रविवार, 19 जुलाई 2015

थोपे गए फैसलों से उभरते सवाल

पर क्या किसी काम का उद्देश्य कहीं कोई मायने नहीं रखता ?  पैसा देने वाले को भी किसी के आभा-मंडल से इतना प्रभावित नहीं हो जाना चाहिए कि उसकी चकाचौंध से अच्छे-बुरे की पहचान ही न हो पाए। इसकी नज़ीर महाराष्ट्र सरकार ने पेश की जब एक अभिनेत्री के "ब्रैंड एम्बेसडर" बनने की अनुचित मांग ठुकरा दी........    

गुजरे जमाने की फिल्मों में जब खलनायक के रूप में प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी फ़िल्म के अंतिम भाग में नायिका को जबरदस्ती किसी पहाड़ी या तहखाने में शादी करने के लिए ले जाते थे, हालांकि ऐन वक्त पर नायक उपस्थित हो कर उनके मनसूबों पर पानी फेर देता था, तब भी मन में यह सवाल उठता था कि ऐसे जबरन की गई या थोपी गयी शादी के बाद क्या उनकी जिंदगी कभी भी सामान्य हो पाएगी !  फिल्म के सुखांत पर सवाल भी लोप हो जाता था। वह तो फिल्मों के काल्पनिक संसार की बात थी पर इन दिनों घट रहीं कुछ घटनाओं के कारण फिर वैसे ही सवाल फिजा में मंडराने लगे हैं। 

सवाल एक :- कहते हैं ना कि "जिसके पैर न फटी बिवाई वह क्या जाने पीर पराई।"  2008 में एक कन्या के साथ दुष्कर्म हुआ। वर्षों बाद 2014 में आरोपी को जेल हुई पर साल भर बाद ही जज महोदय ने उसे रिहा ही नहीं कर दिया बल्कि पीड़िता को समझौता कर उसी दुष्कर्मी से उसे शादी करने की सलाह भी दे डाली। वह तो इसी बीच उच्चतम न्यायालय का एक  फैसला आ गया "कि ऐसे मामलों में समझौता विकल्प नहीं हो सकता" तब हाई कोर्ट ने अपनी बात वापस ली। इस सच्चाई पर कब गंभीरता से चिंतन-मनन होगा कि दुष्कर्म से सिर्फ शरीर ही दूषित और पीड़ित नहीं होता बल्कि इसका असर स्थाई रूप से दिलो-दिमाग को प्रभावित कर डालता है। वे कुछ क्षण उसकी जिंदगी को नर्क बना कर रख देते हैं। वह अपनी ही नज़रों में कभी उठ नहीं पाता।              

सवाल दो  :-  सुप्रसिद्ध धारावाहिक महाभारत में युद्धिष्ठिर की भूमिका निभा चुके गजेन्द्र चौहान को सरकार द्वारा FTII  का पदभार सौंपे जाने पर छात्रों के विरोध से मचा बवाल माह भर गुजर जाने पर भी शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। फ़िल्म जगत की जानी-मानी हस्तियां भी छात्रों के पक्ष में अपने विचार प्रगट कर चुकी हैं। तो लगता नहीं कि सौजन्यता पूर्वक, नैतिकता के मद्देनजर गजेन्द्र जी खुद ही इस विवाद से अलग हो जाएं।यहां उनकी क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा रहा बल्कि ऐसे माहौल में वे कैसे काम कर पाएंगे और संस्थान का क्या भला हो पाएगा, यह सवाल उभर कर आ रहा है ! 

