बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

लगना हलवे का कड़ाही में, चिंता कंजकों की

काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में पानी का लोटा या जग लिए घर के दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था घर के बास से कौन पंगा ले, वह भी तब, जब बात धर्म की हो, आस्था की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा  होगा .…… 

आज सुबह, करीब पौने सात का समय था, थोड़ी हवाखोरी के लिए निकला तो  देखा बच्चियों के झुण्ड हाथ में प्लेट नुमा थाली लिए आ-जा रहे हैं। उनके साथ ही दो-तीन नन्हें बालक, जिन्हें "लैंकडा" कहा जाता है वे भी काफी व्यस्त दिख रहे थे। सुबह-सुबह सारे बच्चे नहाए-धोए, टीप-टॉप नज़र आ रहे थे। बच्चियों के कंधों पर बाकायदा पर्स नुमा बैग लटके हुए थे। कमाई और उपहार सहेजने के लिए। नवरात्र की अष्टमी जो थी, कमाई के साथ-साथ मौज-मस्ती का दिन। बच्चों को तो मौज-मस्ती का कोई न कोई बहाना चाहिए। उन्हें ना खाने से मतलब होता है ना पैसों से। रोजमर्रा के बंधे-बधाए नियमों से छुटकारा ही उनको प्रफुल्लित करने के लिए बहुत होता है। नहीं तो इन्हें ही रोज स्कूल भेजने के लिए सुबह उठाते-उठाते माँ-बाप की परेड हो जाती है।  कुछ सालों पहले स्कूल वगैरह में इन दिनों लंबी छुट्टियां हुआ करती थीं। हड़बड़ाहट नहीं होती थी, सो ऐसे दृश्यों की शुरुआत साढ़े आठ-नौ बजे दिन से शुरू होती थी। पर
समय के साथ घटती छुट्टियों और बढ़ती आपा-धापी ने इस उत्सव के साथ भी तनाव को जोड़ दिया है। अल-सुबह कार्यक्रम की शुरुआत होने लगी है। आस्तिक गृहणियां इन दिनों सदा से ही चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई और कहीं अघाई कन्या ने खाने से इंकार कर दिया तो हो गया अपशकुन। इसीलिए होड़ रहती है पहले अपने घर कन्या बुला कर जिमाने की। हैं तो आखिर बच्चियां ही ना ! कम-ज्यादा
खा लेने से कहीं तबियत ही ना बिगड़ जाए, इसका भी ध्यान रखना पड़ता है। 

वर्षों के बाद इस बार इन दिनों दिल्ली में होने का सुयोग मिला है। तो फिर पुरानी यादें ताजा हो गयीं हैं। अस्सी
के दशक की याद आती है।      दिल्ली में हमारी  कालोनी में,  खास कर अष्टमी के दिन, कैसे  आस - पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता था।   सप्तमी की रात से  ही कंजकों  की बुकिंग शुरु हो जाती थी। फिर भी सबेरे-सबेरे 'हरकारे' दौड़ना शुरु कर देते थे। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं ? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी ? "पिंकी" आ कर फिर कहाँ चली गयी ?  कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है !         
इधर काम पर जाने वाले हम जैसे लोग, हाथ में लोटा - जग लिए घर के  दरवाजे पर खड़े रहते थे कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार, स्वागत कर अपने काम पर जाएं। देर हो रही होती थी, पर आफिस के बॉस से तो निपटा जा सकता था, घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो। वैसे निश्चिंतता इस बात से भी रहती थी कि आज के दिन तो आफिस का बॉस भी "अपने बॉस" से डरता अपने घर लोटा लिए खड़ा होगा । 

5 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (22-10-2015) को "हे कलम ,पराजित मत होना" (चर्चा अंक-2137)   पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
विजयादशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - आजाद हिन्द फौज का 72वां स्थापना दिवस में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - आजाद हिन्द फौज का 72वां स्थापना दिवस में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Pallavi saxena ने कहा…

बात तो सही है। :) लेकिन इसका एक विकल्प यह भी होसकता है कि आप बजाए घर पर बच्चियों को बुलाने के किसी अनाथालय या मजदूर वर्ग के पास जाकर वहाँ भोजन का वितरण करदें। फिर न कड़ाही में हलवा जलेगा न हबड़ हबड़ होगी और न ही फिर आपको यूं हाथ में लौटा लिए दरवाजे पर खड़े ही रहना पड़ेगा। नहीं ? :) मैं तो ऐसा ही करती हूँ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

पल्लवी जी,
अपनी-अपनी सोच है। आपका तरीका बेहतर है, भोजन का सदुपयोग होता है।
पर शायद आपने पूरी पोस्ट पढ़े बगैर ही अपनी राय रख दी है। मैंने आज की नहीं तकरीबन पच्चीस साल पहले के अनुभव बांटे हैं और फिर हलवे को तो बनना ही है, अब यह नियति के ऊपर है कि वह उसे बर्तन में लगाती है या समय बचाने के चक्कर में कच्चा ही रख छोड़ती है