रविवार, 31 जनवरी 2016

रामायण की उप-कथा से जुड़ा कोटा का हनुमान जी का मंदिर

 रंगबाड़ी इलाके में विराजमान हनुमान जी 
चिर-काल से ही हमारे यहां कथा-कहानियों का चलन रहा है। धार्मिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, काल्पनिक, यथार्थवादी हर तरह के किस्से चलन में रहे हैं। समय के साथ-साथ परिवेश के अनुसार उनमें थोड़े बहुत फेर-बदल होते रहते हैं, उनमें उपकथाएं, उप-उप कथाएं जुड़ती रहती हैं। कभी-कभी तो इस जोड़-घटाव के कारण मूल कथा का स्वरूप ही बदल जाता था। एकाधिक बार  आख्यानों में आध्यात्मिक सत्य को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए काल्पनिक कथाओं का सहारा भी  लिया जाता  रहा है, जिसे कथा की रोचकता या कथानक पर अटूट आस्था के कारण पाठक अनदेखा कर देता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार तो कहानियाँ बनीं ही, धार्मिक और काल्पनिक गल्पों को सच्चाई के करीब लाने के लिए साक्ष्य खोजे और गढ़े गए। ऐसे अनोखे स्मारक देश भर में दिख जाते हैं।  पिछले दिनों महाकाव्य रामायण की एक उपकथा से जुड़े अवशेष राजस्थान के कोटा शहर में देखने का मौका मिला। कथा के अनुसार श्री राम के राज्याभिषेक पर भगवान शिव और हनुमान जी की भारत दर्शन की इच्छा को पूरा करने का जिम्मा लंका नरेश विभीषण ने लिया और उन्हें वृहदाकार कांवड़ में बैठा यात्रा शुरू तो कर दी पर शिव जी की शर्त के अनुसार कांवड़ के कहीं भी जमीन से छू जाने से यात्रा समाप्त हो जाएगी, के चलते उन्हें कोटा में अपना प्रयाण खत्म करना पड़ा था।  

कांवड़ के जिस हिस्से के धरा को छूने से शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव, वहीँ उनके मंदिर का निर्माण हुआ। उसी तरह कांवड़ का दूसरा सिरा जिस पर हनुमान जी बैठे थे वह रंगबाड़ी नामक जगह पर टिका वहीँ उनका मंदिर बना। पिछले दिनों कोटा प्रवास पर यहां बालाजी के दर्शन करने का सुयोग मिला था।      

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में ऐश्वर्या ही क्यों ?

इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था।

कल काफी दिनों बाद 26 जनवरी की छुट्टी पर ठाकुर जी मेरे यहां आए। कुशल-क्षेम की जानकारी तो फोन पर हासिल हो जाती थी पर आमने-सामने बैठ वार्तालाप हुए एक अरसा हो गया था। इधर-उधर की बातचीत के बाद अपनी आदत के अनुसार उन्होंने एक सवाल दाग ही दिया कि, शर्मा जी ये बताइये कि इतनी नामचीन, कुशल, अभिनय-प्रवीण अन्य अभिनेत्रियों के होते हुए भी कल फ्रांस के राष्ट्रपति के भोज में अभिनेत्री ऐश्वर्या राय को ही क्यों आमंत्रित किया गया ? क्या अमिताभ बच्चन की पहुँच के कारण ?

सवाल जायज था, समीचीन भी और प्रासंगिक भी। यह बात बहुत से लोगों के जेहन में उठी भी होगी। पर आम-जन के हित-अहित से कोई सरोकार ना होने के कारण कोई ख़ास तवज्जो नहीं मिल पायी और आम खबर की तरह आई-गयी हो गयी थी। पर सवाल तो सवाल था जिसका सही उत्तर भी होना चाहिए ! तो जहां तक मेरा अंदाज था और मुझे समझ में आया, इसमें अमिताभ बच्चन की दखल या रसूख की कोई भूमिका नहीं थी। ऐश्वर्या की फांस में उसकी छवि और पहचान ने ही यह सम्मान जुटाया था। पहली बात तो यह कि वहाँ की सरकार द्वारा उसे वहाँ के सबसे बड़े नागरिक सम्मान "Knight of the Order of Arts and Letters" से नवाजा जा चुका है। दूसरे वह वहाँ, दुनिया के प्रतिष्ठित फिल्म समारोह, "केन्स फिल्म फेस्टिवल" की तकरीबन नियमित मेहमान रही है। वहीँ उसकी दूसरी पारी की फिल्म "जज्बा" सबसे पहले फ्रांस में ही दर्शकों के सामने पेश की गयी थी। तीसरे वह फ़्रांस की मशहूर कॉस्मेटिक कंपनी "L’Oral Paris" की भी ब्रांड एबेंस्डर है। फिर पेरिस में उसने कई फिल्मों की फिल्मांकन में भाग लेकर वहाँ अपनी पहचान बना रखी है। वैसे भी एक सौम्य, गरिमामय, बुद्धिजीवी, विवादहीन, प्रतिष्ठित परिवार का सदस्य होने का फायदा तो होता ही है। 

