शनिवार, 31 दिसंबर 2016

बिना किसी पूर्वाग्रह के, त्यौहार मनाएं



उत्सव प्रियामानवा। मानव स्वभाव से ही उत्सव प्रिय होता है। इसीलिए उसे जिस चीज से भी आनंद-ख़ुशी मिलती है वह उसे अपना लेता है और यह जो पश्चिम द्वारा आयोजित-प्रायोजित नव-वर्ष का उत्सव है वह तो अपने में मौज-मस्ती, हंसी-ख़ुशी, आनंद-उल्लास समेटे लाता ही है, इसीलिए दुनिया भर में उसका स्वागत किया जाता है, उसे हाथों-हाथ लिया जाता है

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब
नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी। हाँ यदि मन में कहीं अपनी संस्कृति से जुड़े रहने, विदेशी रिवाजों से आक्रांत न होने, अपने पर्वों-त्योहारों की गरिमा बचाए रखने, अपने आने वाली पीढ़ी को अपने संस्कार देने की सद्भावना बची हो तो आपको किसने रोका है या कौन रोक सकता है ऐसा करने को ! मनाइये अपने त्यौहार डंके की चोट पर।  हर धर्म-संस्कृति में, जगत की, मानव की भलाई के लिए अच्छी बातें होती हैं, उन्हें अंगीकार करने में कोई बुराई नहीं है, अच्छाई लीजिए, अच्छाई दीजिए, प्रेम लीजिए, प्रेम दीजिए, कटुता का त्याग कीजिए। अपनी अच्छाइयों को जोरदार तरीके से, पूर्ण विश्वास के साथ लोगों के सामने रखिए। पर पहले खुद तो उस पर पूरा भरोसा जमाएं। सिर्फ कुढ़न के कारण किसी को बुराई दे देना भी तो उचित नहीं है।   

उत्सव प्रियामानवा। मानव स्वभाव से ही उत्सव प्रिय होता है। इसीलिए उसे जिस चीज से भी आनंद-ख़ुशी मिलती है वह उसे अपना लेता है और यह जो पश्चिम द्वारा प्रायोजित नव-वर्ष का उत्सव है वह तो अपने में मौज-मस्ती, हंसी-ख़ुशी, आनंद-उल्लास समेटे लाता ही है, इसीलिए दुनिया भर में उसका स्वागत किया जाता है, उसे हाथों-हाथ लिया जाता है।  हर बार की तरह ही कल  फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था, उसके पहले साल भी, उसके पहले भी, ऐसा ही चला आ रहा है, साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। 

पर कभी-कभी कुछ बातें खटक भी जाती हैं, जैसे यह भी दूसरे पर्वों की तरह अब दिखावे का माध्यम बन गया है। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। उन्हें तो रोज सूरज उगते ही फिर वही सनातन चिंता रहती है कि आज क्या होगा, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में भी ढक पाएगा कि नहीं ?  ऐसे लोगों को तो यह भी नहीं पता होता कि नववर्ष क्या होता है, उनके लिए तो उनके बच्चों का पेट भर जाए वही जश्न है। 

कुछेक की हर बार यही चिंता होती है कि इतने सारे पैसे को खर्च कैसे करें, हालांकि इस बार नोटबंदी ने उन्हें किसी और तरह की चिंता में डाल रखा होगा,  और कुछ की, कि इतने से पैसे को कैसे खर्च करें ?  चिंता की यह खाई दोनों वर्गों में सदियों से फैली हुई है जिसका निवारण होना तो दूर, उसके ओर-छोर पर ही काबू नहीं पाया जा सका है। वैसे देखें तो कल क्या बदल जाएगा ? कुछ लोग कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति अपना, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ लोग मानव रूपी भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खुद ही खर्च हो जायेंगे। पर वे अपनी जगह हम अपनी जगह। जब वे अपनी करनी से बाज नहीं आते तो हम भी अपने कर्म से क्यों चूकें ! इसीलिए अपनी तो यही कामना है कि साल का हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, समृद्धि, सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाए। 
नव-वर्ष सभी  सभी भाई-बहनों के साथ-साथ "अनदेखे अपने" मित्रों के लिए मंगलमय हो, मुबारक हो, सुखमय हो। सभी सुखी, स्वस्थ, प्रसन्न और सुरक्षित रहें। नोटबंदी का किसी पर कोई असर बाकी न रहे। यही कामना है। 

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

माँ का जाना

4 दिसम्बर 2016, रविवार सुबह पौने बारह बजे के करीब माँ ने अंतिम सांस ली। पिछले दो-तीन महीने से उम्र का बोझ शरीर पर भारी पड़ता जा रहा था, जिसके चलते तन की सारी क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं शिथिल पड़ती जा रही थीं। रायपुर से फोन कम ही आता था, मैं ही समय-समय पर फोन कर हालात की जानकारी लिया करता था। इन दिनों वहाँ से फोन का आना दिल धड़का जाता था। इसीलिए उस सुबह भी जब पौने नौ के आसपास फोन की घँटी बजी तो मन आशंका से भर उठा था। पूनम का फ़ोन था, तबियत ज्यादा ही बिगड़ रही है, आ जाइये ! उसी समय निकल कर एयरपोर्ट पहुँचने पर पता चला कि पौने एक की उड़ान में जगह नहीं है, शाम साढ़े सात की उड़ान में जगह मिल सकती है। छोटे भाई को यही बताने फोन किया तो उसी समय फोन पर बातों के दौरान ही माँ के ना रहने की खबर मिल गयी । रात नौ बजे घर पहुँचने पर पार्थिव शरीर ही इंतजार कर रहा था। जिसका ध्यान सदा मेरी तरफ लगा रहता था, मेरे दुःख, परेशानी, कठिन समय में जो अपनी वृद्धावस्था को अनदेखा कर सशरीर, मन-धन से सदा मेरी सहाई होती थीं, आज मेरे अविरल बहते आसुओं, रुंधते गले, बंधती हिचकियों के बावजूद निश्चेष्ट पड़ी थीं। उस शरीर में जो मेरी तकलीफ की कल्पना कर ही काँप जाता था आज उसमें एक जुंबिश तक नहीं हो रही थी। एक अध्याय समाप्त हो चुका था, बची थीं सिर्फ यादें, बचपन से लेकर अब तक की !

किसी के देहावसान पर उस परिवार को सांत्वना देते समय अक्सर कहा-सुना जाता है कि सबको जाना है, किसके माँ-बाप सदा बैठे रहते हैं या इनका साथ यहीं तक था इत्यादि-इत्यादि, पर किसी अपने के बिछड़ने का गम वही समझता है जिसके घर से कोई विदा हुआ हो !  देस-विदेश में दूर बसे किसी सदस्य के बारे में एक निश्चिंतता तो उसके बने रहने की होती है पर दिवंगत हुए किसी अपने के बारे में यह सोच कर ही कि अब उससे कभी भी, कहीं भी, कैसे भी मिलना संभव नहीं हो सकेगा और तिस पर जब कि माँ बिछुड़ी हों, दिल काँप कर आँखों में पानी भर लाता है !  होगा समय बहुत बड़ा कारगर मल्हम, पर वह भी ऊपरी जख्म को ठीक करता है, अंदर की टीस को समय-समय पर सालने से तो वह भी नहीं रोक पाता।

दिवंगत इंसान के शोकग्रस्त परिवार को संबल देने, उबरने, समझाने के लिए तरह-तरह की बातें और रीति-रिवाज  बनाए गए हैं, इन्हीं के तहत कुछेक दिनों के लिए नाते-रिश्तेदार घर पर जुटते हैं, कुछ रस्में पूरी की जाती हैं जिसमें व्यस्त हो इंसान यादों को कुछ दूर रख सके, अपना गम भुला सके, दुःख भरा माहौल कुछ हल्का हो सके। पर मानव के साथ जिंदगी भर जुड़े रहने वाली ये नियामत इतनी कमजोर नहीं होती कि ऐसे उपायों से उन्हें भुलाया या दूर रखा जा सके। जैसे ही अकेलेपन के कोहरे का साथ उन्हें मिलता है वे फिर आ घेरती हैं, हर बार, बार-बार। अच्छा ही है उनके कारण माँ सदा बनी रहेंगी अपने वात्सल्य के साथ, मेरे आस-पास, मेरे इर्द-गिर्द मुझे संबल देते, ममता बरसाते, स्नेह लुटाते।                

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अपानवायु, कुछ रोचक जानकारी

दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  जान कर  आश्चर्य होगा कि चीन में   "Professional  Smeller"   द्वारा गंध सूंघ कर रोगों का निदान किया जाता रहा है। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है

अपानवायु, चिकित्सा जगत में भले ही इस पर काफी कुछ लिखा, बताया या शोध किया जा रहा हो, पर रोजमर्रा की जिंदगी में और आम बोल-चाल में यह काफी उपेक्षित सा विषय रहा है। आम धारणा में यह कुछ भदेस, असुसंस्कृत, बेशऊर, फूहड़ या कह सकते हैं कि कुछ हद तक अश्लीलता की श्रेणी में आता है। भले ही इस पर खुले-आम बात करने पर, असभ्यता माने जाने के कारण लोग कतराते हों, पर है यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की अभिन्न प्राकृतिक क्रिया। इसका नाता शरीर के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहता है। 

इधर इस को लेकर जगह-जगह, तरह-तरह ख़बरें, कुछ ज्यादा ही सामने आने लगी हैं। कुछ में इससे कुछ हद तक निजात पाने की बात रहती है, तो कुछ में इसकी दुर्गंध को रोकने पर हो रही शोध के बारे में बताया जाता है। यह तो हुई इस समस्या को लेकर उठाए गए गंभीर कदम, पर उधर कुछ फिल्मों और टी वी के तथाकथित हास्य सीरियलों में इसको लेकर फूहड़ हास्य पैदा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जो कतई स्वागत योग्य नहीं हैं। शायद ऐसे लोगों को अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं होता जो ऐसी हरकतों को दर्शाने में उतर आते हैं।   

