सोमवार, 29 दिसंबर 2014

एक तमाशा मेरे आगे

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा। 

होना तो यह चाहिए था कि जनता जनार्दन जितनी जागरूक यानी समझदार होगी उतना ही चुनाव खर्च कम होगा पर हो उल्टा ही रहा है। अभी 36 गढ़ के नगर निगमों के चुनाव को देख लग रहा था जैसे शहर चलाने  के लिए नहीं राज्य चलाने के लिए चुनाव हो रहे हों !  बीसियों दिन पहले से घेरा बंदी, मोर्चा बंदी, व्यूह रचना ऐसे शुरू हो गयी थी जैसे नगर निगम के पार्षद का नहीं विधान सभा के सदस्य का चुनाव होना हो। कद्दावर नेताओं की प्रतिष्ठा का भी यह प्रतीक बन गया था।  जैसे-जैसे चुनाव के दिन के सूर्य के उदय का समय नजदीक आता गया वैसे-वैसे गहमा-गहमी बढ़ती चली गयी। झंडे, बैनर, पोस्टर, पैंफ्लेट जैसी पुरातन प्रचार सामग्री तो थी ही इनके साथ-साथ नचैये-गवैयों को भी तरह-तरह के लोकप्रिय गानों की धुन पर फिट किए गए सामायिक शब्दों वाले गानों पर आलाप भरते-ठुमकते देखा जा सकता था। उनकी कला का फ़ायदा उठाने की भी पुरजोर कोशिश की जा रही थी।

पहले ऐसा होता था कि भीड़ इकट्ठा करने वाले को जमा हुए लोगों के हिसाब से उनके खाने-पीने के पैसे
पकड़ा दिए जाते थे या सारा सामान बाहर से मंगवाया जाता था। पर इस बार नई रणनीति के तहत ज्यादातर प्रत्याशियों ने अपने कार्यालय में ही भंडारा खोल दिया था, जहां सुबह के चाय-नाश्ते के साथ-साथ रात के डिनर तक की व्यवस्था कर दी गयी थी। वह भी कार्यकर्ताओं की पसंद-नापसंद पूछ-जान कर, जिसमें वेज और नॉनवेज  उपलब्ध करवाए गए थे। यह सब ताम-झाम इसलिए कि कार्यकर्ता सदा उम्मीदवार के साथ और पास बना रहे,  न खिसक जाए।  उनकी रूटीन भी बना-समझा दी गयी थी। सबेरे आते ही चाय-नाश्ता कर रैली में निकालो, घूम-फिर कर दोपहर को लौट खाना खाओ। कुछ देर आराम कर फिर अपने गले और शरीर के करतब दोहराओ, फिर वापस आ  चाय लेकर निकलो और फिर आ कर रात का भोजन पाओ।  

पर जाहिर है कि आजकल कोई भी सिर्फ खाने के लिए किसी से बंधा नहीं रहता।  इसलिए हरेक के लिए उसके काम के अनुसार मेहनताना भी निश्चित कर दिया गया था। हालांकि यह गोपनीय होता है पर स्थानीय अख़बारों की मानें तो अलग-अलग कामों के लिए यह 100 रुपये से शुरू हो 1000 रुपये तक  एक-एक सिर का रोज का भुगतान था।  अब हर पार्टी की "मीटरों लम्बी, चुनावी हथियारों से सजी" रैली के ऊपर रोज कितना खर्च आता होगा इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है।  जो पिछले चुनावों से और नहीं तो दोगुना तो हो ही चुका है।  किसी भी चीज को नष्ट या बर्बाद कर उसे दोबारा पाना बहुत मुश्किल या ना के बराबर ही होता है।  पर शायद पैसा ही ऐसी  चीज है जिसकी बढ़ोत्तरी के लिए उसे बेरहमी से खर्च (नष्ट या बर्बाद) किया जाता है।            

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा।  

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या अंग्रेजी में बोलने से अपशब्द स्वीकार्य हो जाते हैं ?

एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!

