मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

अथ रसगुल्ला कथा

इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों, बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूधिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  

"नोवीन दा किछू  नोतून कोरो, डेली ऐक रोकोमेर मिष्टी आर भालो लागे ना."

"हेँ, चेष्टा कोच्ची (कोरची), दैखो की होय."    
1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था।तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीनचंद्र दास 

नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। और सच में वे कोशिश कर भी रहे थे कुछ नया बनाने की जिसमें उनका भरसक साथ दे रही थीं उनकी पत्नी, खिरोदमोनी । उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।



कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।

नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है। नविनचंद्र दास की जीवनी पर एक फिल्म भी बन चुकी है।  


बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रोशोगोल्ले" का जवाब नहीं। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस मिठाई पर अपना हक़ जताने के लिए दो प्रांतों बंगाल और ओडिसा में सालों कानूनी जंग चलती रही। ओडिसा का कहना था कि इसकी पैदाइश उनके यहां हुई थी और वर्षों से उसका भोग जगन्नाथ जी को लगता आ रहा है। पर वहां के ''रसगोले'' का रंग भूरापन लिए होता है और उसे खीरमोहन नाम से जाना जाता रहा है। जो थोड़ा सा कड़ापन लिए होता है। जबकि बंगाल का ''रोशोगुल्ला'' मुलायम, स्पॉन्जी और दूडिया सफ़ेद रंग का होता है। वैसे भी दोनों मिठाइयों के रंग के अलावा उनके स्वाद, चाशनी, प्रकृति और बुनावट में भी काफी फर्क होता है। 
ओडिसा का और बंगाल का रसगुल्ला 

जो हो इसका जन्म तब के ईस्ट इंडिया का ही माना जाता है जिसे आज
बंगाल और ओडिसा के नाम से जानते हैं। वैसे 2017 में सरकार द्वारा बनाई गयी कमिटी ने ''बांग्लार रोशोगोल्ले'' को  Geographical Indications (GI) Tag  प्रदान कर दिया है। उस दिन बंगाल में ऐसी ख़ुशी मनाई गयी जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत  हो।  यह है इस मिठाई का ''क्रेज़''। हालांकि आजकल बदलते समय के साथ कई लोग इसके नाम का सहारा ले उल्टी-सीधी मिठाइयां, जैसे पान रसगुल्ला, मिर्ची रसगुल्ला, गुलाब रसगुल्ला, चॉकलेट रसगुल्ला जैसे सौ स्वादों वाले रसगुल्ले बनाने का दावा कर नाम और दाम कमाने से नहीं हिचकिचा रहे। यह सही है कि किसी को कुछ बनाने की रोक नहीं है पर किसी की ख्याति को भुनाना भी उचित नहीं होता। देखना है कि बंगाल का, अपनी परंपराओं से लगाव रखने वाला, भद्रलोक किसे सर-माथे पर बिठाए रखता है।    
तो यदि कभी कोलकाता जाना हो तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना पड़ बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

रविवार, 28 अप्रैल 2019

जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है !

जहां बाकी त्योहारों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं  इस उत्सव में  ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर निति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए...........!

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हमारा देश तो सदा से उत्सव प्रिय रहा है। हफ्ते, महीने या साल में आने वाले ऐसे मौकों पर आम इंसान अपनी बेहतरी के लिए सारे रंजो-गम भूल-भूला कर उन्हें मनाने में कोई कोताही नहीं बरतता। ऐसा ही एक पंचसाला उत्सव आजकल अपने पूरे शबाब पर है। पर इसमें और बाकी त्योहारों में मूल फर्क यह है कि जहां बाकियों में अवाम अपने आराध्य की पूजा-अर्चना कर उसे खुश करने की कोशिश करता है, वहीं इसमें ''आराध्य'' दीन-हीन बन  अपने भक्तों को रिझाने में जमीन-आसमान एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ता। मजे की बात यह है कि आम जिंदगी में लोगों को अलग-अलग पंथों, अलग-अलग मतों को मानने की पूरी आजादी होती है और इसमें उनके आराध्य की कोई दखलंदाजी नहीं होती पर इस त्यौहार के ''देवता'' साम-दाम-दंड-भेद हर नीति अपना कर यह पुरजोर कोशिश करते रहते हैं कि उनके मतावलंबी का प्रसाद किसी और को ना चढ़ जाए। 

