बुधवार, 17 अप्रैल 2013

माँ का बुलावा क्या सचमुच आता है? एक अजब-गजब यात्रा वृतांत


ऐसी आम धारणा है कि किसी देव-स्थान या तीर्थ पर जाना तभी संभव हो सकता है जब वहां के अधिष्ठाता देवी या  देवता का बुलावा आता है। खासकर वैष्णव देवी के धाम के साथ यह विश्वास काफी गहराई से जुडा हुआ है। अभी हाल में ही इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में कथन पढने को मिले। तभी वर्षों पहले की गयी एक यात्रा का विवरण आंखों के सामने कौंध गया। किसी भी पक्ष की तरफ़दारी ना करते हुए सिर्फ आपबीती बयान कर रहा हूं।   हालांकि उस समय हर कदम पर अडचनें आयीं पर खुद ब खुद दूर भी होती चली गयीं। उस समय घटी एक-एक बात या घटना "पक्ष" की ओर इशारा करती है। पर फिर भी मन किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाया आज तक। अनेक घटनाओं के कारण यात्रा का वर्णन काफी लंबा हो गया है। इसलिए इसे दो भागों में रख रहा हूं।    

28 तारीख। दिल्ली। 82 या 83 का साल। दिसम्बर का महीना कडाके की ठंड। कार्यस्थल के एक सहयोगी, श्री ओमी ने वैष्णव देवी के दर्शनार्थ चलने का प्रस्ताव रखा। उस समय "जगराते" बहुत होते थे। खासकर टैक्सी, स्कूटर स्टैंड वाले समय-समय पर ऐसा आयोजन करते रहते थे। जिनमें इक्की-दुक्की जगह को छोड कर अधिकांश में फिल्मी गानों पर आधारित भजन गाये जाते थे। मैं कभी भी इन सब जगहों से तारतम्य नहीं बैठा पाया। जिन भजनों को सुन मां की मूरत के बदले फिल्मों के सीन याद आएं वहां श्रद्धा कहां से उपजती। पता नहीं क्यों यह धारणा बन गयी थी कि यह देवी सिर्फ टैक्सी-स्कूटर वालों की अधिष्ठात्री देवी हैं। शायद इसी लिए ओमी के बहुत जोर देने पर भी मन बन नहीं पा रहा था जाने का। पर नहीं जाने का भी कोई कारण नहीं समझ आ रहा था।

माँ का दरबार 
उन दिनों नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली स्टेशनों तक जाने के लिए विभिन्न कालोनियों से रल नं। वाली बसें चला करती थीं। राजौरी गार्डेन से रल 6 नं की बस गुजरती थी, जो हम दोनों के घरों को जोडती चलती थी। सो मैंने ऐसे ही कह दिया कि चलना होगा तो अंतिम रल 6 में मिल जाऊंगा। क्योंकि पुरानी दिल्ली से जम्मू एक्स।, ठीक से याद तो नहीं, पर उस समय शायद साढे ग्यारह बजे चला करती थी, से जाने का प्रोग्राम था। घर आ कर बताया तो श्रीमती जी ने भी चले जाने को ही कहा। ऊहापोह में पौने नौ बज गये बस सवा नौ के आस-पास थी। पता नहीं जाने वाले मन का पलडा कैसे भारी पडा कि बैग उठा बस स्टैंड जा पहुंचा। तभी बस भी आ गयी, जिसमें ओमी जी तथा उनका छोटा भाई मौजूद थे। मुझे देख उन्होंने एक सुखद सांस ली। पर यह तो शुरुआत थी। आगे होने वाली बातों का कहां किसी को अंदाज था।