सवाल तीन :- उसी "शो" जगत की विराट शख्शियत अमिताभ बच्चन से भी एक विवाद तब आ जुड़ा जब उन्होंने "दूरदर्शन" द्वारा देश के किसानों के हित के लिए शुरू किए गए एक नए चैनल से अपने आप को जोड़ लिया। इस चैनल के करीब पैंतालीस करोड़ के बजट से श्री बच्चन को  6.31 रुपये का मेहनताना, जो ऐसे काम के लिए किसी भी "प्रमोटर" को दी जाने वाली सबसे बड़ी रकम है, दिया जाना ही विवाद का कारण बना है। साबुन, तेल, फोन, गाडी, खाद्य सामग्री की बात पर कोई ऊंगली नहीं उठाता पर जब किसी काम का उद्देश्य किसी बदहाल तबके का भला करना हो तो सिमित बजट का "Lion's share" किसी को भी देने या लेने पर उंगली तो उठेगी ही। यहां विरोधी पक्ष का कहना है कि जब किसान अपनी बदहाल अवस्था के कारण ख़ुदकुशी कर रहे हों तो ऐसी दशा में इतनी बड़ी रकम एक आदमी को देना कहां तक उचित है ? वहीँ उनके पक्ष में खड़े लोगों का मत है कि ये उनके मंहगे समय की कीमत है। 

यह सही है कोई भी अपने काम का मूल्य खुद तय करता है। कोई उसे कम कीमत पर काम करने को मजबूर नहीं कर सकता। पर क्या किसी काम का उद्देश्य कहीं कोई मायने नहीं रखता ?  इसके साथ ही पैसा देने वाले को भी किसी के आभा-मंडल से इतना प्रभावित नहीं हो जाना चाहिए कि उसकी चकाचौंध से अच्छे-बुरे की पहचान ही न हो पाए। इसकी नज़ीर महाराष्ट्र सरकार ने पेश की जब एक अभिनेत्री के "ब्रैंड एम्बेसडर" बनने की अनुचित मांग ठुकरा दी।    

शनिवार, 18 जुलाई 2015

वह खौफनाक मंजर

पानी मेरे कद के हिसाब से ज्यादा था। पैर तले में नहीं लग पा रहे थे। मेरे लाख हाथ पांव मारने के बावजूद काई के कारण तना पकड़ में नहीं आ रहा था। उधर सारे जने अपने-अपने में मस्त थे पर पता नहीं कैसे हरजीत का ध्यान मेरी तरफ हुआ, वह तुरंत दौड़ा और तने पर आ, बिना अपने कपड़ों की परवाह किए अपने दोनों पैरों से तने को जकड़ अपना हाथ मेरी ओर बढा मुझे किनारे तक खींच लिया। मैं सिर से पांव तक तरबतर ड़र और ठंड से कांप रहा था ........ 

कभी-कभी यादों का सिलसिला चल पड़ता है तो फिर थमने का नाम ही नहीं लेता। एक-एक कर भूली-बिसरी यादें ताजा होती चली जाती हैं लगता है जैसे कल की ही बात हो। अभी कुछ दिनों पहले अपने स्कूल लाने ले जाने वाले रिक्शे वाले की आत्मीयता की बात की थी, आज बचपन के साथी की याद आ रही है, पता नहीं कहां होगा जिसने मेरी जान बचाई थी।     
वर्षों पहले की बात है तब आज की तरह शिक्षा व्यवसाय का रूप नहीं ले पायी थी जिसकी वजह से गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह स्कूल नहीं खुले हुए थे। इसलिये शिक्षण केन्द्र ज्यादातर घरों से दूर ही होते थे। पिताजी उन दिनों कलकत्ता के पास कोननगर नामक स्थान में लक्ष्मीनारायण जूट मिल में कार्यरत थे। वहां काम करने वाले लोगों में हर प्रांत के लोग थे। पंजाबी, गुजराती, मारवाड़ी, बिहारी, मद्रासी (उन दिनों हर दक्षिणवाले को मद्रासी ही समझा जाता था), हिमाचली, नेपाली और बंगाली तो होने ही थे। पर वहां सब अपनी जाति भूल एक परिवार की तरह ही रहते थे, एक-दूसरे की खुशी गम में शरीक होते हुए। बच्चों के लिए सब घर अपने थे। बिना रोक-टोक आना-जाना, कहीं भी खाना कहीं भी सो जाना आम बात थी।  
हमारे हिंदी भाषी स्कूल का नाम था रिसड़ा विद्यापीठ, जो रिसड़ा नामक जगह में हमारे घर से करीब पांच एक मील दूर था। हम सात-आठ बच्चे रिक्शों में वहां जाते-आते थे। उस समय के रिक्शे वालों की आत्मीयता का जिक्र मैं अपनी एक पोस्ट शिबू रिक्शे वाला में कर चुका हूं। रिक्शे वाले समय के पाबंद हुआ करते थे।

