pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

दिल्ली से झुंझनु होते हुए सालासर...... भाग 2

सुबह 10.40 पर घर से चलते वक्त साथ के बच्चों को लेकर एक चिंता सी थी कि कहीं उन्हें  इतने लम्बे सफ़र में कोई परेशानी ना हो, पर वह भी दूर हो चुकी थी. दोनों खूब तफरीह कर रहे थे. सो  बिना किसी अवरोध के हम सब करीब साढे  चार बजे झुंझनु पहुँच गये.  पुराने शहर की संकरी गलियों से होते हुए मंदिर तक जाने में लगे करीब पन्द्रह मिनटों के बाद हम रानीसती जी के भव्य मन्दिर के सामने खड़े थे.   पूरा विवरण www.kuchhalagsa.blogspot.com पर  उपलब्ध है.     
अब आगे ...................
तब के कलकत्ते, आज के कोलकाता, में रिहायश के दौरान रानी सतीजी के मंदिर का बहुत नाम सुना करते थे. पर कभी जाने का मौका नहीं मिल पाया. पिछले तीन सालों में भी इधर से दो बार सालासर जाना हुआ पर इसका जैसे ध्यान ही नही रहा. कहते हैं जब प्रभू की इच्छा होती है तभी वे दर्शन देते हैं।  कुछ वैसा ही तो हमारे साथ हो रहा था.  वर्षों बाद जैसे एक तमन्ना पूरी हो रही थी.  सो 17 अक्टूबर की शाम साढे चार बजे हम झुंझनु की कुञ्ज गलियाँ पार कर मंदिर के सामने खड़े थे.  
रानी सती मंदिर का मुख्य द्वार   

रानीसती जी का यह करीब चार सौ साल पुराना मंदिर राजस्थान के झुंझनु शहर में स्थित है. यह भारत के प्राचीन तीर्थ स्थलों में से एक है. जो नारी शक्ति की गाथा
सामने मंदिर का द्वितीय द्वार 
द्वितीय द्वार पर बनी अद्भुत कलाकारी 

बयान करता आज भी अपने पूरे वैभव के साथ सर  उठाए खडा है. इस मंदिर की यह खासियत है कि यहाँ किसी भी प्रकार की किसी भी पुरुष या महिला की मूर्ती या तस्वीर की स्थापना नहीं है. यहाँ पूजा होती है अदृष्य शक्ति की।  वैसे भक्तों को ध्यान करने की सहूलियत के लिए  फूलों और त्रिशूल से एक आकार बना दिया गया है, जो माँ के रूप का एहसास दिलाता है। यहाँ हर साल भादों मास की अमावस्या पर एक  ख़ास पूजा का आयोजन किया जाता है जिसमे देश-विदेश के अनगिनत श्रद्धालु जन, दर्शन-पूजा का लाभ लेने यहाँ पहुंचते हैं। मुख्य मंदिर तक जाने के लिए तीन द्वार पार करने पड़ते हैं।  परिसर में हनुमान जी, शिव जी, गणेश जी तथा राम दरबार भी स्थापित हैं।  
परिसर में स्थित हनुमान जी की भव्य प्रतिमा 

मारवाड़ी समाज ख़ास कर माता के भक्त रानी सती जी को उत्तरा जो  महाभारत काल में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी थीं, का अवतार मानते हैं। ऎसी धारणा है की युद्ध में अभिमन्यु की मृत्यु के बाद दुखी उत्तरा ने भी अपनी जान देने का निश्चय कर लिया था।  पर श्री कृष्ण के समझाने और अगले जन्म में फिर अभिमन्यु को पाने और सती होने की इच्छा पूरी होने का वरदान पा कर उसने बात मान ली थी. उसी वरदान स्वरुप उत्तरा ने अगले जन्म में नारायणी नाम से जन्म लिया और उसका विवाह हिसार के थंदन, जो अभिमन्यु का दूसरा जन्म था, के साथ हुआ. थंदन के पास एक अद्भुत घोड़ा था जिस पर हिसार के राजा के बेटे की नजर थी. उसने कई बार वह घोड़ा हथियाना चाहा पर सफल न हो सका था.  क्रोध में आ कर उसने थंदन को युद्ध के लिए ललकारा जिसमे राजा के बेटे की मौत हो गयी। इस पर राजा ने क्रोधित हो थंदन की ह्त्या नारायणी के सामने ही कर डाली। जिसके फलस्वरूप नारायणी ने उग्र रूप धर राजा और उसके सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद अपनी पूर्व जन्म की इच्छानुसार अपने पति के साथ सती हो स्वर्गारोहण किया तथा रानी सती के रूप में ख्याति प्राप्त  कर आज तक पूजे जाने का गौरव प्राप्त किया.    
मंदिर का पार्श्व 
पिछला द्वार 

