बुधवार, 30 मार्च 2016

होली और सिन्थॉल साबुन

 तभी मैंने एक धमाका सा कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो पर खुश भी हो रहे थे उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे ...... 



कई बार बेहद पुरानी यादें भी ताजा होकर दिलो-दिमाग को गुदगुदा जाती हैं। जिससे बरबस चेहरे पर मुस्कान खिंच जाती है। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब नहाने के वक्त साबुन की नई बट्टी के "रैपर" को खोला, वर्षों पहले की एक घटना जीवंत हो उठी। वह भी शायद इस कारण कि अभी-अभी होली हो कर गुजरी है। वैसे तो नहाने के साबुन पर मेरे यहां प्रयोग चलते रहते हैं। नए-पुराने, देश-विदेश के उत्पादों उनके दावों, खासियतों को परखा जाता रहता है। पर घूम-फिर कर गोदरेज कंपनी के "सिन्थॉल" पर ही हम आ टिकते हैं।       वह भी सबसे
तब 
पहले वाले हरे रंग और लाल कवर वाले उत्पाद पर। जिस पर आजकल "original" लिखा रहता है। 

बात तब की है जब मेरे लिए नन्हें-मुन्ने का संबोधन एक साथ न होकर अलग-अलग होने लगा था। हमलोग तबके कलकत्ता के नजदीक कोन्नगर में रहा करते थे।  होली के एक-दो दिन पहले मेरे चाचा जी तरह-तरह के तोहफों के साथ वहीँ आ गए थे। उन दिनों सारे परिवार में मैं ही अकेला बच्चा था, सो अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है। तो मैं उनकी गोद में बैठा सब कुछ खोल-खोल के देख रहा था। तभी एक पैकेट से छह सिन्थॉल साबुन की बट्टियां भी निकलीं। उस समय तो इतना पता नहीं था पर बाद में जाना था कि गोदरेज ने जो अपना नया साबुन निकाला था ये वही था। पर अपन को इस सब की जानकारी से क्या लेना-देना था ! हमें तो यही लग रहा था कि होली है, उसके लिए ख़ास साबुन होगा रंग उतारने वाला। यही सोच हमने तो अपना सामान उठाया जिसमें वह साबुन भी था और चल दिए दोस्तों में रुआब गांठने। मित्र-मंडली मेरी पिचकारी, तरह-तरह के गीले-सूखे रंग, गुलाल इत्यादि देख-परख कर खुश हो रही थी।
अब 
क्योंकि उन सब को पता था कि उस सारे साजो-सामान का मैं अकेला नहीं, वे सब भी भरपूर उपयोग करने वाले थे। उन दिनों जब तक आपस में कुछ अनबन ना हो जाए सब कुछ सबका साझा ही रहता था और अनबन होती भी कितने समय के लिए थी !  तभी हमने एक धमाका कर दिया यह कह कर कि मेरे चाचाजी एक ऐसा साबुन लाए हैं मेरे लिए, जो कितना भी गहरा रंग हो उसे मिनटों में छुड़वा सकता है, इतना कह मैंने सिन्थॉल की एक टिकिया उनके सामने रख दी। सब उसे उठा, देख, सूंघ कर ऐसे हैरत में पड़े थे जैसे वह साबुन न हो कोई जादू की टिकिया हो। सच कहूं तो अपन भी उस समय यही समझ रहे थे कि होली पर ऐसे साबुन के लाने का एक ही मतलब हो सकता है जो हम समझ और समझा रहे थे। 

आज भी जब वह वाकया याद आता है तो अपनी समझ और दोस्तों के भोलेपन को याद कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। कैसे निश्छल मन हुआ करते थे। कैसा अपनत्व हुआ करता था। दोस्त-मित्र भाइयों की तरह होते थे, कुछ तेरा-मेरा नहीं हुआ करता था।  पर मन उदास भी हो जाता है आज और उस समय की तुलना कर !   

मंगलवार, 22 मार्च 2016

हुड़दंगी हम, जब पुते पेंट से........ बचपन की होली की यादें

अब अपन राम, लिपे -पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया........  
     
इंसान की बढती उम्र के साथ उसके दिमाग के बैंक के खाते में उसकी यादों रूपी धन की सदा बढ़ोत्तरी होती रहती है। जिस तरह जमा धन वक्त-बेवक्त काम आता है वैसे ही यादों की पूंजी मौका ए वक्त पर कभी-कभी दिल को सकून दे जाती है। कुछ यादों की तासीर आंवले की तरह होती है, जो उस समय तो कड़वी लगती है पर बाद में उसी में मिठास मिलने लगती है। जब भी कोई त्यौहार वगैरह आता है तो यही संचित यादें इंसान को वर्षों पीछे साथ ले जाती हैं। अब होली ने जैसे ही द्वार खटखटाया, यादों ने भी दिलो-दिमाग की खिड़कियां खोल दीं अतीत में झांकने के लिए।    
                    
