सोमवार, 16 नवंबर 2015

बेहतर क्या है,स्वर्ग या नरक

सभी आख्यानों में  यही  बताया जाता है कि पुण्य करते रहने से स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पाप करने से नरक में जाना होता है  पर  हमारे कानूनी दांवपेंचों की तरह यहां भी कई पेचो-खम मौजूद हैं। जिनके चलते, जैसे मानवी दुनिया में चतुर-चंट वकील कानून की आंखों की पट्टी का लाभ अपने मुवक्किल को दिला देते हैं, वैसे ही ज्ञानी-ध्यानी, गुरुजनों ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए कुछ संकरी गलियां खोज रखी हैं.....। इस लेख को हलके-फुल्के तौर पर ही लें  कोई गूढ़ार्थ न निकालें    

स्वर्ग-नरक का अस्तित्व है कि नहीं इस पर लम्बी बहस हो सकती है पर इनकी धारणाएं दुनिया के हर ग्रंथ में पाई जाती हैं। नरकस्वर्ग का विलोमार्थक है। विश्व की प्राय: सभी जातियों और धर्मों की मान्यता के अनुसार मरणोपरांत इंसान की आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार इन्हीं में से एक जगह ले जाया जाता है। सभी आख्यानों में करीब-करीब यही बताया गया है कि पुण्य करते रहने से स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पाप करने से नरक में जाना होता है जहां अधर्मी, नास्तिक, पापी और अपराधी दुष्टात्माएँ दंडित होती हैं।  

पर हमारे कानूनी दांवपेंचों की तरह यहां भी कई पेचो-खम मौजूद हैं। जिसके चलते जैसे मानवी दुनिया में चतुर-चंट वकील कानून की आंखों की पट्टी का लाभ अपने मुवक्किल को दिला देते हैं, वैसे ही ज्ञानी-ध्यानी, गुरुजनों ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए कुछ संकरी गलियां खोज रखी हैं। जैसे युद्ध भूमि में लड़ते हुए मारे जाने से स्वर्ग मिलता है फिर वह चाहे कितना बड़ा भी अत्याचारी क्यों न हो! उसी तरह पापी से पापी इंसान यदि अपनी अंतिम सांस लेते समय प्रभू का नाम ले ले तो भी सीधा स्वर्ग जाता है। मरने के पहले गंगाजल या तुलसी-दल भी स्वर्ग की राह प्रशस्त करने में सक्षम होते हैं। इन उपधाराओं के चलते बड़े से बड़े खलनायक, जिन्होंने धरती पर हर तरह का उत्पात मचाया हो, जीवों की नाक में दम कर रखा हो, वे भी यहां का सारा सुख भोग स्वर्ग में भी अपनी सीट बुक करवा लेते हैं। महाभारत के वीरों को ही देख लीजिए हर तरह के दुष्कर्मों के रचयिता कौरव सीधे स्वर्ग गए और युद्ध के बाद विजयी होने, प्रभू का साया सदा सर पर बने रहने के बावजूद पांडवों को नरक जाने से रोकने के लिए युद्धिष्ठिर को कितनी जद्दोजहद का सामना करना पड़ा था। हालांकि ये सब किस्से-कहानियों के रूप में लिया जाता है,फिर भी.........   

ऐसा बताया जाता है कि मानव जीवन बहुत पुण्यों के बाद, प्रभू की अनुकंपा से ही मिल पाता है। अब स्वर्ग की व्याख्या क्या है,ऐशो-आराम, सुख-चैन, कोई काम धाम नहीं, हर चीज की उपलब्धता, कोई हारी-बिमारी नहीं, चिंता-फ़िक्र नहीं। सुख ही सुख। उधर नरक में रोज की मार-कुटाई, हर तरह के दुःख-तकलीफों से आमना-सामना, वहां के समयानुसार हर पल काम में जुते रहना, ना खाने का ठिकाना ना सोने का।

अब मुद्दा यह बनता है कि वहां जो भी है, सुक्ष्म शरीर या आत्मा, उसे कहां रह कर भगवान याद आऐंगे, स्वर्ग में या नरक में। जाहिर है नरक में हर क्षण तड़पने वाला ही हर पल प्रभू को याद करेगा और ग्रंथों के अनुसार इसका फल भी उसे मिलेगा ही। उधर स्वर्ग में मूढ़ इंसान की आत्मा क्या उतनी तन्मयता से अपने इष्ट को याद करेगी? शक होता है ! तो फिर किसका हश्र क्या होगा, जाहिर है, स्वर्ग वाला फिर धरा पर और नरक वाले को मोक्ष ! 
अब राम की माया तो राम ही जानें। हमारे अटकलपच्चू से क्या होता है और वैसे भी स्वर्ग तो सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता !!!    

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (18-11-2015) को "ज़िंदगी है रक़ीब सी गुज़री" (चर्चा-अंक 2164) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी.
आभार