उन्हीं की याद में बना यह मंदिर कोलकाता के "मारवारी टेंपल बोर्ड" द्वारा संचालित है तथा इसकी गिनती भारत के सबसे धनाढ्य मंदिरों में की जाती है. लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि इसका चढ़ावा  "तिरुपति बालाजी" से कुछ ही कम होता होगा.  यह मंदिर लोगों की आस्था का प्रतीक है और आस्था सदा मानवीय नियम-कानूनों से ऊपर रही है. यह मंदिर इसका साक्षात प्रतीक है.    

दर्शन कर बाहर आने पर लोगों से पता चला कि सालासर धाम में शरद पूर्णिमा के कारण मेला लगा हुआ है और रहने-ठहरने की जगह मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. हमारे वाहन चालाक राधेश्याम की भी सलाह थी कि हमें झुंझनु में ही रात बितानी चाहिए. पर मन था कि मानता ही नहीं था. जहां की सोच के चले थे, जो निदृष्ट था उसके पहले रूकने की बात गले नहीं उतर रही थी. अंत में यही तय रहा कि सब ऊपर वाले पर छोड़ दिया जाए, जैसा वह चाहेगा वैसे ही रहेंगे। गाड़ी ने शहर के बाहर आ जब सालासर का रूख किया तो छह बज कर बीस मिनट हो रहे थे. गाड़ी और मन अपनी-अपनी रफ्तार से अपनी मंजिल की और अग्रसर थे. 

कैसा रहा रात को सालासर पहुँचने पर माहौल...........कल के अंक में।   

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

यात्रा राजस्थान के सालासर बालाजी धाम की, झुंझनु के रानी सती मंदिर होते हुए (1)

पहली बार 2010 में राजस्थान में हनुमान जी के प्रसिद्ध धाम, सालासर बालाजी के दर्शन का सौभाग्य मुझे, श्रीमती जी, दोनों बेटे चेतन और अभय को सड़क मार्ग से "वैगन आर" द्वारा जा कर प्राप्त हुआ था. यात्रा काफी सुखद व संतोषजनक रही थी. इसी कारण 2011 में भी यात्रा दोहराई जा सकी, जिसमें कदम जी के भ्राता श्री राकेश जी, उनकी पत्नी श्रीमती स्नेह और बिटिया नेहा भी सम्मलित हुए थे. गए तो तब भी कार से ही थे पर "i-ten" को कुछ ज्यादा ही बोझ उठाना पडा था :-). कारण हाई-वे और दूरी के लिहाज से कार वाहक के रूप मे अभय पर ही सब को भरोसा था सो दूसरी कार ले जाना सर्वसम्मति से नकार दिया गया था.  पर जो भी हो यात्रा और दर्शन बहुत ही सुखदाई रहे थे. पर यह सिलसिला उसके अगले साल इच्छा होते हुए भी, यानी 2012 में  संभव नहीं हो पाया था. इसी कारण इस बार काफी पहले से ही इस यात्रा को प्रमुखता दे रखी थी. पर इस बार इसे ज़रा सा और विस्तार दे बालाजी धाम के पास के दो और तीर्थ स्थानों, झुंझनु के रानीसती जी के मंदिर और खाटु स्थित श्याम जी के मंदिर को भी शामिल कर लिया गया था. 

इसके लिए 17, 18, 19 अक्टूबर के दिन भी निश्चित हो चुके थे और हमारे अनुभवों को सुन इस बार सदस्य संख्या भी 12-13 का आंकड़ा छू रही थी. पर जैसे-जैसे दिन नजदीक आते गए सदस्यों की 'हाँ,' 'ना' का रूप धरती गयी और 16 अक्टूबर की सुबह तक हम वही 2010 वाले चारों ही बचे रहे थे और यह तय हो चुका था कि फिर अपनी "वैगन-आर" को ही हमें दर्शन करवाने का मौका दिया जाए. पर प्रभू की माया, संध्या समय राकेश जी ने अपने अकेले जाने की इच्छा जाहिर की, फिर उनसे छोटे भाई राजीव जी ने भी परिवार सहित, जिसमें आठ साल की बिटिया तथा पांच साल का खुशदिल बेटा सबका दिल बहलाने को शामिल थे.  इन्हीं सारी बातों और सदस्यों की संख्या को ध्यान में रख 16 की रात करीब साढ़े दस बजे एक ZYLO बुक़ कर ली गयी।         

17.10.13, जल्दी करते-करते भी सुबह जब गाड़ी ने घर छोड़ा तो घड़ी 10.40 का आंकड़ा दिखला रही थी. अंतरजाल और पुराने अनुभवों के आधार पर रोहतक-भिवानी-लोहारू-झुंझनु वाला मार्ग ही अपनाया गया. पर इस बार सबसे सुखद आश्चर्य सडकों की हालत देख कर हुआ. उनके साफ, समतल रूप और "वाई पासों" ने यात्रा को सुगम बनाने में बहुत मदद की. दिल्ली से रोहतक तथा कुछ हद तक भिवानी के मार्ग ने तो लालू जी की टिप्पणी की याद ताजा कर दी थी पर भिवानी शहर से बाहर निकलने तक कार के झूला बनने की स्थिति बनी रही जो कमोबेश हर शहर के अंदर से गुजरने पर मिलती रही, पर यह कुछ ही देर की परेशानी ही होती थी.
सुन्दर, साफ, समतल सड़क 
चलायमान अवस्था में भी लेखन का सुख 

 लोहारू पार करते-करते मुखद्वार से कुछ न कुछ अंदर जाते रहने के बावजूद भूख ने सर उठाना शुरू कर दिया था सो एक उपयुक्त सी जगह देख साथ लाए गए भोजन को उदरस्त कर थोड़ी-थोड़ी चाय का मजा ले फिर आगे की यात्रा शुरू की गयी.
भोजन की प्रतीक्षा 
थकान का नामोनिशान नहीं 
पूड़ी-आलू विद अचार, भई वाह  
भोजनोपरांत की तृप्ति 
कुछ घंटों की यात्रा की हल्की सी थकान और अकड़ाहट भोजन के बाद गायब हो गयी थी. चाय ने भी सोने पे सुहागे का काम किया था. यात्रा की शुरुआत से बच्चों को लेकर जो एक चिंता सी थी कि कहीं उन्हें परेशानी ना हो वह भी दूर हो चुकी थी. दोनों खूब तफरीह कर रहे थे. सो  बिना किसी अवरोध के हम सब करीब साढे  चार बजे झुंझनु पहुँच गये.  पुराने शहर की संकरी गलियों से होते हुए मंदिर तक जाने में लगे करीब पन्द्रह मिनटों के बाद हम रानीसती जी के भव्य मन्दिर के सामने खड़े थे.
रानीसती मंदिर का मुख्य द्वार



















यहीं पता चला कि सालासर में बालाजी के  दरबार में शरद पूर्णिमा के कारण मेला भरा हुआ है, जिसके कारण वहाँ  पचासों हजार लोग इकट्ठा हैं इसलिए रहने की व्यवस्था होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. वाहन चालाक की भी यही सलाह थी कि रात झुंझनु में ही बिताई जाए. पर मन नहीं मान रहा था. रानी सती माता के दर्शन और फिर कैसे क्या हुआ...........कल की  रिपोर्ट मे.