जिस दिन का जिक्र कर रहा हूं , उस दिन स्कूल जाते हुए अपने एक सहपाठी हरजीत के साथ मेरी किसी बात पर अनबन हो गयी थी। कारण तो अब याद नहीं पर हम दोनों दिन भर एक दूसरे से मुंह फुलाये रहे थे। उस दिन किसी कारणवश स्कूल में जल्दी छुटटी हो गयी थी। आस-पास के तथा बड़े लड़के-लड़कियां तो चले गये। पर हमारे रिक्शेवालों ने तो अपने समय पर ही आना था, सो हम वहीं धमा-चौकड़ी मचाते रहे। स्कूल से लगा हुआ एक बागीचा और तलाब भी था। खेलते-खेलते ही सब कागज की नावें बना पानी में छोड़ने लग गये। तालाब का पानी तो ठहरा हुआ होता है सो नावें भी भरसक प्रयास के बावजूद किनारे पर ही मंडरा रही थीं। हम जहां खेल रहे थे वहां से कुछ हट कर एक पेड़ पानी में गिरा पड़ा था। उसका आधा तना पानी में और आधा जमीन पर था। अपनी नाव को औरों से आगे रखने की चाह में मैं उस तने पर चल, पानी के ऊपर पहुंच गया। वहां जा अभी अपनी कागजी नाव को पानी में छोड़ भी नहीं पाया था कि तने पर पानी के संयोग से उगी काई के कारण मेरा पैर फिसला और मैं पानी में जा पड़ा । पानी मेरे कद के हिसाब से ज्यादा था। पैर तले में नहीं लग पा रहे थे। मेरे लाख हाथ पांव मारने के बावजूद काई के कारण तना पकड़ में नहीं आ रहा था। उधर सारे जने अपने-अपने में मस्त थे पर पता नहीं कैसे हरजीत का ध्यान मेरी तरफ हुआ, वह तुरंत दौड़ा और तने पर आ, बिना अपने कपड़ों की परवाह किए अपने दोनों पैरों से तने को जकड़ अपना हाथ मेरी ओर बढा मुझे किनारे तक खींच लिया। मैं सिर से पांव तक तरबतर ड़र और ठंड से कांप रहा था। पलक झपकते ही क्या से क्या हो गया था। सारे बच्चे और स्कूल का स्टाफ मुझे घेरे खड़े थे। कोई रुमाल से मेरा सर सुखा रहा था, कोई मेरे कपड़े, जूते, मौजे सुखाने की जुगत में था। और हम सब इस घटना से उतने विचलित नहीं थे जितना घर जा कर ड़ांट का ड़र था। पर एक बात आज भी याद है कि मैंने और हरजीत ने तब तक आपस में बात नहीं की थी सिर्फ छिपी नज़रों से एक दूसरे को देख लेते थे। पता नहीं क्या भाव थे दोनों की आंखों में।

कुछ ही देर में रिक्शेवाले भी आ गये। हम सब घर पहुंचे, पर हमसे भी पहले पहुंच चुकी थी मेरी ड़ुबकी की खबर। और यह अच्छा ही रहा माहौल में गुस्सा नहीं चिंता थी, जिसने हमें ड़ांट फटकार से बचा लिया था। एक बात और अच्छी हुई कि इस घटना के बाद मेरी किसी से भी लड़ाई नहीं हुई कभी भी। 

