मंगलवार, 30 अगस्त 2016

जब हनुमान जी को राम जी के विरुद्ध खड़ा होना पड़ा

जब गुरु विशिष्ट को यह घटना मालुम पड़ी तो उन्होंने ऋषि विश्वामित्र को समझाया कि आपके क्रोध से पता नहीं आज कैसा अनर्थ हो जाता। आपने तो भक्त और भगवान् को ही आमने-सामने खड़ा करवा दिया था। विश्वामित्र जी को भी अपनी भूल का एहसास हुआ उन्होंने विशिष्ट जी से क्षमा  मांगते हुए  राम जी से अपना वचन वापस ले लिया

हमारे ग्रन्थों-पुराणों में जो कथा-कहानियां कही-बताई गयीं हैं, उनमें भगवान् की लीलाओं का वर्णन है जो किसी ना किसी प्रयोजनवश रचाई गयी होती हैं और अपने-आप में गूढार्थ समेटे रहती हैं। नहीं तो कोई सोच तो क्या कल्पना भी नहीं कर सकता कि हनुमान जी जैसे भक्त-शिरोमणि, खुद राम के ह्रदय समान, विनयशील, पूर्णतया समर्पित भक्त को भी अपने आराध्य, अपने इष्ट के सामने खड़ा होना पड़ा था !  
कथा इस प्रकार वर्णित है कि एक बार राजा शकुंतन शिकार के बाद लौट रहे थे। उनके मार्ग में पड़ने वाले एक आश्रम में गुरु वशिष्ठ, ऋषि विश्वामित्र और अत्रि मुनि यज्ञ कर रहे थे। बाहर से सिर्फ गुरु वशिष्ठ ही नज़र आ रहे थे। राजा को लगा कि मैं शिकार से लौट रहा हूँ, खून-पसीने से  अपवित्र शरीर के साथ यज्ञ में शामिल होना उचित नहीं होगा। यह सोच उसने वहीँ से गुरु वशिष्ठ को प्रणाम किया और आगे बढ़ गया। यह बात नारद जी ने विश्वामित्र जी को बताई कि शकुंतन ने सिर्फ वशिष्ठ जी को प्रणाम किया आपको नहीं। इतना सुनते ही ऋषि विश्वामित्र अत्यंत क्रोधित हो गए और क्रोधवश उन्होंने राम  पास जा अपने अपमान की बात कही और उनसे कहा की सूर्यास्त होने से पहले शकुंतन का कटा हुआ सर मेरे समक्ष होना चाहिए अन्यथा तुम्हे मेरे श्राप का सामना करना पड़ेगा।  
उधर नारद जी ने विश्वामित्र जी के क्रोध की बात शकुंतन को भी बताई और उसे अपनी रक्षा के लिए हनुमान जी की शरण में जाने को कहा क्योंकि उनके अलावा किसी में भी इतना सामर्थ्य नहीं था कि उसकी राम जी से रक्षा कर सके। परन्तु नारद जी को यह भी पता था कि अगर वह सीधे हनुमान जी के पास जाकर राम से अपनी प्राणो की रक्षा के लिए कहेगा तो हनुमान जी उसकी मदद नही करेंगे। इसलिए उन्होंने राजा को पहले हनुमान जी की माता अंजनी के पास जा उनसे बिना पूरी बात बताए अपने प्राण रक्षा का आशिर्वाद लेने को कहा।  शकुंतन ने ऐसा ही किया। जब हनुमान जी को पूरी बात का पता चला तो वे धर्मसंकट में पड़ गए। एक तरफ उनके सब कुछ प्रभू राम थे तो दूसरी तरफ माँ का वचन और उनकी आज्ञा ! पर हनुमान जी से बड़ा
विद्वान और नीतिवान भी कौन था, उन्हें एक युक्ति सूझि, उन्होंने राजा को सरयू नदी के तट पर बैठ राम का नाम जपने को कहा और खुद उसके पीछे छोटा कद बना कर बैठ गए। श्री राम जब शकुंतन को ढूंढते हुए वहां पहुंचे तो उसे अपना ही नाम जपते पाया, श्री राम भी दुविधा में पड़ गए कि अपने भक्त का वध कैसे करें ! ऐसे समय में उन्हें हनुमान जी याद आ रहे थे परन्तु उनका भी कहीं पता नहीं था। हार कर अपने वचनों की रक्षा के लिए राम ने अपने बाणों से शकुंतन पर वार किया पर राम नाम के जप के प्रभाव से उनका कोई असर न होते देख उन्होंने दिव्यास्त्रों का प्रयोग करने की सोची। हनुमान जी ने स्थिति की नाजुकता समझ राजा को सिया-राम उच्चारण करने को कहा। भयभीत राजा ने डर के मारे इस उच्चारण के साथ हनुमान जी का नाम भी जपना शुरू कर दिया। इससे श्री राम के सारे दिव्यास्त्र उन्हीं के नाम के प्रभाव से बेअसर हो गए। राम भी कुछ-कुछ स्थिति को समझ गए थे, उन्होंने बाण चलाना रोक दिया क्योंकि उन्हें वहां हनुमान जी की उपस्थिति का आभास हो गया था सो उन्होंने हनुमान जी को पुकारा, सब कुछ ठीक होता देख हनुमान जी अपने रूप में हाथ जोड़ प्रभू के सामने आ खड़े हुए और सारी बात बताई। राम जी ने प्रसन्न हो उन्हें  अपने गले लगा लिया और कहा कि तुमने आज फिर सिद्ध कर दिया कि स्वयं भगवान से भी बढ़कर ताकत उनके सच्चे भक्त में होती है। 

उधर जब गुरु विशिष्ट को यह घटना मालुम पड़ी तो उन्होंने ऋषि विश्वामित्र को समझाया कि आपके क्रोध से पता नहीं आज कैसा अनर्थ हो जाता। आपने तो भक्त और भगवान् को ही आमने-सामने खड़ा करवा दिया था। विश्वामित्र जी को भी अपनी भूल का एहसास हुआ उन्होंने विशिष्ट जी से क्षमा  मांगते हुए  राम जी से अपना वचन वापस ले लिया और राजा को भी अभय प्रदान कर भय-मुक्त कर दिया।  

सोमवार, 29 अगस्त 2016

श्री कृष्ण-अर्जुन युद्ध

यदि स्वामिभक्ति और सखा प्रेम की बात की जाए तो इनमें सर्वोच्च स्थान राम-हनुमान और श्री कृष्ण-अर्जुन को प्राप्त है। हनुमान जी जैसी निष्ठा और अर्जुन जैसे समर्पण से बढ़ कर और कोई उदाहरण नहीं मिलता। भक्ति और दोस्ती का चरमोत्कर्ष है। पर आश्चर्य की बात है कि पौराणिक कथाओं में इन को भी अपने वचन और धर्म की रक्षार्थ एक दूसरे के विरुद्ध अस्त्र उठाते बताया गया है

