शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

बंटती थीं खुशियां दिवाली पर

माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था    
      
जब भी कोई त्योहार आता है तब-तब उससे जुडी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अभी दो-एक दिन के बाद दीपावली आ रही है इसके साथ ही उससे जुडी दशकों पहले की बचपन की यादों ने ताजा-तरीन हो महकना शुरू कर दिया है। जो सबसे पुरानी बातें याद आ रही है वह शायद पचास एक साल पहले की हैं।

बाबूजी (मेरे पिताजी) तब के कलकत्ता के पास एक उपनगर, कोन्नगर, की एक जूट मिल में कार्यरत थे। मिल के स्टाफ में हर प्रांत के लोग थे, मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, बंगाली, बिहारी, ओड़िया, मद्रासी (तब भारत के दक्षिण हिस्से से आने वाले को सिर्फ मद्रासी ही समझा और कहा जाता था) भाषा-रिवाज अलग होने के बावजूद किसी में कोई भेद-भाव नहीं था। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई जाति-भेद नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। मुख्य त्योहार होली और दिवाली ऐसे मनाए जाते थे जैसे एक ही परिवार उन्हें मना रहा हो।  

हमारे परिसर में तीन बंगले थे, जिनमें हमारे अलावा दो गुजराती परिवार थे। मैं उन्हीं के परिवार का अंग बन गया था इसीलिए मेरा पहला अक्षर ज्ञान गुजराती भाषा से ही शुरू हुआ था। बाकी के स्टाफ के लिए कुछ दूरी पर क्वार्टर बने हुए थे, दोनों रिहायशों के बीच बड़ा सा मैदान था, जो खेल-कूद के साथ-साथ पूजा वगैरह और त्योहारों की गतिविधियों के काम भी आता था। दिवाली के पहले धनतेरस को ही कलकत्ता से मिठाई और ढेर
सी, बड़ा सा टोकरा भर कर, आतिशबाजी मेरे लिए आ जाती थी। वैसे  कहने को सारे पटाखे-फुलझड़ियाँ इत्यादि मेरे लिए ही होते थे, पर माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था। आज भी किसी को कुछ देकर मिलने वाली ख़ुशी पाने की आदत के बीज शायद बचपन से ही पड़ गए थे। इस में मेरे बाबूजी का बहुत बड़ा योगदान था। मैंने जब से होश संभाला तब से ही उन्हें दूसरों के लिए कुछ न कुछ करते ही पाया,  वह भी चुपचाप बिना किसी तरह का एहसान जताए। खुद सादगी और किफायती रहने के बावजूद अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों को कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया। वे भी उन्हें सदा पिता समान मानते रहे। वैसे भी परिवार के सदस्य हों या फिर दोस्त, मित्र या जान-पहचान वाले, कोई भी कभी भी उनके पास से खाली हाथ नहीं गया था। इसके साथ ही एक और
खासियत, जिसने मेरे गहरी छाप छोड़ी वह थी उनकी ईमानदारी, जिस पोस्ट पर वह थे वहां पर ईमान डगमगाने के अनेक बहाने और अवसर  आते रहते थे पर उनका मन कभी भी नहीं डोला, दो-तीन वाकये तो मेरे सामने ही घटित हुए जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। उनको यह संस्कार मेरी दादी जी यानी उनकी माँ से मिले थे जिन्होंने अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए जेल में अपनी आँखें गवां दी थीं पर एवज में सरकार से कभी कुछ नहीं चाहा।  बात कहाँ की थी कहाँ पहुँच गयी। पर आज जब लोगों को सिर्फ मैं, मेरा, मेरे, करते पाता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या वैसे लोग भी थे, जो सिर्फ दूसरों का सोचते थे ! यदि वे बिल्कुल मेरे ना होते तो शायद विश्वास भी ना होता ऐसी बातों पर !!

