शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

सेमीनार का सफल समापन, भूटान यात्रा वृतांत - 6

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और  सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।

लोगों से ही तो देश बनता है। जैसे लोग वैसा देश, वैसी ही उसकी पहचान। लोग सरल, सौम्य, हंसमुख, खुशहाल हैं तो संसार में उनका देश भी उसी रूप से जाना जाता है। भूटान की पहचान ऐसे ही नहीं दुनिया के आठवें खुशहाल देश के रूप में की जाती। जबकि एशिया में वह इस मामले में पहले नंबर पर है।    

16 जनवरी 2015,         
सुबह से ही गहमागहमी थी। सभी लोग अपनी-अपनी तैयारियों में लगे हुए थे। ख़ासकर महिला सदस्य कुछ ज्यादा ही व्यस्त थीं,
दोहरा काम जो करना पड़ रहां था, खुद को और अपने प्रेजेन्टेशन को समय पर तैयार करने के लिए। सभा-गृह पास ही था कोई सौ मीटर दूर, ज़रा सी ऊंचाई पर। रह-रह कर मनोज जी वहां की व्यवस्था का जायजा ले रहे थे।   किसी भी तरह की कोर-कसर रह न जाए सबका इसी पर ध्यान था। भूटान में समय हमारे भारतीय समय से आधा घंटा आगे चलता है, इसका सदा ध्यान रखना पड़ता था। अभी मुख्य अतिथि के आने में कुछ समय था तो सुमन जी, दास जी, गुलशन जी तथा मैं होटल से कुछ दूरी पर स्थित एक पुराने बौद्ध मंदिर की तरफ बढ़ लिए। मंदिर में ताला लगा हुआ था पर वहाँ के छोटे लामा ने हमारे लिए उसे खोल दर्शन करवा दिए। इस जगह का इतिहास में साफ उल्लेख नहीं है, इतना ही पता चलता है कि  किसी राजा का एक विशाल महल था जो एक अग्निकांड में पूर्णतया नष्ट हो गया था, उसी की याद में उस जगह के मध्य में इस मंदिर को बनवाया गया था। 

घड़ी किसी चीज की परवाह या इंतजार करे बिना चली जा रही थी, उसी से पता चला कि सेमीनार का वक्त आ पहुंचा है। हम चारों जाने जल्दी से सभा-कक्ष की ओर बढ़ लिए। वहां सारी तैयारियां हो चुकी थीं। देशपांडे परिवार ने भी कक्ष के एक तरफ अपने रूमालों और कार्डों के संकलन को सजा दिया था। कार्यक्रम के शुभारंभ के पहले गणेश वंदना फिर स्वागत गीत के उपरांत विभिन्न पुस्तकों के साथ-साथ "परिकल्पना समय" के जनवरी अंक का विमोचन भी होना था। तभी मुख्य अतिथि श्री फूप श्रृंग, जो भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुख्य सचिव हैं, निर्धारित समय पर आ उपस्थित हुए। इतने बड़े पद पर होने के बावजूद कोई ताम-झाम नहीं, कोई फूं-फां नहीं, समय का पाबंद, सीधा-साधा हंसमुख बंदा, इतना विनम्र कि स्नेह उमड़ पड़े। उनके अनुसार भूटान का हर नागरिक अपनी संस्कृति, अपनी धरोहर, अपने पर्यावरण को बचाने के लिए अलिखित रूप से वचन-बद्ध है। राजा और प्रजा इस बारे में कटी-बद्ध हैं कि संसार के दूसरे देशों की तरह
आर्थिक संपन्नता को हासिल करने के चक्कर में कहीं आने वाली पीढ़ी अपनी मासूमियत, अपना चैन, अपना संतोष न खो बैठे। इसीलिए पर्यटन पर ज्यादातर टिकी अर्थ व्यवस्था के बावजूद हर साल सिमित पर्यटकों को ही भूटान आने की अनुमति दी जाती है और इस बात का ख़ास ख्याल रखा जाता है कि कोई अवैध रूप से यहां रहने न लग जाए। वैसे भारतीयों के लिए यहां के लोगों में खासा मैत्री भाव है हो भी क्यों न, देश को सबसे बड़ा सहारा भारत ही तो प्रदान करता है।

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।  इन दोनों अतिथियों का स्वभाव और सरलपन देख अपने यहां के अकड़ू व्ही.आई पियों. की याद आ गयी जो आते बाद में हैं पर माहौल के लिए तनाव पहले भिजवा देते हैं। खैर कुछ अति-उत्साहित सदस्यों के जोश के बावजूद सब कुछ बिलकुल बढ़िया तरीके से निपट गया। अब पेट-पूजा तदोपरांत शहर-दर्शन की बारी थी।
ठंड से राहत दिलाती धुप 


इस बार शहर घुमाने-दिखाने की जिम्मेदारी ली होटल के केयर-टेकर सुपुत्र श्रृंग देधूप ने, जीभ को अच्छी-खासी कसरत करवाने के बावजूद नाम का सही उच्चारण न होता देख उस छोटे पर अक्लमंद, युवा-वस्था की ओर अग्रसर, बालक ने अपने-आप को छोटू कहने की गुजारिश कर दी जो सभी को रास भी आ गयी। बाजार पहुंच सब तितर-बितर हो गए, अपने-अपने हाथों में तोते लिए हुए। देश में पीछे छूटे अपनों के लिए कुछ न कुछ उपहार जो ले जाने थे। पर अधिकांश लोगों के हाथों के तोते तब उड़ गए, आँखें कुछ ज्यादा ही चौड़ी हो गयीं जब कानों में साधारण सी चीजों की कीमत असाधारण वस्तुओं के मूल्यों से भी ज्यादा
भारत के ताज ग्रुप का होटल ताज 
सुनाई दीं। आधों ने वहीं मैदान छोड़ दिया, कुछेक ने हिम्मत कर अपनी जेब ढीली की। अब क्या करें देश में पीछे इंतज़ार करते हुओं के लिए कुछ तो ले जाना ही था। अब सब तो सुनीता यादव तो थे नहीं, जिन्होंने भारतीय महिलाओं का परचम फहराते हुए भूटान के दुकानदार को भी मजबूर कर दिया अपनी "बार्गेनिंग" से।  चाहे खरीदारी में भूटानियों ने निराश किया हो पर उनके व्यवहार ने मन जीत लिया। मैं अकेला हंड्याते हुए सड़क पार करने जेब्रा क्रासिंग पर उधर आती कारों को देख खड़ा हो गया पर उस समय सुखद आश्चर्य हुआ जब कारें आ वहां रुक गयीं और पहले मुझे सड़क पार करने का इशारा किया गया। अपने देश के किसी भी हिस्से में क्या ऐसा अनुभव संभव है ?           

कोई टिप्पणी नहीं: