गुरुवार, 5 नवंबर 2015

जो दिखता है, वही टिकता है

नाम और दाम पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग पहुँच जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है.............................. 

बाज़ार का मानना था कि आदमी की यादाश्त कमजोर होती है। इसके चलते उसने अपनी रणनीति में एक ब्रह्म-वाक्य जोड़ लिया कि जो दिखता है वही बिकता है। उसका आकलन सही भी था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 'निरमा' और 'मैगी' हैं जिन्होंने गुणवत्ता में अपने से कहीं ऊपर हिंदुस्तान लीवर के उत्पादों की बिक्री में सेंध लगा दी थी।  फिर टी. वी. के आने के बाद तो इस विधा में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया। बाजार ने चौबीसों घंटे आँख और कान के पास अपने ढोल बजा कर इंसान की बुद्धि ऐसी कुंद कर दी कि वह मंत्रमुग्ध सा उधर ही चल पड़ा जिधर बाज़ार के आका चाहते थे। 

इस करामात को देख समाज के कुछ चंट, चालाक, धूर्त, मौकापरस्त लोगों ने इस दिखने की ताकत को पहचान, उसे अपने फायदे के लिए अपनाने में देर नहीं की। उन्हें समझ आ गया कि यदि अपने क्षेत्र में बने रहना है, लोगों में अपनी पहचान बनाए रखनी है तो किसी भी तरह खबरों में बने रहना होगा। इस श्रेणी में हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर तबके, हर दल के लोग शामिल हो गए और इसी के साथ ही शुरू हो गया बेहयाई का नंगा नाच। सारी तहजीब, सारी नैतिकता, लज्जा, संकोच, आदर-सम्मान सब को दरकिनार कर दिया गया। पद, मर्यादा, छोटे-बड़े किसी चीज का लिहाज नहीं बचा। बची तो सिर्फ अपनी मतलबपरस्ती। तभी तो ऐसे-ऐसे महानुभाव जिन्हें देश तो क्या उनके प्रदेश के लोग भी पूरी तरह नहीं जानते थे, जिनके लेखन को सिर्फ घरवाले ही जानते थे, जिनकी तथाकथित कला को उनके "फ्रेंड सर्कल" से बाहर शायद ही कोई भाव देता था,  वे भी आजकल छोटे पर्दे पर घंटों बैठे दिखने लग गए हैं। ऐसे लोग जहां भी ज़रा सी भी गुंजाइश पाते हैं, कवरेज पाने की तो मौका हाथ से जाने नहीं देते। इसके लिए अपशब्दों के प्रयोग में,  दूसरे की बखिया उधेडने में,  किसी की लानत-मलानत करने में, किसी के इतिहास-भूगोल खंगाल कर उसकी बदनामी करने में, अपनी खुद की ही ऐसी की तैसी करवा कर उसको मुद्दा बनाने में कोई गुरेज नहीं किया जाता। जाहिर है इनका एक ही मूल मंत्र है, बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ !! ऐसे "स्मार्ट" लोग जानते हैं कि करोड़ों की आबादी वाले इस देश में कुछ भी करो समर्थन मिल ही जाएगा। सौ-पचास लोग तो ऐसे ही पक्ष में आ खड़े होंगे। ऊपर से यदि किसी राजनैतिक दल से जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त है फिर तो इन्हें कुछ भी ऊल-जलूल बोलने और करने की स्वतंत्रता वैसे भी हासिल हो चुकी होती है। इन्हें रातों-रात शोहरत पाने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत सिर्फ विवादास्पद बयान जारी करना होता है।  उधर उनकी पार्टी और खबरचियों को एक लाइन लिखवानी पड़ती है कि ये श्रीमान अमुक के निजी विचार हैं।  मान लीजिए कुछ ज्यादा ही बखेड़ा खड़ा हो भी जाता है तो बड़े भोलेपन से दूसरे दिन यह भी कहा जा सकता है कि मेरे कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, मेरे कहने का मतलब कुछ और था।        

नाम और दाम ने अच्छाई और बुराई के अर्थ बदल दिए हैं। इन्हें पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग कीचड़ में लथ-पथ हो पहुँच जाते हैं और कई बार पहुंचवा दिए जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। ऐसा नहीं है कि इन्हें अपनी करनी का इल्म नहीं होता या उसके अंजाम से ये लोग अनजान होते हैं। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है और इस मौके को कब, कैसे और कहाँ भुनाना है। 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-11-2015) को "एक समय का कीजिए, दिन में अब उपवास" (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'