चलिए लौटते हैं वर्तमान में क्योंकि रहना तो इसीमें है ! शुभ पर्व दिवाली की आप सभी मित्रों,  अजीजों को सपरिवार शुभकामनाएं। 

सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

दिल्ली की गलियां, एक अजूबा

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां

भले ही नई दिल्ली में सब कुछ मिलने लगा हो, दरों में भी पुरानी दिल्ली के थोक बाजार से ज्यादा फर्क ना हो फिर भी अधिकांश खासकर एक पीढ़ी पहले के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरानी दिल्ली का
रुख जरूर करते हैं, खासकर तीज-त्योहार के मौसम में। भीड़-भाड़, तंग रास्तों, समय की खपत के बावजूद वहां से सामान लाने पर एक अजीब सा संतोष और सुख सा महसूस किया जाता है।   

पुरानी दिल्ली का बाजार यानी की चाँदनी चौक ! सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां द्वारा बसाया गया, देश के सबसे पुराने थोक बाज़ारों में से एक। चांदनी चौक नामकरण के पीछे दो मत हैं, पहले लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक नहर हुआ करती थी जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से जगमगा उठता था इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा दूसरा यह कि यह बाजार अपने चांदी के व्यवसाय के कारण प्रसिद्ध था, वही चांदी धीरे-धीरे बदल कर चांदनी हो गयी।  

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। वक्त की आंधी ने चाहे कितना कुछ बदल कर रख दिया हो पर अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा और कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं !    

हर गली का अजूबा सा नाम, अपना इतिहास, अपनी पहचान, अपनी खासियत। हर गली पटी पड़ी तरह-तरह
की छोटी-बड़ी दुकानों से। चलाते आ रहे हैं लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने व्यवसाय को एक ही जगह पर। दुकानों में कोई बहुत ज्यादा बदलाव भी नहीं आया है सिवाय पीढ़ी के साथ बदलते काम संभालने वालों के व्यवहार में। दिल्ली के बाहर से आने वाले की तो छोड़ें खुद दिल्ली वाले भटक जाते हैं इन कुंज गलियों में। लखनऊ का भूल-भुलैया भी इनके सामने पनाह मांग ले। तीज-त्योहार तो छोड़ ही दें आम दिनों में भी कंधे से कंधा भिड़े बिना यहां चलना मुश्किल होता है। तिस पर उसी में सायकिल भी, रिक्शा भी, ठेला भी, स्कूटर और मोटर सायकिल भी पर सब अपने-अपने इत्मीनान में ! 

कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसकी ऐतिहासिकता, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! 

जौक़ यूं ही तो नहीं फर्मा  गए होंगे,   

इन दिनों गरचे दक्खन मैं हैं बड़ी क़द्र ऐय सुखन, 
कौन जाये ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियां छोड़ कर।   

सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

#करवा चौथ, चश्मा बदलने की जरुरत है

करवा चौथ के व्रत की  हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, दृढ प्रतिज्ञ, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने का साहस रखने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है 

करवा चौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार। जिसमें पत्नियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए दिन भर कठोर उपवास रखती हैं। यह खासकर उत्तर भारत में खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम के प्रतीक का एक त्योहार। सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-
झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर मनाया जाने वाला एक छोटा सा उत्सव।

इसकी शुरुआत को पौराणिक काल से जोड़ा जाता रहा है। इसको लेकर कुछ कथाएं भी प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।

कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है।उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी।पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दे दी गयी है।  

पर आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज
द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं।उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।

पर आज सोची-समझी साजिशों के तहत हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। रही सही कसर पूरी करने को "बाजार" उतारू है जिसने इस मासूम से त्यौहार को भी एक फैशन का रूप देने के लिए कमर कस ली है। आज समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों  उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें।

शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर पहला "कैथेड्रल" कलकत्ता में बना था

कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है

कई बातों में पहला स्थान रखने वाले महलों के शहर कलकत्ता (आज का कोलकाता) में ही सर्वप्रथम क्रिश्चियन समुदाय द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर 1847 में पहले "कैथेड्रल" की स्थापना की गयी थी। जिसे "सेंट पॉल कैथेड्रल" के नाम से जाना जाता है। गोथिक शैली में बनी इस इमारत के निर्माण में करीब आठ साल लगे थे। यह बंगाल का सबसे बड़ा कैथेड्रल तो था ही बिशप द्वारा संचालित एशिया का पहला चर्च भी था जिसे भारत में बढ़ते क्रिश्चियन समुदाय को मद्देनज़र रख, इसी जगह स्थित छोटे आकार के सेंट जॉन चर्च को हटा, बनाया गया था।