इसी चेष्टा में यह उत्सव, उत्सव ना रह कर झूठोत्सव बन एक ऐसा संग्राम बन जाता है जिसमे सब कुछ जायज है। सब कुछ, गाली-गलौच, मार-पीट, धोखा-धड़ी, मौकापरस्ती, वायदे, विश्वासघात, झूठ, लालच, अपमान ! नहीं है तो सिर्फ अवाम की भलाई ! जिसकी गरीबी उसके परिवार का अभिन्न अंग बन चुकी है। जिसका अतीत भी आज है और भविष्य भी ! जिसके लिए बीमार पड़ जाना किसी अपराध से कम नहीं है ! उसे यह नहीं पता कि हाड-तोड़ मेहनत के बावजूद वह क्यों नहीं एक वक्त भी भरपेट भोजन कर पाता जबकि उसका ''आका'' बिन कुछ किए ही अपनी स्वर्ण नगरी स्थापित कर लेता है ! 

विचित्र हैं हमारे देशवासी ! जिस तरह वे हर अच्छाई, सौभाग्य, सुख का श्रेय भगवान को देते हैं और दुर्भाग्य को अपनी किस्मत का दोष मानते हैं ! खुद भूखे पेट भले ही हों धर्मस्थलों में भरसक दक्षिणा देने में नहीं हिचकिचाते ! इनके सामने ही इनके त्यागमय दान से धर्मस्थल ऐसी अकूत संपत्ति का ठीहा बन जाते रहे हैं जिसका कोई उपयोग नहीं होता। ठीक वैसे ही वर्षों से जाति, धर्म, भाषा, पंथ की भूलभुलैया में भटकाने वाले अपने आधुनिक देवताओं को ये कभी दोष नहीं देते ! सालों साल खुद एक झोपड़ी में पड़े-पड़े ही ये अपने आराध्यों के महल स्वर्णमंडित होता देख उसे भी उनका भाग्य और प्रभू का आशीर्वाद मान इसी बात पर निहाल होते रहते हैं कि अगला इनकी जाति का है ! उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं होता कि उसकी जाति-धर्म वाले ने उसका ''मनोरंजन'' करने के सिवा कुछ नहीं किया बल्कि उसे इस बात की ख़ुशी होती है कि उसके उसने फलांनी जाति और धर्म वाले को नीचा दिखा दिया। और यह नीचा दिखाने पर खुश होने की अफीम का डोज़ उसे सालों-साल दिया जाता रहा है और रहेगा !

शायद आसमान पर रहने वाला कभी जमीन की ओर देखे ! सद्बुद्धि वितरित करे ! शिक्षा बढे ! जन जागरण हो ! तब कहीं जा कर दिन बदलें ! कहने को तो कहा जाता है कि घूरे के भी दिन बदलते हैं ! पर अभी तो पता नहीं कितनी देर है ! पर जब तक देर है, तब तक तो अंधेर का रहना तय ही है ! 

सोमवार, 22 अप्रैल 2019

अपने इतिहास को जानना भी जरुरी है

बहुत खेद हुआ जब हल्दीघाटी के बारे में एक दसवीं के छात्र ने अनभिज्ञता दर्शाई ! हल्दीघाटी तो एक मिसाल भर है। ऐसी  शौर्य, साहस , निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली सैंकड़ों जगहें हैं जो हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर दुःख इसी बात का है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को इनके बारे में पूरी और सही जानकारी नहीं है ! इसमें उनका कोई दोष भी नहीं है, जब आप किसी चीज के बारे में बताओगे ही नहीं तो उसके बारे में किसी को क्या जानकारी होगी ......... !

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हल्दीघाटी, नाम सुनते ही जो पहली तस्वीर दिमाग में बनती है वह एक पर्वतीय घाटी में राणा प्रताप और मुगलों के बीच हुए भीषण युद्ध का खाका खींच देती है। अधिकांश लोगों को यही लगता है कि यह पहाड़ियों के बीच स्थित बड़ी सी जगह होगी जहां प्रताप ने मुगलों के दांत खट्टे कर दिए थे। पर सच्चाई कुछ और है। हल्दी घाटी उदयपुर से तक़रीबन 48 की.मी. की दूरी पर अरावली पर्वत शृंखला में खमनोर और बलीचा गांवों के बीच लगभग एक की.मी. लंबा और लगभग 17-18 फुट चौड़ा, एक दर्रा (pass) मात्र है। जहां 18 जून 1576 में राणा प्रताप ने गोरिल्ला युद्ध लड़ते हुए अपने से चौगुनी अकबर की सेना को तीन की.मी. तक पीछे धकेल भागने को मजबूर कर दिया था। इस जगह की मिट्टी का रंग बिल्कुल हल्दी की तरह होने के कारण इसका नाम हल्दीघाटी पड़ा, पर उस दिन तो महाराणा ने खून का अर्ध्य दे कर इसे लाल कर दिया था ! उस निर्जन सी जगह में खड़े हो यदि आप पांच-छह सौ पहले की कल्पना करने की कोशिश भी करें तो रोमांच हावी हो जाएगा। श्रद्धा से उन राण बांकुरों के प्रति सर झुक जाएगा जिन्होंने विकट और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपनी मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आज जरुरत है ऐसी व्यवस्था की जो आधुनिक पीढ़ी को उनके बारे में जानकारी दे सके ! 