स्टेशन पहुंच कर पता चला कि गाडी में बिल्कुल भी जगह नहीं है, खडे हो कर जाना भी मुश्किल लग रहा था। मन में पहला विचार यही आया चलो लौट चला जाए। टिकट खिडकी पर विचार विमर्श चल ही रहा था कि एक सज्जन अपने टिकट वापस करवाने आ गये, वह भी पूरे तीन। पर उसमें एक टिकट महिला का था। मेरे आनाकानी करने पर भी ओमी ने यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया। मेरे कहने पर भी कि एक तो टिकट बाहर से ले रहे हैं दूसरा उसमें एक महिला का है, गडबड हो गयी तो? ओमी का कहना था कि छोटे भाई को ढक-ढुक कर ऊपर की बर्थ पर सुला देंगे। वैसे भी रात का समय है कौन खोज-खबर लेगा। खैर गाडी पकड ली गयी। कुछ ही देर में कठोर से चेहरे और टेढी भृकुटी वाला चेकर भी आ धमका, वह ओमी का भी गुरु था, बहस बाजी, मोलतोल के बाद किसी तरह 100 रुपये में भाई को बहन मान आगे बढ गया। ऐसे एक बला टली।

29 तारीख। इस तरफ पहली बार जाना हो रहा था सो जम्मू में ठौर के तौर पर ओमी के मामा जी के यहां पडाव डालने की बात थी। अपरान्ह में जम्मू पहुंच उनके घर पहुंचे तो देखा वे घर का ताला खोल रहे हैं। पता चला कि दो सप्ताह बाद अभी पंजाब से लौटे हैं। हम सोच रहे थे कि वे दो-तीन बाद आते तो? खैर जो हुआ अच्छा ही हुआ। तरोताजा हो आगे जाने का पता करने हम बस अड्डे की तरफ चले गये वहां जा पता चला कि दरबार का रास्ता बंद है। ऊपर बर्फ-बारी हुई है। करीब दस हजार लोग फंसे हुए हैं। शासन ने और भीड ना बढे इसलिए यात्रा रोक दी है। अब !!! इतनी दूर आ कर बिना दर्शन के लौटना!!! मन मायूस सा हो गया। पर उपाय भी क्या था?

30 तारीख। आते समय रेल की हालत देख ही चुके थे तो इस बार बस से ही दिल्ली वापसी का तय पाया गया। धूप खिली हुई थी, पर ठंड भी काफी थी। सो कुछ गर्म कपडे पहन ऊपर एक लोई डाल बस के समय का पता करने फिर एक बार बस अड्डे पहुंचे। अभी देख-सुन ही रहे थे कि पता नहीं कहां से एक व्यक्ति आया और पूछने लगा कि क्या कटरे जाना है? ज्ञात हो कि मां के भवन की पैदल यात्रा कटरे से ही प्रारंभ होती है। अब तो खैर बहुत से साधन हो गये हैं पर उस समय घोडे, बंहगी या पैदल ही पहुंचा जाता था। हमें तो मनचाही मुराद मिल गयी। हमारी स्वीकारोक्ति पर उसने अड्डे के बाहर कोने में खडी एक बस की ओर ईशारा कर दिया। पता चला कि नाके पर मेजिस्ट्रेट बैठा हुआ है सो परमिट उसी रास्ते पर पडते किसी गांव का लिया गया है। वहां जा दूसरे रास्ते से कटरा जाया जाएगा। चलना है तो अभी पांच-सात मिनट में चलना होगा। सोचने का समय कहां था, नाहीं घर खबर करने का। उस समय मोबाइल कहां होते थे। हम तीनों वैसे ही बस में सवार हो गये। कंडक्टर ने जयकारा लगाने से मना कर कहा कि नाके पर चेकिंग के बाद जो करना है करें, पर तब तक बिल्कुल चुपचाप रहें। राम-राम कर नाका पार हुआ, हम सब को लगा कि जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। फिर तो बिना किसी अडचन के कटरे जा पहुंचे। सबसे पहले मामा जी को फोन पर सारी बात बताई। पर किसे पता था कि अभी तो इंटरवल ही हुआ है।

