शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

जहां भारतीयों का प्रवेश निषेद्ध है, एक कड़वी सच्चाई

सारे मामलों में एक बात जो शर्मनाक है वह है विदेशी महिलाओं को लेकर भारतीयों पर की गयी टिप्पणियां। विश्लेषण तो हमें खुद ही करना पड़ेगा !!!

बड़ों से सुनने में आता रहा है कि अंग्रेजों के समय के कलकत्ते में एस्प्लेनेड (धर्मत्तल्ला ) के चौरंगी रोड, जिसे
ग्रैंड होटल 
आज जवाहर लाल नेहरू मार्ग के नाम से जाना जाता है, उसके फुटपाथ पर हिंदुस्तानियो का चलना मना था, खासकर "ग्रैंड होटल" वाले हिस्से पर। अंग्रेजों का राज था इसलिए डर के मारे विरोध नहीं हुआ होगा उस वक्त। पर आज के समय जब हम आजाद हैं तब भी हमारे देश में विदेशियों द्वारा बनाई या उपयोग में लाई जाने वाली  कुछ जगहें ऐसी हैं जहां भारतीयों का प्रवेश निषेद्ध है, है ना अचंभे की बात !  पर यह एक कड़वी सच्चाई है कि आजादी के इतने सालों के बाद भी कई स्थानों पर हमारा जाना मना है। इससे एक सवाल यह भी उठता है कि क्या हम इतने बेअदब, बद्तमीज या बेशऊर हैं कि हमे लोग देखना तक गवारा नहीं करते !!   
वे कुछ स्थान ये हैं -                            

1.  पॉन्डेचेरी और गोवा के समुद्री तट पर बनी कुछ निजी आरामगाहें, जिनके मालिकों का सरे-आम कहना है
कि उन्होंने  भारतीयों की विदेशियों को घूरने की आदत पसंद न होंने के कारण ऐसा किया है। तो क्या यह आदत सिर्फ भारत में पाई जाती है ?

2.  चेन्नई में एक भूतपूर्व नवाब की हवेली, जिसे होटल का रूप दे दिया गया है, उसमे प्रवेश तब ही मिलता है जब आगंतुक के पास विदेशी पासपोर्ट हो।  इसके संचालकों का ऐसा करने
के तर्क भी अजीब हैं उनके अनुसार भारतीय लोग झगड़ालू और शोर-शराबा मचाने वाले होते हैं जिसके कारण विदेशियों को असुविधा होती है। फिर इस लॉज में स्नानागार वगैरह "कॉमन" होने की वजह से विदेशी महिलाओं को घूरती भारतीय निगाहें रास नहीं आतीं।  इसलिए वे लोग सिर्फ  "चुनिंदा" लोगों को ही प्रवेश की इजाजत देते हैं। विडंबना यह है कि यहां के कर्ता-धरता खुद हिन्दुस्तानी हैं।

3.  आइये चलते हैं बंगलुरु।  यहाँ 2012 में जापानी कंपनी निप्पोन ने शहर में जापानियों की बढ़ती संख्या को देख कर अपना एक "उनो-इन-होटल" खोल दिया। ध्येय था पहली बार भारत आने वाले जापानियों को घरेलू माहौल मिल सके। पर कुछ ही दिनों बाद ऐसी शिकायतें आने लगीं कि वहां के स्टाफ द्वारा सिर्फ जापानियों को ही प्रवेश दिया जा रहा
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है। ऐसा पता चलते ही प्रशासन ने उसे बंद करवा दिया।

4.  अब तक बात हुई चेन्नई, बेंगलुरु, गोवा जैसे शहरों की जो तथाकथित "मॉडर्न" नगरों में गिने जाते हैं पर पहाड़ों में भी एक जगह है जहां देसी लोगों से पराया व्यवहार होता है। हिमाचल प्रदेश की पार्वती घाटी में बसा
एक गाँव, कसोल। वहां है एक काफी हाउस नाम है "फ्री कसोल कैफे" जहां देसी लोगों के आने-जाने पर आनाकानी की जाती है। इसका मालिकाना हक़ भी एक रहस्य ही बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार इसका मालिक कोई इजरायली है जबकि कैफे चलाने  वाला किसी भारतीय महिला का नाम बतलाता है। पर
 फ्री कसोल कैफे
लगता है बात तब की है जब हिमाचल में हिप्पियों का जमावड़ा हुआ करता था, तब इजरायल से भी काफी युवक मौज-मस्ती के लिए यहां आते थे। यह रेस्त्रां तभी की देंन हो सकता है। चूँकि स्थानीय निवासी हुड़दंग पसंद नहीं करते थे इसलिए यहां आने से कतराते होंगें तो एक चलन सा बन गया होगा यहां सिर्फ विदशियों का आना और वह एक दस्तूर बन गया होगा। जो भी हो, है तो सोचने और विचारने की बात।

सारे मामलों में एक बात जो शर्मनाक है वह है विदेशी महिलाओं को लेकर भारतीयों पर की गयी टिप्पणियां। विश्लेषण तो हमें खुद ही करना पड़ेगा !!!

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-09-2015) को "सीहोर के सिध्द चिंतामन गणेश" (चर्चा अंक-2111) (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-09-2015) को "सीहोर के सिध्द चिंतामन गणेश" (चर्चा अंक-2111) (चर्चा अंक-2109) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat ने कहा…

शर्मनाक है यह....इतने गंभीर मामले में सरकार , शासन, प्रशासन क्यों मूक है यह समझ से पर है!!

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आए हाए तेरी अंग्रेजी - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !