बुधवार, 28 जनवरी 2015

भूटान में पहला दिन

कोलकाता के दूसरे स्टेशन सियालदह से रात दस बजे चल कर अगले दिन सुबह आठ बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचने वाली दार्जिलिंग मेल, घने कुहासे की वजह से डेढ़ घंटे विलंब से करीब साढ़े नौ बजे अपने गंतव्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकी। स्टेशन पर पूरी यात्रा की व्यवस्था संभालने वाले श्री रजत मंडल ने हमारी अगवानी की। हम कुल जमा पांच लोगों का यह पहला जत्था था। जिसमें मेरे अलावा श्री ललित शर्मा, श्री अरविंद देशपांडे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना देशपांडे तथा उनकी प्यारी सी बिटिया अदिति देशपांडे थे। स्टेशन के बाहर ही रजत जी ने हमें व्रत-तोडू जलपान करवा कर अपने एक सहायक श्री दीपांकर मंडल के साथ एक टैक्सी में बैठा कर फुशलिंग जो भूटान में हमारा पहला पड़ाव था, की ओर रवाना कर दिया, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में हमारी हर जरूरत का ध्यान रखा जाए। समय था सुबह के 10. 45 .

हल्की-हल्की कुनकुनी ठंड थी। मौसम खुशगवार था। वैसे भी नई जगह देखने के मौके ने सब में उल्लास भर रखा था। सड़क पर यातायात कम था। सड़क ऐसी सुन्दर, चिकनी, सपाट लग रहा था कि गाडी को भी उस पर चलने में खुशी की अनुभूति हो रही है। रुकते-चलते एक सौ चालीस की. मी. का सफ़र तय कर करीब तीन बजे हम भारत-भूटान के बार्डर पर फुशलिंग गेट के सामने आ पहुंचे थे। रोमांचक क्षण था वह जब हम
दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर रहे थे। कुछ ही मिनटों बाद आबादी से ज़रा हट कर और कुछ ऊंचाई पर स्थित हम अपनी आरामगाह होटल मिड प्वाइंट के प्रांगण में जा उतरे।

न्यू ज. गु. की व्यस्त सड़क 
सफर चाहे जैसा भी हो थकान तो थोड़ी-बहुत हो ही जाती है, उसे ही दूर करने मैं सबसे पहले नहाने के लिए स्नान कक्ष में जा घुसा।  गर्म पानी वैसे ही शरीर को आराम दे जाता है।  नहा, कपडे बदल बाहर आया तो अपने बाकी चारों साथियों का कोई अत-पता नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि भाई लोग होटल के तरण-ताल में तैरने का आनंद उठा रहे हैं। आश्चर्य हुआ कि पहाड़ी इलाके में ठंड के मौसम में स्विमिंग पूल ?  हुआ क्या था,  कि ललित भाई रफ-टफ, मस्त-मौला इंसान।  पानी देखा और छलांग लगा दी। अरविंद भाई ने पूछा, पानी ठंडा तो नहीं है ? जवाब मिला, बिल्कुल नहीं। तो अगला भी उतर गया, डुबकी लगाने। अब जब पानी में अरविंद जी को देखा तो माँ-बेटी भी आँख मूँद कर चल दीं उनके पीछे। यह अलग बात थी कि पानी को छूते ही शरीर की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती थी...…हिक्क.......। मैंने कहा भी कि भले आदमी पानी कोई दस फुट दूर तो नहीं था, छू कर देख ही लेना था ! खैर मौज-मस्ती रही। नहा-वहा कर उदर पूर्ती की गयी। तब तक दूसरे "बैच" के साथियों की कोई खबर नहीं मिल पाई थी।

अस्ताचलगामी सूर्य 

यह होटल आबादी से कुछ दूर ऊंचाई पर था और हमें छोड़ कर गाड़ी फिर स्टेशन रवाना हो चुकी थी, इसलिए मजबूरी में हमें वहीं आस-पास मंडराते रहना था। अब तक हम आपस में काफी खुल चुके थे। अचानक मेरे पीछे कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, मुड़ कर देखा तो अरविंद जी थे ! फिर तो उन्होंने अपनी इस कला का जो प्रदर्शन किया तो आस-पास के सारे श्वान-पुत्रों में खलबली मच गयी। स्वाभाविक भी था उन्हें आवाज जरूर सुनाई पड रही थी पर अपना विदेशी भाई कहीं नज़र नहीं आ रहा था, इधर-उधर दौड़ते-भागते उनकी अजीब हालत हो रही थी। इधर शाम की चुनरी थामे रात धीरे-धीरे धरती को अपने आगोश में समेटने की तैयारी कर रही थी। सूरज के विदा होते ही ठंड ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया था। कुछ भी हो सफर की थकान तो थी ही, सो रात का भोजन ले हम सब अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गए।

घड़ी रात के आठ बजा रही थी, स्थानीय समयानुसार। तारीख थी 13. 01. 15 .                
होटल मिडप्वाइंट 

रात के करीब दो बजे कुछ शोर-गुल से नींद उचटी, लगा कुछ लोग आ-जा रहे हैं, कमरों के खुलने-बंद होने से आभास हो गया कि लखनऊ-बाराबंकी के साथी अब पहुँच पाए हैं। पर कुछ थकान, कुछ ठंड और कुछ गहरी नींद की खुमारी की वजह से उठा नहींगया। वैसे उन्हें भी आराम की सख्त जरूरत थी और उनसे पहले परिचय भी नहीं था तो सुबह मिलना ही उचित था।

वे सब भी जल्दी-जल्दी खाना-पीना निपटा अपने-अपने गदेलन में घुस गए थके शरीर को कुछ राहत देने की इच्छा लिए।  सबेरे पता चला कि गाड़ियां घंटों देर से चल रही हैं। उन लोगों को तो ज्यादा आराम भी नसीब नहीं हो पाया, क्योंकि सुबह-सुबह साढ़े सात बजे भूटान की राजधानी "थिम्फु" के लिए रवाना जो होना था।

कल थिम्फु की ओर ………

5 टिप्‍पणियां:

अन्तर सोहिल ने कहा…

बढिया रिपोर्ट
अगली कडी का इंतजार
मलाल रहेगा इस सम्मेलन में नहीं जा पाने का

प्रणाम

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सच सच है सोहिल जी, भूटान की बात ही कुछ अलग थी

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

स्वीमिंग पुल का पानी सच में गर्म था। अब किसी को ठंडा लगे तो मैं क्या करुं। :)

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

वह तो पानी में उतरने वालों के चहरे से ही पता चल रहा था :-)

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

वह तो पानी में उतरने वालों के चहरे से ही पता चल रहा था :-)