देवानंद, एक युग का अंत, पर सरकारी "चैनल" अपने ढर्रे पर।
देवानंद नहीं रहे। सुबह-सुबह इस खबर पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा। एक ऐसा इंसान जिस
ने थकना ना जाना हो, हताशा-निराशा जिसके पास ना फटकती हो, जो कभी पीछे मुड़ कर ना देखता हो, जिसने हिंदी सिनेमा को एक अलग-अनोखा रंग दिया हो, अस्सीवें दशक में भी जो युवाओं के दम-खम को चुन्नौती देता रहा हो वह ऐसे कैसे जा सकता है। वह तो जीवन भर जिंदगी का साथ निभाने को जैसे वचनबद्ध था पर अंतत: जिंदगी ने ही उनका साथ छोड दिया। फिर भी यह इंसान जब तक जीया अपनी शर्तों को जिंदगी पर थोप कर जीया, कभी किसी तरह का समझौता किए बगैर। इस धरती पर ऐसे इंसान कभी-कभी वर्षों मे एक बार जन्म लेते हैं।
देवानंद नहीं रहे। सुबह-सुबह इस खबर पर विश्वास ही नहीं हो पा रहा। एक ऐसा इंसान जिस
ने थकना ना जाना हो, हताशा-निराशा जिसके पास ना फटकती हो, जो कभी पीछे मुड़ कर ना देखता हो, जिसने हिंदी सिनेमा को एक अलग-अनोखा रंग दिया हो, अस्सीवें दशक में भी जो युवाओं के दम-खम को चुन्नौती देता रहा हो वह ऐसे कैसे जा सकता है। वह तो जीवन भर जिंदगी का साथ निभाने को जैसे वचनबद्ध था पर अंतत: जिंदगी ने ही उनका साथ छोड दिया। फिर भी यह इंसान जब तक जीया अपनी शर्तों को जिंदगी पर थोप कर जीया, कभी किसी तरह का समझौता किए बगैर। इस धरती पर ऐसे इंसान कभी-कभी वर्षों मे एक बार जन्म लेते हैं।पहले शम्मी कपूर और अब देव आनंद। दो ऐसे अभिनेता जिन्होंने हिंदी सिनेमा को एक अलग पहचान दी, एक-एक कर अपना रोल निभा रं
गमंच छोड गये। शम्मीजी ने उम् और स्वास्थ्य के चलते अपने-आप को काफी दिनों से अलग-थलग कर लिया था। पर देवांनद तो कर्मयोगी का पर्याय थे। वर्षों से चुपचाप बिना हश्र की चिंता किए अपने कर्म को मूर्त-रूप देते चले आ रहे थे। लाभ-हानि की चिंता से काफी ऊपर उठ चुके इस इंसान को शायद पता ही नहीं था कि थकान, निराशा, हताशा क्या होती है। उसको सिर्फ पता था कि मुझे काम करते जाना है और वही वह करता रहा मरत्युपर्यंत। किसी प्रशंसा या आलोचना की परवाह किए बिना। ऐसा इंसान भगवान के दरबार में भी निष्क्रीय नहीं रहेगा वहां भी अपनी सृजनकला का उपयोग करता रहेगा।
उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजली।
पर दुख: हुआ यह देख कि सरकारी चैनल पर "रंगोली" मे इस खबर का कोई असर नहीं था। वह अपने पुराने ढर्रे पर दूसरे प्रेमगीत बजाता जा रहा था।
गमंच छोड गये। शम्मीजी ने उम् और स्वास्थ्य के चलते अपने-आप को काफी दिनों से अलग-थलग कर लिया था। पर देवांनद तो कर्मयोगी का पर्याय थे। वर्षों से चुपचाप बिना हश्र की चिंता किए अपने कर्म को मूर्त-रूप देते चले आ रहे थे। लाभ-हानि की चिंता से काफी ऊपर उठ चुके इस इंसान को शायद पता ही नहीं था कि थकान, निराशा, हताशा क्या होती है। उसको सिर्फ पता था कि मुझे काम करते जाना है और वही वह करता रहा मरत्युपर्यंत। किसी प्रशंसा या आलोचना की परवाह किए बिना। ऐसा इंसान भगवान के दरबार में भी निष्क्रीय नहीं रहेगा वहां भी अपनी सृजनकला का उपयोग करता रहेगा। उन्हें हमारी विनम्र श्रद्धांजली।
पर दुख: हुआ यह देख कि सरकारी चैनल पर "रंगोली" मे इस खबर का कोई असर नहीं था। वह अपने पुराने ढर्रे पर दूसरे प्रेमगीत बजाता जा रहा था।