हमारे ग्रन्थ, पुराण, काव्य, महाकाव्य सब विभिन्न तरह की रोचक, उपदेशात्मक, मार्गदर्शक, नीतिवान, ज्ञानवर्धक कथाओं से भरे पड़े हैं। पर कहीं-कहीं कुछ ऐसी कथाएं भी मिलती हैं जो रोचक होने के साथ-साथ विस्मयकारी भी होती हैं। ऐसी ही दो कथाएं हैं जिनमें अपने वचन और धर्म को निभाने के लिए भक्त को अपने इष्ट के विरुद्ध, या यूँ कहिए कि आम आदमी को सर्वोच्च सत्ता के सामने खड़ा होने की प्रेणना देती हैं। आज यदि स्वामिभक्ति और सखा प्रेम की बात की जाए तो इनमें सर्वोच्च स्थान राम-हनुमान और श्री कृष्ण-अर्जुन को प्राप्त है। हनुमान जी जैसी निष्ठा और अर्जुन जैसे समर्पण से बढ़ कर और कोई उदाहरण नहीं मिलता। भक्ति और दोस्ती का चरमोत्कर्ष है। पर आश्चर्य की बात है कि पौराणिक कथाओं में इन को भी अपने वचन और धर्म की रक्षार्थ एक दूसरे के विरुद्ध अस्त्र उठाते बताया गया है। आज पहले वह कथा जिसमें अर्जुन को अपने सबसे प्रिय सखा, संरक्षक, मार्गदर्शक, जीवन रक्षक श्री कृष्ण के सामने युद्ध के लिए खड़ा होना पड़ा था।       
एक बार महर्षि गालव जब प्रात: सूर्यार्घ्य दे रहे थे तभी उनकी अंजलि में आकाश मार्ग से जाते हुए चित्रसेन नामक गंधर्व की थूकी हुई पीक गिर गई। इससे मुनि को क्रोध आ गया। वे उसे शाप देना चाहते थे पर अपनी साधना की हानि होने के भय से उन्होंने जाकर भगवान श्रीकृष्ण से सारी बात बता चित्रसेन को दंड देने को कहा। श्री कृष्ण ने भी गंधर्व की धृष्टता को देखते हुए चौबीस घण्टे के भीतर  उसका वध कर देने की शपथ ले ली। कुछ ही देर बाद वहां देवर्षि नारद पहुंच गए और प्रभू को चिंतित देख उसका कारण पूछने पर श्री कृष्ण ने गालव जी के प्रसंग और अपनी प्रतिज्ञा बता दी। अब नारद मुनि ठहरे नारद मुनि उन्होंने यह बात जा कर चित्रसेन को बता अपनी रक्षा का उपाय करने को कहा। उसने हर जगह जा अपनी रक्षा की गुहार लगाईं पर श्री कृष्ण से कौन दुश्मनी मोल लेता।  हार कर वह फिर नारद की ही शरण में आया जिन्होंने उसे सुभद्रा के पास जा, पहले अपनी रक्षा की प्रतिज्ञा करवा तब पूरी बात बताने को कहा। सारी बात जान सुभद्रा धर्मसंकट में पड़ गयी फिर भी उसने  अर्जुन को सारी बात बता दी। भाग्यवश चित्रसेन अर्जुन का भी मित्र था फिर सुभद्रा का वचन पूरा करना था, अर्जुन पेशोपेश में था फिर भी उसने गंधर्व को  बचाना ही धर्मयुक्त समझा। यह बात जान नारद मुनि ने द्वारका जा श्री कृष्ण को सारी वस्तुस्थिति से अवगत करवा दिया। प्रभू ने नारद को फिर एक बार अर्जुन को समझाने के लिए भेजा पर अर्जुन ने सब सुनकर कहा कि मैं हर समय श्रीकृष्ण की ही शरण में हूं, मेरे पास उन्हीं का बल है, पर उनके दिए हुए क्षात्र धर्म के उपदेश के कारण मैं अपनी बात से विमुख नहीं हो सकता। मैं उनके बल पर ही अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा करूंगा। हाँ, प्रभू समर्थ हैं, वे चाहें तो अपनी प्रतिज्ञा छोड़ सकते हैं। देवर्षि ने आ कर फिर सारी बात प्रभू को बताई ! अब क्या था, तुमुल युद्ध छिड़ गया। बड़ी घमासान लड़ाई हुई। पर कोई जीत नहीं सका। अंत में श्रीकृष्ण ने क्रोधित हो सुदर्शन चक्र छोड़ा, इधर अर्जुन ने पाशुपातस्त्र छोड़ दिया। पर प्रलय के लक्षण देखकर अर्जुन को अपनी भूल का एहसास 
 हुआ और उसने भगवान शंकर को स्मरण कर भूल निवारण करने की प्रार्थना की। शिव जी ने दोनों शस्त्रों को रोका और  फिर वे भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और बोले, भक्तों की बात के आगे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाना तो आपका सहज स्वभाव है, ऐसा कई बार  हुआ है। अब इस लीला को यहीं समाप्त कीजिए। प्रभु युद्ध से विरत हो गए। अर्जुन को गले लगाकर उसके घावों को दूर किया तथा चित्रसेन को भी अभय-दान दिया। 

पर गालव ऋषि को यह बात अच्छी नहीं लगी। उनके अपमान का परिमार्जन नहीं हुआ था।  उन्होंने क्रोध में आकर कहा कि मैं अपनी शक्ति प्रकट कर कृष्ण, अर्जुन, सुभद्रा समेत चित्रसेन को भस्म कर दूँगा ! ऋषि के क्रोध से सभी सकते में  आ गए, पर उन्होंने ज्यों ही जल हाथ में लिया, सुभद्रा बोल उठी, मैं यदि कृष्ण की भक्त होऊं और अर्जुन के प्रति मेरा पातिव्रत्य पूर्ण हो तो यह जल ऋषि के हाथ से पृथ्वी पर न गिरे। ऐसा ही हुआ। तब तक गालव ऋषि को भी अपनी भूल समझ में आ गयी थी। उन्होंने प्रभु को नमस्कार कर क्षमा मांगी और अपने स्थान पर लौट गए। 

कल, क्यों हनुमान जी को राम जी के सम्मुख खड़ा होना पड़ा 

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

प्लास्टिक को पहचानें उस पर दिए गए कोड से

आज प्लास्टिक से बनी वस्तुओं को  बिलकुल नकार दिया जाना भी सम्भव नहीं है। पर इनका उपयोग खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए। ज़रा सी टूट-फूट होने के बाद इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।इसकी श्रेणियों में 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनसे बचना या कम उपयोग करना चाहिए ....... 