वैसे तो होली के रंगों से परहेज किए क्यों, कैसे और कितने वर्ष बीत गए, याद नहीं पड़ता। पर उसकी बचपन की 
यादें अभी भी चेहरे पर मुस्कराहट लाने से बाज नहीं आतीं। ख़ास कर दो घटनाएं, जिन्हें घटे कम से कम आधी सदी बीत चुकी होगी पर फिर भी वे कल ही की घटी लगती हैं। उन दिनों कलकत्ते के पास कोननगर की लक्ष्मी नारायण जूट मील में बाबूजी कार्यरत थे। ऊंचा पद और रुतबा था। घर में एकलौता बालक, मैं। वैसे भी मील के स्टाफ में पांच-सात बच्चे ही थे। सभी की नज़र-ए-इनायत मुझ पर रहती थी। हुड़दंगी होना तो बनता ही था। सब का चहेता, जिसकी फूँक सिर्फ बाबूजी के सामने सरकती थी। 

उन दिनों दिवाली से ज्यादा होली के त्यौहार का बेसब्री से इंतजार  रहता था। मुझे अभी भी अपनी बड़ी वाली पीतल की पिचकारी की याद है जो जिद कर के ली थी। हालांकि भरने और चलाने में बहुत जोर लगाना   
पड़ता था। कभी-कभी तो मूँठ को जमीन पर टिका नली को दोनों हाथों से पकड़, शरीर का पूरा वजन डालना पड़ जाता था। होली के दो तीन दिन पहले से ही बाल्टी, पानी और पिचकारी मेरे दिन भर के साथी बन जाते थे। बंगले और मील को जाने वाले रास्ते  के बीच एक छड़ों वाला भारी-भरकम गेट था। उसी के एक तरफ मेरा मोर्चा जमा करता था। मील की पारी बदलने के वक्त उधर से गुजरने वाले मजदूरों के जत्थे ही मेरी पिचकारी का निशाना बनते थे। अधिकांश हँसते, बचते, भाग लेते थे। पानी होता ही कितना था ! पर कोई-कोई प्यार से ही समझाने की कोशिश कर कहता था, बाबा (बच्चे के लिए संबोधन) हम लोग नहीं खेलता। हम पर  रंग मत डालो। उस समय कहां जाति-धर्म का ज्ञान था, कहां इतनी समझ थी कि कोई क्यों होली नहीं खेलता ? लगता था कि पानी से बचने का बहाना कर रहा है। पर एक दो बार ध्यान आया कि जिनके लम्बी सी दाढ़ी होती है वही मना करते हैं। हालांकि  उनकी मनाही में भी गुस्सा या आक्रोश नहीं होता था। पर क्यों करते हैं यह समझ के परे ही रहता था। आज के माहौल में तो कोई वैसा सोच भी सकता है क्या ?      

दूसरी घटना जब भी याद आती है तो बेसाख्ता हंसी छूट जाती है। होली के ही दिन थे। शिकार तो मील की पारी बदलने पर ही मिलते थे। बाकी समय उनको तलाशना पड़ता था। सो एक दिन इसी तलाश में मील के औजार घर पहुँच गया, अपनी पिचकारी ले कर। एक बार, दो बार, तीन बार, प्यार से, बाबूजी का डर दिखा, सामान खराब होने की बात समझा, जब किसी भी बात का असर नहीं हुआ इस आफत की पोटली पर, तो कुछ तो सबक सिखाना ही था सो दो जनों ने मुझे पकड़ा और एक ने सफ़ेद ऑयल पेंट से मेरी बाहें और लातों को पोत दिया और चेहरे पर भी तिलक सा लगा छोड़ दिया। अब अपन राम, लिपे-पुते, पिचकारी घसीटते हुए पंचम सुर में गला फाड़ते  घर की ओर जो उन्मुख हुए तो उस सौ गजी फासले में जो भी हमें देखता हंसे बिना नहीं रह पाता। इससे हमारा दुःख और भी कई गुना बढ़ जाता था। मेरे क्रंदन की            
आवाज सुनते ही शिव, जो घर में काम करता था, दौड़ा हुआ आया और कुछ समझते ना समझते मुझे माँ के हवाले कर दिया। फिर जो धुलाई शुरू हुई, शायद घंटे से ऊपर ही कार्यक्रम चला होगा, तो होती ही चली गयी। माँ को यह चिंता थी कि बाबूजी के घर आने के पहले हालत काबू में आ जाए नहीं तो आज छितरैल पक्की है। जैसे-तैसे मुझे दुरुस्त किया गया।  पर मजाल है, माँ ने किसी को कुछ कहा हो या किसी की शिकायत की हो ! सब छोटे-बड़े अपने ही तो हुआ करते थे। कुछ भी होता था तो पहले अपने बच्चे या खुद की गलती देखी जाती थी। आज कोई बाहर वाला छोड़िए, घर का रिश्तेदार ही किसी के बच्चे को कुछ कहने की हिम्मत नहीं रखता।  

सोमवार, 21 मार्च 2016

होली, वैसी हुआ करती थी !

डफ वादक और मंडली फाग गाते हुए, घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, अपने पूरे रंग में आ जाते थे। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था....... 