बहुत दिनों बाद ठाकुर जी का मेरे यहां आना हुआ। पर कुछ उखड़े-उखड़े लग रहे थे, ठंड के बावजूद पहले की तरह आते ही चाय की फरमाईश नहीं की। मैंने ही कहा, अच्छे वक्त पर आए चाय बन ही रही है, पर आज मूड ठीक नहीं लग रहा, क्या हो गया ? पर वे अनमने से बने रहे, लगा जैसे बात शुरू करने का कोई छोर ढूँढ रहे हों। तभी चाय आ गयी, उसने माहौल सामान्य करने में अपना पूरा योगदान दिया। तब तक वे  भी प्रकृतिस्त हो चुके थे, बोले मंदिर से आ रहा हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा कि मंदिर जाने से इनका मन परेशान क्यों हो गया, पर मैं बोला कुछ नहीं, उनके बोलने का इंतजार  करता रहा। चाय खत्म कर प्याला रख मुझे देखते हुए बोले, शर्मा जी, क्या आपने कभी आजकल की बातचीत में प्रयोग होने वाली भाषा पर ध्यान दिया है ?  मुझे लगा वो 'हिंग्लिश' के बारे में बोलना चाहते हैं। पर अपनी तरफ से कुछ न कहते हुए मैंने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि उन पर डाले रखी। तब उन्होंने अपने दिल की बात कहनी शुरू की, बोले मंदिर से दर्शन कर निकल ही रहा था कि अंदर दाखिल होती एक कन्या की पूजा की सामग्री किसी कारणवश गिर गयी, जिसके गिरते ही उसके मुंह से निकला  "शिट"……, सोचा कि उससे पूछूं कि इस शब्द का अर्थ तुम्हें मालुम भी है, पर फिर खिन्न मन लिए आप के पास चला आया। अब आप ही बताइये कि इन अर्ध-शिक्षितों को, जो मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उनको हिंदी नहीं आती और उनकी इस बात पर उनके अभिभावक भी गर्व करते हैं, पर क्या वे कभी ध्यान देते हैं कि उनके नौनिहाल या 'नौनिहालिनियों' की  पकड़ अंग्रेजी पर भी पच्चीस-पचास शब्दों से ज्यादा नहीं है। ऐसों को ना ढंग से हिंदी आती है नाही अंग्रेजी। खिचड़ी भाषा में बतियाते हुए अपने आप को मॉडर्न दिखाने के चक्कर में साधारण से 'ओह' की जगह जबरन 'आउच' उच्चारते ये कैसे अस्वाभाविक लगते हैं, ये इन्हें नहीं मालूम।
मैंने कहा, ठाकुर जी, क्यों परेशान होते हैं, आज का दौर ही ऐसा हो गया है। आप किसी भी प्रांत से निकलने वाले हिंदी के अखबार को उठा लें, सिनेमा को देख लें, टेलीविजन का जायजा ले लें, किसी सेमिनार में भाग ले लें,  सब जगह ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल होने लग गया है। इसमें वैसे कोई ख़ास बुराई भी नहीं है।
ठाकुर जी बोले, मैं दूसरी भाषा के शब्दों के उपयोग पर आपत्ति नहीं उठा रहा हूँ, मेरी परेशानी बात-चीत में अपशब्दों के प्रयोग से, वह भी बिना स्थान परिवेश या सामने वाले की उपस्थिति को देख उगल देने से है।आप तो टी. वी. बहुत कम देखते है, फिर भी शायद देखा होगा कि एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!
अब आप ही बताइये कि यह सब क्या है ?   मैं यह भी जानता हूं  कि कुछ लोग मुझे दकियानूस समझते हैं पर क्या बिना नंगाई या बेहयाई पर उतरे बिना बातचीत संभव नहीं है ?  ख़ास कर घर-घर तक पहुँच रखने वाले दृश्य मीडिया को तो अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।  हर जगह फूहड़ता का बोल-बाला हो गया है। इस पर विडंबना ये है कि अपने को सही साबित करने के लिए ये जनता की पसंद की दुहाई देने लग जाते हैं।

तभी उनके फोन की घंटी बज उठी, भाभी जी का था, इनके अभी तक घर न पहुँचने से ज़रा चिंतित थीं। ठाकुर जी तो चले गए पर अपनी बातों से मुझे सोच में डाल गए, तो मैंने सोचा कि आपसे पूछ कर देख लूँ कि आपका क्या विचार है ? क्या यह एक अस्थाई दौर है या सचमुच कोई  सोचनीय अवस्था दस्तक दे रही है ?                






