सोमवार, 27 जून 2016

पानी की समस्या अगले साल तक के लिए गौण हो गयी है :-(

कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या पानी की यह कमी प्रायोजित तो नहीं है ?क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता है ! याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था     

हम लोग सकारात्मक सोच वाले, वर्तमान में जीने वाले लोग हैं। हम उन मनोवैज्ञानिकों के अनुयायी हैं जो कहते हैं जब तक समस्या सामने न हो उस के बारे में मत सोचो ! तो लो जी,  बरसात आ गयी तो सरकार ने भी राहत की सांस ले विगत पानी की समस्या को ठंडे बस्तों में डाल देना है। पानी पर गुल-गपाड़ा मचाने वाले मीडिया में अब दूसरे-तीसरे मुद्दे उछलने लगेंगे। लोग वैसे ही कारें धोते रहेंगे। संत्रीयों-मंत्रियों के लॉन हरियाए जाते रहेंगे, सार्वजनिक नलों से टोंटी ना होने की वजह से पानी, पानी की तरह बहता रहेगा। बरसात के पानी को अभी कोई संजोने की नहीं सोचेगा। नदियां उफनने लगेंगी, बाढ़ से तबाही मचेगी, पर अभी, सभी, आगामी गर्मियों तक इस बेशकीमती प्राकृतिक देन का मोल फिर नहीं समझेंगे।     

आज पूरे देश में नागरिकों को पानी एक निश्चित अवधी के लिए ही उपलब्ध करवाया जाता है। जिसमे कभी-कभी तकनीकी कारणों से नागा भी पड़ जाता है जिसकी आशंका से लोग जरुरत से ज्यादा पानी का भंडारण कर लेते हैं पर बहुत सारे घरों में देखा गया है कि जैसे ही सुबह का पानी उपलब्ध होता है, पिछले दिन के संचयित जल को फेंक कर उस "ताजे" पानी का भंडारण कर लिया जाता है। इसी तरह रोज पीने के पानी को बदलने की क्रिया में एक दिन पहले का पानी यूंही नाली में बहा देने से बेशुमार पानी बर्बाद कर दिया जाता है। सोचने की बात है यह है कि कोई नहीं सोचता कि जिस पानी को ताजा समझ कर इकट्ठा किया जा रहा है उसका निर्माण अभी नहीं हुआ है ! वह भी कहीं न कहीं कई दिनों से संजो कर ही रखा गया था।  पर नल में पानी आता देख पहले का पानी बासी लगने लगता है। घर में दो दिन पुराने दूध या दही को तो कोई नहीं फेंकता ! चलिए  मन का वहम दूर ना ही हो तो पिछले दिन के पानी को नाली में बहाने की बजाए घर के किसी भी दसियों कामों में उसका उपयोग किया जा सकता है। वैसे भी साफ़-सफाई से रखे गए पानी में कोई खराबी नहीं आती। इस तरह के पानी को और भी गुणवत्ता युक्त बनाने के लिए उसे यदि अच्छी तरह फेंट लिया जाए तो वातावरण की आक्सीजन उसमें घुल कर उसे और भी उपयोगी बना सकती है। 
     
आज हमारे देश में उपलब्ध जल की मात्रा की समस्या उतनी विकराल नहीं है, जितनी उसके प्रबंधन की कमी की है। जरुरत है नागरिकों को इसके बारे में जानकारी और जागरूकता उपलब्ध करवाने की। अतः जल संरक्षण के लिये जरूरी है कि हम सभी को जल के बारे में सही जानकारी हो, हम उसकी कीमत समझें, आसानी से उपलब्ध इस जीवनोपयोगी नियामत को संभाल कर खर्च करें और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने की हर संभव कोशिश करें। 

