मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

मौकापरस्ती ने चमगादड़ को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा

देश के कुछ हिस्सों में चुनाव चल रहे हैं।  उनमें राजनैतिक दलों द्वारा कैसे-कैसे गठबंधन और दांवपेंच खेले जा रहे हैं उसे देख-सुन कर आश्चर्य और कोफ़्त दोनों ही हो रहे हैं। साफ़ नजर आ रहा है कि शर्म-हया-उसूल-मर्यादा, सब को ताक पर रख किसी भी तरह सत्ता हथियाने या कम से कम उससे जुड़ ही पाने के लिए कोई भी दल किसी भी तरह का समझौता करने के लिए बिकने को तैयार खड़ा है, भले ही उसकी लानत-मलानत होती रहे। राजनीती के सरोवर में जहां कभी-कभी फूल खिल भी जाते थे अब तो वहाँ की सड़ांध के मारे लोग बिदकने लगे हैं पर मजबूरी है, चुनाव के तमाशे में भाग लेने की ! आज के माहौल को देख एक पुरानी कहानी याद आ रही है -               

वर्षों पहले की बात है, जंगल में पशु और पक्षी मिल-जुल कर रहा करते थे।  सबका आपस में भाईचारा, सौहार्द, प्रेम  की मिसाल दी जाती थी। अपनी जरुरत से ज्यादा कोई एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करता था। अच्छा-भला समय गुजर रहा था। पर एक बार लंबा अकाल पड़ा। नदी नाले, सरोवर-झील-ताल सब सूखने की कगार पर आ गए। पानी के लिए हाहाकार मच गया। इसी के कारण जानवरों और पक्षियों में भी ठन गयी। जानवरों का तर्क था कि हम जमीन पर रहते हैं और वही ताल-तलैया हैं, इसलिए उन पर हमारा हक है। पक्षियों ने इसका विरोध किया कि पानी कुदरत की देन है और उसके बिना जीया नहीं जा सकता तो उस पर पशु अपना हक कैसे जमा सकते हैं ? बात बढ़ती चली गयी और नौबत युद्ध तक जा पहुंची। दोनों तरफ के लड़ाके आमने सामने आ डटे। लड़ाई शुरू हो गयी।

उसी जंगल में चमगादडों का भी झुंड़ रहा करता था। पर उनको किसी से कोई मतलब नहीं था, चिंता थी तो सिर्फ अपनी, बाकी कोई मरे-जिए उनकी बला से। पर जब पूरा जंगल दो गुटों में बंट गया तो उन्हें भी किसी का पक्ष लेना पड़ना था। तो उन्होंने आपस में सोच-विचार कर यह फैसला किया कि इंतज़ार कर माहौल देखेंगे और जो गुट जीतेगा उसी के पक्ष में वे खड़े हो जाएंगे। उधर एक-दो दिन के युद्ध में ही हजारों पक्षी हताहत हो गए, पशुओं का पलड़ा पूरी तरह भारी  हो गया। यह देख चमगादड़ पशुओं के राजा सिंह के पास जा हाथ जोड़ कर बोले, महाराज हम भी बच्चों को जन्म देते हैं और पशुओं की तरह उन्हें दूध पिलाते हैं इसलिए हम भी आपकी श्रेणी में ही आते हैं हमें अपनी शरण में ले लीजिए। शेर वैसे ही जीत के नशे में था उसे क्या फर्क पड़ता था चमगादड़ के आने-जाने से, सो उसने उन्हें पशुओं के साथ रहने की अनुमति दे दी।

इधर अपनी हार से हताश-निराश पक्षी गरुड़ महाराज के पास पहुंचे और अपनी हालत बयान की। सारी बातें सुन गरुड़ बोले, तुम्हारी हार का कारण तुम्हारा जमीन पर रह कर लड़ना है, तुम्हें तो भगवान ने पंख दिए हैं, तुम उड़ते हुए लड़ोगे तो बिना किसी क्षति के तुम्हारी जीत हो जाएगी। दूसरी सुबह गुरुमंत्र के साथ पक्षियों ने युद्ध आरंभ किया और शाम होते-होते पशुओं की सेना तितर-बितर हो गयी। यह देख मौकापरस्त चमगादड़ तुरंत पक्षियों के राजा के पास गए और बोले, महाराज ! हम तो पक्षियों की श्रेणी में आते हैं, पेड़ों पर रहते हैं, आप सब की तरह उड़ कर ही आते-जाते और शिकार करते हैं, हमें अपनी शरण में आने दीजिए। खगराज ने भी उन्हें पक्षी मान लिया।

अब होता क्या है कि दो-तीन दिन की लड़ाई में हुई बर्बादी देख दोनों पक्ष सहम गए और युद्ध ख़त्म करने की
घोषणा हो गयी। जंगल में आम सभा बुलाई गयी और सारे गिले-शिकवे-द्वेष भुला कर एक साथ रहने पर समझौता हो गया। पानी के बंटवारे पर जब दोनों दलों के हर सदस्य को सबके सामने बुला उसके हिस्से के बारे में बताया जाने लगा तब चमगादड़ की पोल खुल गयी कि कैसे उसने पशु और पक्षियों को बेवकूफ बना अपना स्वार्थ सिद्ध किया था। बस फिर क्या था दोनों पक्षों ने उसकी ऐसी खबर ली कि वह आज तक दिन में निकलने की हिम्मत नहीं कर पाता और सुनसान हो जाने पर रात को ही निकलता है।

यह ठीक है कि, हमारी यानि अवाम की यादाश्त कमजोर होती है और हम अपने नेता-अभिनेताओं के कद-पद के तिलस्म में फंस कर उनके कस्मे-वादे भूल जाते हैं पर ऐसा एक बार, दो बार, तीन बार हो सकता है पर बार-बार की इस नौटंकी को अब जनता भी समझने लगी है। उसे भी अच्छे-बुरे का ज्ञान हो चुका है। इसका प्रमाण भी मिलता रहा है, फिर भी कोई इस सच्चाई से आँख मूंद देश और जनता की भलाई को किनारे कर अपनी रोटी सेकना चाहेगा तो उसे अपने हश्र का अंदाज हो जाना चाहिए। 

1 टिप्पणी:

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

लगता है इस कहानी के पात्रों ने अब इंसानों का बाना पहन लिया है