शनिवार, 20 दिसंबर 2014

दिल्ली का "मजनू का टीला", ये मजनू वो मजनू नहीं है

कभी-कभी एक जैसे नाम से गलतफहमी हो जाती है। जैसे किसी अनजान से इंसान के नाम पर किसी जगह की पहचान बनी हो तो सच्चाई न जानने वालों को लगता है कि उस जगह का नाम कथा-कहानियों में प्रचलित ज्यादा मशहूर इंसान के नाम पर ही रखा गया होगा। खोज-खबर न होने पर यह धारणा मजबूत भी होती चली जाती है।

ऐसी ही एक जगह है दिल्ली में, मजनू का टीला। ज्यादातर लोगों की धारणा है कि लैला के प्रेमी मजनू के नाम पर ही इस जगह का नामकरण हुआ होगा, जबकी असलियत यह है कि वर्षों पहले चौहदवीं शताब्दी में सिकंदर लोधी की बादशाहत के समय यहां अब्दुला नाम का एक मस्त-मौला, खुदा के ख्यालों में खोया रहने वाला इंसान रहता था, जो लोगों को अपनी नाव में यमुना नदी के आर-पार बिना कोई शुल्क लिए लाया ले जाया करता था। उसका रंग-ढंग देख लोग उसे मजनू यानी बावला पुकारने लग गए। दैव-योग से एक बार गुरु नानक देव का यहां आना हुआ और अब्दुला की निष्ठा को देख वे यहां उसके पास कुछ दिन रुक गए। उनके यहां निवास के दौरान हर धर्म के लोग धर्म-चर्चा के लिए उनके पास आने लगे। इसी बीच अब्दुल्ला उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो गया। गुरु जी ने उसकी भक्ति देख उसे आशीर्वाद दिया की तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। वही हुआ उनकी कृपा अब्दुला पर देख लोग इस जगह को उसके प्रचलित नाम, मजनू के नाम से जानने लग गए।      

1783 में सिख सेना नायक बघेल सिंह ने जब दिल्ली फतह कर उसे कुछ दिन अपने कब्जे में रखा, उसी दौरान उन्होंने यहां एक गुरूद्वारे का निर्माण करवाया जो मजनू का टीला गुरुद्वारा कहलाया । जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने बाद में विस्तार दिया। यहीं छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी ने भी आकर निवास किया था। आज यह दिल्ली के पुराने सिख धर्मस्थलों में से एक है।
सबसे पहले सन 1900 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली के निर्माण में जुटे मजदूरों  यहां ला कर बसाया गया। फिर
आजादी मिलने के बाद अरुणा नगर के नाम से रिहायशी इलाका आबाद हुआ। धीर्रे-धीरे जगह-जगह से लोग यहां आकर बसते गए। फिर 1960 में भारत सरकार ने न्यू अरुणा नगर बस्ती बसा वहाँ तिब्बती शरणार्थियों को पनाह दी। धीरे-धीरे उनकी आबादी बढ़ती गयी और आज यह जगह छोटे तिब्बत के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। यहां का तिब्बती बाजार सदा ग्राहकों से भरा रहता है जो अपनी पसंद के शाल, जूते, घर सजाने का सामान, तिब्बती कलाकृतियां ढूंढते-ढूंढते यहां आ पहुंचते हैं। यहां एक बौद्ध मठ तथा मंदिर भी है। इसके अलावा खाने-पीने की अनेक दुकाने खुल चुकी हैं, जहां नार्थ कैम्पस के विद्यार्थी और यहां आने वाले ग्राहक उचित मूल्य पर अपनी भूख शांत कर सकते हैं।       

दिल्ली की बढ़ती आबादी ने यहां भी अपना असर, आस-पास फैली सैंकड़ों झुग्गी-झोपड़ियों के जमावडे के रूप में फैलाया है, और इन्ही तीनों रिहायशी जगहों से घिरा हुआ है यह ऐतिहासिक मजनू का टीला। जहां अंतर्राज्यीय बस अड्डे या कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन से आसानी से कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है।

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

एक होती है "ग्रे मनी यानी धूसर धन"

इसकी माया बड़ी विचित्र होती है। जनता की शुभ्र-धवल गाढ़ी कमाई को जब धीरे-धीरे इकट्ठा कर कोई अपने कब्जे में करता है तो उस धन की रंगत भी सफेद से धूसर हो जाती है। पर यह अपने स्वामी को उसकी तनख्वाह से ज्यादा प्रिय होता है, ठीक कढ़े हुए दूध की रबड़ी की तरह।