शौर्य, साहस, निडरता, देशप्रेम की याद दिलाने वाली यह जगह हमारे गौरवशाली इतिहास की प्रतीक है ! पर यह अत्यंत खेद का विषय है कि हमारी तथाकथित आधुनिक शिक्षा प्रणाली में ऐसे विषयों की कोई अहमियत नहीं रह गयी है। जिसके फलस्वरूप आज के बच्चों को तो छोड़िए उनके अभिभावकों तक को पूरी और सही जानकारी नहीं है। आजकी शिक्षा-पद्दति सिर्फ और सिर्फ एक कागज का प्रमाण पत्र हासिल कर उसकी सहायता से किसी नौकरी को लपकने का जरिया मात्र रह गयी है। क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि स्कूलों में प्रथमिक शिक्षा के दौरान ज्यादा ना सही कम से कम हफ्ते या पंद्रह दिनों में एक बार अपने इतिहास, उसके महानायकों, उनकी उपलब्धियों, उनके योगदान की सच्चाई के बारे में, बिना किसी कुंठा और पूर्वाग्रह के, बताया जाए ! ठीक उसी तरह जैसे पिछले जमाने में दादी-नानी की किस्से-कहानियां बच्चों में नैतिकता, त्याग, प्रेम, संस्कार इत्यादि के साथ-साथ पौराणिक तथा ऐतिहासिक जानकारीयां भी रोपित कर देती थीं।   

अभी पिछले दिनों उदयपुर जाने का अवसर मिला तो हल्दीघाटी तो जाना ही था ! वहां पहुंचने के दौरान जब साथ के बच्चे से, जो दिल्ली के एक नामी ''क्रिश्चियन स्कूल'' की दसवीं कक्षा का छात्र है, वहां के बारे में पूछ तो उसने पूरी तरह अनभिज्ञता दर्शाई ! यहां तक की उसकी ''मम्मी'' को भी सिर्फ आधी-अधूरी जानकारी थी, जबकि वह खुद एक स्कुल में अध्यापक हैं। विडंबना यही है कि अपने बच्चों के भविष्य, उनके कैरियर की चिंता में आकंठ डूबे अभिभावकों को आजके समय की गला काट पर्टियोगिताओं के चलते इतना समय ही नहीं मिलता कि वे इस तरह की बातों पर ध्यान दें। इसकी जिम्मेवारी तो पाठ्यक्रम बनाने वालों पर होनी चाहिए ! शिक्षा पद्यति कुछ ऐसी हो जो सिर्फ जानकारियां ही न दे बच्चों के ज्ञान में भी बढ़ोत्तरी करे। 

इसी यात्रा के दौरान होटल में केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर जी से मुलाकात का संयोग बना था पर यह समय ऐसी गंभीर बातों के लिए उचित नहीं था। चुनावी समय के अलावा और कोई वक्त होता तो यह बात उनके कानों में जरूर डाल दी जा सकती थी। वैसे सूना जा रहा ही कि केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति पर काम कर रही है। अब शिक्षा नीति पर गठित सलाहकार समिति क्या सलाह देती है यह देखने की बात होगी। 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

श्रीनाथद्वारा, नंदनंदन श्रीकृष्ण जी का मंदिर

मुख्य मंदिर में श्री नाथ जी की अत्यंत सुंदर, मनमोहक काले रंग के संगमरमर से बनी करीब-करीब आदमकद की प्रतिमा विराजमान है, जिसके मुख के नीचे ठोड़ी पर एक हीरा जड़ा हुआ है | यहां श्रीनाथजी के दर्शनों का समय निर्धारित है। कुल मिला कर आठ दर्शन होते हैं, मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थपन, भोग, आरती और शयन। प्रभू के प्रत्येक दर्शन का श्रृंगार अलग होता है। इसीलिए ब्रज के मंदिरों की तरह ही यहां रुक-रुक कर दर्शन करने को मिलते हैं..........!