गुरुवार, 16 जुलाई 2015

कथनी की "रील" और करनी की "रियल" जिंदगी में अंतर

फिल्मी दुनिया का माया लोक तो अपनी निष्ठुरता के लिए प्रसिद्ध है ही, जहां काम निकलने के बाद लोग पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। अब छोटे पर्दे  पर भी उसका असर दिखने लगा है। चकाचौंध की दुनिया में इंसानियत, नैतिकता, संवेदना जैसी भावनाएं तिरोहित होती चली जा रही हैं।  हालांकि "रील  और रियल" की जिंदगी में जमीं-आसमान का फर्क होता है पर… 

टी.वी. पर चौबीसों घंटे चलने वाले कार्यक्रमों में एक "सब" भी है। इसने अपनी पहचान हल्के-फुल्के पारिवारिक हास्य सीरियलों से बनाई है। जिनमें परिवार के सदस्य एक-दूसरे के लिए समर्पण, आदर, प्रेम, लिहाज तथा त्याग की भावना से ओत-प्रोत दिखते हैं। ये सरल पात्र इंसानियत और मानवता के प्रतिरूप की तरह गढ़े गए हैं। इनका यह प्रेम और लगाव घर वालों के लिए ही नहीं पड़ोस के साथ-साथ समाज के लिए भी सरोकार रखता है।  
मनीष विश्वकर्मा
पर लगता है कि यहां भी कथनी और करनी में गहरा अंतर है। पर्दे पर दुनिया भर के आदर्श और बड़ी-बड़ी बातें कहने और कहलवाने वालों का असली रूप कुछ और ही है। फिल्मी दुनिया का माया लोक तो अपनी निष्ठुरता के लिए प्रसिद्ध है ही, जहां काम निकलने के बाद लोग पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। अब छोटे पर्दे  पर भी उसका असर दिखने लगा है लगा है। चकाचौंध की दुनिया में इंसानियत, नैतिकता, संवेदना जैसी भावनाएं तिरोहित होती चली जा रही हैं।                  
पिछले दिनों #सब टी.वी. पर चलने वाले एक सीरियल "चिड़ियाघर" में मेढक प्रसाद के पात्र को निभाने वाले मनीष विश्वकर्मा शूटिंग के वास्ते जाते हुए सड़क दुर्घटना का शिकार हो गए। अस्पताल में वे कोमा में हैं। पर नाहीं सब वालों ने खुद दर्शकों को इसकी जानकारी दी नाहीं उस सीरियल के पात्रों से कुछ कहलवाया। जबकी अपने आने वाले किसी कथानक की घोषणा जबरदस्ती सीरियल के बीच जगह बना किसी पात्र द्वारा करवा दी जाती है। टी. वी. धारावाहिकों के निर्माताओं ने एक सहूलियत ले रखी है जिसके अंतर्गत कथानकों में पात्रों का आना-जाना-बदलना एक आम बात है। पर यदि किसी की जान पर बन आई हो तो इंसानियत के नाते संवेदना प्रगट करना तो फर्ज बनता ही है न ! 

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

नहीं भूलता बचपन का वह रिक्शेवाला

हमारे धमा-चौकड़ी मचाते  तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की ? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की ? हमें हंसता-खुश होता देखने की ? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की ? वह भी बिना किसी आर्थिक लाभ के !    

समय के साथ-साथ मनुष्य के मन की कोमल भावनाएं कैसे तरोहित होती चली गयीं पता ही नहीं चला। बच गयी तो प्रतिस्पर्धा, वैमनस्य, व्यवसायिकता। किसी के पास क्षण भर को ठहर कर अपने चहुं ओर देखने का समय ही नहीं बचा। लोग अपना ही ख्याल नहीं रख पा रहे हैं तो दूसरों का हाल क्या पूछेंगे ! और-और पाने की चाह में एक अंधी दौड़ चल पड़ी है।  