प्रकृति ने हमें दिल खोल कर पचासों नदियों की सौगात बक्शी है, भरपूर जल मुहैय्या करवाया है, पर हम उसकी कीमत ना समझ 'माले मुफ्त दिल बेरहम' की तर्ज पर उसको बर्बाद करते रहे हैं। हमने कभी भी उसके उचित प्रबंधन पर ध्यान ही नहीं दिया। यह मान बैठे कि यह चीज तो कभी ख़त्म ही नहीं होगी। हमारी इसी अदूरदर्शिता से आज इसकी कमी महसूस होने लगी है। पर कभी-कभी तो मन में यह संशय भी सर उठाता है कि क्या यह कमी प्रायोजित तो नहीं है, क्योंकि हम आकंठ भ्रष्टाचार में इस तरह लिप्त हैं कि हमें खुद के लाभ की बजाए और कुछ भी सुझाई नहीं देता। क्या ऐसा तो नहीं कि शहरों में टैंकर माफिया के दवाब में, या पानी को तथाकथित शुद्ध करने वाले यंत्रों के निर्माता बड़े व्यवसायिक घरानों को लाभ पहुंचाने के लिए, या विरोधी दलों के द्वारा सत्तारूढ़ दाल की विफलता को दर्शाने के लिए दुष्प्रचार किया जाता हो ? क्योंकि हमारे यहां कुछ भी असंभव नहीं है। याद आते है, अस्सी के दशक की गर्मियों के वे  दिन जब रेलवे स्टेशनों पर पानी की उपलब्धता जान-बूझ कर रोक दी जाती थी, जिससे प्यासे यात्रियों को मजबूरी में ऐसे-वैसे बोतलबंद ठंडे पेय को अनाप-शनाप कीमत चुकता कर खरीदना पड़ता था !!! 

शुक्रवार, 24 जून 2016

इंसान सदा से ही उत्सव प्रिय रहा है

कुछ लोग अति उत्साहित हो जिम का रूख कर लेते हैं, कुछ सुबह-शाम सैर के लिए निकल पड़ते हैं तो कुछ घर में ही छोटा सा जिम बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण खरीद कर ला धरते हैं। पर  दस-पंद्रह दिनों में ही 90-95 प्रतिशत लोगों का उत्साह ठंडा पड जाता है, जिम और सैर के प्रोग्राम तो धरे के धरे रह ही जाते हैं घर पर लाया गया सामान भी धूल चाटने लग जाता है

अभी-अभी योग दिवस बीता है, उसके दूसरे ही दिन अखबार में एक खबर पढ़ने को मिली, कि योग दिवस के पहले योग के लिए प्रयुक्त होने वाली मैट या दरी की इतनी मांग होती है कि उसे पूरा करना मुश्किल हो जाता है। पर एक-दो दिन बाद ही लोग उसे वापस लौटने के लिए तिकड़में भिड़ाने लगते हैं।  किसी को उसका रंग नहीं भाता तो किसी को डिजायन। अधिकांश के लिए रात गयी, बात गयी वाला वाकया हो जाता है। उनके अनुसार वह अब उनके किसी भी काम की चीज नहीं होती। इनमें सबसे आगे होते हैं बड़े-बड़े संस्थान जो सरकार को दिखाने या उसके डर से ऐसे दिनों का आयोजन खूब धूम-धाम से करते हैं पर दूसरे दिन ही दरी वगैरह को वापस करने के लिए तरह-तरह के बहाने गढ कर सामान को दुकानदार को वापस करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

सिर्फ मैट की ही बात नहीं है। सेहत को लेकर टी.वी., अखबारों में तरह-तरह आख्यानों-व्याख्यानों से  प्रभावित हो कुछ लोग अति उत्साहित हो जिम का रूख कर लेते हैं, कुछ सुबह-शाम सैर के लिए निकल पड़ते हैं तो कुछ घर में ही छोटा सा जिम बनाने के लिए तरह-तरह के उपकरण खरीद कर ला धरते हैं। पर यह जोश दूध के उफान की तरह ही का होता है, दस-पंद्रह दिनों में ही 90-95 प्रतिशत लोगों का उत्साह ठंडा हो जाता है और जिम और सैर के प्रोग्राम तो धरे के धरे रह ही जाते हैं। घर पर लाया गया सामान भी धूल चाटने लग जाता है। सबसे बुरी हालत होती है "ट्रेडमिल" की, कोई तरह-तरह के बहानों से उसे वापस करना चाहता है तो किसी के
 यहां ऐसे ही किसी कोने में धूल फांकती पड़ी रहती है तो कहीं बाल्कनी में उस पर कपडे सूखते मिलते हैं।

