शनिवार, 21 जनवरी 2017

जल्लीकट्टू , एक विवादित पारंपरिक खेल

आशा है इस पारंपरिक खेल को वैर भावना से मुक्त कर इंसान और पशु दोनों की सुरक्षा का भी ख्याल रखते हुए  खेल भावना  के तहत ही खेला जाएगा, जिससे फिर कभी इस पर कोई विवाद खड़ा न हो...

कहावत है , उतसव प्रिया: मानवा। पर आज कल देश में घटित हो रहे वाकयों को देख कर लगने लगा है कि कहावत होनी चाहिए, कलह प्रिया: मानवा !  
रोज ही कुछ ना कुछ बखेड़ा, कोई ना कोई विवाद, कोई ना कोई मतभेद उभर कर सामने आता ही रहता है। इससे और कुछ हो ना हो पर राजनितिक दलों को अपनी राजनीती चमकाने का मौका जरूर मिल जाता है। लोग सडकों पर उतर आते हैं। मामला कोर्ट तक जा पहुंचता है। जिसके फैसले पर भी, हालांकि लोग खुल कर नहीं बोलते, आजकल उंगलियां उठाने लग गयीं हैं। जो आने वाले समय के लिए कोई अच्छा इशारा नहीं है ! ताजा मसाला देश के दक्षिण भाग में फसल कटने पर होने वाले त्यौहार पोंगल के अवसर पर खेले जाने वाले मशहूर प्राचीन पारंपरिक खेल  जल्लीकट्टू का है। जिसे इंसान सांड या बैलों के साथ खेलता है।

वर्ष 2011 में बैल प्रजाति को भी संरक्षित श्रेणी में स्थान दे दिए जाने पर  जल्लीकट्टू पर भी विवाद शुरू हो गया था जिसकी परिणीति पर मई 2014 में भारत के "एनीमल वेलफेयर बोर्ड" और "पेटा" के आवेदन पर कोर्ट ने इसे हिंसक करार देते हुए इस पर रोक लगाने के आदेश दे दिए थे। हर साल पक्ष-विपक्ष में झड़पें होती रहीं। लोग खेल के पक्ष में थे उनके अनुसार यह एक प्राचीन, लोकप्रिय, सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन था जो लोगों के दिलों से गहराई से जुड़ा हुआ था। पर कोर्ट इसे पशुओं पर अत्याचार के रूप में लेता रहा है। कुछ दिन पहले ही मोदी सरकार ने मुख्यमंत्री जयललिता की मांग पर खेल को हरी झंडी दी थी पर सुप्रीम कोर्ट ने अब फिर उस पर पाबंदी लगा दी है न्यायालय ने स्पष्ट किया कि  जल्लीकट्टू को सिर्फ इसलिए न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता कि यह वर्षों से होता आ रहा है। इसी फैसले को लेकर पूरा प्रदेश आंदोलन पर उतर आया है जिसमे नामी-गिरामी लोग भी शामिल हो गए हैं।  

जल्लीकट्टू, तमिलनाडु के ग्रामीण इलाक़ों का एक परंपरागत खेल है जो फसलों की कटाई के अवसर पर पोंगल के त्यौहार पर आयोजित कराया जाता है और जिसमे बैलों से इंसानों की लड़ाई कराई जाती है. इसे तमिलनाडु के गौरव तथा संस्कृति का प्रतीक कहा जाता है, जो उनकी संस्कृति से जुड़ा है।
जल्लीकट्टू का इतिहास करीब 400 साल पुराना बताया जाता है। जो  पोंगल के समय आयोजित किया जाता है। तमिलनाडु में यह सिर्फ एक खेल नहीं बल्कि बहुत पुरानी परंपरा है। मदुरै में जल्लीकट्टू खेल का सबसे बड़ा मेला लगता है। इससे पुरुषों और बैलों दोनों के दम-ख़म की परीक्षा होती थी।लड़कियों के लिए सही वर ढ़ूंढने के लिए स्वयंबर के रूप में जल्लीकट्टू का सहारा लिया जाता था, जो युवक सांड़ पर काबू पा लेता था शादी उसी से होती थी। दूसरे गायों की अच्छी नस्ल के लिए उत्तम कोटि के सांड का भी चुनाव इसी के द्वारा किया जाता था। 

यह खेल स्पेन की "बुल फाइट" से मिलता जुलता है। पर वहां की तरह इसमें बैलों को मारा नहीं जाता और ना ही बैल को काबू करने वाले युवक किसी तरह के हथियार का इस्तेमाल करते हैं। यहां पशु को घायल भी नहीं किया जाता। पिछले समय में बैल या सांड के सींगों में सोने के सिक्के बांधे जाते थे जिनका स्थान अब नोटों ने ले लिया है, खेल में भाग लेने वालों को पशु को काबू कर इन्हें ही निकालना  होता है। इसको पहले सल्लीकासू कहा जाता था, सल्ली याने सिक्का और कासू का मतलब सीगों से बन्ध हुआ, समय के साथ सल्लीकासू बदल कर जल्लीकट्टू हो गया।  यह खेल जितना इंसानों के लिए जानलेवा है उतना ही जानवरों के लिए खतरनाक भी है। खेल के शुरु होते ही पहले एक-एक करके तीन बैलों को छोड़ा जाता है। ये गांव के सबसे बूढ़े बैल होते हैं। इन बैलों को कोई नहीं पकड़ता, ये बैल गांव की शान होते हैं और उसके बाद शुरु होता है  जल्लीकट्टू का असली खेल। खेल के दौरान भारी पुलिस फोर्स, एक मेडिकल टीम और कलेक्टर खुद भी वहां मौजूद रहते हैं। 

इस खेल के लिए सांड और बैलों के पालक अपने पालतू पशुओं की खूब देख-भाल करते हैं तथा उनको इस खेल के लिए प्रशिक्षित भी करते हैं। पर समय के साथ-साथ इस खेल में नई पीढ़ी के पदार्पण के साथ ही बढ़ती प्रतिस्पर्धा व जीत की लालसा ने कुछ गलत तरीकों को भी अपना लिया है। जिसके अंतर्गत सांड़ों को भड़काने के लिए उन्हें शराब पिलाने से लेकर उनकी आंखों में मिर्च तक डाल दी जाती है इसके साथ ही उनका शारीरिक उत्पीडन भी किया जाता है ताकि वे और तेज दौड़ सकें। इसी हिंसक बर्ताव को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने  इस खेल को बैन कर दिया था। 

ताजा समाचारों के अनुसार इसकी लोकप्रियता और इसके पक्ष में विराट जन-आंदोलन को देखते हुए एक अध्यादेश पारित कर, सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद, अब फिर इसको आयोजित करने की अनुमति मिल गयी है। आशा है इस पारंपरिक खेल को वैर भावना से मुक्त कर इंसान और पशु दोनों की सुरक्षा का भी ख्याल रखते हुए  खेल भावना  के तहत ही खेला जाएगा, जिससे फिर कभी इस पर कोई विवाद खड़ा न हो। 

4 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "कैंची, कतरन और कला: रविवासरीय ब्लॉग-बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

आपका हार्दिक आभार

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (24-01-2017) को "होने लगे बबाल" (चर्चा अंक-2584) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
नमस्कार, पोस्ट सम्मिलित करने का आभार। इस मौसम में अपना ख्याल रखे ।