चर्च और कैथ्रेडल में यही अंतर है कि कैथ्रेडल आकार में बहुत बड़ा होता है और बिशप द्वारा संचालित किया जाता है। बिशप का निवास भी ज्यादातर वहीँ होता है। वहीँ चर्च पादरी की देख-रेख में अपना काम करता है। भारत का सबसे पुराना चर्च, "सेंट थॉमस सायरो मालाबार कैथोलिक चर्च" है, जो केरल के त्रिचूर जिले के पालायूर इलाके में स्थित है। इसका निर्माण 52 AD के आस-पास का माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहीं से धर्म परिवर्तन की शुरुआत भी हुई थी। 
   
सेंट पॉल कैथेड्रल की सुंदर इमारत कलकत्ता के इकलौते हरे-भरे स्थल "मैदान" के दक्षिणी और विश्वप्रसिद्ध "विक्टोरिया मेमोरियल" की पूर्वी दिशा की तरफ स्थित है। इसी के कारण इसके सामने वाली सड़क का नाम भी कैथेड्रल रोड रखा  गया है। करीब सात एकड़ में बने इस कैथ्रेडल में हजार लोग एक साथ खड़े हो प्रार्थना कर सकते हैं। कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

दंड भी दोषी को ही मिलना चाहिए

सरहद पार से आने वाले और उनको लाने वालों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। नाही वहाँ से आने वालों का स्तर संजीव कुमार, दिलीप कुमार या बलराज साहनी जैसा है, नाही उनको लेकर फिल्म घड़ने वाले राज कपूर या ऋषिकेश मुखर्जी हैं। ये लोग सिर्फ मौकापरस्त हैं 

देश कुछ लोगों की हठधर्मिता या कहिए अज्ञानतावश अजीब पेशोपेश में पड़  एक दोराहे पर आन खड़ा हुआ है। जबकि हमारी संस्कृति, हमारी परंपराओं, हमारी नैतिकता, हमारी सहिष्णुता, हमारे आचरण ने सदा हाथ फैला देशी-विदेशी हरेक का स्वागत किया है। हमारा धर्म इसी लिए सनातन है क्योंकि उसमें हरेक को अपने में समो लेने की विशेषता रही है। बाहर से आने वाले भी हमारे समाज रूपी दूध में शक्कर की तरह घुल-मिल कर यहीं के हो रह लिए। उनका धर्म, भाषा भले ही अलग थीं पर उनका योगदान हमारे समाज के लिए सदा लाभदायक रहा।    
 
बेल्जियम के कामिल बुल्के ने रामायण पर शोध ग्रन्थ, "रामकथा : उत्पत्ति और विकास" लिख यह पहली बार साबित किया कि रामकथा केवल भारत की ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय कथा है। रसखान जिनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था, उनकी कृष्ण भक्ति पर तो क्या प्रभू की जन्म भूमि के प्रति लगाव भी एक मिसाल है। रहीम, कबीर, फरीद कितने नाम गिनाए जाएं ! कहते हैं गामा पहलवान को दैवीय शक्तियों का आशर्वाद प्राप्त था। प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान पर हनुमान जी की कृपा थी। संगीतकार नौशाद माँ सरस्वती की आराधना करने के बाद ही काम पर जाते थे। राही मासूम रज़ा ने लोकप्रिय टी वी सीरियल का कथानक बुना, संजय खान ने हनुमान जी पर सीरियल बनाया, देश की उन्नति में डाक्टर कलाम का योगदान क्या कभी भुलाया जा सकता है ?  ये तो खैर नाम-चीन हस्तियां हैं, जन साधारण में भी ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जो हमारे देवी-देवताओं में आस्था और भक्ति रखते हैं। जैसे कोलकाता के एक इलाके धापा में चीनी लोग माँ काली की पूजा करते हैं। राम लीला में साज-सज्जा और रावण-मेघनाद इत्यादि के पुतले बनाने में कई मुस्लिम परिवारों का योगदान रहता है। 