पिछले अंक में रिख्शे वालों की बात कर रहा था, जो मुझे और मेरे  हमउम्र साथियों को स्कूल ले जाया करते थे।कितनी आत्मीयता होती थी उन दिनों उनकी बच्चों के प्रति। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। अभिभावक भी उनके संरक्षण में बच्चों को छोड़ निश्चिन्त रहते थे। हमारा स्कूल कोई कोई सात-आठ किमी दूर था। जितना याद पड़ता है, मेरे रिक्शे वाले की उम्र ज्यादा नहीं थी, कोई तीसेक साल का होगा। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है। हमारे यहां से स्कूल की तरफ चार या पांच रिक्शा वाले अपनी-अपनी "बच्चा सवारियों" के साथ निकलते थे। बहुतेरी बार अपने रिक्शे से किसी और रिक्शे को आगे होते देख बाल सुलभ इर्ष्या के कारण हम शिबु को और तेज चलाने के लिए उकसाते थे और इस तरह रोज ही ‘रेस-रेस खेल’ हो जाता था। स्कूल आने-जाने के दो रास्ते थे। एक मुख्य  सड़क से तथा दूसरा  भीतर ही भीतर घुमावदार, कुछ लंबा। शिबु अक्सर हमें लंबे रास्ते से वापस लाया करता था। उस रास्ते पर एक बड़ा बाग हुआ करता था। बाग में एक खूब बड़ी सीमेंट की फिसलन-पट्टी थी। हमें खुश करने के लिए वह अक्सर वहां घंटे-आध-घंटे के लिए रुक जाता था। जब तक हम वहां धमा-चौकड़ी मचाते थे तब तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आजकल साबुन के घोल से जैसे बनाते हैं वैसे ही। उन दिनों यह सब सामान्य लगता था। पर आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की? हमें हंसता खुश होता देखने की? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की? खूद गीले होने की परवाह ना कर बरसातों में हमें भरसक सूखा रखने की? जबकी इसके बदले नाही उसे अलग से पैसा मिलता था नाही और कोई लाभ। जबकि इन सब में व्यतीत हुए समय का उपयोग कर वह कोई और सवारी ले कुछ आमदनी कर सकता था। कभी देर-सबेर की कोई शिकायत नहीं। क्या ऐसी बात थी कि उसके रहते हमारे घरवालों को कभी हमारी चिंता नहीं रहती थी। उसके इसी स्नेह से हम रोज स्कूल जाने के लिए भी उत्साहित रहते थे। आज के युग में ऐसा होना तो छोड़ कोई शायद इस तरह की कल्पना भी नहीं कर सकता। 

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

मासूमों को कब निजात मिलेगी !

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। 

नए सत्र के साथ फिर स्कूल खुल चुके हैं। उत्तीर्ण हो आगे की कक्षाओं में बढ़ गए बच्चों के रिक्त स्थानों की पूर्ती के लिए नई खेप आ चुकी है। आजकल "शिक्षालय" या "विद्यालय" पूर्णतया "स्कूलों" में परिवर्तित हो चुके हैं। समय ने हर चीज को बदल कर रख दिया है। स्कूलों द्वारा अभिभावकों को लुभाने के लिए तरह-तरह की सहूलियतें बखान की जाती हैं। जिसमें पढ़ाई का स्तर या उसकी बात गौण होती है तथा उसका नंबर काफी बाद में आता है। आज हर नामी स्कूल के पास बच्चों को लाने ले जाने के लिए अपनी बस सेवा उपलब्ध होती है। आज स्कूलों में दाखिले के साथ-साथ वहाँ बच्चों को पहुंचाना भी अभिभावकों के लिए एक समस्या है, इसलिए वे इस सुविधा का लाभ, मंहगी होने के बावजूद, ले कुछ हद तक तनाव मुक्त हो जाते हैं। वैसे स्कूल पहुँचने का हर जरिया अभिभावक की जेब पर भारी ही पड़ता है।

आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर "लदे" हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। एक रिक्शे में दो बच्चे ही बैठते थे। यही अघोषित परंपरा थी, चाहे एक ही जगह से कितने भी बच्चे एक ही स्कूल में जाते हों। कभी-कभार किसी रिक्शे वाले के मजबूरीवश न आ पाने के कारण दो की जगह तीन बच्चे बैठ जाते हों पर उससे ज्यादा कभी नहीं। मुझे याद है, तब मेरे बाबूजी, तबके कलकत्ता, के पास कोननगर में लक्ष्मी नारायण जूट मिल में कार्यरत थे। वहाँ से करीब आठ-दस बच्चे पांच-सात किलोमीटर दूर रिसड़ा विद्यापीठ में पढने जाते थे। दो-दो बच्चों के हिसाब से चार या पांच रिक्शे रोज वहाँ से निकलते थे। उन दिनों निजी वाहन बहुत कम हुआ करते थे। रिक्शों का चलन आम था। मेरा हमजोली मंजीत सिंह नाम का साथी था। स्कूलों में भी आजकल जैसी अफरातफरी का माहौल नहीं हुआ करता था। नाही बस्तों का बोझ आज
जैसा था। सही मायनों में शिक्षा देने की परंपरा थी। गर्मियों में बच्चों का ध्यान रखते हुए स्कूल सुबह के हो जाते थे, सात से ग्यारह। बाकी महिनों में वही दस से चार का समय रहता था। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। रिक्शे वाले भी बच्चों का बहुत ध्यान रखते थे।  मजाल है कि कोई ऊँच-नीच हो जाए। इसीलिए माँ-बाप भी उन्हें बच्चों को सौंप कर निश्चिन्त रहा करते थे। मुझे लाने-ले जाने वाला रिक्शाचालक उड़ीसा का था। उम्र रही होगी कोई तीस के आस-पास की। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। नाम तो शायद उसका शिव रहा होगा, पर जैसा कि बंगला या उड़िया उच्चारणों में होता है, वह शिवो और शिवो से शिबु हो गया होगा। जैसा अब समझ में आता है। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है।

आजकल रिक्शों की जगह ज्यादातर ऑटो ने ले ली है। अब चाहे ऑटो हो या रिक्शा बच्चे बैठे नहीं ठूंसे रहते हैं।
इस तरह की यात्रा जाहिर है शरीर में थकान पैदा कर देती है, रही सही कसर बस्तों का भार पूरा कर देता है। तो स्कूल की पढ़ाई के लिए जो ताजगी शरीर और दिमाग में होनी चाहिए वह स्कूल पहुँचने के पहले ही उड़नछू हो जाती है। स्कूलों के खुलने के आस-पास इस सब पर हाय-तौबा मचती है फिर सब कुछ यथावत चलने लगता है। बड़ों की लापरवाही का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। पता नहीं कब सच्चे दिल से कोई इस ओर ध्यान देकर मासूमों को निजात दिलवाएगा !     

गुरुवार, 2 जुलाई 2015

"बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ, फिर भी खरीददार हूँ",

कहा जाता था कि "बाज़ार से गुजरा हूँ, पर खरीददार नहीं हूँ" पर उपभोक्ता संस्कृति ने उसे उलट कर "बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ फिर भी खरीददार हूँ", कर दिया है। मैं ऐसी जगह जाने से कतराता हूँ, जहां फांसने की पूरी चाक-चौबंद तैयारी कर रखी गयी हो।  इस कतराहट को जानते हुए भी जब कभी श्रीमती जी कुछ अलग अंदाज में कहती हैं कि चलो न ज़रा मॉल से कुछ सामान ले आएं, तो समझ में आ जाता है कि फिर छुरी पर खरबूजे को गिराने की तैयारी हो चुकी है, फिर रात के भोजन को बेस्वाद होने से भी बचाना होता है सो  !!!

