मंगलवार, 14 जनवरी 2014

लोहड़ी का त्योहार और दुल्ला-भट्टी

कल लोहड़ी जलाने पर कुछ पड़ोसियों ने पूछा कि क्या आज कोई आप का (यानी पंजाबियों का) त्योहार है? मैंने कहा है तो पूरे देश का पर सिमट कर रह गया है देश के उत्तरी हिस्से में।  
हम सदा से उत्सव-धर्मी रहे हैं। इसी कारण हमारा देश तीज-त्योहारों का देश है। तीज-त्योहार यानी खुशियां मनाने, बांटने के मौके। जो संदेश देते रहते हैं कि हजार परेशानियां हों पर उन्हें भूल कर जीवन को चलायमान रखना जरूरी है। इसी को अपना मूल मंत्र मानता है हमारे देश का उत्तरी भाग, ख़ास कर पंजाब। वहाँ के लोगों की जिंदा-दिली का कोई जवाब नहीं है. जो छोटी-छोटी बातों में भी खुशियां ढूँढ निकालते हैं. उसी का उदाहरण है "लोहड़ी".
वैसे तो इसके बारे में कई कथाएं हैं पर मूल कारण शीत ऋतु का समापन है।  वैसे तो वैज्ञानिक सबसे छोटा दिन 21-22 दिसंबर को मानते हैं पर हमारे यहाँ सूर्य के उत्तरायण होने से दिनों के बड़ा होने की शुरुआत माना जाता है जिसे पूरा देश "मकर संक्रांति" के रूप में मनाता है. इसीलिए लोहड़ी को मकर संक्रांति के एक दिन पहले की रात को सर्द दिनों की विदाई और अगले दिन से दिनों के बड़े होने की खुशी में मनाया जाता है। हर साल तेरह जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार एक तरह से ऊर्जा के स्रोत आग का पूजन है।  
इस दिन सुबह से ही बच्चे लोहड़ी से संबंधित गीत, जो "दुल्ला भट्टी " से जुड़े होते हैं गाते हुए घर-घर जाते हैं जिसके बदले में उन्हें हर घर से मूंगफली, तिल, गुड, रेवड़ी, गजक के साथ-साथ पैसे भी दिए जाते हैं। बच्चों को खाली हाथ लौटाना अच्छा नहीं माना जाता। फिर रात होने पर हर घर के सामने या मोहल्ले में एक जगह, होलिका दहन की तरह छोटे-बड़े अलाव जलाए जाते हैं. उसके चारों और नाचते-गाते, परिक्रमा करते हुए उसमें तिल, गुड, मूंगफली की आहुति दी जाती है. यह कार्यक्रम देर रात तक चलता रहता है. यह उन परिवारों के लिए और ख़ास हो जाता है जहां हाल ही में शादी-ब्याह हुआ हो या नवजात का आगमन, क्योंकि दोनों उर्वरता और फलप्रद स्थिति के द्योतक होते हैं और प्रकृति भी तो उसी दिन से ऊर्जा यानी सूर्य की और रुख करती है।

पंजाब में बंगाल की तरह ही दूसरा दिन नए साल की शुरुआत का होता है। जब पंजाब और हरियाणा का किसान फिर अपने खेतों को नए सिरे से संवारता है, तैयार करता है नयी फसल और अपने उज्जवल भविष्य के लिए। जिससे फिर वह अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्रों के साथ खुशियां मना सके, दुल्ला-भट्टी के गीत गा सके।

पर यह दुल्ला-भट्टी है कौन? जिससे लोग इतनी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। जिसका नाम हर लोहड़ी के गीत की आवश्यकता है।  
कहते हैं बादशाह अकबर के जमाने में पंजाब में अराजकता फैल गयी थी। हिंदू कन्याओं का जबरन अपहरण कर उन्हें खाडी के देशों में बेच दिया जाता था. पिंडी भट्टियां के शासकों भट्टी सरदारों के खानदान के युवक दुल्ला-भट्टी को यह नागवार गुजरा। वह एक दिलेर इंसान था जिसने ग़रीबों की सहायता के लिए अमीरों को तंग कर रखा था। अपहरण की गयी हिंदू कन्याओं को बचा कर उनका सम्मान पूर्वक विवाह करवाना तथा उनकी गृहस्ती बसाना उसका मुख्य उद्देश्य हुआ करता था। ऐसी ही दो लड़कियों के नाम सुंदरी और मुंदरी थे, जिनका उसने पूरी शानो-शौकत से विवाह करवाया था। य़े वही सुंदरी-मुंदरी हैं जिनका नाम लोहड़ी के गीतों में शामिल होता आ रहा है।       

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (15-01-2014) को हरिश्चंद का पूत, किन्तु अनुभव का टोटा; चर्चा मंच 1493 में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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मकर संक्रान्ति (उत्तरायणी) की शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आदरणीय-

मनोज कुमार ने कहा…

सुंदर वर्णन!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सबको लोहड़ी की ढेरों शुभकामनायें।