यही सब वे वजहें हैं जो उसे दूसरी अभिनेत्रियों की बनिस्पत तरजीह दी गयी होगी। 

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

पंद्रह किलो सोने के साथ बाबागिरी !

वैसे तो "बाबा" शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे दादा, बुजुर्ग व्यक्ति और कहीं बालक भी। पर वृहद रूप में इस शब्द को ऐसे इंसान के लिए प्रयोग किया जाता है जिसने मोह-माया त्याग दी हो, सन्यास ले लिया हो, योगी हो। खुद को अनुशासित कर हर तरह की कुटेव से दूर रहता हो।  हमारे ग्रंथों और ज्ञानी-जनों के अनुसार ऐसा इंसान दुनिया की मोह-माया को त्याग प्रभू से लौ लगा लेता है, उसका किसी भी भौतिक चीज से व्यक्तिगत लगाव नहीं रहता, उसके मन में सिर्फ प्रेम बसता है, भक्ति बचती है, सर्वहारा के लिए करुणा शेष रह जाती है वह अपने-आप को परम-सत्ता को समर्पित कर देता है।

पर आजकल सारी मान्यताएं, धारणाएं बदली-बदली सी नजर आने लगी हैं। सन्यास लेने के बाद, बाबा कहलाने के बावजूद भी लोग मोह-माया नहीं त्याग पाते।  गुरु बन जाते हैं। शिष्यों की फौज खड़ी हो जाती है।  सैंकड़ों एकड़ में आश्रम खुल जाते हैं। ऐसे गुरु स्वयं ही भौतिक जगत से मुक्त नहीं हो पाते तो शिष्य को क्या मुक्ति दिला पाएंगे। यहाँ भी घृणा, द्वेष, शोषण, भय, प्रसिद्धि पाने की ललक, अपने-आप को श्रेष्ठ साबित करने की हवस, सब स्थाई भाव हैं। यहाँ भी जिसके साथ जन-बल होता है, सत्ता होती है, वह अराजक बन जाता है। यहां भी वह सब कुछ होता है, जो बाकी भौतिक जगत में होता है, अंतर होता है तो केवल वस्त्रों के रंग का | अपने-आप को औरों से अलग दिखाने की चाहत, समाज में अपने नाम की चर्चा की ललक, किसी भी तरह प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। जिसका नाम भी कभी नहीं सुना गया हो, वह भी अपने क्रिया-कलापों से रातों-रात मशहूरी पा लेता है। समाज में चर्चा का विषय बन जाता है। जैसा कि अभी पिछले दिनों एक तथाकथित बाबा की, अपने स्वर्ण-प्रेम के चलते, बहुत चर्चा थी मीडिया में। अक्सर हरिद्वार से कांवड़ ले दिल्ली आने वाले इस शिव-भक्त के शरीर पर पंद्रह किलो (इनके शिष्यों के अनुसार आठ किलो) सोना, जिसकी कीमत तकरीबन तीन करोड़ के ऊपर होगी सदा शोभायमान रहता है। किसी समय के व्यापारी ने अपने ताम-झाम से लोगों को आकृष्ट करवा अब "गोल्डन बाबा" की उपाधि हासिल कर ली है।       

अनगिनत नकारात्मक खबरों के बावजूद रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते, किसी अलौकिक चमत्कार की आशा में अभी भी लोगों की आस्था, विश्वास, श्रद्धा साधू-सन्यासियों के प्रति कम नहीं हुई है। पर उनसे आशा रखते हैं मार्ग-दर्शन की। अपेक्षा रखते हैं सात्विकता की। उन्हें लगता है कि ऐसे लोग आध्यात्म को गहराई से समझते हैं, प्रभू के ज्यादा करीब हैं इसलिए उनकी मुश्किलों का उनके कष्टों का, उनकी परेशानियों का निवारण कर सकते हैं। उनके दिमाग में ऐसे लोगों की छवि प्रभू के दूत की बन जाती है इसीलिए उनकी बेजा हरकतें भी उन्हें नागवार नहीं गुजरतीं। 