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श्रीनाथद्वारा, पुष्टिमार्गीय वैष्णव सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है। जो राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित है। यहां नंदनंदन, आनंदकंद श्रीकृष्ण जी का तीन सौ साल से भी पुराना भव्य मंदिर है। यह देवस्थल उयदयपुर से सिर्फ 48 की.मी. की दूरी पर है। कहा जाता है कि प्रभु श्रीजी का प्राकट्य ब्रज के गोवर्धन पर्वत पर जतिपुरा गाँव के निकट हुआ था। पर मुगलों के आक्रमण के समय इसकी पवित्रता और सुरक्षा के लिहाज से इसे वहां से हटा लिया गया। मूर्ती को राजस्थान लाने का जिम्मा मेवाड़ के राजा राजसिंह ने लिया था। जिस बैलगाड़ी में विग्रह को लाया जा रहा था, उस बैलगाड़ी के पहिये नाथद्वारा में आकर मिट्टी में धंस गये और लाख कोशिशों के बाद भी गाडी को आगे नहीं ले जाया जा सका। तब पुजारियों ने श्रीनाथजी को यहीं स्थापित कर दिया। उस समय मंदिर बनाने का समय उपलब्ध ना होने के कारण प्रतिमा को एक हवेली में ही विधि-विधान पूर्वक स्थापित कर दिया गया था। इसीलिए यह मंदिर परंपरागत मंदिरों की तरह नहीं है। हवेली में स्थित होने के कारण ही इस मंदिर को श्रीनाथ जी की हवेली भी कहा जाता है।
 मंदिर में पहुँच के लिए तीन द्वार हैं। जो मोतीमहल दरवाजा, नक्कारखाना द्वार तथा प्रीतम पोल कहलाते हैं। मोतीमहल से प्रवेश करने पर पहले श्री लालन मंदिर मिलता है, जहां बाल गोपाल के दर्शन होते हैं। नक्कारखाने से प्रवेश करने पर एक खुली जगह आती है जो पुरुषों के इन्तजार के काम आती है। यहां से श्रीनाथ जी के सीधे दर्शन किए जाते हैं। महिलाओं के लिए पास में ही संगमरमरी विशाल कमल चौक है जो घूम कर नक्कारखाने से आ मिलता है। इधर से महिलाओं के लिए दर्शन की व्यवस्था है। प्रीतम पोल से बाहर बाजार की तरफ जाया जा सकता है।




मुख्य मंदिर में श्री नाथ जी की अत्यंत सुंदर, मनमोहक काले रंग के संगमरमर से बनी करीब-करीब आदमकद की प्रतिमा विराजमान है, जिसके मुख के नीचे ठोड़ी पर एक हीरा जड़ा हुआ है | यहां श्रीनाथजी के दर्शनों का समय निर्धारित है। कुल मिला कर आठ दर्शन होते हैं, मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थपन, भोग, आरती और शयन। प्रभू के प्रत्येक दर्शन का श्रृंगार अलग होता है। इसीलिए ब्रज के मंदिरों की तरह ही यहां रुक-रुक कर दर्शन करने को मिलते हैं।
 नक्कारखाना द्वार 