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

यहाँ रावण की पूजा होती है

रावणग्राम के रावणबाबा 
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के एक गांव, जिसका नाम ही रावणग्राम है, के किसी भी समारोह के पहले राक्षसराज रावण की पूजा होती है। जो गांव के बाहर लेटी हुई प्रतिमा, जिसकी लम्बाई करीब दस फुट की है तथा जिसे रोज खीर और पूड़ी का भोग लगाया जाता है, के रूप में विराजमान है। यहां की दो-तिहाई आबादी,   कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की है। जिनकी संख्या करीब  5000 से 6000 तक हैये सभी गांववासी दशानन के अनन्य भक्त हैं।
                                                                
रावण गांव के अलावा आस-पास के गांव सेउ, नटेरन आदि में भी जब शादी-ब्याह या कोई शुभ कार्य होना होता है तो रावण गांव के बाहर लेटी रावण की प्रतिमा के चरणों में पहले नैवेद्य अर्पित कर उसकी पूजा की जाती है। दुल्हन के गृह प्रवेश के पूर्व, तथा दुल्हे की बारात जाने से पहले तो पूजा करना बहुत जरूरी समझा जाता है। पहले यहाँ शादी-ब्याह के मौकों पर ही पूजा-अर्चना की जाती थी पर अब दशहरे पर भी आराधना शुरू हो गयी है.

कठोर लाल सफ़ेद पत्थर से बनी रावण की यह प्रतिमा परमार काल .की मुर्ती कला का अद्भुत नमूना है। इसे रावण का विशाल रूप, दस सिर, बीस हाथ, हाथों में गदा, तलवार, त्रिशूल आदि और भव्य बनाते हैं। पुरातत्वविद  इस प्रतिमा की प्राचीनता का अभी आकलन नहीं कर पाये हैं.  

ऐसी ही एक जगह कानपुर में भी है जहां रावण की पूजा होती है वहाँ भक्तों की इच्छा है की रावण के जीवन के उज्जवल पक्ष को भी दुनिया के सामने उजागर  होना चाहिएएक मजे की बात और भी है। दशहरे के दिन गांववासी रावण की प्रतिमा की पूजा अर्चना करते हैं, फिर शाम को कागज के रावण का दहन भी किया जाता है, जो अभी पिछले कुछ बरसों से शुरु हुआ है। हो सकता है कि कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के अलावा और जाति के लोगों की बढ़ती आबादी के कारण ऐसा होने लग गया हो।

इसी तरह जोधपुर में भी रावण के एक मन्दिर का निर्माण हो रहा है जिसे अपने आप को रावण की पत्नी मन्दोदरी का वंशज मानने वाले, जोधपुर से कुछ दूर स्थित "मंदोर" नामक जगह के निवासी करवा रहे  हैं।  
  

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

प्रभू की माया कौन समझ पाया

सावन-भादों की एक शाम। आकाश में घने बादल गहराते हुए रौशनी को विदा करने पर आमदा थे। दामिनी एक सिरे से दूसरे सिरे तक लपलपाती हुई माहौल को और भी डरावना बना रही थी। जैसे कभी भी कहीं भी गिर कर तहस-नहस मचा देगी। हवा तूफान का रूप ले चुकी थी।