इसका दवाब किसी को भी, कभी भी और कहीं भी हो सकता है। पर भीड़-भाड़ में यह एक शर्मनाक समस्या बन जाता है। पार्टी इत्यादि में सभी के सामने वायु-त्याग करना खुद ही अपमानित होने जैसा लगता है। पर इसके वेग को रोकना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता। ऐसा करने से सिरदर्द, सीने में दर्द, बेचैनी या पेट में दर्द या सूजन भी हो सकती है।  इसलिए हमें स्वस्थ खान-पान की आदत डालनी चाहिए जो कुछ हद तक इसका निवारण कर सकती है घर के बाहर का या कुछ भी, जो मिला पेट में डाल लेना, समय-असमय खाना,  विपरीत गुणों वाले खाद्य-पदार्थों को एक साथ लेना, इसके प्रमुख कारक हैं। मद्य व अत्यधिक धूम्र-पान जैसी आदतों को छोडने या कम करने से इसका प्रकोप भी काफी हद तक  नियंत्रित किया जा सकता है। बाजार में इससे निजात दिलाने वाली दवाएं भी उपलब्ध हैं। वैसे, जैसा कि प्रयोगों द्वारा साबित हुआ है, रोज एक केला खाने से बड़ी हद तक इसे काबू में किया जा सकता है। यह सब बातें तो आम हैं पर इसके बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य भी खोज निकाले गए हैं जो सर्वविदित नहीं हैं।   

यह जान कर आश्चर्य होता है कि मनुष्य शरीर के वायु-प्रकोप को, जिसे हेय दृष्टि से देखा जाता है वह कुछ लोगों का परिवार चलाने का जरिया है। कहते हैं चीन में  "Professional Fart Smeller" गंध सूंघ कर रोगों का निदान करते हैं। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है। आम आदमी 10 फिट/सेकंड या 9.5 की.मी/ की गति से 'औसतन' रोज 14 बार वायु निष्काषित करता है, यह क्रिया ज्यादातर रात में सोते वक्त होती है। इसकी मात्रा इतनी होती है जिससे एक मध्यम साइज का गुब्बारा फुलाया जा सकता है। पर इस क्रिया का अधिकतम ऊचांई या पानी की गहराई में होना कुछ मुश्किल होता है। अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि आज इसकी आवाज और आयतन दोनों को नापना संभव हो गया है। गजब तो यह है कि अब खाने वाली ऐसी गोलियां भी मिलने लगी हैं जिनके सेवन से इसकी दुर्गन्ध, गुलाब या चॉकलेट जैसी चीजों की सुगंध में बदल जाती है। वैसे अधोवस्त्र बनाने वाले, वस्त्रों के कई निर्माता ऐसे कपडे को बाजार में लाने का उपक्रम कर रहे हैं जिससे निष्काषित वायु की दुर्गंध को रोका जा सके। इसमें सफलता भी मिलने लगी है। 
   
अपान वायु पेट में पाचन के दौरान वहां स्थित बैक्टेरिया के कारण बनी कई तरह की गैसों का मिश्रण है। यदि भोजन में सल्फर की मात्रा ज्यादा हो तो दुर्गन्ध भी उतनी ही बढ़ जाती है। इस श्रेणी में पत्तेदार सब्जियां, अंडे, रेड मीट, डेयरी के उत्पादन, प्याज, लहसुन इत्यादि आते हैं। यह मनुष्यों को ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत को प्रभावित करती है। यहां तक कि कीड़े-मकोड़े भी इससे अछूते नहीं हैं। जान कर  आश्चर्य होगा कि दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  कितनी अजीब बात है कि मनुष्य को अपनी अपान वायु की दुर्गंध सदा दूसरों से कम बुरी लगती है। 

दुनिया भर में इस को चाहे कितना फूहड़, हेय या भदेस माना जाता हो, पर कुछ संस्कृतियां ऐसी भी हैं जहां इसे अन्य आम क्रियाओं की तरह मान्यता प्राप्त है, जैसे दक्षिणी अमेरिका की एक जन-जाति, यानोमामी, जो इसे अभिवादन के रूप में लेती है। चाहे जो हो वायु के इस प्रकार का हमारे शरीर पर बहुत गहरा असर रहता है। कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम, जहां तक संभव हो, कफ और पित्त के साथ इसका संतुलन बनाए रखें। 
-संदर्भ अंतरजाल 

शनिवार, 26 नवंबर 2016

समय की मांग

हमारे देश की अधिकतम आबादी वह है जो अपना खून-पसीना एक करने बावजूद अपनी आवश्यकता के सौ रुपये के बदले नब्बे रुपये ही कमा पाती है। उसके पास अपना उजला धन ही नहीं टिकता तो काले धन की बात ही कहां !

आठ नवम्बर को एक जलजला आया, यह प्राकृतिक नहीं मानव निर्मित था, पर इससे सारा देश हिल गया। सरकार की तरफ से इसे भ्रष्टाचार, काले धन और बाजार में छाई नकली मुद्रा से निजात पाने के लिए उठाया गया कदम बताया गया। आम भारतीय जो देश के हित के लिए किसी भी प्रकार की परेशानी-कठिनाई सहने को और त्याग करने को तैयार हो जाता है उसने अपने स्वभाव के अनुसार दसियों दिन तकलीफें झेलीं पर इस कठोर निर्णय का स्वागत ही किया। कारण साफ़ था, हमारे देश की अधिकतम आबादी वह है जो अपना खून-पसीना एक करने बावजूद अपनी आवश्यकता के सौ रुपये के बदले नब्बे रुपये ही कमा पाती है। उसके पास अपना उजला धन ही नहीं टिकता तो काले धन की बात ही कहां ! यह तबका वर्षों से मंत्री, संत्री, नेता, अभिनेता, इंजिनियर, ठेकेदार, फलाने-ढिमकाने के पास या फिर उनके द्वारा ठिकाने लगाए गए काले धन के बारे में सुनता आ रहा था। आज उसके मन में कहीं दबे ऐसे धन्ना-सेठों के प्रति आक्रोश को तसल्ली मिली। काले धन के देश के काम आने की बात सुन उसने परेशानियों को सहते हुए भी इस निर्णय का स्वागत किया। विरोध किया विपक्ष ने, जो उसे करना ही था ! सरकार के इस दांव से सदमें में गया भौंचक्का से विपक्ष ने अपना दायित्व निभाते हुए इस कदम के नुक्सान गिनाने शुरू कर दिए। उधर अलग-अलग खेमों में बंटा मीडिया, अपना-अपना राग अलापने लगा। हम, यह जानते हुए भी कि सामने टी वी पर जो कहा जा रहा है वह अर्द्ध-सत्य होता है, उसी को पूरा सत्य मानने लग गए हैं। सच कहा जाए तो हम कहीं अंदर से अपना-अपना पसंदीदा चैनल चुन चुके है जिस पर हम आँख मूँद कर विश्वास भी करने लगे हैं। 

सरकार, विपक्ष और मीडिया सभी जानते हैं कि मुट्ठी भर लोग ही हैं जो इस नोटबंदी का कुछ न कुछ आकलन कर सकते हैं, पर बहुत बड़ी आबादी इस बारे में कुछ नहीं जानती उसे जो समझाया-बताया जा रहा है उसी पर विश्वास कर रही है, तो सब लगे हुए हैं राशन-पानी लेकर अपनी-अपनी बात सही साबित करने। विपक्ष यह बता रहा है कि इसी कदम से रुपया कमजोर हो रहा है, यह एक कारण हो सकता है, पर वह यह नहीं बताता कि इसका एक कारण अमेरिका में ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भी है जिससे डॉलर मजबूत हुआ है और हमारे साथ-साथ एशिया के अन्य देशों यथा जापान, सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिणी कोरिया व ताइवान की करेंसी में भी गिरावट आई है ! कोई स्वाइपिंग मशीनों की कमी को लें-दें में अड़चन बता रहा है पर यह नहीं कहता कि अब तक देश में नगदी में ही अधिकतम काम होता था, इसलिए जरुरत ही नहीं पड़ती थी अब आवश्यकता पड़ी है तो ज्यादा उपलब्ध करवाई जाएंगी। उधर सरकार आमजन को अपने पक्ष में देख आत्ममुग्धता की स्थिति में है और अपने कदम को एकदम सही मान कर चल रही है। शायद उसे गुमान भी नहीं है कि यदि उसके निर्णय से परेशानियों का दौर लम्बा खिंचा तो इसी समर्थन को गुस्से में तब्दील होने में देर नहीं लगेगी।

पहले भी ऐसा हो चुका है। 1975 से 1977 के बीच 21 माहीनों तक लगे आपातकाल का ख़ौफ़ ऐसा है कि उस दौरान जो दो-चार अच्छे काम हुए भी होंगे उन्हें कोई याद नहीं करना चाहता। वही हाल संजय गांधी द्वारा चलाए गए नसबंदी अभियान का हुआ। कौन नहीं जानता कि बढती आबादी हमारी सबसे बड़ी समस्या है जिसके सैलाब में हर छोटी-बड़ी योजना तबाह हो जाती है। उस समय यदि वह अभियान ढंग से चला होता, लोगों पर जबरदस्ती ना थोप ठीक से समझा कर लागू किया जाता, अपने अहम् की पूर्ती को छोड़ योजना की सफलता पर ध्यान दिया जाता तो आज हमारी जनसंख्या के बनिस्पत संसाधनों की मात्रा कहीं अधिक होती। पर जबरन लक्ष्य पूर्ती, अपनी काबिलियत साबित करने, आकाओं के गुस्से से बचने, अपनी नौकरी बचाने के लिए जिस तरह लाल फीताशाही ने अपने पद, अपनी हैसियत, अपने रसूख का दुरुपयोग किया उससे एक दूरदर्शी देश हित की  योजना दुःस्वप्न में बदल कर रह गयी। डर है कि उसी तरह का हश्र इस निर्णय का भी ना हो। क्योंकि ऊपर दल बदलते हैं, मंत्री बदलते हैं पर अफसरशाही तो वही रहती है, और उसके काम करने का तरीका बदलने का दुःसाहस कुछ ही लोग कर पाते हैं जिनके सफल रहने से सबसे ज्यादा तकलीफ भी इसी सरकारी तबके को होती है। इन पर बेलगामी अर्थ का अनर्थ कर डालती है। इसी के साथ, किसी के बहकावे या अफवाहों से बचते हुए, हमें भी धैर्य रख सारी परिस्थियों पर नजर रखनी चाहिए और अपने जमीर, अपने विवेक का सहारा ले उचित-अनुचित में भेद करना चाहिए। समय की मांग भी यही है। 