तो किसी खास दिवस पर भीड़ उमड़ती दिखे तो आयोजकों को उसके सफल  होने का गुमान नहीं पाल लेना चाहिए। क्योंकि उस हुजूम का मतलब यह नहीं होता कि सभी लोग उस ख़ास आयोजन से प्रभावित हैं। वहां कुछ मजबूरी से आते हैं तो कुछ शौक से तो कुछ खबरों में बने रहने के मौके को ताड़ कर, कुछ फैशन के कारण तो कुछ मौज-मस्ती के लिए, क्योंकि मानव सदा से उत्सव प्रिय रहा है।    


वैसे भी बाज़ार के कमाई के तरीकों से अब लोग भी अंजान नहीं रह गए हैं। उसके नित नए गढ़े जाने वाले तरीकों का लोग भी मजा लेने लग गए हैं। पश्चिम से आयातित बाज़ार-संस्कृति के दवाब में विभिन्न प्रकार के दिन अपना नाम रखवाने लग गए हैं तो लोग भी उन दिनों को मौज-मस्ती और फैशन के रूप में मनाने लगे हैं। बाज़ार यदि ग्राहकों को लुभाने के लिए साम-दण्ड-भेद अपना कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं तो ग्राहक भी अब कम चतुर नहीं रह गया है। अपना हानि-लाभ देख कर ही वह किसी की बातों के जंजाल में कदम रखता है और जहां अपना मतलब पूरा होता दिखता है वह अपना दामन बचा निकल लेता है। जिसमें घर बैठे सेवा और सामान देने वाले रिवाज से उसे फायदा ही हुआ है।          

शनिवार, 18 जून 2016

डाकघर से एक पोस्ट-कार्ड खरीदना नामुमकिन नहीं पर मुश्किल जरूर है

विडंबना देखिए कि सात-सात रुपये का घाटा एक #पोस्टकार्ड पर सह कर जिस गरीब मानुष के लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ाई जा रही, वही यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ?

अपने देश में शायद ही ऐसा कोई इंसान होगा जिसका साबका डाकघर यानि पोस्ट-आफिस से ना पड़ा हो। अठाहरवीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा रेल की तरह अपने कार्यों को सुचारु रूप से चलाने के लिए डाक सेवा की शुरुआत की गयी थी। आज से कुछ वर्षों पहले तक यह एकमात्र सस्ता व सुलभ जरिया था, लोगों को आपस में जोड़े रखने, दूर-दराज बैठे सगे-संबंधियों की कुशलक्षेम पाने, जानने का, उन्हें आर्थिक मदद पहुंचाने, पाने का। सबसे अच्छी बात यह थी कि नागरिकों का इस सरकारी संस्थान के कर्मचारियों की कर्मठता और ईमानदारी पर अटूट विश्वास था। होना भी चाहिए था क्योंकि लोग देखते जो थे कि, चाहे आंधी हो, बरसात हो, झुलसा देने वाली गर्मी हो, उनके पत्र, जरुरी कागजात, मनी-आर्डर, राखी, बधाई संदेश, निमंत्रण पत्र इत्यादि को बड़ी साज-संभार से डाकिया उनके हाथों तक पहुंचा कर जाता था। गांव-देहात के अनपढ़ पुरुष-महिलाओं के लिए डाक-बाबू द्वारा पत्र बांचना और लिखना आम बात होती थी। ऐसी जगहों में डाक्टर के बाद डाकिया ही ज्यादा सम्मान पाता था।