ऐसे में उस सुनसान इलाके में, एक जर्जर अवस्था में पहुंच चुके खंडहर में, एक आदमी ने दौड़ते हुए आकर शरण ली। तभी दो सहमे हुए मुसाफिरों ने भी बचते बचाते वहां आ कर जरा चैन की सांस भरी। फिर एक व्यापारी अपने सामान को संभालता हुआ आ पहुंचा। धीरे-धीरे वहां सात-आठ लोग अपनी जान बचाने की खातिर इकट्ठा हो गये। बरसात शुरु हो गयी थी। लग रहा था जैसे प्रलय आ गयी हो। इतने में एक फटे हाल बच्चा अपने सूकर के साथ अंदर आ गया। उसके आते ही मौसम ने प्रचंड रूप धारण कर लिया। बादलों की कान फोड़ने वाली आवाज के साथ-साथ ऐसा लगने लगा जैसे बिजली जमीन को छू-छू कर जा रही हो। सबको लगने लगा कि उस अछूत बच्चे के आने से ही प्रकृति का कहर बढ़ा है। यदि यह इस मंदिर में रहेगा तो भगवान के कोप से बिजली जरूर यहीं गिरेगी। इस पर सबने एक जुट हो, उस डरे, सहमे बच्चे को जबर्दस्ती धक्के दे कर बाहर निकाल दिया। रोते हुए बच्चे ने कुछ दूर एक घने पेड़ के नीचे शरण ली।

उसके वहां पहुंचते ही जैसे आसमान फट पड़ा हो, बादलों की गड़गड़ाहट से कान बहरे हो गये। बिजली इतनी जोर से कौंधी कि नजर आना बंद हो गया। एक पल बाद जब कुछ दिखाई पड़ने लगा, तब तक उस खंडहर का नामोनिशान मिट चुका था। प्रकृति भी धीरे-धीरे शांत होने लगी थी।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

गुप्तचरी, एक सदियों पुरानी विधा


देखा जाय तो देवताओं की भलाई के लिये सदा तत्पर रहने वाले नारद जी को सबसे पहला गुप्तचर माना जा सकता है। जिन्होंने एक तरह से खुद बदनामी मोल लेकर भी सुरों का भला करना नहीं छोड़ा।

वजूद में आने के बाद मनुष्य ने ज्यों-ज्यों अपनी पैठ, अपना वर्चस्व जगत में कायम किया होगा त्यों-त्यों अपना अस्तित्व बचाए रखने के साथ ही उसमें असुरक्षा की भावना भी घर कर गयी होगी। इसीलिये अपने को सुरक्षित रखने के लिये दूसरों के भेद जानने की प्रवृति भी अपने पैर जमाने लग गयी होगी। शुरुआत में यह बडे और खतरनाक जानवरों से अपने को बचाने के काम लाई जाती होगी। फिर बढती आबादी में यह आपस की टोह लेने में उपयोग की गयी होगी और इसी तरह धीरे-धीरे इजाद हुई होगी गुप्तचरी की कला। 

यह एक बहुत पुरानी विधा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों, महाकाव्यों में भी इसका विवरण आया है। रामायण-महाभारत में भी गुप्तचरों की वृहद जानकारी मिलती है। रावण की कूटनीति में गुप्तचरी को खासा स्थान प्राप्त था।
देवर्षि नारद मुनि
रामायण में उसके विभिन्न गुप्तचरों के नामों का जगह-जगह उल्लेख मिलता है। शुक, सारण, प्रभाष, सरभ तथा शार्दुल उसके प्रमुख गुप्तचर थे। शुक और सारण को ही युद्ध के समय वानर भेष में रामसेना का भेद लेते पकड़ा गया था। उधर विभीषण के लंका के बाहर रहने के बावजूद उनके गुप्तचर लंका में सक्रिय थे जो समय-समय पर उन्हें रावण की गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। श्री राम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर उनके गुप्तचर भद्रमुख ने ही उन्हें धोबी के कथन की जानकारी दी थी।