रविवार, 20 नवंबर 2016

अफवाहें नहीं सच्चाई को सामने लाया जाए

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है,.........मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं 

आजकल देश में जो एक ही मुद्दा छाया हुआ है उस पर तरह-तरह की बेबुनियाद, फिजूल, भ्रामक, भड़काऊ खबरें रोज ही उछाली जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि लोग परेशान नहीं हैं, उन्हें दिक्कत नहीं हो रही पर उनकी सहनशीलता उन्हें साधुवाद का पात्र बनाती है। दूसरी ओर मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं। 

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है। यदि कोई चिकित्सालय या चिकित्सक ऐसा अमानवीय काम पैसों के ना मिलने की वजह से करते हैं तो उन पर कार्यवाही होनी चाहिए ना कि उसे नोटबंदी से जोड़ा जाना चाहिए !!

ऐसे भी खबरें उछाली गयीं हैं कि पैसों की कमी के कारण खाना न खरीद पाने की वजह से एक-दो लोग भूख से मर गए ! पहले तो ऐसा होना संभव नहीं है यदि ऐसा हुआ भी है तो इसकी सच्चाई का पता किसने लगाया ? हम इतने हृदयहीन नहीं हो गए हैं कि हमारे सामने कोई भूख से तड़प रहा हो और हम नोटों की लाइन में खड़े उसका तमाशा देखें। आज जगह-जगह से खबरें मिल रही हैं कि गली-मोहल्ले वाले कतार में खड़े लोगों को चाय-पानी-नाश्ता उपलब्ध करवा रहे है। सिख समाज तो निःस्वार्थ-भाव से वर्षों-वर्ष से भूखों को भोजन करवाता आ रहा है। कई मन्दिर और संस्थाएं जरूरतमंदों के लिए लंगर चलाते हैं। यदि पीड़ित व्यक्ति वहां ना भी सका हो तो आस-पास के लोगों से ही अपनी तकलीफ व्यक्त कर सकता था। अरे हमारे यहां तो जानवरों तक को भूखा रखना पाप समझा जाता है। किसी इंसान को कैसे ऐसी हालत में प्राण त्यागने दे सकता है ?

ऐसी ही एक स्थिति थकान की है, बुजुर्गों की है, उसमें भी आस-पास की सहायता आसानी से ली जा सकती है, अपने सामने-पीछे वाले को अपनी हालत बता, कतार से हट कर बैठा जा सकता है। इसमें बैंक वाले यदि टोकन के साथ समय भी इंगित कर दें तो और भी आसानी हो सकती है।

राजधानी के बड़े अखबार खोज-खोज कर ऐसे-ऐसे सरकार विरोधी डिजायनर "बंदों" से लेख लिखवा रहे हैं जिनकी एक सिटिंग का सिगरेट-शराब का खर्चा हजारों में होता है। कोई मोदी द्वारा देश को दसियों साल पीछे ले जाने की बात करता है तो कोई स्वाइपिंग मशीनों की कमी का रोना रोता है। वह यह नहीं बताता कि अब तक देश में नगदी में ही अधिकतम काम होता था, इसलिए जरुरत ही नहीं पड़ती थी अब ज्यादा उपलब्ध करवानी पड़ेंगी। विरोध कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी है बस इसीलिए कुछ भी उगला जा रहा है।

आज मीडिया को अपने पर "बिके हुए" का तमगा हटाने का मौका मिला है। आज वह चाहे तो अपने-आप को विश्वसनीय और निष्पक्ष सिद्ध करने का प्रयास कर सकता है। अपनी लुटी-पिटी साख वापस पा सकता है। उसे सिर्फ सच्चाई को लाना है बस।    

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अपने मुंह में खबरिया चैनलों के शब्दों को जगह ना दें

आज  "मरीज" खुद  भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह किसी भी तरह का कष्ट किसी भी हद तक सहने को राजी है पर उसे भड़काया जा रहा है, अरे ! तुम्हारा आपरेशन होगा, तुम्हें कष्ट होगा, तुम्हें परेशानी होगी। आज कल नहाने का मौसम है तुम नहाओगे कैसे, तुम्हें सोचने -समझने का  समय ही नहीं दिया गया इत्यादि, इत्यादि। बजाए मरीज का हौसला बढ़ाने और उसकी मदद करने के उसे भरमाया जा रहा है, जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर कुछ लोग शायद चाहते भी यही हैं .....      

धन तो सदा ही आदमी को नचाता रहा है, हो तब भी और ना हो तब भी। अब जब उसके रूप-रंग में कुछ बदलाव आ रहा है तब भी इंसान चकरघिन्नी बना हुआ है। पर इस तिगनी के नाच में कुछ मजबूरीवश, कुछ घबड़ाहट के तहत, कुछ अफवाहों के चलते तो कुछ "प्रयोजित लोग" भी शामिल हैं, जो अलग-अलग गुटों में बंटे खबरिया चैनलों  की बीन की धुन पर, बिना अपने जमीर की सुने नाचे जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। 

अभी एक मित्र की बच्ची की शादी के सिलसिले में जयपुर जाना हुआ था। बारात अगवानी के पहले जब हम कुछ लोग विवाह स्थल का जायजा लेने पहुंचे तो वहां माइक थामे एक मैडम, जो हिंदी चैनल में होने के बावजूद इंग्लिश में बतिया रही थीं, अपने सहयोगी कैमरा-मैन के साथ उपस्थित थीं। हमें देखते ही उनका पहला सवाल यह था कि नोटों के बदलने से आप को जो परेशानी हो रही है, उसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?  मेरे मित्र ने कहा यह देश-हित में उठाया गया कदम है और इससे हमें कोई परेशानी नहीं हैं। हम सब प्लान कर के ही चल रहे है। उनके लिए यह एक अप्रत्याशित उत्तर था, क्योंकि उनके आका शादियों के मौसम में इस कदम को मुद्दा बना सरकार के कदम को अनुचित सिद्ध करने में जुटे हुए है ! माइक-धारी महिला ने फिर सवाल उछाला, तो आप इस सारे खर्च का पेमेंट कैसे करेंगे, उसमें तो आपको असुविधा होगी ! मित्र का जवाब था, वह मेरी व्यक्तिगत समस्या है, जिससे पार पाने के लिए मैंने हर संभव इंतजाम कर रखे हैं। जिनको भुगतान करना है वह भी वस्तुस्थिति से अवगत हैं और वे भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। 

यहां अपने मन-मुताबिक़ जवाब ना पाने पर माइक और कैमरा दोनों ने साज-सज्जा तथा स्टालों को अपना निशाना बनाना शुरू किया और वहां खड़े स्टाफ से कुछ ना कुछ उगलवाना चाहा पर जब वहां भी उन्हें अपने चैनल के नाम, अपनी भाषा और अपने रोब-दाब से भी मनवांछित फल नहीं मिला, तब उन्होंने बौखला कर तरह-तरह के उल-जलूल उदाहरण और सवाल-जवाब शुरू किए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूरे सौजन्यता के साथ अंग्रेजी में ही उनसे कहा कि क्यों आप हमारे मुंह में अपने शब्द  में डालने की कोशिश कर रही हैं और हिंदी भाषी चैनल के बावजूद यह बीच-बीच में धारा-प्रवाह इंग्लिश क्यूँ ? हर तरफ अपना विरोध देख उनका हत्थे से उखाडना लाजमी था, फिर वैसा ही हुआ जैसा हम अक्सर फिजूल की बहसें ऐसे चैनलों पर देखते-झेलते रहते हैं। टी वी पर तो रिमोट अपने हाथ होता है पर यहां तो साक्षात आमना-सामना था ! उसी सिलसिले में मैंने कहा कि सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आपलोग किसी की सुनना नहीं चाहते सिर्फ अपनी बात को सही मनवाना चाहते हैं।  आप इसलिए नहीं माइक थामे हैं कि आप सरकार के कदम को गलत साबित करें यह जिम्मेदारी इसलिए दी गयी है कि आप सही छवि लोगों के सामने लाएं नाकि अपनी बनाई हुई तस्वीर !  अगली के हाथ में माइक था वे अपनी आदतानुसार बोले भी जा रही थीं पर उपस्थित लोगों की सहमति मेरे साथ होने के कारण पस्त भी थीं। मैंने कहा कि यदि किसी बीमार व्यक्ति का आपरेशन जरूरी हो तो भी आप विरोध में चिल्लाने लगिएगा कि देखो उस पर कितना अत्याचार हो रहा है उसके शरीर पर चाक़ू चलाया जा रहा है, इत्यादि-इत्यादि, जब कि उस आदमी को बचाने के लिए आपरेशन जरुरी है। यहां तक कि "मरीज" भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह कष्ट सहने को भी राजी है पर आप उसे भड़का रहे हो। इस पर माइक से जवाब आया कि उसके पहले मरीज को एनेस्थेसिया दिया जाता है, दवाएं दी जाती हैं। मैंने कहा वैसे उपाय यहां भी किए गए हैं, आप उन्हें भी तो "हाइलाइट" कीजिए, लोगों को हौसला बनाए रखने में मदद करने की बजाए आप सिर्फ कमियों का रोना रोए जा रहे हो जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर आप शायद चाहते भी यही हो !! 