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

युद्ध-रत, कर्ण-घटोत्कच की अद्भुत प्रतिमा

राजस्थान के कुशल कारीगर तो सदा पाषाण में प्राण फूँकते रहे हैं।  उनके द्वारा निर्मित एक से एक उत्कृष्ट कलाकृतियां देश-विदेश में सराहना पाती रही हैं। ऐसी ही एक 2013 में निर्मित एक शानदार, विलक्षण, अद्भुत, वृहदाकार प्रतिमा राजस्थान के कोटा शहर के महावीर नगर 3 और रंगबाड़ी इलाके के एक चौराहे पर स्थित है। जिसमें महाभारत के उस पल को अतीत की गहराइयों से निकाल यादगार बना दिया गया है, जब कर्ण ने घटोत्कच के युद्ध-तांडव से कौरव सेना को बचाने के लिए, अर्जुन के वध के लिए संभाल कर रखे "शक्ति बाण" का प्रयोग कर वीर घटोत्कच का वध किया था।
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पूरी की पूरी मूर्ति ही अद्भुत है। जिसके एक-एक इंच पर कारीगरों की कला सजीव हो उठी है। इसकी भव्यता तो सिर्फ देख कर ही महसूस की जा सकती है उसका वर्णन करना मुश्किल है। ऎसी ही एक प्रतिमा बाली, इंडोनेशिया में भी स्थापित की गयी है।      

मकर सक्रांति, सूर्य के उत्तरायण के अलावा भी महत्वपूर्ण है

बाप-बेटे में कितनी भी अनबन क्यों ना हो रिश्ते तो रिश्ते ही रहते हैं। अपने फर्ज को निभाने और दुनियां को यह 
समझाने के लिए मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश कर उनका भंडार भरते हैं। इससे उनका मान घटता नहीं बल्कि और भी बढ़ जाता है। इसीलिए इस दिन को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है   
   
वैसे तो हमारे सभी त्योहार अपना विशेष महत्व रखते हैं।  लेकिन मकर सक्रांति का धर्म, दर्शन तथा खगोलीय दृष्ट‌ि से विशेष महत्व है।   ज्योत‌िष और शास्‍त्रों में हर  महीने को दो  भागो में बांटा गया है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल 
पक्ष। जो चन्‍द्रमा की गत‌ि पर न‌िर्भर होता है। इसी तरह वर्ष को भी दो भागो में बांटा गया है, जो उत्तरायण और दक्षिणायन कहलाता है और यह सूर्य की गत‌ि पर न‌िर्भर होता है। मकर सक्रांति के दिन से सूर्य धनु राशि से मकर राश‌ि में प्रवेश कर उत्तर की ओर आने लगता है। धनु राश‌ि में सूर्य का आगमन मलमास के तौर पर जाना जाता है।  इस राश‌ि में सूर्य के आने से मलमास समाप्‍त हो जाता है। यह एकमात्र पर्व है जिसे समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। 
बाप-बेटे में कितनी भी अनबन क्यों ना हो रिश्ते तो रिश्ते ही रहते हैं। अपने फर्ज को निभाने और दुनियां को यह 
समझाने के लिए मकर सक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश कर उनका भंडार भरते हैं। इससे उनका मान घटता नहीं बल्कि और भी बढ़ जाता है। इसीलिए इस दिन को पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में भी देखा जाता है।  इस अवधि को विशेष शुभ माना जाता है और सम्पूर्ण भारत में मकर सक्रांति का पर्व सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। मकर सक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्री तथा उतरायन को उनका दिन माना गया है इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रिया-कलापों का विशेष महत्व माना गया है |   
सूर्य के उत्तरायण होने के अलावा और भी कई कारणों से यह दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी सूर्य के उत्तरायण में आने का महत्व बताते हुए कहा है कि इस काल में देह त्याग करने से पुर्नजन्म नहीं लेना पड़ता और इसीलिए महाभारत काल में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण में आने पर ही देह त्याग किया था। ऐसा माना जाता है कि सूर्य के उत्तरायण में आने पर सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पूरी तरह से पड़ती है और यह धरा प्रकाशमय हो जाती है। इस दिन लोग सागर, पवित्र नदियों और सरोवरों में सूर्योदय
गंगा सागर 
से पहले स्नान करते हैं और दान इत्यादि कर पुण्य-लाभ प्राप्त करते हैं। 
पुराणों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज व गंगा को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण किया था। तर्पण के बाद गंगा इसी दिन सागर में समा गई थी, इसीलिए इस दिन गंगासागर में मकर सक्रांति के दिन मेला लगता है।