एक ज़माना था जब हर तरफ कांच का बोलबाला था। हालांकि टीन के डिब्बों-कनस्तरों का भी चलन था पर दूध, पानी, जूस, ठंडे पेय, खाद्य पदार्थ से लेकर दवाऐं, कास्मेटिक आदि का सामान कांच की बोतलों, बर्नियों, शीशियों में ही अधिकतर पाया जाता था। घरों में रसोई या स्नानागारों में काम आने वाले बड़े कंटेनर भी धातुओं के ही हुआ करते थे। फिर समय बदला। लोगों के आम जीवन में प्लास्टिक ने पदार्पण किया और देखते ही देखते उसने समाज के हर हिस्से पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। इसका सबसे बड़ा कारण इसका मजबूत होने के बावजूद हल्का, लचीला, टिकाऊ, कम टूट-फूट वाला, जंग-मोर्चे से दूर, नमी तथा केमीकल रोधक,  साफ़ करने में आसान और सबसे बड़ी बात सस्ता होना था। आज इसे अपने आस-पास, घर-दफ्तर सभी जगह देखा-पाया जा सकता है। फिर चाहे हमारे खाने-पीने का सामान हो, पहनने-सोने का सामान हो, काम में आने वाला सामान हो, खिलौने, कंप्यूटर, फोन, चम्मच-प्लेट, हमारे दांत, चश्मा तथा उसके लेंस यहां तक कि हमारे शरीर के अंदर धड़कने वाला दिल भी इसी से बनने लगा है। 

पर इसके अनगिनत फायदों के साथ ही इसके कुछ नुक्सान भी हैं। जैसे इसके नष्ट न होने के गुण के कारण यह पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित होता है। घटिया प्लास्टिक का उपयोग विभिन्न रोगों और बीमारियों को बुलावा देना है। खासकर यह बच्चों के लिए बहुत हानिकारक होता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रख सोसायटी आफ ऑफ द प्लास्टिक इंडस्ट्रीज ने इस वस्तु की ग्रेडिंग कर इसे ग्रेड के अनुसार चिन्हित कर दिया है। इन चिन्हों में घडी की दिशा में मुड़े तीन तीरों से बने त्रिभुज के बीच लिखे गए अंकों से उसके स्तर का पता चल जाता है, जिससे जाना जा सकता है कि इस्तेमाल किया जाने वाला आइटम कितना सुरक्षित है। इन्हें 1 से 7 तक के नम्बर दिए गए हैं जिनसे प्लास्टिक के स्तर के साथ-साथ निम्नलिखित बातों की जानकारी भी मिलती है -

1.  Plastic-recyc-01.svgइस चिन्ह वाला प्लास्टिक शीतल पेय, पानी और द्रव्य रखने की बोतलें, मक्खन और जैम के जार इत्यादि के बनाने में काम में लाया जाता है। यह एक बार में काम में लाने के लिए बेहतर होता है। इसे गर्म नहीं करना चाहिए। काफी समय से काम में ना लाई गयी बोतल या डिब्बा भी खतरनाक हो सकता है। इसको रीसायकल कर फिर अन्य सामान बनाया जा सकता है।  यह पारदर्शी, मजबूत, कठोर, तथा तथा गैस और नमी अवरोधक होता है। इसे पॉलीएथाइलीनटेरेफ्थालेट (Polyethylene terephthalate) PET या PETE के नाम से जाना जाता है। 
2.  Plastic-recyc-02.svgयह ज्यादातर पानी के पाइप, छल्ले, खिलौने,  दूध, जूस और पानी की बोतलें, शैम्पू, प्रसाधन  की बोतलें इत्यादि को बनाने के काम आता है। इसे भी रीसायकल किया जा सकता है। यह अपनी मजबूती, कठोरता, नमी प्रतिरोधक, गैस के आवागमन के लिए सुरक्षित होने के कारण काम में लाया जाता है। इसे हाई-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, HDPE के नाम से जाना जाता है। 

3. Plastic-recyc-03.svg यह जूस की बोतलें,  फिल्में; पीवीसी पाइप, फ्लोरिंग, साइडिंग, टेबल कवर, इत्यादि  बनाने के काम आता है। यह बहुउद्देशीय, पारदर्शी, आसानी से मिश्रित होने वाला, मज़बूत, तथा कठोर होता है।  इसे  पॉलीविनाइल क्लोराइड PVC के  जाना जाता है। इससे बचाव करना चाहिए। इसको बनाते समय कई हानिकारक पदार्थ भी बन जाते हैं। यह आसानी से रिसायकल भी नहीं होता। 

4.  Plastic-recyc-04.svgयह प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों के बैग, लचीली बोतलों, फिल्मों, डिब्बों या जारों के ढक्कन, ट्यूब आदि के बनाने के काम में लिया जाता है। यह अपनी  मजबूती, कठोरता, लचीलापन, सील करने में आसान, नमी अवरोधकता तथा अपनी आसानी से होने वाली प्रोसेसिंग के लिए जाना जाता है। इसे लो-डेन्सिटी पॉलीएथाइलीन, LDPE के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित पदार्थ है। इसकी रिसाइकिलिंग से थैले वगैरह बनाए जाते हैं। 
5.  Plastic-recyc-05.svg इससे रीसायकल योग्य बर्तन, रसोई में तथा माइक्रोवेव में पकाने योग्य डिस्पोजेबल डिब्बे, बर्तन, खाद्य पदार्थों को रखने के डिब्बे, टब, ऑटो पार्ट्स, इंडस्ट्रीयल काम, डिस्पोजेबल कप, प्लेटें इत्यादि बनाए हैं। यह मजबूती, कठोरता, ऊष्मा, रसायन, ग्रीस, तेल, नमी अवरोधक, बहुउद्देशीय पदार्थ के रूप में जाना जाता है। इसे पॉलीप्रोपाइलीन, PP के नाम से जानते हैं। यह सुरक्षित तो है पर इसको रीसायकल कर लेना चाहिए।  
6.  Plastic-recyc-06.svgइसका प्रयोग अंडों को रखने वाले डिब्बे, सूखे मेवों, मूंगफली इत्यादि की पैकिंग, डिस्पोजेबल कप, ग्लास, प्लेटें, ट्रे, कटलरी, डिब्बे, फर्नीचर को पैक करने के फोम इत्यादि बनाने में होता है। विभिन्न कामों में उपयोग में आने वाला यह पारदर्शी आसानी से गठित हो जाने वाला पदार्थ है।  इसे पॉलीस्टाइरीन, PS के नाम से जाना जाता है। इसे सँभाल कर उपयोग में लाना चाहिए यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। 
7. Plastic-recyc-07.svgइसे ज्यादातर एक्रेलिक, नायलोन और इलेक्ट्रॉनिक आवरण बनाने के काम में लाया जाता है। इसे पॉलिमर के संयोजन से बनाया जाता है। यह सबसे ज्यादा हानिकारक पदार्थ है। इससे बड़े-बड़े पानी के कन्टेनर, केन्स, तेल की टंकियो, डीवीडी, कंप्यूटर केस, आईपैड इत्यादि बनाए जाते हैं। इसे अक्सर पॉलीकार्बोनेट के बदले काम में लिया जाता है। 

आज हर तरफ प्लास्टिक का बोल-बाला है। इन्हें बिलकुल नकार दिया जाना भी सम्भव नहीं है।  इनमें से कुछ पर्यावरण के तथा इंसान के लिए हानिरहित भी हैं। पर अधिकतर हमारे लिए और पर्यावरण के लिए हानिकारक ही हैं। इन्हें कभी भी गर्म नहीं करना चाहिए, जब तक उस पर ऐसा करना हानिरहित न लिखा हो। ज़रा सी टूट-फूट होने के बाद इनका उपयोग नहीं करना चाहिए।  इनका उपयोग भी खूब सोच-समझ कर ही करना चाहिए। इसकी श्रेणियों में 1, 2, 4, 5  को उपयोग के लिए सुरक्षित और 3, 6, 7, खासकर 7 को हानिकारक मान कर उनका कम  उपयोग करना चाहिए। यदि किसी प्लास्टिक की वस्तु पर कोई कोड ना लिखा हो तो उसे ना खरीदना ही बेहतर है।  

