शनिवार, 19 सितंबर 2015

कदी-कदी एवंई ख्याल आंदा ए :

आज  कल आने वाली इंसानों की खेप को देख महसूस हो रहा है। लगता है जैसे सारा काम किसी रसूखदार के ठेके पर चल रहा हो। कोई ध्यान देने वाला, टोकने वाला ना हो। त्रिदेव भी जैसे ऊब गए हों इस काम से।


करोड़ों साल हो गए सदियां बीत गयीं। ऊपर से जीवों की सप्लाई होने और फिर एक्सपायरी के बाद वापस ले जाना बदस्तूर जारी है। दूसरे जंतुओं का तो पता नहीं पर इतने समय बाद भी इंसानी पुतलों की बेहतर गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया। उसकी मिट्टी में ईर्ष्या, द्वेष, लालच, घमंड, अहंकार, जलन जैसे घातक विकारों की मिलावट सदियों से बदस्तूर वैसे ही सिर चढ़ कर बोलती चली आ रही है। मानकीकरण के लिए यदि दो-चार अच्छाइयां मिलाई भी जाती हैं तो वे भी समय के साथ बेअसर हो जाती हैं। बात ऐसी है कि इस काम के सर्वाधिकारों पर एकाधिकार है वहां वालों का, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। पर निर्माणाधीन वस्तु की कमियां तो दूर होनी चाहिएं। नहीं तो एक ना एक दिन खामियाजा तो भुगतना ही पड़ता है। एक छोटा सा उदहारण अपने यहाँ बनने वाली "एम्बैसडर" कार का लिया जा सकता है, जिसका निर्माता वर्षों तक एक ही मॉडल को ज़रा-जरा से  बदलाव के साथ बाज़ार में धकेलता रहा। कमियों पर कभी ध्यान न देने का फल है कि आज उसका कोई नामलेवा नहीं है।

ऐसा ही कुछ आज  कल आने वाली इंसानों की खेप को देख महसूस हो रहा है। लगता है जैसे सारा काम किसी रसूखदार के ठेके पर चल रहा हो। कोई ध्यान देने वाला, टोकने वाला ना हो। त्रिदेव भी जैसे ऊब गए हों इस काम से।  तभी तो संसार में शायद ही कोई ऐसी जगह बची हो जहां शांति हो, लोग चैन से रहते हों, जीवन दुश्वार न हो गया हो, स्वभाव में असहिष्णुता न समा गयी हो, भाईचारा न ख़त्म हो गया हो। लोग बेवजह धर्म-जाति-भाषा-रंग भेद पर मर-मिटने पर उतारू ना हो जाते हों। ज़रा-जरा सी बात पर कत्ले-आम न हो जाता हो, पडोसी एक-दूसरे को दुश्मन न समझते हों। ऐसा ही रहा तो उन लोगों की बेहतरीन कृति इंसान और इंसानियत लगता नहीं संसार में ज्यादा समय रह पाएंगे। 

अभी भी हालात सुधर सकते हैं, यदि निर्माण के दौरान वहीँ सुधार हो जाए, कमियां वहीं दूर कर दी जाएं। मिलावट का प्रतिशत न्यूनतम कर दिया जाए, वहां के उत्पादन का परिक्षण धरा  पर ना किया जाए, कसौटी पर कसने के लिए संसार को परिक्षण केन्द्र ना बनाया जाए। तो उसका एक फ़ायदा और भी हो सकता है, इन विकारों से उपजी व्याधियों, विघ्नों, दुखों, कष्टों को दूर करने, मिटाने के लिए जो बार-बार कभी प्रभू को अवतार लेना पड़ता है, कभी माँ को समय निकालना पड़ता है तो कभी विघ्नेश्वर को आना पड़ता है उस आने-जाने से बचने वाले समय का अपनी ही कृतियों की भलाई में उपयोग हो सकता है। क्योंकि उद्देश्य तो अपने बच्चों को खुश रखने का है नाकि उन्हें दंडित करने का !!!

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-09-2015) को "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." (चर्चा अंक-2104) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, पागलों की पहचान - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

अपनी ही कृतियों को बेहतर बनाने का विचार बहुत अच्छा लगा -कितना अच्छा हो कि अपने-अपने स्तर पर प्रयत्न चलने लगें !

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत सार्थक आलेख ,सुन्दर व सार्थक रचना , मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....