हालांकि डाक सेव शुरू होने तक, टेलीफोन का परिचय देश के लोगों से हो चुका था, पर वह सेवा बहुत ही कम सरकारी, धनाढ्य और सभ्रांत लोगों तक सिमित थी इसलिए डाक सेवा पर उसका कोई असर नहीं पड़ा था। फिर समय बदला संचार व्यवस्था में अभूतपूर्व क्रान्ति आ गयी। जिसने शहर तो शहर दूर-दराज के गांव-देहात में भी पांव पसार लिए। धीरे-धीरे बच्चे-बच्चे के हाथ में मोबाइल आ गया। लोगों की खतो-किताबत बंद हो गयी। कुछ धक्का बैंकों की सेवाओं ने दिया, रही-सही कसर दूसरे सरकारी विभागों की तरह यहां भी लापरवाही, वयवसायिकता के अभाव, काम के प्रति सुस्ती जैसी बीमारियों के पनपने से पूरी हो गयी। जिसका फ़ायदा निजी कंपनियों ने कुरियर सेवाएं शुरू कर उठाना आरंभ कर दिया और हर निजी संस्थान की तरह इस सरकारी विभाग को मीलों पीछे छोड़ दिया। पर यहां किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी। उसी 1898 के एक्ट के तहत काम किया जाता रहा, फलस्वरूप काम धंधा आधे से भी ज्यादा कम हो गया, कई-कई डाकघरों को बंद करने की नौबत आ गयी। तनख्वाह निकलना मुश्किल हो गया। दुर्दशा सुधारने के लिए कोशिशें जरूर हुईं पर पूरी तरह कारगर कोई न हो सकी। लोगों की आस्था व विश्वास पूरी तरह फिर नहीं पाया जा सका।

डाकघर की कुछ सेवाएं ऐसी हैं जो सदा घाटे में रही हैं। जिसमें पहला नंबर है पोस्टकार्ड का ! इस विभाग के अनुसार इन्हें एक कार्ड पर सात रुपये से ऊपर का नुक्सान होता है। तो आज के परिवेश में उसे बंद ही क्यों नहीं कर दिया जाता या फिर उसकी कीमत क्यों नहीं बढ़ाई जाती ? कहने को उसे गरीब तबके के लिए जारी रखा गया है ! सवाल है किस गरीब के लिए ? उसके लिए जिसे आटा या चावल खरीदना मजबूरी बन गया हो, दाल,सब्जियां जिसके लिए देखने की चीजें हो गईं हों, नमक तक पहुँच के बाहर होता जा रहा हो, एक समय की चाय तक पीना जिसके लिए मुहाल हो गया हो उसके लिए एक #पोस्टकार्ड की कीमत ना बढ़ा कर क्या एहसान किया जा रहा है ? विडंबना देखिए कि वही गरीब मानुष, जिसके लिए इस सेवा की कीमत नहीं बढ़ा रहे, यदि एक पोस्ट कार्ड लेने जाएगा तो क्या डाकघर वाले उसे उपलब्ध करवाएंगे ? कहाँ से लाएगा वह या डाक-खाने वाले पचास पैसे का सिक्का ? आज तो इसका अत्यंत उपाय है कि प्रार्थी से लिखा हुआ मैटर लेकर, उसे स्कैन कर संबंधित जगह भिजवा दें, इससे खर्चा और समय दोनों की बचत हो जाएगी।
ऐसी ही एक सेवा है "बुक-पोस्ट" की, जिसे अंग्रेजों ने पुस्तकों, छपी हुई सामग्री, जिसमें अखबारें शामिल नहीं थीं, को सस्ती दर पर भिजवाने के लिए शुरू किया था। इसमें शर्त यह होती थी कि सामग्री यदि लिफ़ाफ़े में है तो लिफाफा खुला होना चाहिए, बंद या सील किए हुए लिफाफे को बुक-पोस्ट के तहत नहीं भेजा जा सकता था। आजादी के बाद इसका खूब दुरुपयोग हुआ, लोगों ने सामग्री को अंदर चिपका कर लिफाफा खुला भेजना शुरू कर दिया। पर आज तक इस विभाग के किसी कर्मचारी ने इस पर शायद ही ध्यान दिया हो, क्योंकि सरकारी काम में कोई दर्द नहीं पालता। आज भी यदि आप एक डेढ़ सौ ग्राम का पत्र भेजना चाहेंगे तो खुले लिफ़ाफ़े के लिए दस रुपये, बंद के लिए चालीस रुपये और स्पीड-पोस्ट के लिए पैंतालीस रुपये के करीब चुकाने पड़ेंगे ! तो कोई क्यों साधारण डाक का इस्तेमाल करेगा ? जिसमें पत्र के सही-सलामत पहुँचाने की गारंटी भी नहीं है। तो इस घाटे की सेवा को ख़त्म कर साधारण डाक के बराबर कर देना चाहिए।