संदर्भ अंतरजाल  

सोमवार, 22 अगस्त 2016

खेलों को निष्णात, समर्पित लोगों की जरुरत है !.....ना कि

इस बार के ओलिम्पिक को लेकर खेल संस्थानों ने भी बड़े-बड़े दावे पेश कर हमारी उम्मीदें बढ़ाई हुई थीं। पर कारण कुछ भी हो नतीजों का आशानुरूप ना होना सबको मायूस कर गया। यही मायूसी कुंठा बन कइयों की भड़ास बन गयी। जो कि होना नहीं चाहिए था। पर जब तक खेल से जुड़े, निष्पक्ष, समर्पित लोगों और खिलाड़ियों का जुड़ाव, सलाह या संरक्षण खेलों को प्राप्त नहीं होगा तब तक अपने यहां किसी फेल्प्स, किसी बोल्ट, किसी रिसाको या रूथ का पनपना या उसकी कल्पना करना ही बेमानी होगा....

खेलों का महाकुंभ इतिहास में दर्ज हो गया। पिछले, यानी 2012 के लंदन में हुए ओलिम्पिक में अपनी उपलब्धियों को देखते हुए इस बार सारा देश बहुत ही उत्साहित था। हर कोई पिछली बार से और ज्यादा पदकों की आशा लगाए बैठा था। खेल संस्थानों ने भी बड़े-बड़े दावे पेश कर हमारी उम्मीदें बढ़ाई हुई थीं। पर कारण कुछ भी हो नतीजों का आशानुरूप ना होना सबको मायूस कर गया। यही मायूसी कुंठा बन कइयों की भड़ास बन गयी। जो कि होना नहीं चाहिए था। किसी को भी भूलना नहीं चाहिए कि इतने बड़ी प्रतिस्पर्धा में भाग लेने वाले पर, अपनी कला में पारंगत होने के बावजूद, कितना बड़ा मानसिक दवाब रहता है, जो उनके प्रदर्शन पर प्रभाव डालता है। वह तो कोई-कोई  बिरला खिलाड़ी ही होता है जो अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और लौह समान हौसलों से हर विषम परिस्थिति को धत्ता बता अपना लक्ष्य हासिल करने का माद्दा रखता है।   

ऐसे समय जब प्रत्येक भारतवासी के मन में टीस सी है, तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता खेल के नतीजों से या लोगों की निराशा से। इन्हें नाहीं खिलाड़ियों पर भड़ास निकालने वाले जानते हैं नाहीं देश के लोगों को उनका नाम मालुम है। ये वे लोग हैं जो येन-केन-प्रकारेण अपने सरपरस्तों, आकाओं या रसूखदार रिश्तेदारों की वजह से सुयोग हथिया वहां का हिस्सा  बन बैठते हैं पर वहां भी अपनी जिम्मेदारियों से बाज आते ही दिखते हैं, नहीं तो क्या कारण था कि ओलिंम्पिक मैराथॉन जैसी कठिनतम स्पर्धा में भाग लेने वाली 'जैशा' को दौड़ के दौरान पानी तक उपलब्ध करवाने के लिए कोई उपस्थित नहीं था ! विषम परिस्थियों और तेज गर्मी में उसने कैसे दौड़ पूरी की होगी वही जानती है ! जबकि इक्के-दुक्के खेल में मिली सफलता में अपनी उपस्थिति दर्शाने को बेताब ऐसे लोगों को नियमों की अवहेलना करने के कारण शर्मिंदा होना पड़ा था। ऐसे ही लोगों की उपस्थिति खिलाड़ियों का मनोबल कमजोर करने में भी कोई कसर नहीं छोडती। पर इनके दब-दबे से आतंकित-आशंकित ना तो मिडिया ही ज्यादा कुछ बोलता है ना हीं खिलाड़ियों को "साफ्ट टार्गेट" मान उन पर तंज कसने वाले लोग ! पर समय के अनुसार अब धीमी-धीमी, कहीं-कहीं, कभी-कभी ही सही आवाज उठने लगी है कि राजनीति और राजनेताओं को खेलों से दूर ही रखा जाए। पर सोने की मुर्गी को कोई भी छोडना नहीं चाहता ! क्रिकेट का उदाहरण हमारे सामने है। जबकि देश भर के सरकारी संस्थानों या सरकारी संरक्षता में चल रहे किसी भी उद्यम का हाल किसी से छिपा नहीं है। इसलिए जब तक खेलों को निष्णात, निष्पक्ष, समर्पित लोगों और खिलाड़ियों का जुड़ाव, सलाह या संरक्षण प्राप्त नहीं होगा तब तक अपने यहां किसी फेल्प्स, किसी बोल्ट, किसी रिसाको या रूथ का पनपना या उसकी कल्पना करना ही बेमानी होगा।   

बुधवार, 17 अगस्त 2016

धर्मस्थलों में जाना दुश्वार होने लगा है !

रानी सती जी के मंदिर से चल जब रात नौ बजे के करीब सालासर पहुंचे तो वहाँ अपार जन-समूह  को ठाठें मारते देख हम सबके होश उड़ गए। कहीं भी रहने की जगह नहीं मिल पा रही थी। इस बार अगस्त की 13-14-15 की एक साथ पड़ी तीन छुट्टियों ने यह सीख तो दे ही दी कि हम सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं आईं  हैं, हजारों और लोग भी हमारा फ़ायदा उठाने को आतुर हैं ! किसी तरह 'अग्रवाल सेवा सदन' में दो कमरे मिले, हमने प्रभु को शुक्रिया अदा किया और अत्यधिक थके होने के बावजूद, बच्चे भी रात की अंतिम आरती में भाग लेने मंदिर की ओर अग्रसर हो गए। 
मंदिर से पच्चीस-तीस की.मी. पहले प्रवेश द्वार  


वहाँ का हाल भी बेहाल था। रात दस बजे भी अपार भीड़ थी, जिसके कारण अंदर जाने का मार्ग बंद कर दिया गया था। हम निराश हो लौटने ही लगे थे कि एक सज्जन ने मार्ग फिर खुलने की जानकारी दी, शायद प्रभु को हमारे ऊपर तरस आ गया था। आरती समाप्त हो चुकी थी, पर व्यवस्थापकों ने वहां उपस्थित लोगों को जल्दी-जल्दी दर्शन कर लेने का सुयोग प्रदान कर दिया था। निकलते-निकलते  सवा ग्यारह बज गए थे किसी तरह, एक-दूसरे पर लदे लोगों के बीच जो मिला, खा कर करीब बारह बजे जो बिस्तर पर गिरे तो सुबह आठ बजे ही होश आया। सब के आलस मिटाते, सुस्ताते, बतियाते, चाइयाते (चाय इत्यादि), नहाते-धोते करीब ग्यारह बज गए, सवा ग्यारह के आस-पास हम फिर मंदिर में दर्शन हेतु लाइन में लगे हुए थे। 
पंच-मुखी वक्र-गामी मार्ग 




