रविवार, 1 जनवरी 2017

रात तीन बजे हरिद्वार स्टेशन पर एक "विद्वान" की आत्मश्लाघा

उन्होंने हमारे ज्ञान में वृद्धि की कि वे कोई ऐसी-वैसी हस्ती नहीं है वे वेदों के प्रकांड ज्ञाता हैं जिसके लिए उन्हें जबलपुर से हरिद्वार किसी यज्ञ को पूर्ण करने हेतु बुलाया गया है। वे अक्सर यहां आमंत्रित रहते हैं। यहां के लोगों में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा और मान है। यह और बात थी कि उन्हें लेने या उनके स्वागत हेतु वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था                

"वहाँ मत देखिए, हमारे साथ आइए", यह सुनते ही पलट कर देखा तो एक लंबे से मध्यम कद-काठी के इंसान को अपने से मुखातिब पाया। जगह थी, हरिद्वार का रेलवे स्टेशन, समय था पौने तीन रात का, दो-अढाई घँटे में दस दिसंबर की सुबह होने वाली थी। मैं, मामाजी और चेतन का, जो हमसे दिल्ली से जुड़े थे, यहां आना मेरी 
 माताजी के फूलों का गंगाजी में विसर्जन करने हेतु हुआ था। उन दिनों घने कोहरे के फलस्वरूप उत्तर दिशागामी हर गाडी के विलंब से चलने के कारण हमलोग शाम पांच बजे के बजाए आठ-नौ घँटे देर से पहुंचे थे।  गाडी से उतर कर बाहर आते समय वहीँ टँगे विश्राम-कक्षों की सूचि पर नज़र चली गयी तो ठिठक कर जैसे ही देखने लगा वैसे ही उपर्युक्त निर्देश मेरे कानों में पड़ा !हालांकि हमारे पंडित जी के ठिकाने का पता मेरे पास था पर इतनी रात को वहाँ जाना कुछ उचित न समझ हम किसी और विकल्प की तलाश में थे।


हमें लगा कि वे यहां के स्थानीय निवासी हैं। सो हम तीनो उन सज्जन की ओर इस आशा से मुड़े कि वे इतनी रात को सुनसान हो चुके इलाके में टिकने का सही ठौर बता देंगे। तीन जनों के उनके परिवार के साथ हमारे स्टेशन से बाहर आते-आते उन्होंने किसी ठौर की जानकारी के अलावा हर किस्म की अपने से संबंधित बात हमें बता दी। उनका मुख्य उद्देश्य हमारी सहायता करना न होकर अपनी महत्ता और विद्वता का प्रदर्शन करना था जिसके तहत उन्होंने हमारे ज्ञान में वृद्धि की कि वे कोई ऐसी-वैसी हस्ती नहीं है वे वेदों के प्रकांड ज्ञाता हैं जिसके लिए उन्हें जबलपुर से हरिद्वार किसी यज्ञ को पूर्ण करने हेतु बुलाया गया है। वे अक्सर यहां आमंत्रित रहते हैं। यहां के लोगों में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा और मान है। यह और बात थी कि उन्हें लेने या उनके स्वागत हेतु वहाँ कोई भी उपस्थित नहीं था और उनकी तंगाई हुई सी श्रीमती जी परेशान हो उन्हें किसी को फोन करने के लिए बार-बार कह रही थीं। 

हम बाहर सड़क तक आ चुके थे। हमारे हाव-भाव देख उन्हें शायद अपनी बातों की निस्तत्वता का बोध हो आया और इतना तो कोई उनकी सहायता के बिना भी कर सकता था जैसे तथ्य को भूलते हुए, उन्होंने प्लेटफार्म से ही पीछे लगे एकमात्र रिक्शेवाले को हमें किसी धर्मशाला में ले जाने को कहा। जब तक रिक्शेवाला अपनी जानकारियों का बही-खाता खोलता, तब तक हम तीनों सामने दिख रहे एक होटल की ओर अग्रसर हो चुके थे।   

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-01-2017) को "नए साल से दो बातें" (चर्चा अंक-2575) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

हार्दिक धन्यवाद, शास्त्री जी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

गजब के लोग हैं सिर्फ अपना बड्डपन दर्शाने के लिए दूसरों का समय बर्बाद कर देते हैं !!