हम लोग मेवाड़ एक्स. से सुबह साढ़े सात के लगभग उदयपुर पहुंच गए थे। बुक की हुई गाड़ियों को लेकर करीब साढ़े नौ बजे होटल यूई (Yois) पहुंचे। तरण-ताल का उपयोग कर तरोताजा हो बारह बजे के कुछ बाद हल्दी घाटी के लिए रवाना हुए। नयी जगह, अनजान रास्ते का सहारा गूगल ही था; उसकी मेहरबानी थी कि वह कुछ मान-मनौअल, कुछ नखरे के बावजूद राह दिखाता रहा। हल्दीघाटी, चेतक की समाधि और राणा प्रताप संग्रहालय देखने के बाद करीब चार बजे श्री नाथ जी के दर्शन हेतु नाथद्वारा रवाना हुए। आखिर भीड़-भाड़, संकरी गलियों, दूर की पार्किग से जैसे-तैसे निबट कर प्रभू के द्वार पहुंच ही गए। अप्रैल का मध्य था गर्मी अपना जोर दिखाने लग गयी थी, जिससे कुछ-कुछ थकान का एहसास होने लगा था। ऊपर से पंडों-दलालों की किच-किच ! पर मेरा शुरू से ही यह इरादा रहता है कि बिना किसी सहायता के खुद अपने बल-बूते पर ही दर्शन किए जाएं। इससे मन में किसी तरह का अपराध बोध नहीं आता। आजकल ये सारी बातें हर धार्मिक स्थल पर आम हो गयीं हैं। माया की माया का जाल सब जगह फ़ैल चुका है। फिर भी दर्शनों की अटूट इच्छा के सामने ऐसी सब बातें हर तरह से गौण हो जाती हैं।
दर्शनोपरांत 
जब हम नक्कारखाना द्वार पर पहुंचे, उस समय भी मंदिर के कपाट शृंगार के कारण बंद थे। नियमानुसार जूते वगैरह उतार, हाथ-मुंह धो, कैमरा, मोबाइल, बड़े बैग-पर्स सब जमा करवा कर महिलाओं और पुरुषों का अलग-अलग लाइनों में लगना हुआ। तभी दस मिनट के बाद पंद्रह मिनटों के लिए किवाड़ खुले, अपार जनसमूह, जय-जैकार, धक्का-मुक्की, सबको दर्शन करने की बेताबी, दर्शनों को जितना हो सके लंबा खींचने की कामना और दर्शनोपरांत भी हटने की अनिच्छा कभी-कभी अराजकता भी उत्पन्न कर देती थी। वैसे ऐसा होना स्वाभाविक भी है ! दूर-दूर से आए दर्शनार्थी, जिनमें कइयों का दोबारा आना शायद ही संभव हो, मनमोहन की छवि को जैसे सदा के लिए अपने नयनों में बसा लेना चाहते हों। हो भी क्यों ना ! श्री नाथ जी के दर्शन कर किसका मन भावविभोर नहीं हो जाता है | हमें भी दर्शन हुए ! भले ही कुछ दूर से हुए, पर खूब हुए ! नयन तृप्त हुए, मन भाव-विभोर हो गया।

नाथद्वारा बाजार 
होटल का तरण-ताल 
तीन-चार मिनट तक जन सैलाब के थपेड़े, मानव हुजूम का झंझावात सहने के बाद प्रभू को आँखों में समोए किसी तरह बाहर आए, प्रसाद लिया। सबको इकठ्ठा होने में कुछ समय लगना ही था, लगा। फिर कार पार्किंग के स्थान को लेकर हुए दिशा भ्रम को स्थानीय लोगों की मदद से दूर कर करीब छह बजे वापस उदयपुर की ओर का रूख हो पाया। होटल के तरण-ताल के कुछ-कुछ ठंडे पानी ने दिन भर की थकान को जैसे अपने में समेट हमें फिर से तरो-ताजा कर दिया। 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

ग़ालिब की हवेली और गली कासिम जान

ग़ालिब की हवेली के साथ जुड़े दो नाम और सामने आते हैं; पहला गली बल्लीमारान तथा दूसरा गली कासिम जान ! बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर गली कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का.........!

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मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब ! अब इस नाम से कौन वाकिफ़ नहीं है ! इसलिए आज बात करते हैं, इनकी यादों से जुडी उस हवेली की जो आज भी पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक बाज़ार की एक गली बल्लीमारान की एक उप-गली कासिम जान में खड़ी है, जहां इस महान शख्सियत का 1865 से 1869 तक का अंतिम समय गुजरा था। गली बल्लीमारान में दो सौ मीटर जाकर दायें हाथ को आती है गली कासिम जान, इसमें मुड़ते ही तीसरा या चौथा मकान है---ग़ालिब की हवेली । हालाँकि ग़ालिब यहाँ किराये पर ही रहते थे, लेकिन इस मकान का एक हिस्सा सरकार ने लेकर एक संग्राहलय बना दिया है।   