बहस का अंत तो होना नहीं था, समय बीत रहा था सारे इंतजाम भी देखने थे, सो वातावरण को बोझिल ना बना, बात ख़त्म कर उन्हें कुछ लेने का आग्रह किया पर वे भी हताशा-वश वहां के विपरीत माहौल से निकलने का मौका तलाश रहे थे सो ज़रा सा इशारा पाते ही जल्दी से खिसक लिए।

आज लगता है कि देश कहीं पीछे छूट गया है। देश-प्रेम की भावना तिरोहित हो चुकी है। अपने ज़रा से हित के लिए, ज़रा सी सहूलियत के लिए बिना भविष्य की सोचे दिवास्वपन दिखलवाने वालों के बहकावे में आ जाते है। हम अपने जमीर का उपयोग करना चाहते ही नहीं। अफवाहें कहीं भी, कभी भी हमें बेवकूफ बना सकती हैं। हमें पकी-पकाई खाने की आदत पड़ चुकी है। हमारी भेड़-चाल ख़त्म नहीं होने वाली, हमारे कंधे मौकापरस्तों की बंदूकों के लिए अलभ्य नहीं होने वाले, झूठ को सौ बार कह-दिखा कर सच बनाने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आने वाले। इतिहास गवाह है कि हमें लतखोरी की आदत पड़ी हुई है, बिना डंडे के हम सुधर नहीं सकते !!

पर सच्चाई यह है कि हममें किसी भी परिस्थिति का सामना करने का माद्दा है। सेना की तो बात ही ना करें उनके समान तो कुछ हो ही नहीं सकता। पता नहीं सृष्टि ने उन्हें किस मिटटी का बनाया है, कौन से जज्बात भरे हैं दिलो-दिमाग में, किस धातु का हौसला घड़ा है कि सिवा देश के उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं जबकि उसी देश के कुछ नाशुक्रिए पीछे नहीं रहते उनकी बेकद्री करने को। सेना जैसा ही कुछ जज्बा आज भीतरी "फ्रंट" पर तैनात बैंक कर्मियों ने पेश किया है उसके लिए पूरे देश को उन पर गर्व है। विपरीत परिस्थितियों में, गहरे दवाब में, थकान-भूख-प्यास को भूल उन्होंने दिनों-दिन, घंटे दर घंटे, लोगों की बेकाबू भीड़, उनके गुस्से, उनकी तकरार को सहते हुए खुद को शांत रख जिस कर्मठता के साथ अपने काम को अंजाम दिया है उसके लिए तो तारीफ में शब्द ही कम पड़ जाते हैं। साधूवाद है इन सारे कर्मियों के लिए। पर खेद यहां भी वही है कि उनके प्रयास को उतनी तवज्जो नहीं मिल पा रही जिसके वे हकदार हैं।     

रविवार, 13 नवंबर 2016

भीड़ में सबसे पीछे खड़े का कौन सहारा !

तकरीबन सात-आठ साल से ब्लागिंग की दुनिया में रहने के बावजूद लगता है कि "वृत्तिकता" नहीं आ पायी है। यहां कभी-कभी पढने में या फोटुएं देख के लगता है कि कुछ लोग कितने जागरूक रहते हैं अपने आस-पास के माहौल को लेकर। यहां तो कई बार जान-बूझ कर मोबायल को घर पर छोड़ बाहर निकल जाता हूँ, फिर कुछ अलग सा देख-सुन कर, उस पल को संजो ना पाने का पछतावा भी होता है। वैसे भी आस-पास किसी घटना को सामान्य रूप से ले, भुला दिया जाता है जबकि उसका  वर्तमान के परिवेश से सीधा जुड़ाव होता है। 

यह बात तब फिर एक बार सही साबित हुई जब कल टी वी के किसी न्यूज चैनल पर, नोटों की बंदी पर रिक्शा चालकों, दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों, खोमचे वालों आदि के विचार लिए जा रहे थे। तभी मुझे ध्यान आया कि पांच-सात दिन पहले पर्यावरण को लेकर मचे हंगामें की प्रतिक्रिया में दिल्ली सरकार के भी जल्दबाजी में उठाए कुछ कदमों में, भवन निर्माण आदि पर कुछ दिनों के लिए रोक लगा दी गयी थी। उस काम में लगे दिहाड़ी के मजदूरों की परेशानी पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा। 

मेरे निवास के सामने ही एक बिल्डर द्वारा बहुमंजली इमारत बनाई जा रही है। उसमें काम करने वाले मजदूरों में एक का अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ वहीँ रहना होता है। उन्हीं दिनों एक सुबह घण्टी बजने पर जब श्रीमती जी ने द्वार खोला तो सामने काम करने वाली महिला एक छोटा सा बर्तन हाथ में लिए खड़ी थी, बोली आंटी जी थोड़ा दूध मिलेगा, बच्चा सुबह से भूखा है ! अब चाहे जिस कारण से भी उसने मांगा हो उसे दूध और जो कुछ भी हो सकता था उपलब्ध करवाया गया। फिर उसके सीधे-सरल, बिहार निवासी पति से ऐसे ही सहज भाव से कैसा-क्या है जानकारी ली तो उसने दिहाड़ी पर काम करने वालों की पचासों मुसीबतें गिना दीं। इसी सिलसिले में समय पर ठेकेदार से समय पर कुछ सहायता ना मिलने और जमा-पूँजी को पीछे गांव भेजने के कारण उठी उसकी बेबसी सामने आई। जिसके कारण उसे हमारे पास आना पड़ा था। 

वह तो, किसी प्रकार की जरुरत हो तो बिना झिझक बताने का आश्वासन पा, ढेर सी दुआ देता चला गया। यह तो एक सामने बैठा इंसान था, उस जैसे इस शहर में हजारों होंगे, फिर पूरे देश में ऐसे निरीह लोगों की कितनी संख्या होगी उसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है !  कौन सोचता हैं उनके बारे में ? कोई सोचता भी है कि नहीं ? उल्टे-सीधे, बड़े-छोटे, सरल-कठोर कानून थोपने से पहले देश के कर्णधार क्या कभी सचमुच ऐसे लोगों का ध्यान रख निर्णय लेते हैं ? या फिर........!!!      

शनिवार, 12 नवंबर 2016

"उनका" किफायती धन !

मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे   

मनुष्य के प्रादुर्भाव के बाद समय के साथ-साथ उसके खान-पान, रहन-सहन सबमें बदलाव आता चला गया। जिंदगी में स्थायित्व आया। जिम्मेदारी का एहसास जगा। घर, परिवार बना जिसमे भरण-पोषण-उपार्जन का जिम्मा पुरुष के कंधों पर आया और नारी ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली। यही वह समय होगा जब अधिकतम नारियों को पुरुषों का आश्रित होना पड़ा होगा, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उसका मुंह जोहना पड़ता होगा, अति आवश्यक जरुरत को पैसे के अभाव के कारण पूरा न कर पाने पर जन्मी होगी असुरक्षा और संबल पाने की भावना। ऐसी स्थितियों से पार पाने के लिए महिलाओं ने घर खर्च से बचे या घर खर्च में कुछ कटौती कर, घर वालों की नज़र से बचा कर, कुछ न कुछ संचय करना शुरू कर दिया होगा। पर इसमें भी उसका कोई अपना स्वार्थ या हित नहीं था। यह सब उसका किसी अनचाही और कठिन घडी में परिवार को उबारने के लिए उठाया गया कदम भर था। पर पता नहीं ऐसी तरकीब सारी भारतीय माताओं और पत्नियों को एक साथ कैसे सूझी, जो समय के साथ-साथ उनमें एक आदत में तब्दील होती चली गयी !! अक्सर यह जमा-पूंजी संचयकर्ता की हैसियत को देखते हुए हैरत-अंगेज आंकड़ों में तब्दील होते पाई गयी है।  

आज सरकार के एक कठोर निर्णय की वजह से पूरे देश में अफरा-तफरी मची हुई है। सर्वोच्च कीमत वाले नोटों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाईं जा रही हैं। हर कोई बिना नुक्सान के अपने धन को सुरक्षित करना चाहता है और कर भी रहा है। हमारे हर घर में पुरुषों को "आभास" रहता है कि घर की किसी अनजान जगह में, कहीं न कहीं, कुछ ना कुछ नोटों की शक्ल में जरूर पड़ा हुआ है। इसे कोई अन्यथा लेता भी नहीं है। उसी आभास के तहत सहज भाव से अभी दो दिन पहले मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे।    

सब जगह हड़कंप तो मचा ही है पर उससे ज्यादा बड़ा झंझावात तो ऐसी गृहणियों के मनों में छाया हुआ है जिन्होंने पता नहीं कितनी किफ़ायत कर-कर के, कितनी बार अपनी इच्छाओं को दबा कर, कितनी बार अपनी जरूरतों को किनारे कर परिवार के भविष्य के लिए कुछ न कुछ जमा-जुगाड़ कर रखा है। आज की परिस्थिति में उनको समझ ही नहीं आ रहा है कि अपने पास की "उस तरह" की जमा राशि को वे कैसे बचाएं ! किस की सलाह लें! यदि वे किसी को नहीं बताती हैं तो सारी पूँजी के सिफर हो जाने का खतरा है और बताने पर पोल खुल जाती है और रहस्य उजागर हो जाता है। अभी तो खैर सारा पैसा बैंक में जमा हो जाएगा पर सब को पता चल जाने की वजह से वह "आम संपत्ति" हो जाएगी, जिसे जो चाहेगा, जब चाहेगा, थोड़ा-थोड़ा ले-मांग कर सिफर तक पहुंचा देगा। क्या करें क्या ना करें उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा और इस बारे में तो उनकी सहायता नाहीं मोदी जी कर पाएंगे नाहीं जेटली जी !!!!
आपके पास कोई राह, कोई उपाय, कोई युक्ति है क्या ?                              