प्रकृति जब अपने पूरे तरुणाई के साथ पृथ्वी पर छा जाती है तभी बसंत का आगमन होता है जो अपने चरम पर
हमें देता है होली का तोहफा। अपने यहां त्यौहार ढेरों हैं। सबकी अपनी खासियत भी है। पर इसकी खुमारी ही कुछ अलग है। ऐसी मस्ती, ऐसा बिंदासपन, ऐसी हुल्लड़ता, ऐसा बिल्लौसपन और किसी भी उत्सव में नहीं पाया जाता, जिसमें समाज की तरफ से भी रोक-टोक में ढील दे दी जाती हो। यही एक ऐसा त्यौहार है जिसमें नए कपड़ों, नए जूतों या अन्य किसी नवीन चीज की जरुरत हौसला पस्त नहीं करती। होने वाला खर्च डराता नहीं है। उल्टे पुराने कपड़ों-चप्पलों की बन आती है। हर बंदा-बंदी डम्प कर दिए गए, नकार दिए गए पुराने  कपड़ों में से इस दिन
 पहना जा सकने वाला वस्त्र खोजने लगता है। यही एक ऐसा उत्सव है जिसमें सच्चा समाजवाद झलकता है। ना कोई बड़ा ना कोई छोटा, ना कोई अमीर ना कोई गरीब, ना कोई खरा ना कोई खोटा, सब बराबर।

अपने बचपन के समय की होली की बहुत याद आती है। कलकत्ता के पास कोननगर में स्थित थी, लक्ष्मीनारायण जूट मील, जहां बाबूजी कार्यरत थे। स्टाफ में मारवाड़ी समाज की बहुलता थी, तो होली भी राजस्थानी रंग-ढंग से ही मनाई जाती थी। हफ्ते भर पहले से तैयारियां शुरू हो जाती थीं होली के स्वागत की। नयी चंग या डफ लायी जाती थी उसका तरह-तरह से परिक्षण कर तैयार किया जाता था। इतने सारे परिवारों के लिए ठंडाई, गुझिया, मिठाई, नमकीन इत्यादि का पर्याप्त मात्रा में इंतजाम किया जाता था। रंग तो फैक्ट्री में उपलब्ध होते थे पर व्यक्तिगत पिचकारियों की खरीद उनका रख-रखाव एक अलग काम हुआ करता था। उन दिनों प्लास्टिक का चलन नहीं था। पिचकारियां, पिचकारियों की तरह होती थीं। लोहे या पीतल की, तीन आकारों में छोटी,
मध्यम और बड़ी। उनमें दो तरह के "अड्जस्टमेंट" हुआ करते थे। एक फौव्वारे की तरह रंग फेंकता था, जिसकी दूरी के हिसाब से क्षमता कम होती थी। दूसरा एक धार वाला, जो कम से कम दस-बारह फुट तक पानी फेंक किसी को भिगो सकता था।

मील तो चौबीसों घंटे चलती थी। छुट्टी भी सिर्फ होली वाले दिन ही होती थी। इसलिए ड्यूटी के हिसाब से सारे कामों को अंजाम दिया जाता था। हफ्ते-दस दिन पहले से रात को डफ पर थपकियां पड़नी शुरू हो जाती थीं। "सर्रा-रा-रा"  की गूंज देर रात तक मस्ती बरसाती रहती थी। वैसे असली फाग गायन हम बच्चों के सो जाने के बाद ही शुरू होता था। होली वाले दिन स्टाफ के युवा टोली बना मील-परिसर में चक्कर लगाना शुरू करते थे। आगे-आगे डफ वादक अपनी मीठी तान में फाग गाते हुए चला करता था, पीछे पूरी टोली सुर में सुर मिलाती  चलती थी। घर-घर जा यथायोग्य अभिवादन कर, रंग लगा, लगवा कर एक दो-तल वाली इमारत के दालान में इकट्ठा हो, सब अपने पूरे रंग में आ जाते थे। ना कीचड़ या ग्रीस, ना कपड़ा फाडू
हुड़दंग। एक शालीनता तारी रहती थी पूरे माहौल में। वहां इमारत के ऊपर के दोनों तल भरे रहते थे, बच्चों और महिलाओं से, जो अपने-अपने हथियारों के साथ लैस हो अनवरत उन पर रंगों की बरसात बदस्तूर जारी किए
रहते थे। आज आश्चर्य होता है कैसे कलाकार थे वे, जो पानी की बेढब और तीखी बौछारों के बीच भी गायन का न सुर टूटने देते थे नाहीं ताल। डफ को पानी से बचाना एक अलग कलाकारी होती थी क्योंकि ज़रा सा पानी पड़ते ही उस पर मढा चमड़ा अपनी रंगत खो बेसुरा हो बैठता था।

घंटों चलने वाले इन सब कार्यक्रमों के बाद संध्या समय होता था प्रीतिभोज का। खाना-पीना मौज -मस्ती, गाना-बजाना या फिर मैदान में पर्दा लगा प्रोजेक्टर के माध्यम से किसी फिल्म का शो। पर उस शाम का मुख्य आकर्षण होती थी ठंडाई जो वहीँ तैयार की जाती थी। जिसका स्वाद आज तक नहीं भुलाया जा सका है।  उसके भी दो वर्ग हुआ करते थे, बच्चों और महिलाओं के लिए सादी और पुरुषों के लिए "बूटी" वाली। वहां का सारा
स्टाफ एक परिवार की तरह था। बड़े-छोटे का लिहाज, बड़ों के प्रति आदर-सम्मान तथा अनुशासन इतना कि मजाल है किसी बच्चे ने कभी आँख उठा कर भांग वाले पेय को देखा भी हो उधर युवा भी अपने से बड़ों का लिहाज कर ही उसका सेवन करते थे। जिस पर शिव जी की कृपा कुछ ज्यादा होने लगती वह चुपचाप वहां से खिसक लेता था। ना कभी हुड़दंग देखा सुना गया न ही कभी किसी गलत हरकत उभरने दिया गया।

कैसे थे वे दिन और कैसे थे वे लोग !!!             

शनिवार, 19 मार्च 2016

विद्या ददाति विनयम ???

आज शिक्षण एक व्यवसाय है जहां ज्ञान नहीं, "सूचनाओं" की जानकारी दे बच्चों को मशीनों की तरह परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है।  इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं .......  

एक बहुत लोकप्रिय सूक्ति है -
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम | पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत: सुखं" 
यानी विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।


इस सूक्ति को आजकल कई विद्यालयों-महाविद्यालयों ने अपना आदर्श वाक्य बना दिवालों पर चस्पा तो कर रखा है पर उसपर आचरण कम, दिखावा ज्यादा होता है। क्योंकि जब इस सूक्ति का आभिर्भाव हुआ था, तब और आज की विद्या में आमूलचूल यानी जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। वह पूजनीय शख्शियत हुआ करता था तथा अपने शिष्यों और समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित हो निष्काम भाव से अपना पूरा ज्ञान सौंप दिया करता था। उनका मुख्य ध्येय ही होता था शिक्षित, ज्ञानवान पीढ़ी का निर्माण। उस समय विद्या और शिक्षा का तकरीबन एक ही मतलब होता था। आज स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है। शिक्षा और विद्या पर भी, "जैसा बोओगे वैसा काटोगे, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से होय", जैसी कहावतें चरितार्थ होने लगी हैं।   


आज शिष्यों का मूल उद्देश्य केवल पढ़ लेना, या यूं कहिए कि रट लेना, परीक्षा देना और पास होना ही रह गया है। डिग्री-धारी का ठप्पा लग जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाने लगा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आजीविका का अर्जन हो कर रह गया है जबकि विद्या से मनुष्य को ज्ञान मिलता है। आज के शिक्षक भी यह समझते हैं। इसीलिए विद्यालय दुकानें बन गए हैं और शिक्षण एक व्यवसाय और वह भी ऐसा-वैसा व्यवसाय नहीं बल्कि जिसने अब देश के कई राज्यों की अर्थ-व्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर करवा लिया है, जहां जिसे ज्ञान कह कर बेचा जा रहा है, वह केवल सूचना है | मशीनों की तरह बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। इस अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में अभिभावक भी पैसा फेंकते जाओ और तरह-तरह की उपाधियां हासिल करते जाओ, जैसी होड़ में मजबूरन शामिल हैं। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं, ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है, जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों को धन तो प्राप्त हो जाता है पर ये लोग सदा अहंकार से ग्रसित रहते हैं। उनमें विनम्रता का सदा अभाव रहता है। इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं। उसी तरह ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है। ऐसी विद्या विनय नहीं अहम को जन्म देती है। 

समाज के हर तबके में ऐसे लोगों की भरमार हो चली है। जिसका उदाहरण रोज ही देखने को मिल जाता है। एक बात जरूर है ऐसे लोग "समदर्शी" हो जाते हैं। अपने अहम के चश्मे के पीछे से इन्हें हर इंसान, जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े से नज़र आने लगते हैं। अपने लिए उठा ज़रा सा विरोध का स्वर इन्हें जहर लगने लगता है। हर प्राणी जो इनके रास्ते में आए या खिलाफत करे वह दुश्मन नज़र आने लगता है। सोचने की बात है कि, क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही तो कोई ऐसी खामी नहीं पैठ गयी है, जिससे  संस्कारी, विचारवान, विवेकशील, सहनशील, परोपकारी, गुणवान, मानवतावादी इंसानों की खेप आनी ही बंद हो गयी है ?      

गुरुवार, 17 मार्च 2016

प्रभुता पाइ काहु मद नाहीं

ऐसे लोगों का अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला के सम्पर्क में आ जब  इनके सत्ता का मद, उफान खा, विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं..... 