रही बात अखबारों की तो आज अधिकतर पेपर वाले अपना भार उठाने में सक्षम हैं, सब्सिडी पर कागज, जमीन तथा दूसरी सुविधाओं का चुपचाप उपयोग करते जा रहे हैं तो कम से कम वर्षों से चली आ रही पोस्टल छूट तो बंद कर ही देनी चाहिए। समय आ गया है रोना छोड़, ठोस उपाय अपनाने का चाहे वह पोस्ट लिए हो, अंतरदेशीय पत्र के लिए हो या अखबारों के लिए हो।

आज जब हर जगह प्रतिस्पर्द्धा गहराती जा रही है तो कोई तुक नहीं है कि हम जबरदस्ती घाटे को अपने ऊपर थोपवाते रहें। क्योंकि वह घाटा तो हमारी ही जेब से बिना हमें बताए पूरा किया जाता है !

सोमवार, 13 जून 2016

हमाम गायिकी यानि बाथरूम सिंगिंग के लिए भी एक अदद घराना होना चाहिए था

"पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर "बाथरूम सिंगिंग" यानि हमाम गायिकी के विषय को छुआ गया था, पर  उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी। हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे  को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती अनवरत जल-राशि से ही बनती है  !

बहुत दिनों से एक सोच आ-आ कर टक्करें मार रही थी कि गायकी का एक घराना और होना चाहिए था। सिर्फ गायिकी के घरानों की बात करें तो देश में ऐसे पच्चीस-तीस घराने ही तो होंगे, जहां अत्यंत उच्च कोटि का गायन सिद्धहस्त गुरुओं और उस्तादों द्वारा मनोयोग से सिखाया जाता रहा है। वहां प्रवेश मिलना तो दूर उसके लिए
ऐसे में सुर कैसे सधे 
सोचने की भी ख़ास योग्यता की जरुरत होती है। गुरु और शिष्य तन, मन और पूरी निष्ठा से सुरों को साधने में वर्षों लगा देते हैं। इसीलिए वहां से हीरे ही निकलते भी हैं। पर कितने ! पांच हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार  !!  पर मुद्दा यह है कि दुनिया को सिर्फ डॉक्टर ही थोड़े चाहिए होते हैं ! सहायक, नर्सें, वार्ड-ब्वाय भी तो लगते हैं। इसीलिए यह सोच बार-बार जोर मार रही थी कि एक अदद ऐसा घराना होना चाहिए था, जो काश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से आसाम तक पाए जाने वाले उन लाखों-लाख 'सुरतालयों' को, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से गली-मौहल्ले तक को सराबोर कर रखा हो, एक जगह इकट्ठा कर उन्हें अपना नाम दे उनकी पहचान बनवा सकने में सहायक होता। 