दिनों-दिन, जैसे-जैसे भीड़ बढती जाती है वैसे-वैसे उसे सँभालने के जतन भी मंदिर वाले करते जाते हैं। जब भी कभी जाना होता है, तभी कोई नया बढ़ा हुआ रास्ता देखने को मिलता है। इस बार रास्ते को और लंबा पाया। पहले 'राम सेतु' नामक "फ्लाई ओवर" से गुजर कर पंचमुखी, वक्र-गामी मार्ग पर आना हुआ। इस जगह हजार के ऊपर, लोग समाए हुए थे। हालांकि स्वंयसेवी संस्थाओं द्वारा विशाल कूलरों और पीने के पानी की व्यवस्था की गयी थी, फिर भी गर्मी और उमस के मारे बुरा हाल था। कतार धीरे-धीरे, रुकते-चलते, रेंगते दूसरे हॉल में पहुंची जहां त्रिमुखी वक्र मार्ग हमारा इंतजार कर रहा था। वहां समय बिता एक और 'पल' से होते हुए जब मुख्य द्वार के पास द्विमुखी वक्र मार्ग में फंसे तब पाया कि भारी जेबों वाले, देश के ख़ास कहे जाने वाले, पुलिस और पण्डों की पहचान वालों से पटा एक दूसरे मार्ग का मुहाना भी वहीँ खुल रहा है। खैर धक्का खाते, धकियाते, दर्शन पाते अपने-आप बाहर आते-आते घडी ने दो बजा ही दिए थे। इसीलिए तुरंत ऑटो कर 'चमेली देवी सेवा सदन पहुंचे, इस बार भीड़ के कारण वहां रहना संभव नहीं हो पाया था पर उसका आजमाया हुआ खाना, जाना-पहचाना था। जल्दी इसलिए थी क्योंकि वहां "लंच' दो बजे तक ही उपलब्ध होता है, पर कुछ देर होने के बावजूद भोजन उपलब्ध हो गया। 






हर बार सालासर धाम से करीब चालीस की.मी. दूर डूंगरगढ़ बालाजी के दर्शन हेतु जरूर जाना होता है। पर पिछली बार उधर जाने के बाद समयाभाव के कारण लौटते समय खाटू श्याम जी के दर्शन नहीं हो पाए थे, सो इस बार समय हाथ में रख, चार बजे माँ अंजनी के दर्शनों के बाद हम सब खाटू के लिए रवाना हो गए। सालासर से करीब 85 की.मी. की दूरी पर सीकर जिले में स्थित यह भीम पुत्र बर्बरीक का मंदिर है। जिसकी मान्यता मारवाड़ी समाज सहित पूरे देश में मानी जाती है। शाम को छह बजे जब वहां पहुंचे तो पाया कि वहां भी पैर रखने की जगह नहीं है। भीड़ के कारण गाडी खड़े होने की जगह से मंदिर तक का पांच सौ गज का फासला पैदल तय करने में चालीस मिनट लग गए। मालुम पड़ा कि एकादशी और रविवार का संयोग एक साथ पड़ने के कारण जन-समुद्र उमड़ा पड़ा है। सारी जगहें छान मारीं, कहीं भी आश्रय स्थल उपलब्ध नहीं हुआ। हो भी जाता तो दर्शन दुर्लभ थे, मीलों लंबी कतार में करीब पच्चीस से तीस हजार लोग खड़े थे। हालात तब और पस्त हो गयी जब सुनने में आया कि यह हालात सुबह चार बजे से ही हैं, लोगों के ठठ्ठ के ठठ्ठ आते जा रहे हैं, भीड़ बढती ही जा रही है। आपस में विचार-विमर्श कर बच्चों और साथ के लोगों की सेहत को ध्यान में रख उसी समय दिल्ली वापसी का फैसला पास करवा लिया गया। शाम के साढ़े सात बजे टेम्पो-ट्रेव्हलर ने रवानगी ले, दो बजे के आस-पास वापस हमें घर तक पहुंचा दिया। 

इस यात्रा ने ज्ञान चक्षुओं को खोलते हुए कुछ बातें गाँठ बाँध लेने को कहीं। पहली कि छुट्टियां सिर्फ हमारी ही नहीं होतीं ! दूसरे आप कहीं भी जा रहे हों, भले ही आप वहां से पूरी तरह से परिचित हों फिर भी ताजा जायजा जरूर ले लें !! तीसरे हर देवता का दिन-त्यौहार देख परख कर ही वहां जाने का कार्यक्रम बनाएं, और यदि उसी बीच जाना ही हो तो आने वाली परेशानियों का सामना करने के लिए तैयार हो कर जाएं। सबसे अहम परामर्श, आपकी चाहे हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। इस बात को मूल मंत्र बना लें।        

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

तीन अवकाश और बालाजी धाम की यात्रा

कुछ दिनों पहले इसी ब्लॉग पर लिखा था कि अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। यह बात फिर एक बार सत्य साबित हुई जब इस बार 13-14-15 अगस्त को पड़ने वाले तीन अवकाशों का सदुपयोग फिर सालासर बालाजी के दर्शनों को करने का कार्यक्रम बना लिया गया। इस बार दो बच्चों समेत दस सदस्य थे इस लिए कार की बजाए टेम्पो-ट्रैवेलर का इंतजाम किया गया।    

यात्रा के लिए रास्ता चुना गया दिल्ली-बहादुरगढ़-झझ्झर-चर्खीदादरी-लोहारू-झुंझुनू-मुकुंदगढ़-लक्ष्मणगढ़ होते हुए सालासर का। इस रास्ते का पहला फ़ायदा यह है कि इधर से जाने पर करीब 70-80 की. मी. की बचत होती है। दूसरे इस मार्ग पर टोल-टैक्स बहुत कम लगता है। सिर्फ 170 रुपये जबकि राष्ट्रीय राजमार्ग पर करीब सात सौ रुपये चुकाने पड़ते हैं। हाँ यह जरूर है कि इस तरफ से जाने पर करीब चालीस प्रतिशत घटिया सडकों पर सफर करना पड़ता है जिससे यात्रा का समय कुछ बढ़ जाता है। वापसी में सीकर जिले के खाटू में स्थित खाटू श्याम जी के दर्शनों के बाद मुख्य मार्ग, रींगस-माधोपुर-कोटपुतली-नीमराना-भिवाड़ी-गुड़गांव होते हुए दिल्ली लौटना तय हुआ था।

तेरह अगस्त की सुबह साढ़े दस बजे गाडी ने सालासर का रुख कर लिया। रुकते, चलते, खाते-बतियाते अपराह्न साढ़े तीन बजे कार्यक्रमानुसार,   राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र के झुंझनु जिले में स्थित करीब चार सौ साल पुराने




रानी सती मन्दिर पहुँचना हो गया था। इस जगह का साफ़-सुथरा, शांत, सुन्दर, पवित्र माहौल सबको बरबस आकर्षित कर लेता है। मंदिर परिसर में ही राम दरबार, गणेश मंदिर, हनुमान मंदिर, तथा शिव जी के मंदिरों के साथ ही 13 सती मंदिर भी बने हुए हैं। मन्दिर के एक बाजू में कुछ गहराई में सीढ़ियों युक्त सुंदर लॉन बना हुआ है जिसमें फौव्वारे लगाए गए हैं। दूसरी तरफ एक बगीचा है जिसमें भगवन शिव की प्रतिमा के साथ कुछ वन्य पशुओं की सजीव सी लगने वाली   मूर्तियां मन मोह लेती हैं। ऐसी मान्यता है   