इसी दिन भगवान विष्णु और मधु-कैटभ युद्ध समाप्त हुआ था और प्रभू मधुसूदन कहलाने लगे थे। 

माता दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर वध करने के लिए धरती पर अवतार लिया था। 
मकर सक्रांति तब ही मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य का प्रति वर्ष धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश बीस मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद यह क्रिया एक घण्टे की देर यानी बहत्तर साल में एक दिन की देरी से संपन्न होती है।  इस तरह देखा जाए तो लगभग एक हजार साल पहले मकर सक्रांति 31 दिसम्बर को मनाई गई होगी। पिछले एक हजार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने से यह 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा हे कि पाॅंच हजार साल बाद मकर सक्रांति फरवरी महीने के अंत में जा कर हो पाएगी। 

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

धार्मिक स्थल और दर्शनार्थियों का पहनावा (ड्रेस कोड)

 मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ  और ऐसे ही धार्मिक - स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए         


जब से तिरुवंतपुरम के पद्मनाभ मंदिर के न्यास ने मंदिर में प्रवेश करने वालों के लिए खास पहनावा निर्धारित किया है तब से ही एक अनावश्यक बहस छिड़ गयी है। विडंबना है कि बाहर से आने वाले विदेशियों को इससे कोई शिकायत नहीं है वे जैसे भी हो इस नियम का भरसक पालन करते हैं, क्योंकि उनके आचरण में, उनकी आदत में अनुशासन शामिल होता है, वे दूसरे की भावनाओं का आदर करते हैं। मिर्ची हमें ही लगती है। हमारी आदत हो चुकी है नियम तोडना, कानून का उल्ल्ंघन करना, मान्यताओं का मजाक उड़ाना। दुर्भाग्यवश इसे आधुनिकता का पर्याय मान लिया गया है और इसके लिए लिए आड़ ली जाती है व्यक्तिगत स्वतंत्रता की। 
         
एक दो दिन पहले राजधानी के एक अग्रणी समाचार पत्र में "Who says god likes topless men but not jeans "? शीर्षक के साथ एक लेख छपा था। उसमें विद्वान लेखक ने बताया था कि कैसे ढीले कपड़ों में लोग असुविधा महसूस करते हैं। कैसे दौड़ते-भागते पास की दुकानों से कपडे ख़रीदते हैं।  कैसे उनका ध्यान पूजा में नहीं अपने  कपड़ों को संभालने में लगा रहता है ! ऐसे लोगों को क्या उत्तर दिया जाए ? इनको तो मालुम ही होगा कि चर्च में भी घुटनों और कंधों को ढक कर ही अंदर जाया जाता है।  लोग खुद ही आदर की भावना के तहत इस बात का ध्यान रखते हैं कि बिना आस्तीन के, बहुत तंग, टी शर्ट, मिनी स्कर्ट, या अधोवस्त्र दिखें ऐसे कपडे पहन कर प्रार्थना करने ना जाया जाए। कई जगह तो भले ही घंटों कतार में खड़े होने के बाद अंदर जाने का नंबर आया हो, यदि आगंतुक ने ढंग के कपडे न पहने हों तो उसे बाहर कर दिया जाता है। वहां तो कभी भी कोई हो-हल्ला नहीं करता ! कभी कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता का डंडा घुमाता अंदर जाने की जिद नहीं करता। 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, बौद्ध या जैन मंदिर या मठ और ऐसे ही धार्मिक स्थल पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र जरूर बन गए हैं पर इसके पहले वे पवित्र धार्मिक स्थल हैं। क्या कभी किसी ने मस्जिद में चलताऊ वस्त्र पहने किसी को देखा है ? वहां का चलन है कि शरीर का जितना ज्यादा से ज्यादा भाग ढका जा सके, ढक कर ही सजदा किया जाए। क्या गुरुद्वारों में बिना सर और शरीर ढके कोई जाता है ? वहां भी यदि किसी के पास उचित वस्त्र नहीं हैं तो वे उपलब्ध करवाए जाते हैं। नियम सबको मानना ही है। सीधा-साफ़ संदेश यही है कि ये जगहें तफ़रीह के लिए नहीं हैं। यहां व्यक्ति सर्वोच्च शक्ति के पास शीश नवाने आता है, उसके दर्शन करने आता है, उसके रहमो-करम पाने के लिए आता है या फिर घूमने ही आता हो, पर यह किसी का हक़ नहीं बनता कि वह वहां के कायदे-कानून पर सवाल उठाए या अमर्यादित व्यवहार करे। उस पवित्र स्थल की गरिमा या मर्यादा को भंग करने की किसी को भी इजाजत नहीं होनी चाहिए।   

वैसे तो अधिकांश पर्यटक अपने गंतव्य की पूरी जानकारी ले कर ही घूमने निकलते हैं, उन्हें हर जगह के नियम-
कानूनों की जानकारी होती है। कभी-कभी किसी गाइड की लापरवाही से हो सकता है कि किसी परेशानी का सामना करना पड़ जाता हो। पर वे अपनी असुविधा को भी खेल भावना से ही लेते हैं। उनके उलट हम जैसे ज्यादातर स्थानीय घुमक्कड़ पैसा बचाने के लिए कभी गाइड का सहारा नहीं लेते, ना ही हम अपने देश में कहीं जाते हुए उस जगह की जानकारी लेने की आवश्यकता समझते हैं। हमारा ज्यादातर प्रवास लोगों की बातों और "देखा जाएगा" कि भावना पर आधारित होता है। इसीलिए कहीं जब कोई बात हमें अपने मन-मुताबिक नहीं मिलती तो हम आक्रोशित हो जाते हैं। अधकचरे ज्ञान, अपूर्ण जानकारी और विदेशी सभ्यता के अंधानुकरण से धीरे-धीरे जैसा माहौल बनता जा रहा है, या बनाया जा रहा है उसके चलते अपनी संस्कृति, अपने रस्मो-रिवाज, अपनी मान्यताओं का मजाक उड़ाना या विरोध करना आजकल आधुनिकता और फैशन का प्रतीक बन गया है। उदहारण स्वरूप जैसे शिंगणापुर के शनिदेव के चबूतरे पर महिलाओं के चढने पर प्रतिबंध की बात है, तो हो सकता है कि उस समय के महिलाओं के वस्त्रों को ध्यान में रखते हुए तेल के कारण रपटीली सतह पर उनकी सुरक्षा को ध्यान में रख कर ही वैसा नियम बनाया गया हो !  इसलिए जरुरत है कि पुराने तौर-तरीकों का सही और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद ही उसकी आवश्यकता या अनुपयोगिता का निर्धारण किया जाए। न की जोश में किसी के दवाब में आ कोई भी फेर बदल कर दिया जाए। 

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

कोटा का "सेवन वंडर्स पार्क"

साफ़-सुथरा लॉन, समतल पैदल पथ, झील के किनारे बनी मनमोहक राजस्थानी शैली के बने जालियों वाले झरोखे, नौका विहार के लिए जेटी तक जाने वाले रास्ते पर बना खूबसूरत पुल सब उत्कृष्टता का अनुपम उदाहरण हैं। दिन में तो लोग आते ही हैं पर संध्या होते ही जैसे रेला ही उमड़ पड़ता है। अंदर जाने के लिए टिकट घर पर मीटरों लंबी कतार लग जाती है 

हर शहर की कोई न कोई खासियत जरूर होती है। किसी का संबंध धर्म से होता है, कोई ऐतिहासिकता समेटे होता है, कोई अपने वास्तुशिल्प के कारण खबरों में रहता है, कोई अपनी आधुनिकता के कारण। शहर के नियंता भी कोशिश करते रहते हैं, जिससे उनका शहर पर्यटकों इत्यादि को आकर्षित कर सके। 
प्रवेश द्वार 
विहंगम दृश्य 
वैसे तो राजस्थान का कोटा शहर अपनी   "कोचिंग"    के कारण असाधारण प्रसिद्धि पा चुका है पर इसके साथ-साथ वहां ढेरों ऐसी  जगहें हैं जो वहां आने वाले के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती हैं। इसी तरह की एक जगह है "सेवन वंडर्स", जो शहर के बीच बल्लभ बाड़ी में स्थित किशोर सागर लेक के एक किनारे पर बनाया गया है।इसमें संसार की प्रसिद्ध इमारतों के लघु रूपों को हूबहू प्रदर्शित किया गया है।