धन या पैसे इत्यादि का जब जिक्र होता है तो दो तरह की दौलत की बात होती है। सफेद धन और काला धन। सफेद-गोरा-चिट्टा धन वह होता है जिसे मेहनत की कमाई समझा जाता है। उसे आदमी बेखौफ प्रदर्शित करता है, काम में लाता है, जो सबको दिखाई पड़ता है। इसके स्वामी के सिवा इसके ज्यादा-कम होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है नाही किसी की भृकुटि टेढ़ी होती है ।
काला धन वह कहलाता है जिसे उसका मालिक धो-पौंछ कर अच्छी तरह "पैक" कर किसी सुरक्षित स्थान या इदेश-विदेश में संभाल  कर रख देता है, ज्यादातर यह किसी काम का नहीं होता, हाँ इसके साथ आईं आशंकाओं के कारण इसके मालिक का रक्त-चाप भले ही बढ़ा रहता हो पर उसका आत्म-बल और गुमान सातवें आसमान पर विचरण करता रहता है। वैसे यह तो एक जगह बंद पड़ा बिसूरता रहता है पर  इसका मालिकाना हक़ सदा चलायमान रहता है।              
इनके अलावा भी एक धन होता है, तीसरी तरह का धन। जो सफेद और काले का मिश्रण होता है इसे "धूसर धन या ग्रे मनी"  कहा जा सकता है। इसमें ऊपर उल्लेखित दोनों धनों के गुण मौजूद होते हैं।  इसे अपने देश में ही संजो कर पर छिपा कर रखा जाता है। इसकी माया बड़ी विचित्र होती है। जिस तरह सफेद दूध कढते-कढते अपनी रंगत खो कर कुछ गुलाबी-पीला सा हो जाता है पर उसके स्वाद में बढ़ोत्तरी हो जाती है, उसी तरह जनता की शुभ्र-धवल गाढ़ी कमाई को जब धीरे-धीरे इकट्ठा कर कोई अपने कब्जे में करता है तो उस धन की रंगत भी सफेद से धूसर हो जाती है। पर यह अपने स्वामी को उसकी तनख्वाह से ज्यादा प्रिय होता है, ठीक कढ़े हुए दूध की रबड़ी की तरह।  यह ज्यादातर सरकारी आबूओं-बाबूओं, इंजीनियरों, चपरासियों या रसूखदार लोगों के पास उनके घरों की दिवार-फर्श-बिस्तर इत्यादि में सहेजा रहता है। कई भक्त तो इसे ही असली लक्ष्मी मान अपने घर में बने देवस्थान में मूर्तियों के पीछे-नीचे छिपाने में भी गुरेज नहीं करते। पर ऐसा धन अपने मौसेरे भाई, काले धन की तरह किसी एक जगह समाधी लगा कर बैठा नहीं रह सकता। इसकी खुद को  उजागर करने की बुरी आदत है। इसकी यही "उजागरनेस" इसे इकट्ठा करने वाले को धर-दबोचवा देती है किसी न किसी "रेड" में।
इसकी मासूमियत ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसकी तादाद काले धन से कई गुना ज्यादा होने के बावजूद, लोग काले धन के पीछे ही हाथ धो कर पड़े रहते हैं, इसके नाम पर हाय-तौबा नहीं मचाते। जैसे आजकल फिल्मों में नायकों की इज्जत रखने के लिए उनके खलनायकी के रोल को नकारात्मक न कह कर "ग्रे शेड" वाला रोल कहते हैं वैसा ही कुछ चरित्र इस प्रकार के धन का भी होता है। यह इकठ्ठा होते समय तो बड़ा मजा देता है पर इसका मजा लेने पर पिटाई और बेइज्जत भी बहुत करवाता है।                

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अमर्यादितता छिछलेपन को दर्शाती है

किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ?

कहावत है कि, यथा राजा तथा प्रजा।  पर समय बदल गया है और इसके साथ-साथ हर चीज में बदलाव आ गया है। कहावतें भी उलट गयी हैं। अब यथा प्रजा तथा राजा हो गया है। जैसे प्रजा में असहिष्णुता, असंयमिता, अमर्यादितता तथा विवेक-हीनता बढ़ रही है वैसे ही गुण लिए जनता से उठ कर सत्ता पर काबिज होने वाले नेता यानी आधुनिक राजा हो गए हैं। 
वर्षों से गुणीजन सीख देते आये हैं कि जुबान पर काबू रखना चाहिये। पर अब समय बदल  गया है। जबान की मिठास धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। खासकर राजनीति के पंक में लिथड़े अवसरवादी और महत्वाकांक्षी लोगों ने तुरंत ख़बरों में छाने और अपने दल की  अग्रिम पंक्ति में स्थापित होने के लिए यह रास्ता अख्तियार किया है। इसका फायदा यह है कि एक ही झटके में उस गुमनाम-अनजान अग्नि-मुख का नाम हरेक की जुबान पर आ जाता है, रातों-रात वह खबरों में छा अपनी पहचान बना लेता है। कुछ हाय-तौबा मचती है पर वह टिकाऊ नहीं होती। अगला हंसते-हंसते माफी-वाफी मांग दल की जरुरत बन जाता है। यह सोचने की बात है कि इस तरह की अनर्गल टिप्पणियों की निंदा या भर्त्सना होने के बावजूद लोग क्यों जोखिम मोल लेते हैं। समझ में तो यही आता है कि यह सब सोची समझी राजनीति के तहत ही खेला गया खेल होता है। इस खेल में ना कोई किसी का स्थाई दोस्त होता है नही दुश्मन। सिर्फ और सिर्फ अपने भले के लिए यह खेल खेला जाता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों में गहराई नहीं होती, अपने काम की पूरी समझ नहीं होती इन्हीं कमजोरियों को छुपाने के लिए ये अमर्यादित व्यवहार करते हैं।  इसका साक्ष्य तो सारा देश और जनता समय-समय पर देखती ही रही है।