आजकल के माहौल को देखते हुए सोचना यह है कि हमें किससे नफ़रत करनी है, कर्मों से या नामों से। यदि कोई हमारी पौराणिक कथाओं में आस्था रखता है, पूरे मनोयोग, पाक-साफ़ इरादों से उन पर मंचित नाटकों में भाग लेना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है ? उल्टे हमें तो ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो हर तरह के डर या बन्दिशों को धत्ता बता ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आगे आते हैं। उन्हें ही यदि हम दुत्कारेंगे तो उनके मन में वही सब बातें जड़ें ज़माना शुरू कर देंगी जिन्हें हमें समूल नष्ट करना है। एक तरफ तो हम चाहते हैं कि यहां रहने वाले देश के प्रति वफादार रहें दूसरी तरफ उनका अपमान करने से भी पीछे नहीं रहते ! प्रतिरोध तो हमें उनका करना है जिनकी नापाक नज़र हमारी धरती पर है। उनके मंसूबों को ख़त्म करना है जिनका मजहब सिर्फ दहशतगर्दी है। उनको मुंह तोड जवाब देना है जो हमारी शान्ति-प्रियता को हमारी कमजोरी समझ बैठे हैं।

बहार से आए हर गुणी का हमारे यहां स्वागत है। पर फिलहाल सरहद पार के खिलाड़ियों और कलाकारों पर बन्दिश लगाना सही साबित हो सकता है। इससे वहाँ के लोगों में अपनी सरकार के तथा उसकी कार्यप्रणाली के प्रति असंतोष उत्पन्न होगा। साथ ही वहाँ से आने वाले और उनको लाने वालों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। नाही वहाँ से आने वालों का स्तर संजीव कुमार, दिलीप कुमार या बलराज साहनी जैसा है, नाही उनको लेकर फिल्म घड़ने वाले राज कपूर या ऋषिकेश मुखर्जी हैं। ये लोग सिर्फ मौकापरस्त हैं। 

कभी - कभी तो आशंका होने लगती है कि कहीं रफ़ी के गाये भजनों को भी बैन करने की बात न उठने लगे क्योंकि ऐसे लोगों को नहीं पता कि जिन बाइकों पर सवार हो वह गैर जिम्मेदाराना हरकतें करते हैं उसका ईंधन कहाँ से आता है ! यदि सिर्फ अपने अहम् की तुष्टि के लिए बैन-बैन-बैन की रट लगी रही तो इधर-उधर कहीं से कुछ भी बैन हो सकता है। समय आ गया है कि हर दल के जिम्मेदार अगुआ अपने मतलब से ऊपर उठ देशहित की सोचें और आजकल घटती घटनाओं को रोकने में गंभीरता से पहल करें। देश ऐसे कई भस्मासुरों से अतीत में खासा नुक्सान उठा चुका है।   

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

सुपर ट्रेनों में बढती टिप की बिमारी

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें

कुछ ट्रेनों में जिनमें खान-पान की सुविधा का मूल्य टिकट के साथ ही ले लिया जाता है, जैसे #राजधानी एक्स. में, उनमें सफर के ख़त्म होने के समय #कैटरिंग स्टाफ द्वारा #टिप लेने का चलन काफी दिनों से चला आ रहा है। हालांकि नाश्ते-भोजन का खर्च टिकट के साथ ही ले लिया जाता है यह जानते हुए भी यात्री की मन:स्थिति यात्रा के दौरान भोजन इत्यादि पर कुछ खर्च न होने और नम्रता पूर्वक की गयी त्वरित सर्विस के कारण वह 25-50 रुपये दे ही देता है। हालांकि पचासों वादों के बाद भी भोजन की गुणवत्ता जस की तस है। अब तो लोग तंग आ कर भोजन की सुविधा प्रदान करने वाली गाड़ियों में भी घर का खाना ले चलने लगे हैं। हाँ नाश्ते वगैरह को ठीक-ठाक कहा जा सकता है।  
पहले क्या होता था कि जिसने जो भी दे दिया कैटरिंग स्टाफ का मुखिया उसे चुप-चाप स्वीकार कर लेता था।पर आसानी से मिलती ढेर सी राशि को देख इनका लालच भी बढ़ने लगा है और अब ये अपनी मांग रखने लगे हैं। अभी सितंबर माह की बीस तारीख को "रायपुर राजधानी" के मेरे कोच में सिर्फ आठ-दस यात्री ही थे। सुबह दुर्ग के बाद जब वेटर के मांगने पर मैंने उन्हें टिप दी तो वे बोले, सर कुछ और दीजिए, देखिए ना आज तो कितने कम पैसेंजर हैं। जैसे यात्री कम होना भी मेरी गलती हो ! जैसे-तैसे वेटर गए तो सफाई वाला आ खड़ा हुआ कि मैं कल से सेवा कर रहा हूँ, कुछ दीजिए !! वही दृश्य जब तीन अक्टूबर को लौटना हुआ तो फिर दोहराया गया !!! जैसे ये लोग अपनी ड्यूटी न कर सिर्फ  मेरी सेवा कर रहे हों !! आदमी भले ही अपनी ख़ुशी से कुछ दे दे, पर माँगने से कोफ़्त होना स्वाभाविक है।  

