शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मासूमों को कब निजात मिलेगी !

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। 

नए सत्र के साथ फिर स्कूल खुल चुके हैं। उत्तीर्ण हो आगे की कक्षाओं में बढ़ गए बच्चों के रिक्त स्थानों की पूर्ती के लिए नई खेप आ चुकी है। आजकल "शिक्षालय" या "विद्यालय" पूर्णतया "स्कूलों" में परिवर्तित हो चुके हैं। समय ने हर चीज को बदल कर रख दिया है। स्कूलों द्वारा अभिभावकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की सहूलियतें बखान की जाती हैं। जिसमें पढ़ाई का स्तर या उसकी बात गौण होती है तथा उसका नंबर काफी बाद में आता है। आज हर नामी स्कूल के पास बच्चों को लाने ले जाने के लिए अपनी बस सेवा उपलब्ध होती है। आज स्कूलों में दाखिले के साथ-साथ वहाँ बच्चों को पहुंचाना भी अभिभावकों के लिए एक समस्या है, इसलिए वे इस सुविधा का लाभ, मंहगी होने के बावजूद, ले कुछ हद तक तनाव मुक्त हो जाते हैं। वैसे स्कूल पहुँचने का हर जरिया अभिभावक की जेब पर भारी ही पड़ता है।

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। कभी-कभार किसी रिक्शे वाले के मजबूरीवश न आ पाने के कारण दो की जगह तीन बच्चे बैठ जाते हों पर उससे ज्यादा कभी नहीं। मुझे याद है, तब मेरे बाबूजी, तबके कलकत्ता, के पास कोननगर में लक्ष्मी नारायण जूट मिल में कार्यरत थे। वहाँ से करीब आठ-दस बच्चे पांच-सात किलोमीटर दूर रिसड़ा विद्यापीठ में पढने जाते थे। दो-दो बच्चों के हिसाब से चार या पांच रिक्शे रोज वहाँ से निकलते थे। उन दिनों निजी वाहन बहुत कम हुआ करते थे। रिक्शों का चलन आम था। मेरा हमजोली मंजीत सिंह नाम का साथी था। स्कूलों में भी आजकल जैसी अफरातफरी का माहौल नहीं हुआ करता था। नाही बस्तों का बोझ आज
जैसा था। सही मायनों में शिक्षा देने की परंपरा थी। गर्मियों में बच्चों का ध्यान रखते हुए स्कूल सुबह के हो जाते थे, सात से ग्यारह। बाकी महिनों में वही दस से चार का समय रहता था। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। रिक्शे वाले भी बच्चों का बहुत ध्यान रखते थे।  मजाल है कि कोई ऊँच-नीच हो जाए। इसीलिए माँ-बाप भी उन्हें बच्चों को सौंप कर निश्चिन्त रहा करते थे। मुझे लाने-ले जाने वाला रिक्शाचालक उड़ीसा का था। उम्र रही होगी कोई तीस के आस-पास की। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। नाम तो शायद उसका शिव रहा होगा, पर जैसा कि बंगला या उड़िया उच्चारणों में होता है, वह शिवो और शिवो से शिबु हो गया होगा। जैसा अब समझ में आता है। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है।

आजकल रिक्शों की जगह ज्यादातर ऑटो ने ले ली है। अब चाहे ऑटो हो या रिक्शा बच्चे बैठे नहीं ठूंसे रहते हैं।
इस तरह की यात्रा जाहिर है शरीर में थकान पैदा कर देती है, रही सही कसर बस्तों का भार पूरा कर देता है। तो स्कूल की पढ़ाई के लिए जो ताजगी शरीर और दिमाग में होनी चाहिए वह स्कूल पहुँचने के पहले ही उड़नछू हो जाती है। स्कूलों के खुलने के आस-पास इस सब पर हाय-तौबा मचती है फिर सब कुछ यथावत चलने लगता है। बड़ों की लापरवाही का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। पता नहीं कब सच्चे दिल से कोई इस ओर ध्यान देकर मासूमों को निजात दिलवाएगा !     

3 टिप्‍पणियां:

jyoti khare ने कहा…

बहुत सार्थक और सच बात कही है --
सादर

आग्रह है -- ख़ास-मुलाक़ात

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, फ़िल्मी गीत और बीमारियां - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

दौड़ जारी है ।