महाभारत में तो पग-पग पर गुप्तचारी के कारनामों का उल्लेख मिलता है। धृतराष्ट्र के प्रमुख गुप्तचर का नाम कणिक था। जिससे उसे सारे राज्य की खबरें मिला करती थीं। पांड़वों के अज्ञातवास के दौरान सैंकड़ों गुप्तचर उनका पता लगाने के लिये दुर्योधन ने छोड़ रखे थे। यह गुप्तचरों का ही काम था जो पांडव लाक्षागृह से सकुशल निकल पाये थे। कौरवों को गुप्तचरों द्वारा ही जयद्रथ वध की अर्जुन की प्रतिज्ञा का पता चला था।
महाभारत में शत्रू की सूचना प्राप्त करने के अनेकों उपाय बताये गये हैं। इस काम के लिये साधू, भिक्षुक, नटों, नर्तकियों और अंधे लोगों को उपयुक्त बताया गया है। पर साथ ही साथ संकट काल में इन्हें देश से निर्वासित करने की भी सलाह दी गयी है।

देखा जाय तो देवताओं की भलाई के लिये सदा तत्पर रहने वाले नारद जी को सबसे पहला गुप्तचर माना जा सकता है। जिन्होंने एक तरह से खुद बदनामी मोल लेकर भी सुरों का भला करना नहीं छोड़ा। 
चाणक्य ने तो इस विधा को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। जिसके फलस्वरूप ही चंद्रगुप्त नि:शंक हो अपना राज कर सके।

गुप्तचरों के काम की कोई सीमा नहीं होती। नाही स्त्री-पुरुष का भेद होता है। महिलाओं ने भी इस क्षेत्र में बहुत यश कमाया है, जिसमें माताहारी का नाम सर्रवोपरि माना जाता है। गुप्तचरों या जासूसों को जहां संकट के समय हर छोटी-बड़ी सूचना अपने अधिकारी को देनी होती है वहीं शांतिकाल में भी राज्य की आंतरिक व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी भी इनकी होती है।

आज हालत यह है की इंसान तो इंसान जानवर तथा मशीनों का भी उपयोग जासूसी में होने लग गया है। जिसमें शत्रू मित्र का भेद भी ख़त्म हो चुका है। देशों की बात तो दूर अब तो व्यक्तिगत जासूसी आम हो गयी है। यहाँ तक की शादी के पहले भावी वर तथा वधू के आचरण को जानने के लिए लोग गुप्तचरों की सेवा बेहिचक लेने लगे हैं। अब तो हर छोटे-बडे शहरों में ऐसे गुप्तचरों की सेवाएं आम बात हो गयी है। पर क्या इससे हमारी आपसी समझ, विश्वास, भरोसा कहीं खत्म तो नहीं होता जा रहा ? 

शनिवार, 5 अक्टूबर 2013

अग्रोहा के महाराजा अग्रसेन,


अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये      प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्रजी, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने 1871 में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिसमें विस्तार से इनके बारे में  बताया गया है। इसी में 'अग्रवाल का अर्थ भी समझाया गया है कि अग्रवाल यानी "महाराज अग्रसेन के वंशधर या बच्चे"।
वर्तमान के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5185 साल पहले हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। पर इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।

कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।
  
अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।

महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।    

महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।

उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।   

उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवाल समाज हिंसा से दूर ही रहता है। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।


महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे।  इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे।  पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी।  वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

आज तीनों बंदर भी हैरान हैं


 उन तीनों  बंदरों  की साख, उनके आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

मिजारु, मिकाजारु, मजारु, तीन बंदर, पर कितने बुद्धिमान, बुरा कहने, सुनने  और देखने की मनाही करने वाले। गांधीजी को ये इतने भाए और उन्होंने तीनों को ऐसे अपनाया कि  वे गांधीजी के बंदर ही कहलाने लग गए। ये तीनों भी जापान से ऐसे ही भारत नहीं चले आए थे। वे आए थे यहाँ की संस्कृति, यहाँ का ज्ञान, यहाँ का पांडित्य, यहाँ की मर्यादा, यहाँ के सर्व-धर्म समभाव का गुणगान सुन कर। यहाँ की क्षमा शीलता की, मानवता की, भाई-चारे की,  माता-पिता-गुरु जनों के सम्मान की गाथाएं सुन कर। यहाँ के रहवासियों के  प्रकृति-पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम की कहानियां सुन कर।   यहाँ आकर शरण भी ली तो ऐसे इंसान के यहाँ जो सदा  दूसरों के प्रति समर्पित रहा और फिर तीनो  यहीं के हो कर रह गए।

