानी कमजोर चिन्हित करने वाला बता, उसे होली के दिन उपयोग में न लाने को कहा गया है। जबकि देव-दानव और दानव-देव का घालमेल कर लोगों को भ्रमित कर उलझाने और उकसाने का प्रयास किया गया है। यह बात सफाई से छिपा दी गयी है कि ग्रंथों में इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख है कि सुरों के अलावा अन्य जातियों में भी परम प्रतापी लोगों की कभी कमी नहीं रही है।  
                       इसी तरह रात में शव दहन की बात को सच्चाई छिपाते हुए मुद्दा बनाने की कोशिश की गयी है कि हिंदू धर्म में सारे धार्मिक कार्य देवों को साक्षी मान किए जाते हैं। इसलिए खासकर मनुष्य के जीवन का यह अंतिम संस्कार सूर्य देव, जिनको आत्मा का कारक माना जाता है, वही जीवन और चेतना भी हैं, के सामने ही किया जाता है और फिर अन्धकार यानी रात्रि काल को कुछ अशुभ भी माना जाता है। जबकि इस प्रथा का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले यह क्रिया आबादी से बाहर की जाती थी एतएव जंगली जानवरों इत्यादि से बचाव के लिए इसे दिन में ही किए जाने का प्रावधान रखा गया हो। इसी तरह की कई आधी सच्चाई आधे झूठ वाली बातों को गड्ड-मड्ड कर समाज को दो-फाड़ करने का कुत्सित प्रयास इस एस.एम.एस. में किया गया है।  
                        इस संदेश से यह बात तो साफ़ है कि समाज की शांति, भाईचारे, सौहार्द, को नष्ट कर, वैमनस्य फैलाने का यह कुत्सित प्रयास है। यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है, ऐसी उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर इस तरह की हरकतें कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो। इसलिए आधे-अधूरे सच में लिपटे ऐसे तथ्यों की सच्चाई और जानकारी लोगों के सामने तुरंत आनी और लानी चाहिए। क्योंकि आजकल चारों ओर जैसा माहौल है उसमें इस तरह की हरकत आग में घी का काम ना करे इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। जिसके लिए जागरूकता की अति आवश्यकता है। हम सब को अपनी जाति, अपने धर्म, अपने हित को किनारे कर, दलगत लाभ से ऊपर उठ, एक साथ मिल कर, ऐसी ओछी हरकतों की भर्त्सना तो करनी ही चाहिए साथ ही ऐसे उपाय भी करने चाहिए जिससे ऐसी मानसिकता वाले लोगों और उनकी असलियत का समाज के सामने पर्दाफाश हो सके जिससे भविष्य में अपनी ऐसी घिनौनी हरकतों से समाज में भेद-भाव का बीजारोपण करने का कभी भी दुःसाहस ना करे सकें।        

5 टिप्‍पणियां:

कविता रावत ने कहा…

ओछी हरकत करने वालों के खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए, सबक सिखाना जरुरी है ऐसे लोगों को। .
सार्थक प्रस्तुति

जमशेद आजमी ने कहा…

किसी धर्मग्रन्थ के तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती। रोज रोज होती इन घटनाओं से वैश्विक स्तर की साजिशों की बू आती है। हर धर्म में दक्षिणपंथियों की बहुतायत है। ये सभी दक्षिणपंथी रक्त पिपासू और हमलावर होते हैं। आज हिंदू धर्म के ग्रन्थों की बात सामने आई है। कुछ समय पहले मुसलमानों की पवित्र पुस्तक कुरान के तथ्यों को भी तोड़ मरोड़ कर पेश करने की कोशिश हो चुकी है। चाहे पैंगबंर हजरत मोहम्मद का कार्टून हो या बाईबल को ईसाइयों के द्धारा तोड़मरोड करने का आरोप हो। दक्षिणपंथी अपनी इन्हीं कारगुजारियों से अक्सर हमारे दिमागों पर कब्जा करके, तबाही फैलाने में कामयाब हो जाते हैं। इसलिए सावधान रहने की जरूरत हैं क्योंकि इनके मकसद जितना हम सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। भाई को भाई खिलाफ लड़ाकर अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहते हैं।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ऐसा करने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि यदि हजार उनके विरोध में खड़े होंगे तो सौ लोग तरह-तरह की दलीलें ले उनके पक्ष में भी आ जुटेंगे ! यही सौ, उन हजार पर भारी पड़ इन लोगों को ऐसे कृत्य करने का हौसला देते रहते हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…


आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (05-03-2016) को "दूर से निशाना" (चर्चा अंक-2272) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Aabhar, Shastri ji

विशिष्ट पोस्ट

क्या आप भी बिस्कुट को चाय में डुबो कर खाते हैं

कोई चाहे कुछ भी कहे ! पर बिस्कुट को चाय में भिगो कर खाने का मजा कुछ और ही है ! पर  इस काम में "टाइमिंग" बहुत मायने रखती है, जो बिस...