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

मेजबानी जुकाम की

फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है  

पिछले दिनों दिल्ली अपने पर्यावरण के कारण काफी चर्चा में रही थी। सही कहें तो उसने दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर होने का खिताब पाते ही, "बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ" वाले मुहावरे को सही सिद्ध कर दिया। वर्षों-वर्ष बीत गए, चाहे  कहीं भी रहूं, मुझ पर बदलता मौसम कभी भी अपना असर नहीं डाल पाया। ऐसा नहीं है कि कभी सर्दी-जुकाम हुआ ही ना हो पर बदलता मौसम कभी परेशान नहीं कर पाया। पर इस बार उसकी जीत हो ही गयी।   

यूं तो दिल्ली का वातावरण, बरसात के कुछ दिनों को छोड़ सदा प्रदूषित ही रहता है। यहां के वाशिंदे इसके साथ रहने के, मजबूरीवश ही सही, आदी हो गए हैं। उनकी इसी आदत का फायदा यहां का प्रशासन और प्रशासक दोनों उठाते रहे हैं। इस बार अक्टुबर के खत्म होते-होते शाम के समय ठंड की पदचाप सुनाई देने लगी थी।दिल्ली और आस-पास के इलाके धूएं, धूल और कोहरे की कोठरी में सिमटने लग गए थे। दिवाली की रात के बाद जब लोग सुबह अलसाए से उठे तो पाया कि सारा शहर उस कोठरी के दम-घोंटू माहौल के बदले "स्मॉग" के गहरे, मोटे, अपारदर्शी जान-लेवा गैस-चैंबर में कैद हुआ पड़ा है। पहले दिवाली के एक-दो दिन बाद मौसम में बदलाव आ जाता था पर इस बार जैसे यह स्थाई हो कर रह गया था। आँखों में जलन, गले में खराश, सीने में घुटन, सर्दी-जुकाम-खांसी से लोग परेशान हो गए। मरीजों की अस्पतालों में लाइनें लग गयीं। स्कूल बंद कर
दिए गए। अस्वस्थ, बुजुर्गों को घर में ही रहने की सलाह दी गयी। एक अघोषित आपातकाल सा लागू हो गया।

हर तरह के लाभ-हानि, सलाह-उपदेश, जोड़-घटाव के बावजूद मुझसे कभी सुबह की सैर का आंनद स्थाई तौर पर नहीं लिया जा सका। इसीलिए शाम के समय मैंने घूमने की आदत बना रखी थी जो इन दिनों भी जारी थी। इधर सूरज ढलते ही पार्कों में धूएं-धूल की मोटी परत का शामियाना तनने लग गया था। उसके संभावित खतरे के अंदेशे-अंदाजे के होने-लगने के बावजूद बाहर निकलना जारी रहा। फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है। अब रूमालों की जरुरत और नाक की हालत का हाल मत ही पूछिएगा !            

जुकाम को कोई बिमारी ही नहीं मानता। पर जिसे जकड़ता है उसकी ऐसी की तैसी कर डालता है। पहले कहा जाता था कि इसके होने पर यदि डाक्टर के पास जायें तो यह तीन दिन में ठीक हो जाता है पर यदि कुछ ना भी करें तो यह अपने-आप 72 घंटे में ठीक हो जाता है। पर आजकल यह भी थोड़ा "ढीठ" हो गया है और अब कम से कम पांच दिन का अनचाहा मेहमान तो बन ही जाता है। तो इस अतिथि को पांच दिनों बाद विदा कर अब चैन की सांस ली है।   

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

मैं #छत्तीसगढ हूं

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है 

मैं #छत्तीसगढ हूं। आज एक नवम्बर है मेरा जन्मदिन। सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयों से अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को मेरा जन्म-दिन याद रहता है
यह मेरा सौभाग्य है। यह मेरा सोलहवां साल है, सपनों का साल, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में पदार्पण करने का साल। कुछ कर गुजरने का साल, सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जमीन तैयार करने का साल।   

आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो  देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, उनमें मुझे लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं, लोग मुझे एक पिछडा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा। लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका
मिला तो उनकी आंखें खुली की खुली रह गयीं उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद मैं इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।

वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्न-गर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया।

कालांतर से मेरा नाम बदलता रहा, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-
अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का। है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्र्ंश है। आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी राजधानी "रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढती लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी शुरू हो चुका है, जो पूर्ण होने के बाद देश के सबसे सुन्दर और अग्रणी  शहरों में शुमार हो जाएगा। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।

एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम से ओत-प्रोत मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे  आदर्श प्रदेश के  रूप में जाना जाऊं,  जो देश के किसी भी कोने से आने वाले
 देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूं ही उन्हें #छत्तीसगढिया #सबसे #बढिया का खिताब हासिल नहीं हुआ है।

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज
सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है।

मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।

जय हिंद
जय छत्तीसगढ़ 

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

बंटती थीं खुशियां दिवाली पर

माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था    
      
जब भी कोई त्योहार आता है तब-तब उससे जुडी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अभी दो-एक दिन के बाद दीपावली आ रही है इसके साथ ही उससे जुडी दशकों पहले की बचपन की यादों ने ताजा-तरीन हो महकना शुरू कर दिया है। जो सबसे पुरानी बातें याद आ रही है वह शायद पचास एक साल पहले की हैं।

बाबूजी (मेरे पिताजी) तब के कलकत्ता के पास एक उपनगर, कोन्नगर, की एक जूट मिल में कार्यरत थे। मिल के स्टाफ में हर प्रांत के लोग थे, मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, बंगाली, बिहारी, ओड़िया, मद्रासी (तब भारत के दक्षिण हिस्से से आने वाले को सिर्फ मद्रासी ही समझा और कहा जाता था) भाषा-रिवाज अलग होने के बावजूद किसी में कोई भेद-भाव नहीं था। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई जाति-भेद नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। मुख्य त्योहार होली और दिवाली ऐसे मनाए जाते थे जैसे एक ही परिवार उन्हें मना रहा हो।  

हमारे परिसर में तीन बंगले थे, जिनमें हमारे अलावा दो गुजराती परिवार थे। मैं उन्हीं के परिवार का अंग बन गया था इसीलिए मेरा पहला अक्षर ज्ञान गुजराती भाषा से ही शुरू हुआ था। बाकी के स्टाफ के लिए कुछ दूरी पर क्वार्टर बने हुए थे, दोनों रिहायशों के बीच बड़ा सा मैदान था, जो खेल-कूद के साथ-साथ पूजा वगैरह और त्योहारों की गतिविधियों के काम भी आता था। दिवाली के पहले धनतेरस को ही कलकत्ता से मिठाई और ढेर
सी, बड़ा सा टोकरा भर कर, आतिशबाजी मेरे लिए आ जाती थी। वैसे  कहने को सारे पटाखे-फुलझड़ियाँ इत्यादि मेरे लिए ही होते थे, पर माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था। आज भी किसी को कुछ देकर मिलने वाली ख़ुशी पाने की आदत के बीज शायद बचपन से ही पड़ गए थे। इस में मेरे बाबूजी का बहुत बड़ा योगदान था। मैंने जब से होश संभाला तब से ही उन्हें दूसरों के लिए कुछ न कुछ करते ही पाया,  वह भी चुपचाप बिना किसी तरह का एहसान जताए। खुद सादगी और किफायती रहने के बावजूद अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों को कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया। वे भी उन्हें सदा पिता समान मानते रहे। वैसे भी परिवार के सदस्य हों या फिर दोस्त, मित्र या जान-पहचान वाले, कोई भी कभी भी उनके पास से खाली हाथ नहीं गया था। इसके साथ ही एक और
खासियत, जिसने मेरे गहरी छाप छोड़ी वह थी उनकी ईमानदारी, जिस पोस्ट पर वह थे वहां पर ईमान डगमगाने के अनेक बहाने और अवसर  आते रहते थे पर उनका मन कभी भी नहीं डोला, दो-तीन वाकये तो मेरे सामने ही घटित हुए जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। उनको यह संस्कार मेरी दादी जी यानी उनकी माँ से मिले थे जिन्होंने अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए जेल में अपनी आँखें गवां दी थीं पर एवज में सरकार से कभी कुछ नहीं चाहा।  बात कहाँ की थी कहाँ पहुँच गयी। पर आज जब लोगों को सिर्फ मैं, मेरा, मेरे, करते पाता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या वैसे लोग भी थे, जो सिर्फ दूसरों का सोचते थे ! यदि वे बिल्कुल मेरे ना होते तो शायद विश्वास भी ना होता ऐसी बातों पर !!