जब किसी ख़ास स्मारक इत्यादि की बात होती है तो अनायास ही उससे जुड़े स्थानों या जगहों के बारे में जानने की जिज्ञासा भी उत्पन्न हो ही जाती है। अब चाँदनी चौक जैसी मशहूर जगह को छोड़ दें तो इस इमारत से जुड़े दो नाम सामने आते हैं; पहला बल्लीमारान तथा दूसरा कासिम जान। बल्लीमारान के बारे में तो ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी और पता चल गया कि शाही किश्तियों के खेवनहार को बल्लीमार कहते थे इसीलिए उनकी रहने की जगह बल्लीमारान के रूप में जानी जाने लगी। पर कासिम जान के बारे में पता नहीं चल पा रहा था कि वह कौन था जिसके नाम से इस गली का नामकरण हुआ ! नाम से भी साफ़ जाहिर नहीं हो पा रहा था कि यह पुरुष का नाम है या किसी महिला का ! काफी खोजबीन के बाद यह जानकारी हासिल हुई कि ये जनाब 1750 के दौरान लाहौर के गवर्नर मोईन-उल-मुल्क की कचहरी के एक मुलाजिम थे, जो 1750 में दिल्ली आ कर शाह आलम द्वितीय की कचहरी में काम करने लगा। जल्दी ही उसके काम से खुश को उसे नवाब की पदवी तथा रहने को लाल किले के पास बल्लीमारान में जगह दे दी गयी। उसी के नाम से उस गली का नाम गली कासिम जान पड गया। उसने वहां एक मस्जिद का निर्माण भी करवाया जिसे ''कासिम खानी मस्जिद'' के नाम से जाना जाता है। इन्हीं कासिम जान के एक भाई आरिफ जान के लड़के इलाही बख्श जान की लड़की उमराव बेगम के साथ ग़ालिब का निकाह हुआ था। 







ग़ालिब के अंतिम दिनों की गवाह यह हवेली वर्षों तक गुमनामी में रही, लोगों ने उसे हथिया कर घर-दुकानें बना लीं। फिर गुलज़ार जी जैसे कुछ लोगों के प्रयास और सरकार की कोशिश से लोगों को हटाया गया और इसे ग़ालिब संग्रहालय का रूप दे, ग़ालिब के जन्म दिन 27 दिसंबर 2000 पर अवाम को समर्पित कर दिया गया। कोशिश यही रही कि संग्रहालय का रूप-रंग-माहौल अपने वास्तविक रूप में ही नज़र आए। हालांकि अभी हवेली का एक ही हिस्सा अवाम के लिए उपलब्ध है पर उसके रख-रखाव पर कोई कोताही नहीं बरती जाती है, दर्शक अभी भी लखौरी ईटों, बलुए पत्थर के फर्श, लकड़ी के दरवाजे-छज्जों को देख, अपने आप को उस बीते समय से जुड़ा पाता है। 



शायर से जुडी वस्तुएं, उनके हस्तलिखित पत्र, दीवान, उनके फोटो, किताबें यहां सुरक्षित रख प्रदर्शित की गयी हैं। इसी के साथ उनकी एक प्रतिकृति भी देखने को मिलती है जिसमें वे हाथ में हुक्का थामे बैठे हुए दिखते हैं। उसी के साथ ही उनके रोजमर्रा के काम आने वाले बर्तन भी प्रदर्शित हैं। दीवारों पर भी उनके विशाल चित्रों के साथ उनकी शायरी उकेरी गयी है। वातावरण पूर्णतया शांत है। सुरक्षा हेतु एक सुरक्षा कर्मी भी तैनात है जो आप अकेले हों तो आपकी फोटो लेने में भी सहायता करता है। 







कई बार जानकारी होने के बावजूद विभिन्न कारणों से हम ऐसी जगहों पर जा नहीं पाते पर कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी धरोहरों को हम तो देखें ही आज की पीढ़ी को भी इनसे अवगत कराएं। 

सोमवार, 8 अप्रैल 2019

चांदनी चौक का गौरी शंकर मंदिर

संगमरमर की सीढ़ियों और खूबसूरती से उकेरे गए खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी का आसन नज़र आता है जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी गयी हैं।अंदर गर्भगृह में शिवलिंग के पीछे चांदी के छतर के नीचे  शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है..........!

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दिल्ली का चांदनी चौक, जो देश के प्रमुख और पुराने बाजारों में से एक तो है ही, वहां की इमारतों, भवनों व पूजा स्थलों का भी अपना समृद्ध इतिहास है। ऐसा ही एक शिव मंदिर, जो गौरी-शंकर मंदिर के नाम से प्रसिद्द है, लाल किले के सामने बाजार की शुरुआत पर दिगंबर जैन लाल मंदिर और गुरुद्वारा शीशगंज के बीच जैन मंदिर से लगा हुआ, स्थित है। माना जाता है कि तकरीबन 800 साल पुराना यह मंदिर शैव सम्प्रदाय के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है।  इस मंदिर को ''कॉस्मिक पिलर'' या पूरे ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है। इसका निर्माण शिव  जी के परम भक्त  एक मराठा सैनिक आपा गंगाधर द्वारा करवाया गया था। कहते हैं कि एक युद्ध में उनके प्राणों पर बन आने पर उन्होंने भगवान शिव से अपने प्राणों की रक्षा की विनती की थी। प्रभू की कृपा से जब उनकी जान बच गयी तो पूर्णतया स्वस्थ होने पर उन्होंने 1761 में इस मंदिर का निर्माण करवाया। मंदिर के गर्भ गृह में रजत कलश के नीचे भूरे रंग के शिवलिंग के पीछे कुछ ऊपर चबूतरे पर स्वर्णाभूषणों से सज्जित पूरा शिव परिवार भी स्थापित है। यह देवस्थल शिवजी के अर्द्धनारीश्वर स्वरुप को समर्पित है। 