सैकड़ों साल पहले तुलसीदास जी ने इस बात की फिर पुष्टि कर दी थी, जता दिया था कि समय के साथ भले ही लोगों के स्वभाव में, उनके विचारों में, उनके रहन-सहन में, कितने भी बदलाव आ जाएं पर कुछ ऐसा है जो कभी नहीं बदल पाएगा। उसी में एक है यह मदांधता का स्वभाव। जैसे ही मनुष्य को सत्ता, धन, बल मिलता है उसका सबसे पहला असर उसके दिमाग पर ही होता है। अपनी शक्ति के नशे में अंधे हो जाना आम बात  हो जाती है।  उसे अपने सामने हर कोई तुच्छ कीड़ा-मकोड़ा नज़र आने लगता है। 

कुछ समय पहले तक हालत ऐसी नहीं थी। किसी उच्च पद को पाने के लिए, शिखर तक पहुंचने के लिए, कुछ हासिल करने के लिए, उसके लायक योग्यता होनी जरूरी समझी जाती थी, मेहनत करनी पड़ती थी अपने इष्ट को पाने के लिए। साबित करना पड़ता था अपने-आप को। इसलिए बड़े लोगों में भी विनम्रता, त्याग, मानवता जैसी भावनाएं कभी भी विलुप्त नहीं होतीं। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जो शक्तिशाली होते हुए भी विनम्र हों, क्योंकि शक्ति और विनम्रता दोनों विपरीत स्वभाव के गुण हैं, लेकिन अगर ये एक ही इंसान में आ जाएं तो उस व्यक्ति को महान बना देते हैं। 

आज सारे संसार में एक अजीब सा माहौल है। पता नहीं कैसी प्रतिस्पर्द्धा चल रही है कि हर कोई एक अंधी दौड़ में शामिल है। हरेक को कहीं न कहीं पहुंचने की हड़बड़ी है और विडंबना यह है कि ज्यादातर लोग मेहनत या योग्यता की सहायता से नहीं बल्कि कुछ तिकड़म से, कुछ बाहुबल से और ज्यादातर धन-बल के सहारे वह स्थान हासिल कर लेना चाहते हैं, और वे सफल भी हो जाते हैं। ऐसे लोगों में लियाकत तो होती नहीं इसलिए उन्हें सदा अपना स्थान खोने की आशंका बनी रहती है। इसी आशंका के कारण उनके दिलो-दिमाग में क्रोध और आक्रोश ऐसे पैवस्त हो जाते हैं कि उन्हें हर आदमी अपना दुश्मन और दूसरे की ज़रा सी विपरीत बात अपनी तौहीन लगने लगती है। फिर इनका अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला पर सत्ता का मद जब उफान खा विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं। 

इस तरह के लोग समाज के हर तबके में उपलब्ध हैं। ये लियाकतहीन, मौकापरस्त, विवेकहीन लोग जहां भी रहते हैं वहीँ अराजकता विराजती है। पर सबसे चिंतास्पद बात यह है कि अब इस तरह के लोगों की पैठ राजनीती में भी बहुलता से होने लगी है। देश की नीतियों, योजनाओं, कार्य शैली पर भी इनके साये की छाया पड़ने लगी है। जो कि अशनि-संकेत की तरह है। इसके लिए आम नागरिक के साथ-साथ, मीडिया को, प्रबुद्ध-जनों को, राजनैतिक दलों को अपनी महत्वकांक्षाओं, अपने अहम, अपने स्वार्थ से ऊपर उठ, देश हित के लिए ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर दरकिनार करने की पुरजोर कोशिश करनी होगी। काम मुश्किल है, क्योंकि स्वार्थ आड़े आएगा पर कोशिश तो करनी ही है।      

शनिवार, 12 मार्च 2016

कौवे की धूर्तता, बकरी की सेल्फ़ी

आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी.........

जबसे सेवानिवृत्ति का समय शुरू हुआ है, दिवास्वपनों की बारंबारता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है। जल्द समझ ही नहीं आता कि हकीकत कब होती है और स्वप्न कब ! सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पर उसकी छोड़ी हुई फोटुएं ???
आज जैसे ही घर से निकलने लगा एक बकरानुमा आदमी या आदमीनुमा बकरा दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। मैं कुछ समझूँ या पूछूँ उसके पहले ही वह यह कहता हुआ अंदर आ गया कि आपके लिए एक सनसनीखेज खबर लाया हूँ, सुन लीजिए, आपका ही भला है, जिस चैनल को भी आप इसे देंगे उसके तो पौ-बारह हो ही जाएंगे, आपको भी आस-पास के लोग जानने लगेंगे। कब तक ब्लॉग पर मिली पांच-सात टिप्पणियों पर इतराते रहेंगे। मुझे भी सामने पोस्ट आफिस तक एक संपादक को तकाजे का पत्र पोस्ट करने ही जाना था, पर उसको अपने समय की अहमियत जताने के लिए घडी देखता हुआ बैठ गया। एक बार तो मन में आया कि इसकी मेरे पर ही मेहरबानी क्यों ? फिर सोचा मारो गोली ! देखते हैं शायद कुछ काम की ही बात निकल आए।

मेरे बैठते ही बकरे ने इधर-उधर देखा और बोला, आज आपको एक ऐसे झूठ का सच बताने जा रहा हूँ, जिसे सुन
कर आप गश खा जाएंगे। अब तो मेरी भी कुछ-कुछ उत्सुकता बढ़ने लगी थी। पर मैं कुछ बोला नहीं, उसकी तरफ देखता रहा। उसने कहना शुरू किया, यह घटना वर्षों पुरानी है, मेरी परदादी के समय की और उन्हीं से संबंधित। आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी। हमारे खानदान में तो सब को असलियत मालुम पड़ गयी थी पर फिर भी अपने सीधेपन और किसी की बुराई न करने के कारण इतने दिन किसी को कुछ नहीं बताया। पर आज जब उसके वंशजों का वर्चस्व देश में दिनों-दिन बढ़ता देखा तो रहा नहीं गया। चलिए पूरी बात बताता हूँ -
   
