शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

गणेश जी को भेजे गए पत्रों को पहुंचाने के लिए नियुक्त है एक डाकिया

जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। 

हमारे देश में लोगों में सर्वोच्च सत्ता के प्रति जितनी आस्था है, विश्वास है, समर्पण है वैसा शायद और किसी देश में नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे दूरदर्शी विद्वान पूर्वजों ने शायद आने वाली नस्लों की उच्श्रृंखलता का अंदाज लगा लिया होगा इसीलिए प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए उन्होंने उसी समय से तरह-तरह के उपायों की घुट्टी किस्से-कहानियों, उपदेशों व शिक्षा के जरिए पिलानी शुरू कर दी
त्रिनेत्र गणेश 
थी। उसी का परिणाम है की आज हम पशु-पक्षियों में, पेड़-पौधों में, नदी-समुद्र में, यहां तक कि  चित्रों-मूर्तियों में भी प्रभू की मौजूदगी को मानते हैं। अपने दुःख-सुख में उन्हें भागीदार बनाते हैं। हर तरफ से निराश-हताश हो जाने पर या किसी अनहोनी से सुरक्षा पाने के लिए उनकी शरण में शांति की गुहार लगाते हैं। हमारे इतने विशाल देश में जितनी तरह की संस्कृतियां, रस्मो-रिवाज तथा मान्यताएं हैं, उतनी ही तरह की उन्हें पूरा करने और मनाने की विधियां और आस्थाएं हैं। ऐसी ही एक अनोखी और अनूठी परंपरा है, राजस्थान के रणथम्भोर किले में स्थित श्री गणेश जी को विवाहोत्सव पर पहला निमंत्रण देने की। फिर वह चाहे खुद जा कर दिया जाए या फिर पत्र द्वारा। खुद उपस्थित हो कर हजारों श्रद्धालू अपना प्रेम तो प्रगट करते ही हैं पर यह शायद दुनिया का अकेला मंदिर है जहां देश और दुनिया भर से रोज हजारों की संख्या में गणेश जी को निमंत्रण देने के लिए डाक से पत्र भी आते हैं और यह सिलसिला सालों-साल से चला आ रहा है। इन पत्रों को गणेश जी तक पहुंचाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने अलग से एक डाकिया नियुक्त किया हुआ है जो रोज तकरीबन दस किलो भार के निमंत्रण पत्र मंदिर तक पहुंचाता है। मंदिर में पहुंचते ही यदि पत्र हिंदी या अंग्रेजी में हो तो पुजारी जी उसे खुद पढ़ कर गणेश जी को सुनाते हैं पर यदि किसी और भाषा में पत्र लिखा गया हो तो उसे खोल कर गणेश जी के सामने रख दिया जाता है।  ऐसी मान्यता है कि गणेश जी को निमंत्रित करने से विवाह बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाता है।  
गणेश मंदिर, रणथम्भोर 


ऐसी परंपरा क्यों शुरू हुई उसकी एक कथा है। कहते हैं जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। इस विघ्न को दूर करने के लिए विघ्न-हर्ता से प्रार्थना की गयी और उन्हें प्रसन्न करने के पश्चात ही विवाह संपन्न हो पाया। कहते हैं तब से गणेश जी को पहला निमंत्रण भेजने की यह प्रथा चली आ रही है।

रोज आने वाले इन हजारों लाखों पत्रों का क्या किया जाए यह भी एक विचारणीय प्रश्न था मंदिर की समिति के सामने।  उन्हें ऐसे ही नष्ट नहीं किया जा सकता था, हजारों-लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई थी उन पत्रों से। फिर इसका उपाय निकाला गया।  साल भर तक तो उन पत्रों को संजो कर रखा जाता है फिर उनकी लुग्दी बना विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर फिर कागज़ बना लिया जाता है। 

दर्शन करने और निमंत्रण देने आए भक्त 
गणेश जी का यह प्राचीन मंदिर सवाई माधोपुर से बारह कि. मी. दूर रणथम्भोर के किले में स्थित है। कहते हैं कि 1299 में राजा हम्मीर और अल्लाउद्दीन ख़िलजी में जब युद्ध शुरू हुआ तो हम्मीर ने प्रजा और सेना की जरूरतों को देखते हुए ढेर सा खाद्यान और जरूरत की वस्तुओं को सुरक्षित रखवा लिया था।  पर युद्ध लंबे अरसे तक खिच जाने की वजह से हर चीज की तंगी होने लगी थी।  राजा, जो गणेश जी का भक्त था,  हताश और परेशान हो उठा। तभी रात को उसे स्वप्न में गणेश जी ने दर्शन दे कहा कि चिंता मत करो कल युद्ध समाप्त हो जाएगा।  दूसरे दिन सुबह गणेश जी की एक तीन नेत्रों वाली आकृति किले की दिवार पर उभर आई और आश्चर्य जनक रूप से  उसी समय युद्ध भी समाप्त हो गया, जब ख़िलजी की सेना अपनी घेराबंदी ख़त्म कर वापस लौट गयी। राज्य फिर से धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। हम्मीर ने 1300 में भगवान गणेश के इस मंदिर का निर्माण करवाया। जिसमें गणेश जी के अलावा उनकी पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि तथा
उनके पुत्रों शुभ-लाभ के साथ-साथ उनके वाहन मूषक की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है।

यहां जाने के लिए देश के हर हिस्से से सुविधा उपलब्ध है। उसके लिए सवाई माधोपुर पहुँचना होता है। जहां के लिए रेल सुविधा के अलावा बढ़िया सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। यहां से रणथम्भोर की दूरी सिर्फ ग्यारह कि. मी. की है। इसके अलावा कोटा से भी आसानी से यहां जाया जा सकता है।         

6 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (06-09-2014) को "एक दिन शिक्षक होने का अहसास" (चर्चा मंच 1728) पर भी होगी।
--
सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को नमन करते हुए,
चर्चा मंच के सभी पाठकों को शिक्षक दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कविता रावत ने कहा…

आधुनिक परिवेश को देखते हुए बहुत सुन्दर रोचक और ज्ञानवर्धक पौराणिक प्रस्तुति ....

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सुन्दर जानकारीपूर्ण प्रस्तुति !!

सदा ने कहा…

बेहद रोचक एवं अनुपम प्रस्‍तुति

सु..मन(Suman Kapoor) ने कहा…

रोचक पोस्ट ...

Dexter the Tester ने कहा…

bahut acha


https://dexterthetester.blogspot.in