पिछले दस-पंद्रह सालों में कितना कुछ बदल गया है हमारे चारों ओर के परिवेश में। वह भी बिना किसी शोर-शराबे के। रहन-सहन, चाल-ढाल, सोच-विचार हर चीज में परिवर्तन हुआ है। जीवन कुछ आसानी महसूस करने लगा है। रोजमर्रा की जद्दो-जहद कुछ कम हो गयी है। सारे बदलाव अच्छाइयों के लिए ही किए जाते हैं पर क्या ऐसा हो पाता है? अच्छाइयों के साथ कुछ बुराइयां भी दबे पांव, बिन बुलाए चली आती हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे।

अब बाज़ार को ही लीजिए। उसने तो शायरों की धारणाएं ही बदल कर रख दी हैं। कहा जाता था कि "बाज़ार से गुजरा हूँ, पर खरीददार नहीं हूँ" पर उपभोक्ता संस्कृति ने उसे उलट कर "बाज़ार से नहीं गुजरा हूँ, फिर भी खरीददार हूँ", कर दिया है। अपनी घरेलू ख़रीददारी को ही लें। पहले हर छोटी-बड़ी परचून या रोजमर्रा के सामान की दुकान पर ग्राहक को बाहर ही खड़े हो कर अपनी जरुरत बतानी होती थी जिसके अनुसार, उसके बजट के दस-पांच रूपये ऊपर-नीचे में सामान मिल जाता था। पर अब तो आधुनिक दुकानों को आपके सामने पूरी तरह बिछा दिया जाता है। हमें लगता है कि अब अपनी मर्जी से हम चुनाव कर सकते हैं। पर इनके तरह-तरह के प्रलोभन और सहूलियतें अपने मकड़जाल में अच्छे-अच्छों को चकरघिन्नी बना डालते हैं। ये मॉल हमारी जेब का माल इतनी खूबी से निकलवा लेते हैं कि हमें कानों-कान खबर नहीं हो पाती। आप बाज़ार भाव के अनुसार कैसा भी बजट बना कर जाएं, पांच-सात सौ ऊपर लगना तय है। पुरानी दुकानों में हर चीज अपनी जगह पर स्थायी तौर पर रखी जाती थी जिससे दूकान के सहायकों को उसे खोजने में दिक्कत न हो और ग्राहक  को भी जल्दी सामान मिल जाए। पर अब जान-बूझ कर सोची-समझी रणनीति के तहत एक निश्चित अवधि के पश्चात जिंस का स्थान बदल दिया जाता है, जिससे कि आप सिर्फ अपने मतलब का सामान ले कर ही न चलते बनें, उसे खोजने के दौरान और भी जरुरी-गैरजरूरी वस्तुएं आपकी नज़र के दायरे में आती रहें, जिससे जरुरत होने ना होने पर भी आपको भर्मित कर आपकी खरीददारी का दायरा कुछ और बढ बाजार को फायदा दिला सके।और इसके लिए सामानों को भी "आधुनिक लुक" प्रदान कर दिया जाता है। अब जैसे भुट्टे को ही लें, मॉल में जब ग्राहक उसे अपनी  प्राकृतिक पोशाक के बदले डिजायनर परिधान में देखता है तो उसे लपक लेने से अपने को नहीं रोक पाता और अपनी जेब का छेद और बड़ा कर लेता है।
मैं ऐसी जगह जाने से कतराता हूँ, जहां फांसने की पूरी चाक-चौबंद तैयारी कर रखी गयी हो।  इस बात को जानते हुए भी जब कभी श्रीमती जी कुछ अलग अंदाज में कहती हैं कि चलो न ज़रा मॉल से कुछ सामान ले आएं, ज्यादा नहीं है बस पांच-सात चीजें ही हैं। उस समय यदि मैं कहूँ भी कि लिस्ट भेज दो या किसी से मंगवा लो तो उलटे असर की संभावना बढ़ जाती है और रात के खाने के बेस्वाद हो जाने के डर से गाडी निकलनी पड़ती है साथ ही समझ भी आ जाता है कि फिर छुरी पर खरबूजे को गिराने की तैयारी हो चुकी है। इन मॉल्स की महिमा तो इतनी अपरंपार है कि बाबा रामदेव, जिनका अपना खुद का इतना बड़ा "नेटवर्क" है ग्राहकों को घेरने के लिए, वे भी मॉल के मायाजाल को समझते हुए अपने उत्पादन वहां रखवाने लगे हैं।

अब मैं और आप तो यही गुनगुना सकते हैं, "मॉल अनंत मॉल 'महिमा' अनंता।
जय हो !!!