कि यहां मांगी हुई मुरादें बहुत जल्दी पूरी हो जाती हैं तथा कठिन समय में माँ अपने बच्चों को सहारा जरूर देती हैं। देश में ही नहीं विदेशों में भी इनके अनगिनत भक्त हैं। महाभारत के युद्ध में जब अभीमन्यु वीर गति को प्राप्त होते हैं तब उनकी पत्नी उत्तरा भी उन्हीं के साथ अपने प्राण त्यागना चाहती है। तब भगवान् श्री कृष्ण ने उसे समझाया और वरदान दिया कि वह कलियुग में नारायाणी  रूप में अवतार ले, सती दादी के रूप में विख्यात होगी और जन जन का कल्याण करेगी तथा सारी दुनिया में पूजी जाएगी। उसी वरदान के फलस्वरूवप उत्तरा ने वि. सं. 1638 में कार्तिक शुक्ला नवमीं दिन मंगलवार को डोकवा गाँव में जन्म लिया तथा लगभग 715 वर्ष पूर्व 06.12.1295 को सती हुईं। 




इस संगमरमर से बने मंदिर की विशेषता है कि इसमें किसी पुरुष या महिला की मूर्ति के बदले एक अलौकिक शक्ति की आराधना की जाती है। भारत में सती प्रथा प्रतिबन्धित होने के कारण यहां कई तरह के उत्सवों और मेलों पर रोक होने के बावजूद इस जगह अत्यधिक मान्यता है। अधिकृत रूप में ना सही पर यह आंकलन है कि यहां चढने वाले चढ़ावे का मूल्य  देश के सबसे धनी मंदिर तिरुपति के बालाजी के बराबर है। 

उमस और गर्मी यहां भी काफी थी, वाहन चालक के वाहन में वातानुकुलित अवस्था में बैठे रहने से, सुबह से चल रही गाडी का इंजन काफी गर्म हो गया और उसे सामान्य हालात में लाते-लाते शाम के छह बज गए तब जा कर बालाजी धाम की ओर अग्रसर होना संभव हो पाया। जहां पहुंचते-पहुंचते रात के नौ बज गए थे। रानी सती मंदिर में भी लोग थे पर ज्यादा भीड़-भाड़ महसूस नहीं हो रही थी पर सालासर में तो अपार जन-समूह उमड़ा पड़ा था। सब एक साथ पड़े तीन अवकाशों का कमाल था। कोई होटल, कोई धर्मशाला खाली नहीं था। कहीं भी रहने की जगह नहीं मिल पा रही थी। वह तो दो दिन पहले किया गया फोन सहायता कर गया और मंदिर से करीब एक की.मी. की दूरी पर स्थित अग्रवाल सेवा सदन में दो कमरे मिलने पर हमने प्रभु को शुक्रिया अदा किया और थके होने के बावजूद बच्चे भी रात की अंतिम आरती में भाग लेने मंदिर की ओर अग्रसर हो गए।   
आगे का हाल कल........ 

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मन जाना राष्ट्रीय पर्व का

वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। दुःख होता है यह देख कर कि  अब इस पर्व को मनाया नहीं बस किसी तरह  निपटाया जाता है !!


तीन साल पहले की यह पोस्ट आज भी वैसी ही सामयिक है ! 

15 अगस्त, वह पावन दिवस, जिस दिन देशवासियों ने एकजुट हो आजादी पाई थी। कितनी खुशी, उत्साह और उमंग थी तब। वर्षों तक लोग स्वंय-स्फुर्त हो घरों से निकल आते थे, पूरे साल जैसे इस दिन का इंतजार रहता था। पर धीरे-धीरे आदर्श, चरित्र, देश प्रेम की भावना का छरण होने के साथ-साथ यह पर्व महज एक अवकाश दिवस के रूप मे परिवर्तित होने पर मजबूर हो गया। इस कारण और इसी के साथ आम जनता का अपने तथाकथित नेताओं से भी मोह भंग होता चला गया।

अब लोग इससे जुडे समारोहों में खुद नहीं आते उन्हें बरबस वहां लाया जाता है। अब इस पर्व को मनाया नहीं निपटाया जाता है। आज हाल यह है कि संस्थाओं में, दफ्तरों में और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है, अपने-आप को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। खासकर विद्यालयों, महाविद्यालयों में जा कर देखें, पाएंगे मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य करते हैं और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं। 

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और देश-भक्ति की भावना लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। चरित्रवान, ओजस्वी, देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले नेताओं से लोगों को प्रेरणा मिलती थी।  यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है, इसने तो हमें भरपूर खुश होने का मौका ही दिया है।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

तिरोहित होती भावनाएं

हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर  हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता ! मतलबपरस्ती के इस आलम में इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

असहिष्णुता पर तो कई दिनों से देश में बहसबाजी जारी है। उस पर नाहीं कोई टिपण्णी करनी है और नाहीं उसके पक्ष-विपक्ष में जाना है। पर कड़वी सच्चाई तो यही है कि धीरे-धीरे समाज में असहिष्णुता के साथ-साथ संवेदनहीनता और खुदगर्जी तेजी से पनप रही है। किसी भी दिन का, किसी भी प्रदेश का, किसी भी भाषा का अखबार उठा कर देख लीजिए, नफ़रत का अजगर हर जगह जहर उगलता नजर आएगा। ज़रा-ज़रा सी बात पर तोड़-फोड़, मार-पीट, खून-खराबा आम बात हो गयी है। एक दस बोलता है तो दूसरा सौ सुनाता है। रिश्ते-नाते, पद-मर्यादा, छोटे-बड़े किसी का लिहाज नहीं बचा है। सड़क से लेकर उच्चतम सदनों तक एक जैसा हाल हो गया है। मतलबपरस्ती का आलम है। 

संवेदनहीनता का आलम यह है कि इंसान की कीमत मोबायल फोन से भी कम हो गयी है। एक-दो दिन पहले की ही तो बात है एक शख्स को धक्का मार कर टेंपो चालक फरार होता है, एक रिक्शावाला उस घायल इंसान को
नजरंदाज कर उसका मोबायल फोन उठा यूं चल पड़ता है जैसे उसीका गिरा हो, उधर पुलिस की गाडी पता नहीं अपनी कौन सी ड्युटी पूरी करने की जल्दी में उस आदमी को देख ही नहीं पाती या देखना नहीं चाहती। बाद में पता चलता है कि यह पुलिस की नहीं उस घायल आदमी की ही गलती थी जिसने गिरते वक्त यह ध्यान नहीं रखा कि उसे एक ही थानाक्षेत्र में गिरना है। फिर जो होता है, तड़फते हुए उस घायल बदनसीब इंसान ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया। वैसे इस अमानवता के पीछे पुलिस की छीछालेदर से बचना भी एक कारण है जिसे आम आदमी झंझट मान बैठा है।  जबकी हादसे ना पूछ कर आते हैं नाहीं पहचान कर ! और यह इस तरह की अकेली घटना भी नहीं है, देश भर में महीने में ऐसे सैंकड़ों वाकये घटते रहते है जिनमें दर्जनों व्यक्ति संवेदनहीनता की वजह से अपनी जान गवां बैठते हैं।
 
कहने-सुनने में बुरा जरूर लगता है पर खुदगर्जी की भावना भी हम में कूट-कूट कर भरी हुई है। हम सब चाहते हैं कि हमें हर तरह की सहूलियत मिले, हमें हर तरह की आजादी हासिल हो, हम पर किसी तरह की बंदिश न हो, हम पर किसी भी तरह की कड़ाई लागू न हो, हमारे हक़ को छीना ना जाए। पर इन सब के लिए हम खुद लड़ना या आवाज बुलन्द करना या विरोध जताना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि हमारे लिए कोई और लड़े, हमारी ओर से कोई और आवाज उठाए, हमारे लिए कोई और विरोध जताए ताकि मुसीबत आने पर हम पर कोई आंच ना आए। यानी स्वर्ग सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता !! 