सफ़ेद संगेमरमर से निर्मित इस मंदिर की छत को पिरामिड जैसा रूप देते हुए कोणीय आकार में बनाया गया है। 1959 में सेठ जयपुरा द्वारा इसका पूर्णोद्धार करवाया गया। इसकी बाहरी परत को चमकीले सफ़ेद रंग से रंगा गया है जिससे यह दूर से ही अवलोकित होने लगता है। वर्षों पहले जब यहां बियाबान था तब पांच पीपल के वृक्षों के बीच इस स्वयंभू शिवलिंग को देखा गया था। पास ही यमुना जी बहती थीं उसी से इनका अभिषेक हुआ करता था। ऐसी धारणा चली आ रही है कि यहां जो कोई भी पारिवारिक सुख-शान्ति, स्वास्थ्य या संतान प्राप्ति के लिए प्रभू की शरण में आ सच्चे मन से प्रार्थना करता है उसकी मनोकामना गौरी शंकर वैसे ही पूरी करते हैं जैसे उन्होंने अपने भक्त आपा गंगाधर की करी थी। 


मंदिर जमीं से कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है शायद वहाँ कोई टिला हुआ करता होगा। संगेमरमर की सीढ़ियों और नक्काशीदार खंभों को पार कर जैसे ही मंदिर में प्रवेश करते हैं तो सामने ही चांदी की छरी के नीचे रजत पात्र से लिपटे भूरे रंग के शिवलिंग के दर्शन होते हैं। उसके पीछे कुछ ऊंचाई पर चबूतरे नुमा जगह पर चांदी के छतर के नीचे शिव-पार्वती जी की स्वर्णाभूषणों से सज्जित मूर्तियां हैं। जिनके साथ ही कार्तिकेय और गणेश जी भी स्थापित हैं। सब कुछ इतना भव्य और सुंदर है कि दर्शनार्थी विमुग्ध हो कर रह जाता है। मंदिर के पीछे बड़े हॉल में ''भगत स्वरुप ब्रह्मचारी जी'' का आसन नज़र आता है, जिन्होंने अपने जीवन के पचास साल इस मंदिर की सेवा करते हुए गुजारे थे। उनकी फोटो और चरण पादुकाएं अभी भी लोगों के दर्शनों के लिए रखी हुयी हैं। उसी के पीछे कांच के बने एक कक्ष में शिव जी की आदमकद प्रतिमा रखी हुई है जिसके बाहर पीतल के बने नंदी विराजमान है। जैसा कि बताया जाता है कि स्वयंभू शिवलिंग पांच पीपल के पेड़ों के बीच मिला था तो वे पांचों पेड़ अभी भी परिसर में खड़े हैं। गौरी शंकर जी की प्रतिमाओं के अलावा प्रमुख देवी-देवताओं के पूजास्थल भी बने हुए हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि बाहर से अंदाज नहीं होता पर अंदर विशाल खुले-ख़ुले माहौल में बहुत कुछ देखने के लिए उपलब्ध है।



हालांकि दिल्ली वासियों के लिए चांदनी चौक का बाज़ार एक अपरिहार्य जरुरत है पर अधिकांश लोग इस मंदिर और इसके इतिहास के बारे में अनभिज्ञ ही हैं। तो यदि आप अभी तक दिल्ली में रहते हुए भी यहां नहीं गए हैं तो अगली बार जब भी चांदनी चौक जाना हो तो कुछ समय निकाल  भगवान गौरी शंकर के इस मंदिर में दर्शन लाभ का आनंद जरूर लें।  