कभी-कभी नक्कारखाने से तूती की आवाज उठती भी है कि क्या सियासतदारों की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए, क्या देश की बागडोर संभालने वालों की लियाकत का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए? जबकि किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नियुक्ति के पहले नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। शिक्षक चाहे जब से पढ़ा रहा हो उसे भी एक ख़ास कोर्स करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ? कम से कम उन्हें संयम की, मर्यादा की, नैतिकता की, मृदु भाषिता की सीख तो दी ही जा सकती है।

यह जग जाहिर है कि किसी के कटु वचनों पर उनके पाले हुए लोग तो ताली बजा सकते हैं पर आम जनता को ऐसे शब्द और उनको उवाचने वाला नागवार ही गुजरता है। बड़े और अनुभवी नेताओं को ऐसे लोगों की अौकात पता भी होती है, पर चाह कर भी वे ऐसे लोगों को रोक नहीं पाते क्योंकि किसी न किसी  स्वार्थ के तहत इन लोगों को झेलना उनकी मजबूरी बन जाती है और यही बात ऐसे लोगों की जमात बढ़ते जाने का कारण बनती जा रही है।      



रविवार, 7 दिसंबर 2014

सीख तो किसी से भी ली जा सकती है

इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" परिवार द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते !


पचीसों साल बंगाल में रहने और अदम्य इच्छा के बावजूद कभी देश के नक़्शे में और ऊपर स्थित सप्त बहानियों के यहां जाना संभव नहीं हो पाया, फिर शस्य-श्यामला धरती छूटने के बाद तो वहाँ जाना और भी मुश्किल हो गया था। पर इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने की वजह से मेरा एक स्वप्न जैसे साकार होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते। क्योंकि हम ज्यादातर भूत काल  में जीते हैं, अपने गौरवमय अतीत की दुहाई देते हैं, बातें ज्यादा करना हमारा शगल है, पर जब काम करने की बारी आती है तो हम दूसरों का मुंह जोहने लगते हैं। यहां तक कि यदि कोई कुछ अच्छा करना भी चाहता है तो उसकी टांग खींचने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि सदियों से जगद्गुरु  होने का दावा करने वाला हमारा  देश आज कहां आ खडा हुआ है ?  चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, चोर-बाजारी का आलम है । कारण शीशे की तरह साफ है। साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे, ईमानदार, देश-प्रेम का जज्बा दिल में रखने वालों के लिए सत्ता तक पहुँचना एक सपना बन गया है। धनबली और बाहुबलियों के सामने सत्ता तक पहुँचना साधारण नागरिक के लिए  दुरूह कार्य हो गया है।

वहीं शायद हमारी राजनीति और लाल फीताशाही का दुष्प्रभाव देख भूटान ने  निचले स्तर से ही योग्य लोगों को अवसर देने के लिए कमर कस ली है। जिसके चलते  उसने अपने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए भी कुछ मापदंड तय कर दिए हैं। उसके लिए पढ़े-लिखे योग्य व्यक्तियों को ही मौका देने के लिए पहली बार लिखित और मौखिक परीक्षाओं का आयोजन किया गया है। इसमें प्रतियोगियों की पढ़ने-लिखने की क्षमता, प्रबंधन के गुण, राजकाज करने का कौशल तथा कठिन समय में फैसला लेने की योग्यता को परखा जाएगा। इस छोटे से देश ने अच्छे तथा समर्थ लोगों को सामने लाने का जो कदम उठाया है, क्या हम उससे कोई सीख लेने की हिम्मत कर सकते हैं ?