ये सुरताले वे कलाकार हैं जो देश के हर हिस्से में पाए जाते हैं। इनमें गायन की जन्मजात प्रतिभा होती है। इनका
पंचम सुर में आलाप 
पहला क्रंदन भी सुर से भटका नहीं होता, जिसकी गवाह उस समय इनके पास खड़ी दाई या नर्स हो सकती है।ऐसे स्वयंभू गायकों में भाषा भी कोई बाधा नहीं होती। इनके अनुसार गायन की हर विधा और भाषा पर ये पकड़ रखते हैं। पर इनके साथ विडंबना यह होती है कि जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे इनकी प्रतिभा तो फैलती जाती है यानि उस समय का हर दिग्गज गायक इनकी नक़ल के सामने बौना होता जाता है पर इनका खुद का भौतिक दायरा छोटा होता जाता है और ये घर के एक कमरे में, जिसे स्नानागार कहते हैं, सिमट कर रह जाते हैं। जी हाँ, उन्हीं हजारों - लाखों 'बाथ रूम सिंगर' की बात हो रही है जिन्हे देश कभी पहचान नहीं पाया।

एकाध बार इन्हें पहचान दिलाने की अधकचरी कोशिश हुई भी, जैसे फिल्म "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार जी द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर 'बाथरूम सिंगिंग' यानि  'हमाम गायिकी' के विषय को छुआ गया था, पर वह मूल मुद्दे से भटक एक हास्य दृश्य बन कर रह गया। उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी।  हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-लोटे या मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे-मग्गे को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती
जल-राशि से ही बनती है। गाने और पानी का सदियों से नाता रहा है या यूं कहिए पानी की कलकल ध्वनि ने गायन की विधा को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। अब सागर, नदियां, सरोवर तो वैसे रहे नहीं कि उनके किनारे सुर साधे जा सकें ! ले-दे कर स्नानगृह ही ऐसी जगह बची है जहां कुछ-कुछ पानी भी है, कुछ-कुछ तन्हाई भी और कुछ-कुछ फुर्सत भी जिसे दिल ढूँढ़ता रहता है। इसीलिए इसी कुछ-कुछ में बहुत कुछ ढूंढते इन अंजान कलाकारों को कोई तो ठीहा मिलना ही चाहिए ! तो लगता नहीं कि इन बहुआयामी कलाकारों को भी हक़ है अपनी पहचान बनाने का, अपनी कला को निखारने का, अपनी निश्छल सेवा भावना के बदले समाज से कुछ पाने का, अपना घराना बनवाने का !!  क्योंकि ये वे कलाकार हैं जो अपनी कला से प्यार करते हैं पर उस कला की मेहरबानी इन पर नहीं होती।         

गुरुवार, 2 जून 2016

अब बाल की खाल नहीं उतरती, उसकी कीमत वसूली जाती है

बंगाल के सैकड़ों गांवों में निर्धन परिवार की महिलाएं अपनी छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करने के लिए अपने खूबसूरत बालों का सौदा कर रही हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए या सोचे कि उनकी इस प्रकृति-प्रदत्त नियामत को बिचौलिए औने-पौने दामों में खरीद कर निहायत ऊंची कीमतों में बाजार में जा बेचते हैं। पर उन्हें इससे कोई मतलब नहीं, बाल घर की खेती हैं, दो-तीन महीने में फिर उतने के उतने

कोलकाता से करीब सवा सौ की.मी. दूर मिदनापुर का काननडीहि गांव। आबादी करीब दो-सवा दो सौ के लगभग। समय शाम के तीन बजे के आस-पास। एक सायकिल सवार डुग-डुगी बजाता गांव के बीचो-बीच पहुँच खड़ा हो जाता है। उसके साथ ही एक बड़े से सायकिल ठेले में घरों में काम आने वाला लोहे-अल्युमिनियम और प्लास्टिक का सामान भरा हुआ है। हर गांव में साप्ताहिक हाट की तरह इनके आने का दिन भी निश्चित होता है। तभी एक महिला अपने हाथों में लिए करीब आठ-दस इंच लम्बे बालों की लट सायकिल सवार को थमा देती है जो उसे तौल कर उसके बदले में महिला की पसंद की कोई वस्तु उसे थमा देता है। घंटे भर में कोई 12-13 महिलाएं-युवतियां अपने बालों के बदले अपने मन-मुताबिक़ जींस ले खुश-खुश घर की ओर लौट जाती हैं और क्रेता भी आधा किलो के करीब "सामान" बटोर अपनी राह लगता है। 

