मंगलवार, 9 जून 2015

उधर ठाकुर जी मेरा इंतजार कर रहे हैं !

मैं सोच में पड़ गया, एक तरफ मेरे ऊसूल थे दूसरी तरफ मित्र ।  तभी समझ में आया कि क्यों तमाम विरोधों के बावजूद इन  बाबाओं की दुकानें बंद नहीं होतीं।   जब चारों ओर से  इंसान थक-हार जाता है  तो इन जैसे लोग ही उसके लिए रौशनी की एक लकीर बन सामने आ खड़े होते हैं और पीड़ित इस मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ता रहता है, दौड़ता रहता है, किसी चमत्कार की आशा में ..........................        


सुबह-सबेरे ठाकुर जी का फोन आया, शर्मा जी, यदि समय हो तो मेरे साथ एक जगह चलना है। मैंने पूछा कहां जाना है ?  उन्होंने कहा "फलाने बाबा जी" से मिलना है। समय ले लिया है। मैंने कहा ठाकुर जी, आप जानते हैं कि मैं इन सब बातों में विश्वास नहीं करता, और फिर आप ! कैसे ? क्यों? 
वे बोले, आप तो जानते ही हैं कि पिछले तीन-चार साल से हर काम में अड़चन आ रही है। कोई काम सिरे नहीं चढ़ता। सब कुछ होते-हवाते भी जैसे कुछ नहीं होता। तो अब सोचा कि आपकी भाभी की बात भी मान कर देख लेते हैं,  एक बार आजमाने में क्या बुराई है ?  शायद कुछ ठीक हो ही जाए।  

मैं सोच में पड़ गया, एक तरफ मेरे ऊसूल थे दूसरी तरफ मित्र। तभी समझ में आया कि क्यों तमाम विरोधों के बावजूद इन  बाबाओं की दुकानें बंद नहीं होतीं। जब चारों ओर से इंसान थक-हार जाता है तो इन जैसे लोग ही उसके लिए रौशनी की एक लकीर बन सामने आ खड़े होते हैं और पीड़ित इस मृग-मरीचिका के पीछे दौड़ता रहता है, दौड़ता रहता है, किसी चमत्कार की आशा में !        
    
एक समय था जब सन्यास का मतलब एंकात में जा साधना करना, प्रभू के ध्यान मे मग्न रहना, ज्ञान की खोज मे अपने को, परिवार को, समाज को भुला देना होता था। मन मे राग, द्वेष, भोग, विलास, माया, मोह किसी भी चीज के लिए स्थान नहीं रह जाता था। भगवा रंग सुचिता का प्रतीक था। उसे धारण करने वाला आदरणीय, पूजनीय माना जाता था। पर अब समय ने सब कुछ गड्ड-मड्ड कर रख दिया है, साधू-संतों के रूप में बहुरुपिए समाज को भरमाने लगे हैं। भगवा चोला पहन भोले-भाले इंसानों के तथाकथित हितचिंतक बन उनकी मजबुरियों का फायदा उठा उनकी भावनाओं से खिलवाड करने लगे हैं। कुछ तो अदूरदर्शियों की बुद्धि का हरण कर उनके भगवान ही बन बैठे हैं। उन्होंने अपनी पकड़ ऐसी बना ली है कि फिर वे चाहे कैसे भी नैतिक-अनैतिक कर्म करते रहें उनके अनुयायी सारे कर्मों-कुकर्मों को लीला ही समझते रहते हैं। देखते-देखते सड़क पर मजमा लगाने वाले, मठाधीश बन करोड़ों-अरबों के मालिक बन बैठे हैं। पर इतने से ही संतोष ना कर कुछ एक ने और आगे बढ, "अल्लाह मेहरबान......."  जैसे नेताओं को भरमा-फुसला कर राजनीति में पदार्पण कर लिया, क्योंकि सत्ता सुख जैसा सुख तो स्वर्ग में भी दुर्लभ है। ऐसे लोगों का धर्म, संस्कृति या मानवोत्थान से कुछ लेना-देना नहीं होता। ये लोग अपने कर्मों, अपने दायित्वों का बोझ ना उठा पाने वाले ऐसे भगोड़े होते हैं जिनकी हवस, कामनाएं, इच्छाएं नाग की तरह कुंडली मारे इनके मन के कोने में मौके की तलाश मे पडी कभी भी, कैसा भी अवसर मिलते ही फुंफकारने को तैयार रहती हैं।

ऐसे इंसान असामाजिक तत्वों का पक्ष ले समाज का अहित करने में नहीं हिचकिचाते, अपना भला आंक कर मौका-परस्ती का दामन थाम पाला बदलने मे देर नहीं लगाते, दाम मिलता दिखे तो खुद को किसी के हाथों बेचने में नहीं शर्माते। खबरों में बने रहने के लिए, टुच्ची लोकप्रियता को हासिल करने के लिए ये "किसी भी तरह के पंक में" गिरने को भी तैयार रहते हैं। इन पर जरा सा बदल कर एक विज्ञापन की पंच-लाइन बिल्कुल सटीक बैठती है "यदि नाम और दाम मिले तो दाग अच्छे हैं।"

तो यदि अचानक वर्षों से मजबूरीवश दमित इच्छाओं को पूर्ण करने का अवसर मिले, सप्त तारिका भोग-विलास की सामग्री सामने हो, बदनाम ही सही प्रचार और दाम मिलता हो तो कैसा धर्म, कैसी संस्कृति, कैसा आत्म ज्ञान, कैसी शर्म, कैसा संत .  बडे दरबार में प्रवेश ही सत्य है। पर अब मैं क्या करूँ समझ में नहीं आ रहा, असमंजस में हूँ ....................उधर ठाकुर जी मेरा इंतजार कर रहे हैं !!! 

2 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दर्द पर जीत की मुस्कान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

dj ने कहा…

ये बाबा तांत्रिक मेरी समझ में शुरू से नहीं आते और लगता नहीं कि कभी आएंगे।
सच कहा है आपने तमाम विरोधों के बावजूद इन बाबाओं की दुकानें बंद नहीं होतीं क्योंकि न जाने ये कौनसी मूर्खता की पट्टी कुछ लोगों की आँखों पर बांधने में सफल हो जाते है कि वे आखिरी विकल्प के तौर पे ही सही एक बार इनसे सलाह लेना आवश्यक मानने लगते हैं।