बुधवार, 17 जून 2015

दिल्ली का धौला कुआँ, कहाँ है धौलापन?

धौला कुआँ, पहले  
दिल्ली का धौला कुआँ। कभी न कभी हर दिल्लीवासी यहां से गुजरता ही है। चाहे पंजाबी बाग़, राजौरी गार्डन से किसी को दक्षिणी दिल्ली जाना हो या फिर चाणक्यपुरी वालों को हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे जाना हो सबको इसके दर्शन कर ही जाना पड़ता है। एक तरफ मोती बाग़, दूसरी तरफ दिल्ली कैंट, बीच से पालम हवाई अड्डे के लिए गुजरती सड़क। राजस्थान और हरियाणा के लिए बसों का शहर के अंदर मुख्य अड्डा। दिल्ली गेट, कश्मीरी गेट, अजमेरी गेट, चांदनी चौक, कनॉट प्लेस की तरह ही इस नाम के भी आदी हो चुके हैं लोग पर अनजान हैं इसकी जानकारी के बारे में। कारण भी तो है। किसी जगह का नाम किसी विशेष परिस्थिति या कारण या जगह की विशेषता के कारण पड़ जाता है या रख दिया जाता है। पर आज समय की मांग के अनुसार  महानगरों और मेट्रो शहरों का भूगोल इतनी तेजी से बदल रहा है कि वहाँ के रहने वाले ही यदि किसी इलाके की तरफ कुछ अरसे के बाद जाते हैं तो जगह को कुछ तो बदला हुआ ही पाते हैं। और इस जगह पर तो इतने बदलाव हुए हैं कि आठ-दस साल पहले धौला कुआँ को देखने वाले को आज इसे देख हैरत होती है। तो करीब दो सौ साल पहले बने कुएं की क्या बिसात। कौन सा कुआँ, कैसा कुआँ ?       

करीब दो सौ साल पहले यहां के एक छोटे से इलाके, लाल किले से पालम तक, पर राज करने वाले शाह
धौला कुआँ का उड़न-पथ 
आलम द्वितीय (1761-1806) द्वारा जन-हित के लिए बनवाए गए इस कुंए का नाम धौला कुआं यानी सफ़ेद कुआं यहां पाए जाने वाली सफ़ेद रेत के कारण पड़ा बताया जाता है। शाह आलम अक्सर अपनी छोटी सी रियासत का चक्कर लगाया करता था। यह भी एक वजह थी कि उसने अपने यात्रा-मार्ग के बीच कुआं और वृक्ष लगवाए थे जहां कुछ देर आराम किया जा सके।   

आज मुख्य सड़क से थोड़ा हट कर बने एक बगीचे में यह स्थित है। जहां एक झील भी है जिसका पर्यावरण के मद्दे नज़र D.D.A. ने निर्माण करवा दिया था जिसमें इसी कुएं से पानी पहुँचाने की व्यवस्था थी। पर अब इसका हश्र भी बड़े शहरों के कुअों-बावड़ियों की तरह हो चुका है। देख-रेख के अभाव में बगीचे के साथ-साथ दूसरों को पानी देने वाला अब खुद उसके लिए तरस रहा है। झील को भी अपने को कुछ हद तक भरने का मौका बरसात में ही मिल पाता है। पहले तो इसके अस्तित्व का पता सड़क से चल भी जाता था पर इधर मेट्रो के गुजरने का मार्ग बनने के बाद यह और भी ओट में हो गया है। कुछ कोशिशें हुईं भी हैं इसे नया रूप देने को पर वे ना के बराबर ही रहीं। शेख्सपीयर की ना माने तो अब बस नाम ही है जो इसे जिन्दा रखे हुए है।             

6 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 18 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर नंगी क्या नहाएगी और क्या निचोड़ेगी { चर्चा - 2010 } पर दिया जाएगा
धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

दिलबाग जी,
आभार

रश्मि शर्मा ने कहा…

अच्‍छा लगा धौलकुआं के बारे में जानकर

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बढ़िया

Madan Saxena ने कहा…

सुन्दर रचना सामायिक लेख बेहतरीन अभिब्यक्ति , कभी इधर भी पधारें

वाणी गीत ने कहा…

पानी की किल्लत के बावजूद पानी के ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पारंपरिक स्त्रोत की दुर्दशा समझ नहीं आती!