शनिवार, 6 अप्रैल 2019

दिल्ली की गली बल्लीमारान, जहां बल्लीमार रहा करते थे

उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह.......! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
जैसे हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है वैसे ही हमारे शहरों, कस्बों, जिलों, गली-खेड़ों के नाम भी विचित्र संज्ञाओं से विभूषित हैं। वहां रहने वाले तो उस नाम के आदी हो चुके होते हैं पर नवांगतुक उन्हें पहली बार सुन कर एक बार तो सोच में पड़ ही जाता है कि यह क्या नाम हुआ ! जैसे दिल्ली को ही लें ! पुरानी दिल्ली जो कभी राजसी शानो-शौकत का प्रतीक थी आज बेतरतीब बसाहट की वजह से गलियों का मकड़जाल बन कर रह गयी है। इसकी अंतहीन गलियां, गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। इन गलियों के कूचे-कटरों की भूल-भुलैया में घूमते हुए उनके ऐसे-ऐसे नाम सुनने को मिलते हैं कि दिमाग चकरघिन्नी बन जाता है। सूई वालान, नाई वालान, बल्ली मारान, चूड़ीवालान, दरीबा कलां, कूंचा सेठ, गली पीपल वाली, माता गली, गली कासिमजान, जोगीवाड़ा, मालीवाड़ा, गली गुलियांन, कटरा नील, खारी बावली, गली परांठे वाली, छत्ता शाहजी आदि,  आदि, आदि ! यदि ऐसी जगहों और उनके नामों पर शोध किया जाए तो एक भारी-भरकम ग्रंथ ही बन जाएगा ! आज ऐसी ही एक जगह की चर्चा जिसका नाम सुन कर तो ऐसा लगता है जैसे कोई लठ्ठ मारने  को तैयार बैठा हो ! बल्लीमारान !

देश का सबसे मशहूर बाजार, चाँदनी चौक ! यहीं फतेहपुरी से कुछ पहले बायीं ओर एक चौड़ी सी गली पड़ती है जिसका नाम है बल्लीमारान ! आज अपने चश्मों और मोजडियों के कारण विख्यात इस इलाके का वास्ता कभी देश की मशहूर शख्सियतों के साथ रहा था। जिनमें सबसे प्रमुख तो चचा ग़ालिब हैं। जिनकी हवेली आज भी इसकी एक उप-गली कासिमजान में देश-विदेश के शेरो-शायरी की समझ रखने वाले कद्रदानों के आकर्षण का केंद्र है। इसके साथ ही अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। इनके अलावा हाकिम अजमल ख़ाँ, मोहम्मद अल्ताफ हुसैन "हाली", ग़ुलज़ार साहब तथा एक तरह से मशहूर फ़िल्म पटकथा लेखक, निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाता भी यहां से जुड़ता है क्योंकि वे मो. अल्ताफ हुसैन जी के पोते थे। इसकी आज की हालात को देख कौन कह सकता है कि कभी यह जगह अदब का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था !



अब इसके नामकरण की बात ! जब सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां ने चाँदनी चौक बनवाया तो उसके बीचो-बीच लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक बड़ी सी नहर का निर्माण भी करवाया। जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से शीशे की तरह जगमगा कर एक अलग ही लोक का नजारा पेश किया करता था। उसी स्वप्न लोक का आनंद लेने के लिए शाम के वक्त शाही परिवार और अमीर-उमरा अपनी-अपनी कश्तियों में वहां सैर कर वक्त गुजारते थे। जिसके लिए देश के बेहतरीन नाविकों को यहां काम मिलता था। उस समय कश्तियाँ चप्पू के बजाय बल्लियों की सहायता से खेयी जाती थीं। आज भी बंगाल-असम जैसे इलाकों में नावों को दिशा देने के लिए बल्लियों का सहारा लिया जाता है। बल्ली को कुशलता पूर्वक उपयोग करने वाले को बल्ली मार कहा जाता था। चूँकि वे लोग शाही परिवारों और उच्च वर्ग की नाव खेते थे इसलिए उनका उस जमाने में अच्छा रसूख हुआ करता था। इसी कारण उन्हें उस जमाने के ''पॉश'' इलाके में रहने की जगह प्रदान की गयी थी। उन्हीं के काम के नाम पर उस जगह का नाम बल्ली मारान पड़ गया यानी बल्ली मारने वालों की जगह। अब ना तो कोई नहर है, ना कश्ती और नाहीं बल्लीमार वक्त की आंधी ने सब कुछ बदल कर रख दिया है आज उस तंग सी जगह में सायकिल, रिक्शा, ठेला, स्कूटर, मोटर सायकिल सब ठूंसे पड़े हैं पर अपने-अपने इत्मीनान में ! कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता, इसकी ऐतिहासिकता, जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! इसी कारण अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा, कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं।   

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