इतिहास गवाह है, सदियों से ऐसा होता चला आया है। अपने लिए खड़े होने वाले को हम हीरो बना देते हैं, पर काम निकल जाने पर या अधूरा रह जाने पर उसे ज़ीरो बनाने या उसी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। फिर चाहे कोई गांधी हो या अन्ना हो। इसका ताजा उदाहरण मणिपुर की शर्मिला है, जो जब तक कष्ट, विरोध, ताड़ना सहती रही तब तक वह वहाँ के लोगों के लिए पूज्यनीय-आदरणीय, नायिका बनी रही, पर जैसे ही उसने अपने व्यक्तिगत निर्णय लिए उसे खलनायिका का रूप दे दिया गया। यहां तक कि वहाँ की महिलाएं भी उसे अपने मौहल्ले में रहने देने के खिलाफ हो गयीं। अब तक उसका नाम जपने वाले, उसके सहारे अपनी दुकान चलाने वाले रातों-रात ग़ायब हो गए। इरोम भी सोच रही होगी कि अपनी जिंदगी के बीसियों साल मैंने किनके लिए बर्बाद कर दिए !!   

सो हमें भी अपने मन की बात न होने या सुनाई देने से आक्रोशित होने के बजाय सोचना जरूर चाहिए कि जैसे हमारी अपनी एक सोच है तो जरूरी नहीं कि सामने वाले की भी वैसी ही हो। उसका अपना व्यक्तित्व है, अपनी मानसिकता है, अपने विचार हैं। जरूरी नहीं कि मेल खाएं ही !                     

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

पाना, त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनलाभ का

अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। पर विडंबना है कि सैंकड़ों की.मी. की यात्रा की यादों को सँजोने के लिए आप उन पलों को, कैमरे को साथ रखने की मनाही के कारण, कैद नहीं कर सकते ! समय ही ऐसा चल रहा है..... 

इसे प्रभुएच्छा ही कहा जाएगा कि पिछले दो महीनों की भागम-भाग, व्यस्तता और थकान के बावजूद नासिक में संपन्न होने वाले एक विवाह में शामिल होने में कोई बाधा या अड़चन आड़े नहीं आई। कहते हैं ना कि अपनी हजार इच्छा हो, बिना प्रभु की मर्जी के किसी भी देवस्थान तक नहीं जाया जा सकता है और जब उनकी अनुमति होती है तो कोई भी बाधा वहाँ जा दर्शनों से नहीं रोक पाती। ऐसा मेरे साथ कई बार हो चुका है। जिसका ताजा अनुभव शिवजी की कृपा से त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शनों के सौभाग्य का है, जो अभी पिछले दिनों ही प्राप्त हुआ। 

त्र्यम्बकेश्वर  ज्योर्तिलिंग मन्दिर, महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरि नामक पर्वत की तलहटी में, गोदावरी नदी के उद्गम के पास स्थित है। जनश्रुति है कि गौतम ऋषि तथा गोदावरी रूपी माँ गंगा की प्रार्थना के कारण भगवान शिव ने इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यम्बकेश्वर नाम से विख्यात हुए। यह  मंदिर के अंदर एक छोटे से गङ्ढे में तीन छोटे-छोटे लिंग है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। यही इस ज्‍योतिर्लिंग की सबसे बड़ी विशेषता है, जिसमें ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश तीनों का वास है। अन्‍य सभी ज्‍योतिर्लिंगों में केवल भगवान शिव ही विराजित हैं। 
ज्योर्तिलिंग के उद्भव की कथा के अनुसार प्राचीनकाल में इस त्र्यंबक स्थान पर गौतम ऋषि की तपोभूमि थी। एक बार किसी बात पर नाराज हो तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों ने गणेश जी की आराधना कर गौतम ऋषि को आश्रम से निकलवाने की प्रार्थना की। गणेश जी ने उन  समझाने की चेष्टा की पर अपने  भक्तों के हठ पर विवश हो उनकी बात माननी पड़ी। उनका मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि के खेत में जाकर चरने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि ने नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने की कोशिश की, पर  तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं गिर कर मर गयी । इस पर सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे और कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। तब ऋषि गौतम के उनसे प्रार्थना कर प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय पूछने पर उन्होंने कहा, तुम यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगीरि की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।
ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम  भगवान शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा, प्रभू , आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्ति दिलवाएं ! भगवान्‌ शिव ने कहा, गौतम ! तुम तो सर्वथा निष्पाप हो। तुम पर गो-हत्या का दोष लगाने वालों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ। इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु, उन्हीं के कारण  तो मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए हैं, उन पर आप क्रोध न कर क्षमा कर दें और आप यहीं निवास करें। प्रभु ने उनकी बात मानकर वहाँ त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए  कृपा से गंगाजी भी वहाँ पास में गोदावरी के  नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।

 इसी से सम्बन्धित एक और कथा भी प्रचलित है। कहते हैं कि ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। 

गोदावरी नदी के किनारे स्थित यह कलात्मक त्र्यंबकेश्‍वर मंदिर काले पत्‍थरों से बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ। यही वह ख़ास पूजा-स्थली है जहां यहाँ कालसर्प योग, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना की जाती है, जिसके कारण यहाँ साल भर भक्‍तजन अलग-अलग मुराद पूरी होने के लिए आते रहते हैं। शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का ताँता लगा रहता है। 
मंदिर के अंदर गर्भगृह में शिवलिंग की केवल अर्घा दिखाई देती है, जिसके अंदर तीन छोटे-छोटे लिंग स्थापित हैं, जिन्हें त्रिदेव, ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। जिनके दर्शन भाग्यशाली लोगों को ही मिल पाते हैं, क्योंकि हर बड़े और प्रसिद्ध पूजा स्थलों की तरह यहां भी भक्तों को कुछ पलों का ही समय मिलता है दर्शनों का, उसी में जो दिख गया सो दिख गया, फिर तो नसीब में धकियाना ही लिखा होता है।कोई करे भी तो क्या !  भीड़ ही इतनी होती है कि यदि सभी को इच्छानुसार समय  लगे तो हफ़्तों लग जाएं लोगों को इंतजार करते !  भोर के समय होने वाली पूजा के बाद इस अर्घा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है। धार्मिक ग्रन्थों और शिवपुराण में भी त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। नजदीक के ब्रह्मगिरि  पर्वत पर जाने के लिए यहां सात सौ सीढियां हैं, जिनसे ऊपर जाने के मध्य मार्ग में रामकुण्ड और लक्ष्मणकुण्ड स्थित हैं। पर्वत की चोटी पर पहुंचने पर गोदावरी नदी के उद्गम स्थल के विहंगम दर्शन होते हैं। 
पर विडंबना है कि सैंकड़ों की.मी. की यात्रा की यादों को सँजोने के लिए आप उन पलों को, कैमरे को साथ रखने की मनाही के कारण, कैद नहीं कर सकते। समय ही ऐसा चल रहा है।  

बुधवार, 10 अगस्त 2016

कोटा का दाढ़ देवी मंदिर

राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित है एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है ..