चलिए लौटते हैं वर्तमान में क्योंकि रहना तो इसीमें है ! शुभ पर्व दिवाली की आप सभी मित्रों,  अजीजों को सपरिवार शुभकामनाएं। 

सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

दिल्ली की गलियां, एक अजूबा

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां

भले ही नई दिल्ली में सब कुछ मिलने लगा हो, दरों में भी पुरानी दिल्ली के थोक बाजार से ज्यादा फर्क ना हो फिर भी अधिकांश खासकर एक पीढ़ी पहले के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरानी दिल्ली का
रुख जरूर करते हैं, खासकर तीज-त्योहार के मौसम में। भीड़-भाड़, तंग रास्तों, समय की खपत के बावजूद वहां से सामान लाने पर एक अजीब सा संतोष और सुख सा महसूस किया जाता है।   

पुरानी दिल्ली का बाजार यानी की चाँदनी चौक ! सतरहवीं शताब्दी में मुग़ल सम्राट शाहजहां द्वारा बसाया गया, देश के सबसे पुराने थोक बाज़ारों में से एक। चांदनी चौक नामकरण के पीछे दो मत हैं, पहले लाल किले के लाहौरी गेट से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक एक नहर हुआ करती थी जिसका का पानी रात के समय चाँद की रौशनी से जगमगा उठता था इसीलिए इसका नाम चांदनी चौक पड़ा दूसरा यह कि यह बाजार अपने चांदी के व्यवसाय के कारण प्रसिद्ध था, वही चांदी धीरे-धीरे बदल कर चांदनी हो गयी।  

आडी-टेढ़ी, लंबी-चौड़ी, छोटी-मोटी, जानी-अंजानी गलियों से घिरा बाजार। गलियों के अंदर गलियां, गलियों के अंदर की गलियों से निकलती गलियां। अंतहीन गलियां, गलियों का मकड़जाल। उन्हीं गलियों में अपने-अपने इतिहास को समोए-संजोए खड़ी हैं, खजांची, चुन्नामल, मिर्जा ग़ालिब, जीनत महल जैसी हस्तियों की ऐतिहासिक हवेलियां। वक्त की आंधी ने चाहे कितना कुछ बदल कर रख दिया हो पर अभी भी दिल्ली की गलियों में कूचा और कटरा जैसे जगहों के नाम जीवित हैं !    

हर गली का अजूबा सा नाम, अपना इतिहास, अपनी पहचान, अपनी खासियत। हर गली पटी पड़ी तरह-तरह
की छोटी-बड़ी दुकानों से। चलाते आ रहे हैं लोग पीढ़ी दर पीढ़ी अपने व्यवसाय को एक ही जगह पर। दुकानों में कोई बहुत ज्यादा बदलाव भी नहीं आया है सिवाय पीढ़ी के साथ बदलते काम संभालने वालों के व्यवहार में। दिल्ली के बाहर से आने वाले की तो छोड़ें खुद दिल्ली वाले भटक जाते हैं इन कुंज गलियों में। लखनऊ का भूल-भुलैया भी इनके सामने पनाह मांग ले। तीज-त्योहार तो छोड़ ही दें आम दिनों में भी कंधे से कंधा भिड़े बिना यहां चलना मुश्किल होता है। तिस पर उसी में सायकिल भी, रिक्शा भी, ठेला भी, स्कूटर और मोटर सायकिल भी पर सब अपने-अपने इत्मीनान में ! 

कुछ तो है यहां, इसका सम्मोहन, इसकी ऐतिहासिकता, इसका अपनापन, इसकी आत्मीयता जो लाख अड़चनों, कमियों, मुश्किलों के बावजूद लोगों को अपने से जुदा नहीं होने देता ! 

जौक़ यूं ही तो नहीं फर्मा  गए होंगे,   

इन दिनों गरचे दक्खन मैं हैं बड़ी क़द्र ऐय सुखन, 
कौन जाये ज़ौक़ पर दिल्ली की गलियां छोड़ कर।   

सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

#करवा चौथ, चश्मा बदलने की जरुरत है

करवा चौथ के व्रत की  हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, दृढ प्रतिज्ञ, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने का साहस रखने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है। उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है 

करवा चौथ, हिंदू विवाहित महिलाओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार। जिसमें पत्नियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए दिन भर कठोर उपवास रखती हैं। यह खासकर उत्तर भारत में खासा लोकप्रिय पर्व है, वर्षों से मनता और मनाया जाता हुआ पति-पत्नी के रिश्तों के प्रेम के प्रतीक का एक त्योहार। सीधे-साधे तरीके से बिना किसी ताम-
झाम के, बिना कुछ या जरा सा खर्च किए, सादगी से मिल-जुल कर मनाया जाने वाला एक छोटा सा उत्सव।

इसकी शुरुआत को पौराणिक काल से जोड़ा जाता रहा है। इसको लेकर कुछ कथाएं भी प्रचलित हैं। जिसमें सबसे लोकप्रिय रानी वीरांवती की कथा है जिसे पंडित लोग व्रती स्त्रियों को सुनवा, संध्या समय  जल ग्रहण करवाते हैं। इस गल्प में सात भाइयों की लाडली बहन वीरांवती का उल्लेख है जिसको कठोर व्रत से कष्ट होता देख भाई उसे धोखे से भोजन करवा देते हैं जिससे उसके पति पर विपत्ति आ जाती है और वह माता गौरी की कृपा से फिर उसे सकुशल वापस पा लेती है।
महाभारत में भी इस व्रत का उल्लेख मिलता है जब द्रौपदी पांडवों की मुसीबत दूर करने के लिए शिव-पार्वती के मार्ग-दर्शन में इस व्रत को कर पांडवों को मुश्किल से निकाल चिंता मुक्त करवाती है। 
कहीं-कहीं सत्यवान और सावित्री की कथा में भी इस व्रत को सावित्री द्वारा संपंन्न होते कहा गया है जिससे प्रभावित हो यमराज सत्यवान को प्राणदान करते हैं।
ऐसी ही एक और कथा करवा नामक स्त्री की  भी है जिसका पति नहाते वक्त नदी में घड़ियाल का शिकार हो जाता है और बहादुर करवा घड़ियाल को यमराज के द्वार में ले जाकर दंड दिलवाती है और अपनें पति को वापस पाती है।

कहानी चाहे जब की हो और जैसी भी हो हर कहानी में एक बात प्रमुखता से दिखलाई पड़ती है कि स्त्री, पुरुष से ज्यादा धैर्यवान, सहिष्णु, सक्षम, विपत्तियों का डट कर सामना करने वाली, अपने हक़ के लिए सर्वोच्च सत्ता से भी टकरा जाने वाली होती है। जब कि पुरुष या पति को सदा उसकी सहायता की आवश्यकता पड़ती रहती है।उसके मुश्किल में पड़ने पर उसकी पत्नी अनेकों कष्ट सह, उसकी मदद कर, येन-केन-प्रकारेण उसे मुसीबतों से छुटकारा दिलाती है। हाँ इस बात को कुछ अतिरेक के साथ जरूर बयान किया गया है। वैसे भी यह व्रत - त्योहार  प्राचीन काल से चले आ रहे हैं, जब महिलाएं घर संभालती थीं और पुरुषों पर उपार्जन की जिम्मेवारी होती थी।पर आज इसे  कुछ तथाकथित आधुनिक नर-नारियों द्वारा पिछडे तथा दकियानूसी त्योहार की संज्ञा दे दी गयी है।  

पर आज कल आयातित  कल्चर, विदेशी सोच तथा तथाकथित आधुनिकता के हिमायती कुछ लोगों को महिलाओं का दिन भर उपवासित रहना उनका उत्पीडन लगता है। उनके अनुसार यह पुरुष  प्रधान समाज
द्वारा महिलाओं को कमतर आंकने का बहाना है। अक्सर उनका सवाल रहता है कि पुरुष क्यों नहीं अपनी पत्नी के लिए व्रत रखते ? ऐसा कहने वालों को शायद व्रत का अर्थ सिर्फ भोजन ना करना ही मालुम है। जब कि कहानियों में व्रत अपने प्रियजनों को सुरक्षित रखने, उनकी अनिष्ट से रक्षा करने की मंशा का सांकेतिक रूप भर है। यह तो  इस तरह के लोग एक तरह से अपनी नासमझी से महिलाओं की भावनाओं का अपमान ही करते हैं।उनके प्रेम, समर्पण, चाहत को कम कर आंकते हैं और जाने-अनजाने महिला और पुरुष के बीच गलतफहमी की खाई को पाटने के बजाए और गहरा करने में सहायक होते हैं। वैसे देखा जाए तो पुरुष द्वारा घर-परिवार की देख-भाल, भरण-पोषण भी एक तरह का व्रत ही तो है जो वह आजीवन निभाता है ! आज समय बदल गया है, पहले की तरह अब महिलाएं घर के अंदर तक ही सिमित नहीं रह गयी हैं। पर इससे उनके अंदर के प्रेमिल भाव, करुणा, परिवार की मंगलकामना जैसे भाव ख़त्म नहीं हुए हैं।

पर आज सोची-समझी साजिशों के तहत हमारे हर त्योहार, उत्सव, प्रथा को रूढ़िवादी, अंधविश्वास, पुरातनपंथी, दकियानूसी कह कर ख़त्म करने की कोशिशें हो रही हैं। रही सही कसर पूरी करने को "बाजार" उतारू है जिसने इस मासूम से त्यौहार को भी एक फैशन का रूप देने के लिए कमर कस ली है। आज समय की जरुरत है कि हम अपने ऋषि-मुनियों, गुणी जनों द्वारा दी गयी सीखों  उपदेशों का सिर्फ शाब्दिक अर्थ ही न जाने उसमें छिपे गूढार्थ को समझने की कोशिश भी करें।

शनिवार, 15 अक्तूबर 2016

ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर पहला "कैथेड्रल" कलकत्ता में बना था

कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है

कई बातों में पहला स्थान रखने वाले महलों के शहर कलकत्ता (आज का कोलकाता) में ही सर्वप्रथम क्रिश्चियन समुदाय द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के बाहर 1847 में पहले "कैथेड्रल" की स्थापना की गयी थी। जिसे "सेंट पॉल कैथेड्रल" के नाम से जाना जाता है। गोथिक शैली में बनी इस इमारत के निर्माण में करीब आठ साल लगे थे। यह बंगाल का सबसे बड़ा कैथेड्रल तो था ही बिशप द्वारा संचालित एशिया का पहला चर्च भी था जिसे भारत में बढ़ते क्रिश्चियन समुदाय को मद्देनज़र रख, इसी जगह स्थित छोटे आकार के सेंट जॉन चर्च को हटा, बनाया गया था।