कटरे में बताया गया कि ऊपर बिल्कुल जगह नहीं है, अपनी जिम्मेदारी पर आगे जा सकते हो। फिर क्या था, बस के सारे यात्रियों ने बिना रुके उसी समय चढाई चढनी शुरु कर दी। अर्ध क्वारी, गर्भ जून कहीं कुछ भी नहीं, सब ठीक-ठाक, कहीं कोई बर्फ नहीं। हम सब को आश्चर्य हो रहा था कि यात्रा क्यूं रोकी गयी थी। पर इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि यह यात्रा एकतरफा थी। हमें ऊपर से कोई लौटता नहीं मिला था। हंसते-गाते-जयकारा लगाते हम सब करीब-करीब भवन तक पहुंच ही गये थे कोई चार-पांच की।मी। का रास्ता और बचा था कि एक बच्चे की किलकारी सुनाई पडी, मम्मी बर्फ!!! सभी ने मुड कर देखा बायीं तरफ़ एक झाडी पर एक छोटा सुंदर सा बर्फ का फाहा टंगा हुआ था। यह आगत का विजिटिंग कार्ड था।

अगला मोड पार करते ही दुनिया बदल गयी। हम सब जैसे किसी दूसरे लोक में आ गये हों। प्रभू ने जैसे सफेद रंग की कूची फेर दी हो सारी कायनात पर। जहां तक नज़र जाती थी बर्फ ही बर्फ, सिर्फ बर्फ। दूर दिखता भवन,
बर्फ से ढका पूरा परिवेश 
उसके आस-पास की अन्य इमारतें, जंगल, झाडी, पहाड, घाटी सब पर बर्फ का भारी लिहाफ। अब तो हमारे पांवों के नीचे भी बर्फ की चिकनी सतह मोटी
होती जा रही थी। ऊपर से ढलान भी शुरु हो चुकी थी। लोग बार-बार फिसल रहे थे। अब पछतावा हो रहा था कि कटरे में लोगों की सलाह मान कर चलने में सहायक छडियां क्यूं नहीं लीं। फिर दस्ताने वगैरह भी नहीं थे जो आस-पास की झाडियों का ही सहारा लिया जा सकता। किसी तरह सब एक दूसरे का हाथ पकड कछुए की तरह रेंग रहे थे। पीछे एक मां बार-बार अपने बेटे को संभल कर चलने का निर्देश दे रही थी। अचानक हमारे पैरों के पास से वही महिला फिसलती हुई आगे निकलीं, बडी मुश्किल से उन्हें संभाल कर सहारा दे खडा किया जा सका। उन चार कि.मी. को पार करने में तीन-साढे तीन घंटे लग गये।

आगे का हाल कल बयान करूंगा। कैसे लाइन में एक ही जगह खड़े-खड़े नौ घंटे बीत गये. 

11 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

आज की ब्लॉग बुलेटिन गूगल पर बनाइये अपनी डिजिटल वसीयत - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय माता दी ... अभी तक की यात्रा तो हो गई ... अब कल की पोस्ट का इंतज़ार रहेगा !

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

जय माता दी | सुन्दर पोस्ट | आभार

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

जय माता दी ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बृहस्पतिवार (18-04-2013) के दुआ करो किसानों के लिए ( चर्चा - 1218 ) (मयंक का कोना) पर भी होगी!
नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ!
माँ कालरात्रि आप सबका कल्याण करें!
सूचनार्थ...सादर!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ब्लाग बुलेटिन का आभार स्नेह बना रहे।
माँ सभी को स्वस्थ व प्रसन्न रखे।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी, यूं ही स्नेह बना रहे।
आपको सपरिवार मंगल-मय पर्व की शुभकामनाएं।

संजय भास्‍कर ने कहा…

जय माता दी ...

vandana gupta ने कहा…

ओह अब तो जरूर जानना चाहेंगे ………वैसे उसके बुलावे के बिना कोई वहाँ नही जा सकता …………जय माता दी।

Sanjay Tripathi ने कहा…

पढकर आनंद आ गया गगनजी,कल का इंतजार है!

सरिता भाटिया ने कहा…

आपकी यात्रा से मुझे अपनी यात्रा याद आ गई
हर वर्ष जाते थे ,पर 13 वर्ष बाद जब जनवरी ,2012 में गए तो कैसा नजारा था एक कविता लिखी थी इस पर हाजिर है
माँ वैष्णो देवी