दाढ़ देवी ! है ना अजीब सा नाम ? पर  इंसान की आस्था, विश्वास और सोच की कोई सीमा नहीं होती। उसकी इसी फ़ितरत ने ना जाने कितने पूजा-स्थलों का निर्माण, कैसे-कैसे नामों से करवाया है। ऐसी ही एक आस्था का प्रतीक है, राजस्थान के कोटा शहर से करीब  20-22 की. मी. की दूरी पर हाडौती क्षेत्र के उम्मेदगंज नामक स्थान पर सुनसान सी जगह में स्थित एक मंदिर, जिसमें माँ दुर्गा को दाढ़ देवी के नाम से पूजा जाता है। इस मंदिर का निर्माण कैथून के तंवर राजपूतों ने अपनी कबीले की देवी की आराधना के लिए करवाया था। दस भुजाओं तथा त्रिनेत्र वाली माता सिंह पर आसीन हैं। हर हाथ में आयुध हैं। नागर
शैली में चूना-पत्थर से बने इस मंदिर को बारह कलात्मक खंभों का सहारा दिया गया है। मंदिर के सामने एक हौज है जिसमें जमीन के अंदर से पानी आता है। साल के दोनों नवरात्रों में यहां मेला लगता है जिसमे भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहां शिव तथा काल भैरव के भी मंदिर हैं। 

दुर्गा जी के इस नाम के पीछे एक जनश्रुति चली आ रही है, कहते हैं एक बार कोटा के राजा उम्मेद सिंह की दाढ़ में भयंकर दर्द उठा। जमाने भर के इलाज करवाने पर भी उनका कष्ट कम नहीं हुआ तो उन्होंने इसी मंदिर में जा माँ दुर्गा देवी की पूजा-अर्चना की जिससे उनका रोग ख़त्म हो गया। तब उन्होंने एक और मंदिर का निर्माण करवा इस मंदिर की प्रतिमा को नए मंदिर में स्थापित करना चाहा पर उनकी लाख कोशिशों के बावजूद मूर्ति टस से मस नहीं हुई। इसे माँ की इच्छा समझ, उन्हें वहाँ से हटाने की कोशिश छोड़, वहीँ यथावत उनकी पूजा होती आ रही है। 

सोमवार, 8 अगस्त 2016

भागम-भाग में बीते दो महीने

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!    

बहुत दिनों के बाद आप सब से फिर रूबरू होने का मौका मिला है। पिछले एक-दो महीने में काफी कुछ घटित हुआ, बड़े बदलाव आए जिनके दौरान छोटा बेटा  परिणय-सुत्र में बंध गया, अपने जीवन की एक नई शुरुआत करने के लिए। घर में एक नए सदस्य का आगमन हुआ है। बिटिया को नए परिवेश, नए संबंध, नए लोगों से तालमेल बैठाना है। वैसे आजकल की पीढ़ी को उतना वक्त नहीं लगता इन सब बातों में जितना पहले लगा करता था। फिर भी एक-दूसरे के अनुसार ढलने में कुछ समय तो लग ही जाता है।  

घर में सदस्य बढे तो ज्यादा जगह की आवश्यकता भी महसूसी गयी, उसी के लिए फिर एक बड़े घर की तलाश ख़त्म की गयी। शायद मुझे प्रभु की देन है कि मैं बीती-बितायी पर ज्यादा ध्यान नहीं देता। जो आज है वही सच है। पर कभी-कभी पुरानी दबी-ढकी कोई कसक, टीस दे ही जाती है। यह रोज-रोज खानाबदोशों की तरह बोरिया-बिस्तर समेटते-बिछाते, राजौरी गार्डन के करीब चार सौ गज में बने घर की याद आ ही जाती है ! जिसे पता नहीं किस ग्रह-दशा में, बिना ज्यादा सोचे-समझे बेच-बाच कर दिल्ली छोड़ दी थी। समय चक्र घूमा, फिर उसने बीस-बाइस साल बाद वहीँ ला पहुंचाया। मेरी कोशिश रहती है कि भूली-बिसरी यादें ताजा ना ही हों, पर परिवार का क्या किया जाए, जो रोज-रोज की उठा-पटक और आसमान छूते मकान के किरायों की वजह से तंग आ कुरेद ही देता है पिछली घटनाओं को ! पर कहावत है ना कि कोई अक्लमंदी से कमाता नहीं और ना कोई बेवकूफी से गंवाता है। सब होनी के वश में है, जो होना होता है, वह हो कर ही रहता है।

इसी सब में जो पिछले महीने से व्यस्तता शुरू हुई वह अभी भी पूर्णरूपेण ख़त्म नहीं हुई है। बेटे की शादी के बाद ईश्वर की अनुकंपा से प्रभू त्र्यम्बकेश्वर के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चारों मेट्रो शहरों में से बचे एक मुंबई की भी आंशिक यात्रा हो गयी। जिसके साथ-साथ नासिक और पुणे का भी भ्रमण हो गया। लौटते ही, पहले से तय, भतीजे अतुल, जिसे जब पिछली बार देखा था तब वह गोदी में हुआ करता था, की शादी में चंडीगढ़ के पास पंजाब के जिरकपुर का भी चक्कर लगाना हुआ।  समय कैसे फिसलता चला जाता है !! यह तो भला हो आधुनिक तकनीक का, जिससे दूर-दराज बैठे हुए भी एक-दूसरे के हाल-चाल की जानकारी मिलती रहती है। इसी भाग-दौड़ के बीच जो भी समय मिलता उस में नयी जगह में "शिफ्टिंग" भी बदस्तूर जारी रही, जहां अभी भी सामान का जमना-ज़माना चल ही ही रहा  है।

इतनी व्यस्तता, उठा-पटक, भाग-दौड़ से शरीर का थोड़ा नासाज होना भी बनता है, हुआ भी है। पर उसे प्यार से समझाना पड़ा है कि अगले हफ्ते पड़ने वाले तीन अवकाशों में हमें सालासर के बालाजी महाराज के दर्शनों का संकल्प भी पूरा करना है, सो भाई हमारा साथ ना छोडना, ज़रा ठीक ही रहना !!              

लगता तो है कि तन ने बात मान ली है, अब मन और धन भी सकारात्मक रहें इसलिए प्रभू की इच्छा, अनुकम्पा और वरदहस्त की आकांक्षा है।