चर्च और कैथ्रेडल में यही अंतर है कि कैथ्रेडल आकार में बहुत बड़ा होता है और बिशप द्वारा संचालित किया जाता है। बिशप का निवास भी ज्यादातर वहीँ होता है। वहीँ चर्च पादरी की देख-रेख में अपना काम करता है। भारत का सबसे पुराना चर्च, "सेंट थॉमस सायरो मालाबार कैथोलिक चर्च" है, जो केरल के त्रिचूर जिले के पालायूर इलाके में स्थित है। इसका निर्माण 52 AD के आस-पास का माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहीं से धर्म परिवर्तन की शुरुआत भी हुई थी। 
   
सेंट पॉल कैथेड्रल की सुंदर इमारत कलकत्ता के इकलौते हरे-भरे स्थल "मैदान" के दक्षिणी और विश्वप्रसिद्ध "विक्टोरिया मेमोरियल" की पूर्वी दिशा की तरफ स्थित है। इसी के कारण इसके सामने वाली सड़क का नाम भी कैथेड्रल रोड रखा  गया है। करीब सात एकड़ में बने इस कैथ्रेडल में हजार लोग एक साथ खड़े हो प्रार्थना कर सकते हैं। कोलकाता के ह्रदय-स्थल एस्पलेनैड या धर्मतल्ला या चौरंगी से एक डेढ़ की.मी., पैदल 10-15 मिनट की दूरी पर, बिड़ला-प्लेनेटोरियम, विक्टोरिया मेमोरियल, नंदन, रविन्द्र सदन थियेटर, फोर्ट विलियम, गुड़िया घर, रेस कोर्स, गंगा का किनारा बाबू घाट जैसे  स्थलों के बीच खड़ा, यह करीब पौने दो सौ साल पुराना, कैथ्रेडल आज भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। 

शनिवार, 8 अक्तूबर 2016

दंड भी दोषी को ही मिलना चाहिए

सरहद पार से आने वाले और उनको लाने वालों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। नाही वहाँ से आने वालों का स्तर संजीव कुमार, दिलीप कुमार या बलराज साहनी जैसा है, नाही उनको लेकर फिल्म घड़ने वाले राज कपूर या ऋषिकेश मुखर्जी हैं। ये लोग सिर्फ मौकापरस्त हैं 

देश कुछ लोगों की हठधर्मिता या कहिए अज्ञानतावश अजीब पेशोपेश में पड़  एक दोराहे पर आन खड़ा हुआ है। जबकि हमारी संस्कृति, हमारी परंपराओं, हमारी नैतिकता, हमारी सहिष्णुता, हमारे आचरण ने सदा हाथ फैला देशी-विदेशी हरेक का स्वागत किया है। हमारा धर्म इसी लिए सनातन है क्योंकि उसमें हरेक को अपने में समो लेने की विशेषता रही है। बाहर से आने वाले भी हमारे समाज रूपी दूध में शक्कर की तरह घुल-मिल कर यहीं के हो रह लिए। उनका धर्म, भाषा भले ही अलग थीं पर उनका योगदान हमारे समाज के लिए सदा लाभदायक रहा।    
 
बेल्जियम के कामिल बुल्के ने रामायण पर शोध ग्रन्थ, "रामकथा : उत्पत्ति और विकास" लिख यह पहली बार साबित किया कि रामकथा केवल भारत की ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय कथा है। रसखान जिनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था, उनकी कृष्ण भक्ति पर तो क्या प्रभू की जन्म भूमि के प्रति लगाव भी एक मिसाल है। रहीम, कबीर, फरीद कितने नाम गिनाए जाएं ! कहते हैं गामा पहलवान को दैवीय शक्तियों का आशर्वाद प्राप्त था। प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान पर हनुमान जी की कृपा थी। संगीतकार नौशाद माँ सरस्वती की आराधना करने के बाद ही काम पर जाते थे। राही मासूम रज़ा ने लोकप्रिय टी वी सीरियल का कथानक बुना, संजय खान ने हनुमान जी पर सीरियल बनाया, देश की उन्नति में डाक्टर कलाम का योगदान क्या कभी भुलाया जा सकता है ?  ये तो खैर नाम-चीन हस्तियां हैं, जन साधारण में भी ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे जो हमारे देवी-देवताओं में आस्था और भक्ति रखते हैं। जैसे कोलकाता के एक इलाके धापा में चीनी लोग माँ काली की पूजा करते हैं। राम लीला में साज-सज्जा और रावण-मेघनाद इत्यादि के पुतले बनाने में कई मुस्लिम परिवारों का योगदान रहता है। 

आजकल के माहौल को देखते हुए सोचना यह है कि हमें किससे नफ़रत करनी है, कर्मों से या नामों से। यदि कोई हमारी पौराणिक कथाओं में आस्था रखता है, पूरे मनोयोग, पाक-साफ़ इरादों से उन पर मंचित नाटकों में भाग लेना चाहता है तो इसमें बुराई क्या है ? उल्टे हमें तो ऐसे लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो हर तरह के डर या बन्दिशों को धत्ता बता ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए आगे आते हैं। उन्हें ही यदि हम दुत्कारेंगे तो उनके मन में वही सब बातें जड़ें ज़माना शुरू कर देंगी जिन्हें हमें समूल नष्ट करना है। एक तरफ तो हम चाहते हैं कि यहां रहने वाले देश के प्रति वफादार रहें दूसरी तरफ उनका अपमान करने से भी पीछे नहीं रहते ! प्रतिरोध तो हमें उनका करना है जिनकी नापाक नज़र हमारी धरती पर है। उनके मंसूबों को ख़त्म करना है जिनका मजहब सिर्फ दहशतगर्दी है। उनको मुंह तोड जवाब देना है जो हमारी शान्ति-प्रियता को हमारी कमजोरी समझ बैठे हैं।

बहार से आए हर गुणी का हमारे यहां स्वागत है। पर फिलहाल सरहद पार के खिलाड़ियों और कलाकारों पर बन्दिश लगाना सही साबित हो सकता है। इससे वहाँ के लोगों में अपनी सरकार के तथा उसकी कार्यप्रणाली के प्रति असंतोष उत्पन्न होगा। साथ ही वहाँ से आने वाले और उनको लाने वालों का मुख्य उद्देश्य सिर्फ पैसा कमाना है। नाही वहाँ से आने वालों का स्तर संजीव कुमार, दिलीप कुमार या बलराज साहनी जैसा है, नाही उनको लेकर फिल्म घड़ने वाले राज कपूर या ऋषिकेश मुखर्जी हैं। ये लोग सिर्फ मौकापरस्त हैं। 

कभी - कभी तो आशंका होने लगती है कि कहीं रफ़ी के गाये भजनों को भी बैन करने की बात न उठने लगे क्योंकि ऐसे लोगों को नहीं पता कि जिन बाइकों पर सवार हो वह गैर जिम्मेदाराना हरकतें करते हैं उसका ईंधन कहाँ से आता है ! यदि सिर्फ अपने अहम् की तुष्टि के लिए बैन-बैन-बैन की रट लगी रही तो इधर-उधर कहीं से कुछ भी बैन हो सकता है। समय आ गया है कि हर दल के जिम्मेदार अगुआ अपने मतलब से ऊपर उठ देशहित की सोचें और आजकल घटती घटनाओं को रोकने में गंभीरता से पहल करें। देश ऐसे कई भस्मासुरों से अतीत में खासा नुक्सान उठा चुका है।   

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

सुपर ट्रेनों में बढती टिप की बिमारी

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें

कुछ ट्रेनों में जिनमें खान-पान की सुविधा का मूल्य टिकट के साथ ही ले लिया जाता है, जैसे #राजधानी एक्स. में, उनमें सफर के ख़त्म होने के समय #कैटरिंग स्टाफ द्वारा #टिप लेने का चलन काफी दिनों से चला आ रहा है। हालांकि नाश्ते-भोजन का खर्च टिकट के साथ ही ले लिया जाता है यह जानते हुए भी यात्री की मन:स्थिति यात्रा के दौरान भोजन इत्यादि पर कुछ खर्च न होने और नम्रता पूर्वक की गयी त्वरित सर्विस के कारण वह 25-50 रुपये दे ही देता है। हालांकि पचासों वादों के बाद भी भोजन की गुणवत्ता जस की तस है। अब तो लोग तंग आ कर भोजन की सुविधा प्रदान करने वाली गाड़ियों में भी घर का खाना ले चलने लगे हैं। हाँ नाश्ते वगैरह को ठीक-ठाक कहा जा सकता है।  
पहले क्या होता था कि जिसने जो भी दे दिया कैटरिंग स्टाफ का मुखिया उसे चुप-चाप स्वीकार कर लेता था।पर आसानी से मिलती ढेर सी राशि को देख इनका लालच भी बढ़ने लगा है और अब ये अपनी मांग रखने लगे हैं। अभी सितंबर माह की बीस तारीख को "रायपुर राजधानी" के मेरे कोच में सिर्फ आठ-दस यात्री ही थे। सुबह दुर्ग के बाद जब वेटर के मांगने पर मैंने उन्हें टिप दी तो वे बोले, सर कुछ और दीजिए, देखिए ना आज तो कितने कम पैसेंजर हैं। जैसे यात्री कम होना भी मेरी गलती हो ! जैसे-तैसे वेटर गए तो सफाई वाला आ खड़ा हुआ कि मैं कल से सेवा कर रहा हूँ, कुछ दीजिए !! वही दृश्य जब तीन अक्टूबर को लौटना हुआ तो फिर दोहराया गया !!! जैसे ये लोग अपनी ड्यूटी न कर सिर्फ  मेरी सेवा कर रहे हों !! आदमी भले ही अपनी ख़ुशी से कुछ दे दे, पर माँगने से कोफ़्त होना स्वाभाविक है।  