                                                                  जालीदार झरोखे 
किसी समय यह उपेक्षित जगह पूरी तरह कूड़ा घर में तब्दील हो चुकी थी। गंदगी और दुर्गन्ध का आलम था। भला हो आवासीय मंत्री श्री शांति धारीवाल जी का जिन्होंने अपनी कल्पना को साकार रूप दे इस जगह का चेहरा बदल लोगों को गंदगी से निजात तो दिलवाई ही ऊपर से राज्य को आमदनी का एक अजस्र स्रोत भी दे दिया। जो एक अजूबे के रूप में, करीब 20 करोड़ की लागत, 150 कर्मियों, जो कि आगरा, भरतपुर और धौलपुर जैसी जगहों से बुलाए गए थे, की अथक मेहनत और डेढ़ साल की अवधि में बन कर सामने आया। आर्थिक मदद  "अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट" द्वारा प्रदान की गयी। प्रवेश शुल्क सिर्फ दस रुपये प्रत्येक के लिए रखा गया है। जो वाजिब है।
अंदर जाते ही पहले नजर आता है रोम का खरलों के लिए विश्व-प्रसिद्ध थियेटर,  "कोलोजियम"  का लघु रूप। हालांकि उसके भग्न रूप को यहां प्रदर्शित नहीं किया गया है। रोम से मिश्र की दूरी चाहे कितनी भी हो पर यहां दोनों पडोसी हैं। कोलोजियम से कुछ ही दूर खड़ा  "पिरामिड"  अपने वामन अवतार में सबका ध्यान आकर्षित करने में सफल रहता है। इनके बाद वह इमारत स्थित है जिसके दुनिया भर में मुरीद हैं और उसे किसी परिचय का मोहताज नहीं होना पड़ता, जी हाँ, हमारा "ताजमहल"। भले ही वह असली ना हो पर भीड़ सबसे ज्यादा उसी के पास रहती है।  चौथे नंबर पर है ठीक उसी तरह अपने एक हाथ में मशाल और दूसरे में किताब लिए अमेरिका की पहचान "स्टैचू आफ लिबर्टी"। इसके बाद देखने को मिलती है वह इमारत जो हैरतंगेज ढंग से एक तरफ झुकी हुई है और इसी कारण उसका नाम भी "पीसा की झुकी मीनार" पड़ गया है। उसकी यह प्रतिकृति परिधि में तो नहीं पर ऊंचाई में लगभग अपनी  मूल कृति के बराबर नजर आती है।
कॉलोजियम  
पिरामिड का वामन रूप 

परिचय की कोई जरुरत नहीं 

पीसा की मीनार के बाद ही एक और मीनार आकाश से बाते करती दूर से ही नजर आती है, आए भी क्यूँ ना, एक तो उसका शहर ही ऐसा है तिस पर उसकी बुलंदगी, जिससे कारण दुनिया भर में उसको देखने आने वालों की संख्या किसी भी और ईमारत से ज्यादा है, यह है पेरिस का "एफिल टॉवर"। पेरिस में तो इसकी जो शान है सो है यहां भी नीली रौशनी में नहाता उसका प्रतिरूप सबको सम्मोहित कर लेता है और फिर दर्शक जैसे ही इसके सम्मोहन से मुक्त होता है तो अपने आप को ब्राजील में ईसामसीह की बाहों में पाता है। यह है इस स्वप्न लोक की सातवीं और अंतिम प्रतिकृति ब्राजील की सबसे ऊंची चोटी पर खड़ी सबको अपने आश्रय में लेती "Christ the Redeemer"।  
लिबर्टी की प्रतिमा 



झुकी मीनार 

एफिल टावर 
"Christ the Redeemer"।  
इन विश्व-प्रसिद्ध स्मारकों की प्रतिकृतियों को बनाने में हुए खर्च के अलावा इसके आस-पास की जगह को भी करीने से सजाने में काफी खर्च हुआ है जिसको साफ़ महसूस किया जा सकता है। साफ़-सुथरा लॉन, समतल पैदल पथ, झील के किनारे बनी मनमोहक राजस्थानी शैली के बने जालियों वाले झरोखे, नौका विहार की जेटी तक जाने वाले रास्ते पर बना खूबसूरत पुल सब उत्कृष्टता का अनुपम उदाहरण हैं। दिन में तो लोग आते ही हैं पर संध्या होते ही जैसे रेला ही उमड़ पड़ता है। अंदर जाने के लिए टिकट घर पर मीटरों लंबी कतार लग जाती है। अभी तो इसे पूर्ण हुए दो-तीन साल ही हुए हैं, आशा करनी चाहिए कि इसका रख-रखाव ऐसा ही बना रहे जिससे या सालों-साल स्थानीय और बाहर से आने वाले लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहे। 