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें। सरकार ने तो अपने हाथ खिंच कर सब कुछ प्रइवेट कंपनियों को सौंप दिया है। जिनका ध्येय ही है किसी न किसी तरह ज्यादा से ज्यादा कमाई करना। वे तो कमा ही रहे हैं उनके  मातहतों ने भी, यात्रियों को बकरा बना, अतिरिक्त कमाई का जरिया खोज निकाला है। समय रहते यदि इस पर अंकुश नहीं लगता है तो मांग तो बढ़ेगी ही, हो  सकता है कुछ ना देने वाले के साथ बदसलूकी की घटनाएं भी आम हो जाएं।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

सत्ता की भूख ने उघाड़े चेहरे

कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी।  उसमें एक बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए  


अभी तक कुछ गिने-चुने ऐसे संस्थान बचे हुए हैं जिनका क्रिया-कलाप तथा दामन, इक्की-दुक्की घटनाओं के बावजूद पाक-साफ़ माना जाता है।       देश की जनता का जिन पर अटूट विश्वास और  श्रद्धा है।    इनमें हमारे वैज्ञानिक, न्यायालय तथा फ़ौज सर्वोपरि हैं। ऐसी धारणा है कि इनका हर कदम देश हित के लिए ही उठता है।पर इन दिनों सत्ता के लोभियों ने  जनता  के विश्वास    को डांवाडोल कर दिया है। अपने छुद्र स्वार्थ,   ओछी- राजनीति, तथा आकाओं की नज़र में बने रहने के लिए ऐसे लोग, जिनका अपना ना कोई आधार होता है नाही कोई पहचान, अपनी कमियों, अपनी खामियों को ढकने के लिए दूसरे दल   के हर   कदम या फैसले को गलत साबित करने के लिए किसी भी हद  तक चले जाते हैं। ऐसे मंदबुद्धि लोग जिसके इशारे पर ऐसा करते हैं उसको कोई कुछ नहीं कहता क्योंकि वह तो परोक्ष में बैठा है, लानत-मलानत इन छुट्भइयों की होती है मजे की बात यह है कि इनका दल भी इनके व्यक्तव्य को इनकी निजी राय बता पल्ला झाड़ लेता है और ये मुंह बाए बगलें झांकते रह जाते हैं।

अभी हुई हमारी सेना की कार्यवाही भी इन मूढ़मतियों के बयानों के दायरे में आ गयी। आश्चर्य होता है कि हमने कैसे-कैसे लोगों को कैसी-कैसी जिम्मेदारियां सौंप अपनी और देश की बागडोर थमा दी है, जिन्हें संभालना तो दूर वे तो उसका नाम लेने लायक भी नहीं हैं ! उन्हें समझ ही नहीं है कि वे क्या बोल, कर या चाह रहे हैं ! ना उन्हें, ना उनको उकसाने वालों को अंदाजा है कि उनकी नासमझी संसार में हमारी क्या तस्वीर पेश करेगी !  उनके ऐसे अमर्यादित बयानों से सेना के जवानों पर क्या असर पडेगा ! वह तो शुक्र है कि हमारी सेना इतनी संयमित और समझदार है कि वह ढपोरशंखों की आवाज और उनकी मंशा समझती है। पर आज यह जरूरी हो गया है कि ऐसे तिकडमी लोगों की नकेल ऐसे कसी जाए जिससे ये लोग न्यायालय की अवहेलना या फ़ौज की शूरवीरता पर सवाल उठाने की जुर्रत ही न कर पाएं।  

ऐसे माहौल में किसी फिल्म की बात करना मौके की गंभीरता को कम करना लग सकता है पर यह बात सामयिक है। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी। फिल्म कैसी थी, अच्छी थी, बुरी थी, मुद्दा यह नहीं है, बात यह है कि उसमें भी एक ऐसे ही बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए।