मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

मैंने भी कहा, चलो !!

फिर शनि महाराज को मेरी याद हो आई, बोले बेटा एक बार फिर दिल्ली चलना है ? मैंने कहा आप तो अपनी बात मनवा कर ही रहोगे मेरी कौन सी सुनवाई होनी है ! पर महाराज ! नन्हा सा बीज आसानी से धरती में पनप जाता है। छोटे पौधे भी थोड़ी सी देख-भाल से अपने-आप को संभाल लेते हैं।  पर  विकसित वृक्ष को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने में असीमित खतरे रहते हैं। शनि महाराज मुस्कुराए बोले, मैं हूँ ना ! अब और क्या कहना था मैंने भी कहा,   चलो !!

जिंदगी एक शिक्षक की तरह इंसान को काफी कुछ सिखाती रहती है। उसके शिक्षण से आदमी की कई धारणाएं बदलती रहती हैं और उसकी आशा के विपरीत बनती रहती हैं। जैसे मुझे ज्योतिष या भाग्य पर अविश्वास नहीं था तो विश्वास भी नहीं था। पर इस विधा में दखल रखने वालों का कहना है कि शनि ग्रह की प्रबलता इंसान को एक जगह टिकने नहीं देती। उसका स्थानातंरण होता रहता है। अब वह भले ही अच्छाई के लिए हो या बुराई के लिए यह अलग बात है। आज उम्र के इस पड़ाव पर आ कर  फुरसत में बैठ जिंदगी की रील को दोबारा देखने पर पाता हूँ कि सचमुच ही कितनी-कितनी बार उखड़ाव आया है जिंदगी में। और उसका दर्द वही जान सकता है जो उसे भोगता है। 

पंजाब के फगवाड़ा शहर में जन्म के पश्चात तीन साल की आयु में कलकत्ता ले जाया गया, जहां मेरे बाबूजी कार्य करते थे। जगह थी कोन-नगर। आठ-नौ वर्षों के बाद उनके कार्यक्षेत्र के बदलाव के कारण मुझे अपने स्कूल के चलते कलकत्ते में अपने काकाजी के पास रहना पड़ा।  जब समझा गया कि अब मैं लोकल ट्रेनों में अकेले सफर कर सकता हूँ तो फिर कलकत्ते से करीब पैंतीस की. मी. दूर कांकीनाडा, जहां पिताजी कार्यरत थे, आने-जाने की इजाजत मिल गयी। पर सात-आठ साल बीतते-बीतते जैसे ही स्नातक हुआ प्रभू की अनुकंपा से कलकत्ते के पास कमरहट्टी नामक स्थान पर इसी नाम की जूट मील में कार्य करने का मौका मिलते ही फिर एक बार जगह छोड़नी पड़ी। वहीँ गृहस्थाश्रम में प्रवेश किया और जब एक स्थायित्व का अनुभव होने लगा तो कुछ ऐसी परिस्थितियां बनी कि डोरी-लोटा ले कर दिल्ली जाना पड़ गया। घर तो था वहां पर बाकी जरूरतों के लिए, नई जगह नए परिवेश में मशक्कत तो करनी ही पड़ती है। अच्छा, ऐसा भी नहीं लग रहा था कि कोई अनहोनी हो रही है। सब नॉर्मल तरीके से होता गया और हम उसे स्वीकारते रहे। पर कितने दिन, वही दस-ग्यारह साल का अरसा बीतते न बीतते फिर इतिहास ने दोहराना शुरू किया अपने आप को और इस बार बहाना बना अभिभावकों का आग्रह और जिद। जगह हिस्से में आई तब के मध्य प्रदेश के रायपुर शहर की। पर इस बार जिंदगी मुस्कुराई नहीं बल्कि किसी के भी बुरे ना होते हुए भी एक कड़वाहट भाग्य की लकीर बन साथ में चस्पा हो गई। 

हालांकि रायपुर में पच्चीस-सत्ताईस साल की उम्र और गुजर गयी  पर इन सालों में स्थायित्व और मैं आगे-पीछे होते भागते रहे।  इन ढेर सारे सालों में छह बार अपना बोरिया-बिस्तर उठाना और लगाना पड़ा। इसी बीच शहर तरक्की करता गया, राजधानी बन गया छत्तीसगढ़ प्रदेश की। उसके साथ ही पिछले आठ-नौ साल ठीक-ठाक गुजरे।  बच्चे बड़े हो गए और इस लायक हो गए कि किसी भी तरह का भार उठा सकें तो फिर शनि महाराज को मेरी याद हो आई, बोले बेटा एक बार फिर दिल्ली चलोगे ? मैंने कहा आप तो अपनी बात मनवा कर ही रहोगे मेरी कौन सी सुनवाई होनी है ! पर महाराज ! नन्हा सा बीज आसानी से धरती में पनप जाता है। छोटे पौधे भी थोड़ी सी देख-भाल से अपने-आप को संभाल लेते हैं।  पर  विकसित वृक्ष को एक जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने में असीमित खतरे रहते हैं। शनि महाराज मुस्कुराए बोले, मैं हूँ ना ! अब और क्या कहना था मैंने भी कहा,   चलो !! जब तुगलक बना ही दिया है। 

इस तरह एक बार फिर  "मुड़-मुड़ खोती, बौड़ हेठां" . "जहाज का पंछी फिर जहाज पर" . "सुबह का भुला................."  . घर के   ..................."   आदि मुहावरों को चरितार्थ किया और सोचा कौन जा सकता है दिल्ली की गलियां छोड़ कर !!!         

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और प्रेरणादायक कहानी - असली धन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

Harshvardhan ji
dhanywad