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

उपाय तो ढूँढना ही पड़ेगा

समय अब ऐसा है कि राजनीति और उसके दलों के दाव-पेंचों से हट कर हम सब को दिल्ली की जहरीली आबोहवा से छुटकारा पाने के बारे में सोचना ही है। सिर्फ विरोध करने के लिए ही किसी भी कदम का विरोध करना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा पाएगा। हाँ यदि किसी के पास बेहतर हल है तो उसे भी अपना व्यक्तिगत फ़ायदा ना देखते हुए सबके सामने बिना देर किए रखना चाहिए     

करीब हफ्ते भर बाद जब छह तारीख को दिल्ली लौटना हुआ तो मन में सबसे बड़ी यही जिज्ञासा थी कि गाड़ियों के लिए लागू सम-विषम वाले नियम का क्या असर रहा। इसीलिए गाडी से सबको भेज कर मैंने सराय काले खान से 711 न. की बस से जाने का निर्णय लिया। स्टेशन से उत्तमनगर तक आँखें यातायात का जायजा लेती रहीं। पाया कि सड़कें पहले की अपेक्षा हल्की रह, राहत की सांस ले पा रही थीं। गाड़ियां खड़ी या रेंगना छोड़ चल रहीं थीं। रास्ते में सिर्फ साऊथ एक्स. के पास कुछ जाम था अन्यथा धौला कुआं और सागरपुर जैसी सदा तंगाने वाली जगहों में भी आराम से बस निकल गयी। बस में भी भीड़-भाड़ जैसा कुछ नहीं था। लाल बत्ती को छोड़ कहीं भी बेमतलब का रुकना नहीं हुआ। रोज के पौने दो से दो घंटों के बजाय, करीब डेढ़ घंटे में बस ने मुझे उत्तमनगर पहुंचा दिया।        

पहले 
रेंगना भी मुश्किल 

कुछ तो राहत है 

कहीं-कहीं तो ऐसा भी दिखने लगा है 
समय अब ऐसा है कि राजनीति और उसके दलों के दाव-पेंचों से हट कर हम सब को दिल्ली की जहरीली आबोहवा से छुटकारा पाने के बारे में सोचना चाहिए। सिर्फ विरोध करने के लिए ही किसी भी कदम का विरोध करना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा पाएगा। दिल्ली को प्रदूषण मुक्त करने के लिए गाड़ियों के लिए सम-विषम का जो नियम बनाया गया है, हो सकता है कि यह जल्दबाजी में उठाया गया कदम हो, जिससे नागरिकों को कुछ मुश्किलातों का सामना करना पड़ रहा हो, पर है भी तो उनके भले के लिए।
हवा न सही पर सड़क ने राहत की सांस जरूर ली है 
हो सकता है कि प्रदूषण पर तात्कालिक असर ना पड़ा हो पर सडकों पर भीड़ जरूर कम हुई है। जिसका फायदा आनेवाले दिनों में दिखेगा। सो हड़बड़ी में इसको नकारने की बजाय इसके फायदे का आंकलन जरूर होना चाहिए। विरोध करने वाले अपनी जगह ठीक हो सकतें हैं पर ऐसे लोगों का भी फर्ज बनता है कि यदि उनके पास कोई और उपाय है तो सिर्फ व्यक्तिगत या अपनी पार्टी के भले को न देखते हुए उसे सुझाएं। क्योंकि यह समस्या व्यक्तिगत या किसी एक दल की नहीं है पूरे देश की है। इसीलिए आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य को मद्देनज़र रख सिर्फ मौजूदा अड़चनों को देखते हुए भविष्य को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि दिन-ब-दिन आबादी तो बढ़नी ही है सो प्रदुषण घटने से रहा ! इसीलिए अभी से ही कोई न कोई रास्ता जरूर निकालना पडेगा। जल्दीबाजी में इसको नकारना या फिर बंद करना किसी भी नजरिये से उचित नहीं होगा।          

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

कोटा का विभीषण मंदिर

जैसे - जैसे   इस    जगह की   ख्याति  और  जानकारी  बढ़ रही है वैसे - वैसे यहां लोगों के आने - जाने में भी बढ़ोत्तरी होने लगी  है। जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख - रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है।  