यह दृश्य बंगाल के किसी एक गांव का नहीं है। मुर्शिदाबाद, मिदनापुर, लालगोला, बनगाँव, बेहरामपुर जैसे दसियों जिलों के सैकड़ों गांवों में निर्धन परिवार की महिलाएं अपनी छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करने के लिए अपने खूबसूरत बालों का सौदा कर 
रही हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए या सोचे कि उनकी इस प्रकृति-प्रदत्त नियामत को बिचौलिए औने-पौने दामों में खरीद कर निहायत ऊंची कीमतों में बाजार में जा बेचते हैं। पर उन्हें इससे कोई मतलब नहीं, बाल घर की खेती हैं, दो-तीन महीने में फिर उतने के उतने। पर पैसों की चकाचौंध अधिकाँश महिलाओं को अपनी सुंदर केश राशि से जुदा करती जा रही है। जिससे उगने और काटने के गणित का फर्क साफ़ नज़र आने लगता है।  वैसे इस भारत से आयात किए जाने वाले ज्यादातर बाल इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसे बाल अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में काफी लोकप्रिय भी हैं।
बाजार की सबसे बड़ी पूर्ती हमारे मंदिरों से होती है पर गांव-देहात से इकट्ठा किए गए बालों की मांग इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि वे प्राकृतिक और बिना रंग, ट्रीटमेंट या मेंहदी लगे होते हैं। सबसे ज्यादा मांग डेढ़ से दो फुट लम्बे बालों की है जिनकी कीमत करीब 16000 रुपये किलो तक होती है।

प्रकृति के कारण तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बंगाल की महिलाओं और युवतियों के बाल देश भर में सबसे मजबूत, नरम, मुलायम, घने, सुंदर और गहरे काले रंग के होते हैं। जिसकी सर्वाधिक मांग रहती है। बालों की देख-रेख यहां की प्रथा रही है। जिस तरह से दिनों-दिन विग बनानेवाली कंपनियों और ट्रांसप्लांट चिकित्सा में मांग बढ़ रही है उससे इस तरह के "कच्चे माल" की देश-विदेश में भारी मांग बनने लगी है। जो सिर्फ हमारे देश में ही 25000 करोड़ के व्यवसाय का आंकड़ा छूने लगी है। यही कारण है कि हमारे पडोसी देश, बांग्ला देश, नेपाल या म्यांमार से रोज  करीब तीन से चार हजार किलो बालों की स्मगलिंग होने लगी है। इनकी कीमत भी इनकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है, जो 24 से 25 हजार रुपये प्रति किलो भी हो सकती है। पिछले साल भारत से लगभग
310 करोड़ रूपये के मानव बाल निर्यात किए गए थे। चीन इस खेल में भी हमसे कई गुना आगे है। बालों की पैकिंग उनकी गुणवत्ता के अनुसार की जाती है। जैसा कि हर व्यवसाय में होता है इसमें भी गलाकाट स्पर्द्धा की शुरुआत हो चुकी है।  सिर्फ कोलकाता एयर पोर्ट से ही अच्छी क्वालिटी के बालों के बंडलों, जो निर्यात होने थे की चोरी की ख़बरें लगातार आनी शुरू हो चुकी हैं। ऊंची गुणवत्ता के रॉ मेटेरियल की कमी इस मैदान के खिलाड़ियों को कुछ भी करने को मजबूर कर रही है।


पर उधर व्यवसाय में कुछ भी होता रहे पर अगली बार जब भी कटिंग करवाएं तो प्रकृति की इस नियामत को फ़िजूल की चीज ना समझें हो सकता है कुछ ही दिनों बाद आपके ये ही बाल, कुछ रूप-रंग बदल कर, अपनी कीमत वसूल, किसी जरूरतमंद के सिर की शोभा बढ़ा रहे हों।