वर्षों पूर्व भी छल-कपट, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ, धूर्तता जैसी नियामतें हुआ करती थीं पर इनको धारण करने वाले महापुरुषों की संख्या नगण्य होती थी। सरलता, अच्छाई, भलाई, भलमानसता, भोलेपन का ज़माना होते हुए भी इस कौवे में ये सारी खूबियां भरी हुई थीं। पर उसे समाज में चतुर सुजान समझा जाता था।

उन दिनों भयंकर गर्मी पड़ी थी, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले, पोखर-तालाब, बावड़ी-कुएं सूखने की कगार पर पहुंच गए थे। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच गई थी। ऐसे ही एक दिन मेरी परदादी प्यास के मारे बदहाल हो पानी की तलाश में भटक रही थी। तभी
कुछ दूर एक झोंपड़ी के पास उन्हें एक पक्षी कुछ हरकत करते दिखा। उत्सुकतावश पास जाने पर पाया कि गर्मी से बेहाल, लस्त-पस्त, थका-हारा सा एक कौवा एक मटके में, पास पड़े कुछ कंकड़ों को उठा-उठा कर डाल रहा है। मेरी परदादी ने एक झाडी के पीछे खड़ी हो उसके क्रिया-कलाप के साथ ही अपनी भी "सेल्फ़ी" ले डाली। पर कुछ ही देर बाद कौवे ने थकान के मारे अपना प्रयास बंद कर दिया। इसी बीच उसकी नज़र मेरी परदादी पर पड़ी, पहले तो वह चौंक गया पर तुरंत जैसे संभल कर उसने उन्हें पास बुलाया और बोला, मटके के तले के पानी को मैं कंकड़ डाल-डाल कर ऊपर ले आया हूँ, तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो इसलिए तुम पहले पानी पी लो। वह तो बेहाल थी ही तुरंत मटके तक पहुंची पर पीना तो दूर उसे पानी दिखाई तक नहीं दिया। तभी कौवा अक्लमंदी दिखाते हुए बोला, एक काम करो, अपने सर की ठोकर से मटके को उलट दो जिससे पानी बाहर आ जाएगा, तब हम उसे पी लेंगे। ऐसा कर दोनों ने अपनी प्यास बुझाई ।    
मेरी परदादी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर ऐसा प्रचार किया कि सभी जगह उसकी भलमानसता तथा अक्लमंदी का गुणगान होने लगा। जो आज तक बदस्तूर जारी है। हम बकरा जाति को किसी बात को समझने में कुछ समय लग जाता है इसीलिए कुछ समय उपरांत ही हम सब को कौवे की धूर्तता का पता चल गया था। पर इसे भलमानसता समझिए या
अपनी बेवकूफी के प्रचार का डर हम आज तक चुप ही रहे ! पर अब आपसे गुजारिश है कि आप सच्चाई लोगों के सामने लाएं। प्रमाण के लिए मैं कुछ पुरानी फोटो भी साथ ले आया हूँ शायद आपके काम आ सकें।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि कैसे और क्या किया जाए ! इसलिए सारी कहानी, फोटो समेत आपके सामने रख रहा हूँ, सलाह और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिला दिवस, एक छलावा

महिला दिवस ? दुनिया की आधी आबादी के लिए, साल भर में सिर्फ एक दिन ! इतिहास की बात और थी, समय और था,  पर अब ? महिलाओं को यह गवारा ही कैसे है यह बेतुका भेद-भाव ! क्या वे कोई वस्तु हैं ? भुलाया जाता रस्मो-रिवाज हैं ? लुप्त होती प्रजाति है ? कहाँ है पुरानीु पीढ़ियों को तोड़ने को आतुर, मंदिरों-देवालयों में प्रवेश को ले आंदोलन को आयोजित करने वाले संगठन ? उन्हें यह भेद-भाव क्यों नहीं दिखाई देता ? विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं !! 
महिला दिवस। अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर सबसे पहले इसे 28 फ़रवरी 1909  अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के रूप में मनाया गया। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अंतर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया और इसे महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा, आदर और प्यार प्रकट करते हुए उनकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य के तौर पर समर्पित कर इसके लिए फरवरी का आखरी इतवार निश्चित कर दिया गया। 1917 में रूस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। उस समय रूस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अंतर होता है।
जुलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 की फरवरी का आखरी इतवार 23 फ़रवरी को पड़ा था जबकि ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च थी। चूँकि इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये 8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।   
पर धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा है जैसे यह दिवस भी एक अौपचारिकता, एक रस्म, एक तारीख भर हो कर रह गया है। क्योंकि सौ साल से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई उल्लेखनीय या बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आ पाया है। अभी भी वे शोषण का शिकार हैं ! अभी भी दुनिया भर में उन्हें दोयम दर्जा ही उपलब्ध है !  सोचने की बात यह है कि दुनिया की आधी आबादी, कायनात के आधे हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन किसने निश्चित किया है ? इतिहास की बात और थी, समय और था, पर अब ? महिलाओं को यह गवारा ही कैसे है यह बेतुका भेद-भाव ! क्या वे कोई वस्तु हैं ? भुलाया जाता रस्मो-रिवाज हैं ? लुप्त होती प्रजाति है ? जिसके संरक्षण के लिए एक दिन निर्धारित कर उसे बचाने के उपाय सोचे-बताए जाते हैं ! कहाँ है पुरानीु पीढ़ियों को तोड़ने को आतुर, मंदिरों-देवालयों में प्रवेश को ले आंदोलन को आयोजित करने वाले संगठन ? उन्हें यह भेद-भाव क्यों नहीं दिखाई देता ? वह शायद  इसलिए, क्योंकि यह सब निर्धारित करने वाला आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। उपर से यह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे।  विडंबना तो यह है कि इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी, मीडिया में कवरेज पाने के लिए,  कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर मीडिया, फिल्म या राजनीती की मेहरबानी से समाज में ऐसा स्थान पा चुकी हैं जिसकी  चकाचौंध उनके कर्मों के अँधेरे को छुपाने में सफल रहती है। आज जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की। 
ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं उद्यमी नहीं हैं, लायक नहीं हैं, मेहनती नहीं हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। पर पुरुष वर्ग ने बार-बार, हर बार उन्हें दोयम होने का एहसास करवाया है। आज सिर्फ माडलिंग को छोड दें, हालांकि वहां भी बहुत से तरीके हैं शोषण के, तो हर जगह, हर क्षेत्र में महिलाओं का वेतन पुरुषों से कम है। हो सकता है इक्की दुक्की जगह इसका अपवाद हो। कोई क्यों नहीं इसके विरुद्ध आवाज उठाता।  
जब भी कभी इस आधी आबादी के भले की कोई बात होती है तो वहां भी पुरुषों की ही प्रधानता रहती है। वहां इकठ्ठा हुए बहूरूपिए क्या कभी खोज-खबर लेते हैं, सिर पर ईंटों का बोझा उठा मंजिल दर मंजिल चढती रामकली की। अपने घरों में काम करतीं, सुमित्रा, रानी, कौशल्या, सुखिया की? कभी सोचते हैं तपती दुपहरी में खेतों में काम करती रामरखिया के बारे में? कभी ध्यान देते हैं दिन भर सर पर सब्जी का बोझा उठाए घर-घर घूमती आसमती की मेहनत पर ? नहीं ! क्योंकि उससे अखबारों में सुर्खियां नहीं बनतीं, टी.वी. पर चेहरा नज़र नहीं आता ! और कभी अपने मतलब के लिए यदि ऐसा करने की मजबूरी आन पड़ती है तो पहले कैमरे और माईक का इंतजाम कर अपनी छवि को गरीबों का मसीहा प्रचारित करने पर सारा जोर लगा दिया जाता है। ऐसे दिखावे जब तक खत्म नहीं होंगें, महिला खुद जब तक महिला का आदर करना नहीं शुरु करेगी तब तक चाहे एक दिन इनके नाम करें चाहे पूरा साल। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। 
आज जरूरत है उस समाज की सोच बदलने की, जो बच्चियों को श्राप समझता है। जिसे इतनी भी समझ नहीं कि ये ना होंगी तो हम क्या दुनिया ही नहीं होगी जरुरत है, इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। महिलाओं को दिल से बराबरी का दर्जा देने की। हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की। इस सब के लिए महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करनी होगी। यह इतना आसान नहीं है,  उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं। यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों?  पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं !!

बुधवार, 2 मार्च 2016

कौवे का पीछा छोड़ पहले अपना कान टटोल लें

यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है। उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर गलत हरकतें या बातें  कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो।   इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए.... 