वर्षों बाद अभी एक-दो दिन पहले राजस्थान के कोटा शहर जाने का मौका मिला  तो फिर  कैथून जाने का लोभ संवरण नहीं कर सका। कोटा जिले से बीस - पच्चीस की. मी. दूर यह वही जगह है,  जहां कोटा-डोरिया की विश्व-प्रसिद्ध साड़ियां     बनायी जाती हैं।     वहीँ स्थित है, रावण भ्राता,         विभीषण का दुनिया का  एकलौता मंदिर, जहां उसकी देवता के रूप में पूजा होती है।     यह मंदिर  चौथी शताब्दी  का बना  हुआ है।   यहां हर साल मार्च के महीने   में   मेले का आयोजन   किया जाता है।  धीरे - धीरे, जैसे - जैसे   इस    जगह की ख्याति और जानकारी  बढ़ रही है वैसे - वैसे यहां लोगों के आने-जाने में भी बढ़ोत्तरी होने लगी  है। जिसका असर मंदिर की साज-सज्जा और रख - रखाव को देख साफ़ पता चलता है। पहले की अपेक्षा अब तो बहुत बदलाव हो गया है।  

यह सही है कि राम-रावण समर में विभीषण ने राम का साथ दिया था वैसे भी वह धार्मिक प्रवृति का था। पर था तो राक्षस कुल का ही, ऊपर से  भाई के विरुद्ध जाने के कारण उसे कुलघाती माना जा कर दुनिया भर की बदनामी भी मिलती रही है । फिर भी उसके मंदिर का होना एक आश्चर्य का विषय है। यहां मंदिर बनने की कथा कुछ इस प्रकार है कि जब लंका-विजय के पश्चात श्री राम का राज्याभिषेक होने लगा तो सारे ब्रह्माण्ड से अतिथियों का आगमन हुआ था। कैलाश से शिव जी और लंका से विभीषण भी पधारे थे। समारोह के पश्चात शिव जी ने हनुमान जी से भारत भ्रमण की
मंदिर का पार्श्व भाग 
इच्छा जाहिर की तो विभीषण ने आग्रह किया कि शिव जी और हनुमान जी को कांवड़ में बैठा कर यात्रा करवाने की उनकी कामना को पूरा करने का सुयोग प्रदान किया जाए।भगवान शिव मान तो गए पर उन्होंने एक शर्त रख दी कि यदि यात्रा के दौरान कहीं कांवड़ भूमि से छू गयी तो वहीँ यात्रा का अंत कर दिया जाएगा।  विभीषण ने बात मान ली और एक ऐसी कावंड बनवाई जिसके दोनों छोरों में आठ कोस की दूरी थी। उसी में एक तरफ शिव जी तथा दूसरी तरफ हनुमान जी बैठ गए। पर प्रभुएच्छा से कुछ समय बाद जब ये लोग कैथून, तब की कनकपुरी, पहुंचे तो शिव जी वाला हिस्सा जमीन से छू गया और शर्तानुसार यात्रा वहीँ ख़त्म हो गयी। जिस जगह शिव जी उतरे वह जगह थी चौमा गांव वहीँ उनका मंदिर भी बना। उसी
अंदरुनी भाग 
तरह कोटा के रंगबाड़ी स्थान पर हनुमान जी स्थित हो गए, दोनों जगहों की प्रतिमाएं आज भी अपनी अपूर्व छटा के साथ विद्यमान हैं। इसी तरह इनके बीचोबीच कैथून में, जहां विभीषण जी ठहरे थे, वहाँ उनके मंदिर की स्थापना हो गयी। जहां उनके धड़ के ऊपरी भाग की पूजा की जाती है।

मंदिर के अंदर की छत 
अपने यहां बचपन से ही कथा-कहानियों के सुनने-सुनाने का दौर शुरू हो जाता है और घरवालों की आस्था तथा मान्यताओं के अनुरूप ही हम अपने मन में उन कथाओं के चरित्रों की छवि गढ़ लेते हैं,  जो ता-उम्र वैसी ही बनी रह कर आगे भी उसी रूप में स्थानांतरित होती चली जाती है। ये अलग बात है कि कोई चरित्र किसी के लिए नायक का होता है तो वही किसी और के लिए खलनायक का। इसका कारण स्थान, वहां के लोगों की आस्था, वर्षों से चली आ रही मान्यताएं कुछ भी हो सकता है।  है। पर अभी भी कोटा शहर में भी ऐसे लोग मिल जाएंगे जो इस मंदिर के बारे में अनजान हैं।  जो भी हो मंदिर तो है ही और पूजा भी होती ही है। कभी कोटा जाएं तो इस जगह को जरूर ध्यान में रख घूम कर आएं।