शीर्ष पर पहुँचने  के बाद हर मार्ग अवनति की ओर  ही जाता है। यह उन तीनों ने भी सुन रखा था पर इतनी जल्दी मूल्यों का ह्रास हो जाएगा वह भी भारत में, यह तो किसी ने भी नहीं सोचा था। समय चलायमान है, उसके साथ हर चीज बदलती जाती है। यहाँ भी वैसा ही हुआ, समय बदला, ज़माना बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, साथ ही साथ नेता भी बदले और उन्होंने  अपने मतलब के तहत हर चीज की परिभाषा भी बदल डाली।

गांधीजी हमारे मार्गदर्शक रहे, झंझावातों के बावजूद उनके दिखाए रास्ते पर चल कर देश आजाद हुआ। पर अब उनके आदर्शों,  उनकी बातों का लोग अपनी सुविधानुसार उपयोग कर अपना मतलब निकालने में जुटे हुए हैं। बेचारे बंदर भी वैसी ही  कुटिल चालों का शिकार हो गए।  बंदर वही हैं उनकी सीखें भी वही हैं पर कुछ मौका-परस्त, चंट  लोगों ने  उनका अलग अर्थ निकाल कर  आम इंसान की मति  भ्रष्ट करनी  शुरू कर दी  है।  

पहले मजारु  के संकेत का अर्थ बुरा न कहने से लिया जाता था। अब उसका अर्थ निकाला जाता है कि कुछ भी होता रहे, देखते रहो, सुनते रहो पर बोलो मत कुछ भी। लाख अन्याय हो अपना मुंह फेर लो। मजलूमों पर जुल्म होता रहे तुम अनदेखा कर अपनी राह चलते रहो।  एक  चुप हजार नियामत। 

पहले मिजारु  के संकेत का अर्थ समझा जाता था कि बुरा मत देखो। अब उसका अर्थ हो गया है कि कुछ देखो ही  मत। बस बिना सोचे-समझे जो मुंह में आए  बोलते रहो। जितना हो सके दूसरों की बुराई करते हुए हदें पार कर दो।  किसी को नेक नामी मिलते ही उसकी बखिया उधेड़ दो। किसी के अच्छे काम को भी मीन-मेख निकाल कर निकृष्ट सिद्ध कर दो। वादे करो, सब्ज बाग़ दिखाओ और भूल जाओ। 

उसी तरह पहले मिकाजारु  के संकेत का अर्थ बुरा ना सुनने में किया  जाता था पर आज उसके अर्थ का भी  अनर्थ कर दिया गया है। अब उससे यह समझाया जाता है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी मत सुनो। कोइ लाख चिल्लाता रहे तुम अपनी रेवड़ियां बाँटते रहो, जनता के खून-पसीने की कमाई से अपने घर भरते रहो। कोइ विरोध करे तो उसकी ऐसी की तैसी करवा दो। कोइ कुछ भी बोले, कुछ भी कहे तुम अपने कानों पर जूँ मत रेंगने दो।

तीनों बंदर भी  हैरान हैं कि क्या यह वही देश है जिसकी किसी समय संसार भर में तूती बोला करती थी। जो ज्ञान और शिक्षा में जगत-गुरु कहलाता था। जिसके ऋषि-मुनियों के उपदेश दुनिया को राह दिखाते थे।  क्या  हो गया है यहाँ के गुणी जनों को, वीरों को, देश भक्तों को। क्यों मुट्ठी भर पथ भ्रष्ट लोगों के कारनामों पर पूरा देश चुप्पी साधे बैठा है?  क्यों  देश को रसातल की और जाते देख भी आक्रोश नहीं उमड़ता? क्यों महिलाओं की, दलितों की चीखों पर भी कान बंद किए हुए हैं लोग?

औरों की तो क्या कहें उन तीनों की अपनी साख, उनके अपने आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

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