कहा गया है, "नीम-हकीम खतराए जान।" यानी आधी-अधूरी जानकारी सदा से ही खतरनाक रही है, फिर वह चाहे किसी भी विषय की हो, किसी भी विधा की हो, किसी के भी बारे में हो। कटु सत्य यह भी है कि कमजोर यादाश्त के साथ-साथ अवाम का एक अच्छा खासा प्रतिशत इस कमी से भी ग्रस्त है, जिसका फ़ायदा, माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए, कुछ लोगों द्वारा सदा से उठाया जाता रहा है। ऐसे लोग भीड़ में यदि कह देते हैं कि, तुम्हारा कान कौवा ले उड़ा है तो भीड़ पहले कान टटोलने की जगह कौवे के पीछे दौड़ पड़ती है। जब तक
बात समझ में आती है तब तक तो बंटाधार हो चुका होता है। इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए।      
                दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों में कुछ ऐसे चरित्रों का उल्लेख है, जिन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ मानवता और समाज के लिए अपना सारा जीवन खपा कर लोगों को जीने की सही राह दिखाई। उनके कर्मों, उनके आदर्शों, उनके उपदेशों के कारण उन्हें मानव से इतर देवताओं या संतों का दर्जा मिला। आज भी लोग जात-पांत से परे उन्हें अपना इष्ट, अपना आदर्श, अपना संबल मान उनकी पूजा-अर्चना-इबादत करते हैं। पर कुछ मनोविकारी लोग अवाम की इसी आस्था को खंडित कर उसमें जाति-धर्म, भेद-भाव के विषाणु डाल समाज के टुकड़े-टुकड़े कर अपने घृणित मनसूबे पूरा करना चाहते हैं। इस तरह के घृणित कृत्यों के लिए ज्यादातर देवी-देवताओं को निशाने पर रखा जाता है।   
                    रविवार सुबह की सैर करने के दौरान ठाकुर जी ने एक एस.एम.एस. दिखाया। उसे पहले भी मैं देख चुका था और भी कई लोगों ने इस जहर फैलाते संदेश की शिकायत की थी। इसमें वर्ग विशेष को संबोधित कर उन्हें सचेत और जागरूक करने का दिखावा करते हुए प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं को सच-झूठ की मिक्सी में तोड़-मरोड़ कर ऐसे सामने रखा गया था, जिससे उन कथाओं की सीख, उनका अर्थ, उनका संदेश बिलकुल ही अलग और विवादास्पद लगने लगे। ठीक उसी तरह जैसे आजकल ऑडिओ-विडिओ टेप के साथ छेड़-छाड़ कर अपने मतलब की बात रेकॉर्ड कर ली जाती है।
                        उदाहरणार्थ संदेश में ऋग्वेद का उल्लेख कर श्री कृष्ण जी को असुर बताया गया है। किसी को भी भड़काने के लिए यह बात काफी है, क्योंकि आज की पीढ़ी के अधिकांश सदस्यों को तो शायद इस ग्रंथ का नाम ही मालुम नहीं होगा, तो उसमे लिखा क्या है इसको जानने की जहमत कौन उठाएगा ! इसी कमजोरी के कारण विष-बीज-रोपण का दुःसाहस किया गया है। जबकि उसी ग्रंथ में साफ़ शब्दों में बताया गया है कि असुर, वह जो सुर यानी देवता न हो। असु+र से बनने वाले इस शब्द का अर्थ बनता है, प्राण+वाला = प्राणवान या शक्तिमान। ऋग्वेद में ही इसका प्रयोग वरुण देव और अन्य देवों के साथ-साथ मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों के लिए भी किया गया है। यह अलग बात है कि समय के साथ इसका अर्थ भौतिक शक्ति मान लिया गया। 
                        ऐसे ही बहुत सफाई से "अबीर" को "अवीर" यानी कमजोर चिन्हित करने वाला बता, उसे होली के दिन उपयोग में न लाने को कहा गया है। जबकि देव-दानव और दानव-देव का घालमेल कर लोगों को भ्रमित कर उलझाने और उकसाने का प्रयास किया गया है। यह बात सफाई से छिपा दी गयी है कि ग्रंथों में इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख है कि सुरों के अलावा अन्य जातियों में भी परम प्रतापी लोगों की कभी कमी नहीं रही है।  
                       इसी तरह रात में शव दहन की बात को सच्चाई छिपाते हुए मुद्दा बनाने की कोशिश की गयी है कि हिंदू धर्म में सारे धार्मिक कार्य देवों को साक्षी मान किए जाते हैं। इसलिए खासकर मनुष्य के जीवन का यह अंतिम संस्कार सूर्य देव, जिनको आत्मा का कारक माना जाता है, वही जीवन और चेतना भी हैं, के सामने ही किया जाता है और फिर अन्धकार यानी रात्रि काल को कुछ अशुभ भी माना जाता है। जबकि इस प्रथा का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले यह क्रिया आबादी से बाहर की जाती थी एतएव जंगली जानवरों इत्यादि से बचाव के लिए इसे दिन में ही किए जाने का प्रावधान रखा गया हो। इसी तरह की कई आधी सच्चाई आधे झूठ वाली बातों को गड्ड-मड्ड कर समाज को दो-फाड़ करने का कुत्सित प्रयास इस एस.एम.एस. में किया गया है।  
                        इस संदेश से यह बात तो साफ़ है कि समाज की शांति, भाईचारे, सौहार्द, को नष्ट कर, वैमनस्य फैलाने का यह कुत्सित प्रयास है। यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है, ऐसी उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर इस तरह की हरकतें कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो। इसलिए आधे-अधूरे सच में लिपटे ऐसे तथ्यों की सच्चाई और जानकारी लोगों के सामने तुरंत आनी और लानी चाहिए। क्योंकि आजकल चारों ओर जैसा माहौल है उसमें इस तरह की हरकत आग में घी का काम ना करे इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। जिसके लिए जागरूकता की अति आवश्यकता है। हम सब को अपनी जाति, अपने धर्म, अपने हित को किनारे कर, दलगत लाभ से ऊपर उठ, एक साथ मिल कर, ऐसी ओछी हरकतों की भर्त्सना तो करनी ही चाहिए साथ ही ऐसे उपाय भी करने चाहिए जिससे ऐसी मानसिकता वाले लोगों और उनकी असलियत का समाज के सामने पर्दाफाश हो सके जिससे भविष्य में अपनी ऐसी घिनौनी हरकतों से समाज में भेद-भाव का बीजारोपण करने का कभी भी दुःसाहस ना करे सकें।