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें। सरकार ने तो अपने हाथ खिंच कर सब कुछ प्रइवेट कंपनियों को सौंप दिया है। जिनका ध्येय ही है किसी न किसी तरह ज्यादा से ज्यादा कमाई करना। वे तो कमा ही रहे हैं उनके  मातहतों ने भी, यात्रियों को बकरा बना, अतिरिक्त कमाई का जरिया खोज निकाला है। समय रहते यदि इस पर अंकुश नहीं लगता है तो मांग तो बढ़ेगी ही, हो  सकता है कुछ ना देने वाले के साथ बदसलूकी की घटनाएं भी आम हो जाएं।

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

सत्ता की भूख ने उघाड़े चेहरे

कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी।  उसमें एक बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए  


अभी तक कुछ गिने-चुने ऐसे संस्थान बचे हुए हैं जिनका क्रिया-कलाप तथा दामन, इक्की-दुक्की घटनाओं के बावजूद पाक-साफ़ माना जाता है।       देश की जनता का जिन पर अटूट विश्वास और  श्रद्धा है।    इनमें हमारे वैज्ञानिक, न्यायालय तथा फ़ौज सर्वोपरि हैं। ऐसी धारणा है कि इनका हर कदम देश हित के लिए ही उठता है।पर इन दिनों सत्ता के लोभियों ने  जनता  के विश्वास    को डांवाडोल कर दिया है। अपने छुद्र स्वार्थ,   ओछी- राजनीति, तथा आकाओं की नज़र में बने रहने के लिए ऐसे लोग, जिनका अपना ना कोई आधार होता है नाही कोई पहचान, अपनी कमियों, अपनी खामियों को ढकने के लिए दूसरे दल   के हर   कदम या फैसले को गलत साबित करने के लिए किसी भी हद  तक चले जाते हैं। ऐसे मंदबुद्धि लोग जिसके इशारे पर ऐसा करते हैं उसको कोई कुछ नहीं कहता क्योंकि वह तो परोक्ष में बैठा है, लानत-मलानत इन छुट्भइयों की होती है मजे की बात यह है कि इनका दल भी इनके व्यक्तव्य को इनकी निजी राय बता पल्ला झाड़ लेता है और ये मुंह बाए बगलें झांकते रह जाते हैं।

अभी हुई हमारी सेना की कार्यवाही भी इन मूढ़मतियों के बयानों के दायरे में आ गयी। आश्चर्य होता है कि हमने कैसे-कैसे लोगों को कैसी-कैसी जिम्मेदारियां सौंप अपनी और देश की बागडोर थमा दी है, जिन्हें संभालना तो दूर वे तो उसका नाम लेने लायक भी नहीं हैं ! उन्हें समझ ही नहीं है कि वे क्या बोल, कर या चाह रहे हैं ! ना उन्हें, ना उनको उकसाने वालों को अंदाजा है कि उनकी नासमझी संसार में हमारी क्या तस्वीर पेश करेगी !  उनके ऐसे अमर्यादित बयानों से सेना के जवानों पर क्या असर पडेगा ! वह तो शुक्र है कि हमारी सेना इतनी संयमित और समझदार है कि वह ढपोरशंखों की आवाज और उनकी मंशा समझती है। पर आज यह जरूरी हो गया है कि ऐसे तिकडमी लोगों की नकेल ऐसे कसी जाए जिससे ये लोग न्यायालय की अवहेलना या फ़ौज की शूरवीरता पर सवाल उठाने की जुर्रत ही न कर पाएं।  

ऐसे माहौल में किसी फिल्म की बात करना मौके की गंभीरता को कम करना लग सकता है पर यह बात सामयिक है। कुछ दिनों पहले एक फिल्म आई थी, "जमीन", जो हाईजैक हुए हवाई जहाज के यात्रियों को बचाने के प्रयास पर फिल्माई गयी थी। फिल्म कैसी थी, अच्छी थी, बुरी थी, मुद्दा यह नहीं है, बात यह है कि उसमें भी एक ऐसे ही बड़बोले नेता का चरित्र रचा गया था, जिसे जब कमांडो ऑपरेशन में सम्मिलित होने को कहा जाता है तो उसकी धोती ढीली हो जाती है। क्यों नहीं ऐसे प्रमाण-इच्छुक लोगों को भविष्य में होने वाले किसी "सफाई अभियान" में जबरन शामिल कर उन्हें वातानुकूलित कमरे और प्राकृतिक सरहद का भेद समझा दिया जाए। 

शनिवार, 17 सितंबर 2016

प्रतिमा का अनादर न हो

आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को इस आस्था व मान्यता के साथ स्थापित करता है जैसे कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं। इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता।  उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि प्रेम भाव से उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है  

हर साल चाहे दुर्गा पूजा हो, काली पूजा हो या गणेश जी की आराधना, निश्चित अवधि के बाद विसर्जन की ऐसी-ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जिन्हें देख कर लगता है कि क्या सचमुच हम भक्ति-भाव, आस्था, प्रेम के साथ आराधना करते हैं या यह पूजा-अर्चना एक तरह का चलन हो गया है या फिर परिपाटी चली आ  रही है या फिर शुद्ध धन कमाने का जरिया बन  गया है।  

हमारे यहां वर्षों से अलग-अलग जगहों में भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना होती रही है। पर सबसे ज्यादा ख्याति बंगाल की दुर्गा पूजा की और महाराष्ट्र के गणपति पूजन की ही रही है। पहले देश के
किसी भी क्षेत्र का रहवासी वहीँ बने रह कर अपना जीवन व्यतीत कर देता था। बहुत कम लोग रोजगार  अपना इलाका छोड़ते थे। पर समय के साथ जब रोजगार के अवसर बढे तो जीवन-यापन, काम-धंधे के लिए विभिन्न क्षेत्रों के लोग देश के अन्य हिस्सों में जा वहाँ के लोगों के साथ अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाज, अपने तीज-त्यौहारों के साथ घुल-मिल गए। धीरे-धीरे माँ दुर्गा की पूजा, गणपति बप्पा की आराधना, राम लीला, दही मटकी लूट, कांवर यात्रा, गरबा नृत्य इत्यादि अपने-अपने क्षेत्र से निकल आए, सारी हदें ख़त्म हो गयीं। हर त्यौहार हरेक का हो सारे देश में सार्वजनिक तौर पर मनाया जाने लगा। देश के उत्सव-प्रिय लोगों को
ऐसे धार्मिक मनोरंजन खूब रास आने लगे। लोगों की भीड़ बेतहाशा बढ़ने लगी। ज्यादा भीड़, ज्यादा आमदनी। लोगों को अपनी ओर खींचने के लिए
प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी। पैसे के लालच ने एक ही इलाके में दसियों पंडालों को खड़ा कर दिया। मेले-ठेलों की भरमार हो गयी। स्पर्द्धा ने आयोजनों को भव्य बनाने की होड़ मचा दी। लोगों को आकर्षित करने के नए-नए रास्ते अपनाए जाने लगे। प्रतिमाएं गौण हो गयीं, पंडालों और अन्य विधाओं पर करोड़ों खर्च होने लगे। आकर्षण बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े कलाकारों को जिनकी फीस ही करोड़ों में होती है, बुलाया जाने लगा। अध्यक्ष पद के लिए रसूखदार लोगों का आह्वान होने
लगा। पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव हाशिए पर चले गए, दिखावा, शोर-शराबा अन्य बुराइयों के साथ हावी हो गए। धीरे-धीरे यहां ऐसे लोगों की पैठ होती चली गयी जिनका आस्था, संस्कृति, धर्म, पूजा-अर्चना, भक्ति-भाव से कुछ लेना-देना नहीं था उनका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, पैसा।

एक तरफ आज भी आम आदमी अपने घर में श्रद्धा-भक्ति के साथ अपने आराध्य को स्थापित कर पूरे मनोयोग से अपनी हैसियत के अनुसार
यथासाध्य विधि पूर्वक पूजता है। उसकी आस्था व मान्यता होती है कि उसके इष्ट साक्षात उसके घर पधारे हैं।
इसीलिए विदाई वाले दिन उसकी आँखों के आंसू रुकते नहीं हैं। खाने का एक कौर उसके गले से नीचे नहीं उतरता। उसे ऐसा  लगता है जैसे उसके घर का कोई प्रिय सदस्य दूर जा रहा हो। उसको फिर वापस  आने की याद दिलाते उसकी जीभ नहीं थकती। वहीँ  दूसरी ओर बड़े, विशाल, भव्य धार्मिक आयोजनों की वुकत वैसी ही रह गयी है जैसे नाटक-नौटंकी, सर्कस, मेले-ठेलों की होती है।  फ़िल्मी गाने, अनियंत्रित खाना-पीना, असंयमित व्यवहार आम बात हो गयी है। यही कारण कि विसर्जन के समय हमें प्रतिमाओं की दुर्दशा का साक्षी बनना पड़ता है। नदी, तालाब, सागर में उन्हें विसर्जित नहीं किया जाता फेंक कर छुटकारा पाया जाता है।



सवाल यह उठता है कि आयोजन इतना भारी-भरकम क्यों किया जाता है, जिसमें बेहिसाब खर्च आए ?  क्यों इतनी विशाल प्रतिमाएं बनाई जाती हैं कि जिन्हें संभालना भारी पड़ जाए ? क्यों विज्ञ-जनों के प्रवचनों और भजन सन्ध्या की जगह चलताऊ गायक और गानों को प्राथमिकता दे कर धार्मिक भावनाओं को तिरोहित किया जाता है।  आज जरुरत है इस फिजूल-खर्ची पर रोक की। धार्मिक आयोजनों को व्यवसाय न बनने देने की। अपनी संस्कृति, अपने रीती-रिवाजों को बचाने की।  अपने तीज-त्योहारों की गरिमा को अक्षुण रखने की। ऐसा तभी संभव हो पाएगा, जब हम, सब चलता है की मानसिकता से उबर कर, एकजुट हो इधर ध्यान देंगे।