जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया।
हमारे देश में लोगों में सर्वोच्च सत्ता के प्रति जितनी आस्था है, विश्वास है, समर्पण है वैसा शायद और किसी देश में नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे दूरदर्शी विद्वान पूर्वजों ने शायद आने वाली नस्लों की उच्श्रृंखलता का अंदाज लगा लिया होगा इसीलिए प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए उन्होंने उसी समय से तरह-तरह के उपायों की घुट्टी किस्से-कहानियों, उपदेशों व शिक्षा के जरिए पिलानी शुरू कर दी
थी। उसी का परिणाम है की आज हम पशु-पक्षियों में, पेड़-पौधों में, नदी-समुद्र में, यहां तक कि चित्रों-मूर्तियों में भी प्रभू की मौजूदगी को मानते हैं। अपने दुःख-सुख में उन्हें भागीदार बनाते हैं। हर तरफ से निराश-हताश हो जाने पर या किसी अनहोनी से सुरक्षा पाने के लिए उनकी शरण में शांति की गुहार लगाते हैं। हमारे इतने विशाल देश में जितनी तरह की संस्कृतियां, रस्मो-रिवाज तथा मान्यताएं हैं, उतनी ही तरह की उन्हें पूरा करने और मनाने की विधियां और आस्थाएं हैं। ऐसी ही एक अनोखी और अनूठी परंपरा है, राजस्थान के रणथम्भोर किले में स्थित श्री गणेश जी को विवाहोत्सव पर पहला निमंत्रण देने की। फिर वह चाहे खुद जा कर दिया जाए या फिर पत्र द्वारा। खुद उपस्थित हो कर हजारों श्रद्धालू अपना प्रेम तो प्रगट करते ही हैं पर यह शायद दुनिया का अकेला मंदिर है जहां देश और दुनिया भर से रोज हजारों की संख्या में गणेश जी को निमंत्रण देने के लिए डाक से पत्र भी आते हैं और यह सिलसिला सालों-साल से चला आ रहा है। इन पत्रों को गणेश जी तक पहुंचाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने अलग से एक डाकिया नियुक्त किया हुआ है जो रोज तकरीबन दस किलो भार के निमंत्रण पत्र मंदिर तक पहुंचाता है। मंदिर में पहुंचते ही यदि पत्र हिंदी या अंग्रेजी में हो तो पुजारी जी उसे खुद पढ़ कर गणेश जी को सुनाते हैं पर यदि किसी और भाषा में पत्र लिखा गया हो तो उसे खोल कर गणेश जी के सामने रख दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि गणेश जी को निमंत्रित करने से विवाह बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाता है।
हमारे देश में लोगों में सर्वोच्च सत्ता के प्रति जितनी आस्था है, विश्वास है, समर्पण है वैसा शायद और किसी देश में नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे दूरदर्शी विद्वान पूर्वजों ने शायद आने वाली नस्लों की उच्श्रृंखलता का अंदाज लगा लिया होगा इसीलिए प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए उन्होंने उसी समय से तरह-तरह के उपायों की घुट्टी किस्से-कहानियों, उपदेशों व शिक्षा के जरिए पिलानी शुरू कर दी
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| त्रिनेत्र गणेश |
ऐसी परंपरा क्यों शुरू हुई उसकी एक कथा है। कहते हैं जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। इस विघ्न को दूर करने के लिए विघ्न-हर्ता से प्रार्थना की गयी और उन्हें प्रसन्न करने के पश्चात ही विवाह संपन्न हो पाया। कहते हैं तब से गणेश जी को पहला निमंत्रण भेजने की यह प्रथा चली आ रही है।
रोज आने वाले इन हजारों लाखों पत्रों का क्या किया जाए यह भी एक विचारणीय प्रश्न था मंदिर की समिति के सामने। उन्हें ऐसे ही नष्ट नहीं किया जा सकता था, हजारों-लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई थी उन पत्रों से। फिर इसका उपाय निकाला गया। साल भर तक तो उन पत्रों को संजो कर रखा जाता है फिर उनकी लुग्दी बना विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर फिर कागज़ बना लिया जाता है।
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| दर्शन करने और निमंत्रण देने आए भक्त |
उनके पुत्रों शुभ-लाभ के साथ-साथ उनके वाहन मूषक की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है।
यहां जाने के लिए देश के हर हिस्से से सुविधा उपलब्ध है। उसके लिए सवाई माधोपुर पहुँचना होता है। जहां के लिए रेल सुविधा के अलावा बढ़िया सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। यहां से रणथम्भोर की दूरी सिर्फ ग्यारह कि. मी. की है। इसके अलावा कोटा से भी आसानी से यहां जाया जा सकता है।







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