सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

यहां आदमी और शेर आमने-सामने हैं

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जो करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जहां शेर लगातार आदमी का शिकार करते रहतें हैं। हर साल करीब 50 से 60 लोग यहां शेरों के मुंह का निवाला बन जाते हैं। वहां के लोग किन परस्थितियों में जी रहे हैं इसका रत्ती भर अंदाज भी बाहर की दुनिया को नही है। यहां आकर तो लगता है कि जानवर ही नहीं आदमी को भी बचाने, संरक्षण देने की जरूरत है।
             
सुंदरवन करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।  रोजी-रोटी, परिवार को पालने की जिम्मेदारी जो है सर पर। समुद्र के पास होने के कारण यहां ज्वार-भाटा काफी भयंकर रूप से उठता है जिससे शेरों को अपना शिकार खोजने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। दूसरी तरफ यहां रहने वाले लोगों का जीवनयापन नदी से प्राप्त होने वाली मछलियों और जंगल की वनोत्पजों पर निर्भर करता है। इसीलिए जंगलों से आना-जाना उनकी मजबूरी है जिसका  फ़ायदा यहां के वनराज को मिलता है। वैसे भी जंगली जानवरों के शिकार की बनिस्पत मानव को अपना भोजन बनाना बहुत आसान है, इसीलिए यहां के शेर आसानी से मनुष्य भक्षी बन जाते हैं। पानी के पास रहते-रहते ये अच्छे तैराक भी हो गए हैं। जिससे ये इतने निडर हो गए हैं कि मौका पाते ही नाव में सवार मछुआरों पर भी हमला करने से नहीं झिझकते।

सरकार ने और यहां के रहवासियों ने अपने-अपने स्तर पर इस आपदा से बचने के लिए कुछ इंतजाम किए भी हैं, जिससे हमले से मरने वालों की संख्या में कमी भी आई है। शेर हरदम मनुष्य पर पीछे से हमला करता है, खासकर रीढ़ की हड्डी पर।  इसीलिए सरकारी कर्मचारी कमर से लेकर गरदन तक का एक मोटा पैड सा पहने रहते हैं जिससे काफी हद तक हमले की गंभीरता कम हो जाती है। यहां के लोग जंगल में या नौका में आते-जाते समय अपने चहरे के पीछे, गरदन के ऊपर एक मुखौटा लगा कर चलते हैं। जिससे शेर को लगे कि सामने वाला मुझे देख रहा है, पर वह ज्यादा देर
धोखे में नहीं रहता और हमला कर देता है। इसके अलावा यहां के निवासी पूजा-पाठ में भी बहुत विश्वास करते हैं इसीलिए अपने रोजगार पर निकलने के पहले वनदेवी जिसे स्थानीय भाषा में "बोनदेवी" कहते हैं (बंगला भाषा में 'वन' का उच्चारण 'बोन' होता है ) की पूजा-अर्चना कर निकलते हैं। पर कहीं न कहीं, कभी न कभी भिड़ंत हो ही जाती है। दोनों की मजबूरी है, कोई भी पक्ष अपनी रिहाइश छोड़ और कहीं जा नहीं सकता। शेरोन पर तो यह एक तरह से दोहरी मार है।  इनकी प्रजाति पर पहले से ही "पोचरों"  से   खतरा बना  हुआ था,  उस पर अब  एक और गंभीर समस्या

बढ़ती जा रही है। धीरे-धीरे यहां के मनुष्यों और शेरों में एक अघोषित युद्ध शुरू हो चुका है। जैसे ही कोई मानव शेर का शिकार करता है वैसे ही शेर से बदला लेने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। यह बात दोनों ही पक्षों के लिए घातक हैं। इस आपसी भिड़ंत को ख़त्म या कम करने के लिए अभी तक आजमाए गए उपायों का बहुत ही कम असर हुआ है।  फिर भी कुछ न कुछ उपाय किए ही जा रहे हैं जैसे घने जंगल में तार का घेराव या फिर शेरों को उनके भोजन के लिए जानवरों की उपलब्धता इत्यादि। पर पूर्णतया कारगर कोई उपाय अभी सामने नहीं आ पाया है। तब तक अभिशप्त हैं दोनों प्राणी एक दूसरे के दुश्मन बने रहने के लिए।  

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

आतिश का मायाजाल

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो। 

दीपावली का शुभ दिन पड़ता है अमावस्या की घोर काली रात को।  शुरू होती है अंधेरे और उजाले की जंग। अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दो-जहद।  निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाने रखने की पुरजोर कोशिश। इसमें अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा अपने महाबली शत्रु से जूझती हैं सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ। अंधकार कितना भी गहरा हो ये छोटे-छोटे रोशनी के सिपाही अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके।

ऐसा होता भी है, इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चहरे पर फैली मुस्कान और हंसी को देख कर अपने-आप हो जाती है।  एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है।    
एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो।    

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

क्या सिर्फ झाड़ू उठा लेने से गंदगी नौ-दो-ग्यारह हो जाएगी ?

आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती।

साफ़-सुथरा माहौल, साफ-सफाई किसे अच्छी नहीं लगती। इसकी अच्छाइयों, इसके फायदों  से भी सभी वाकिफ हैं। पर नजरिया सब का तंग है।  'मैं साफ मेरा घर साफ' बस और इसी तंगख्याली के चलते अपने घर का कूड़ा लोग नुक्कड़ों या सड़क किनारे डाल निश्चिंत हो जाते हैं बिना यह सोचे कि वह एक जगह एकत्र हुई गंदगी, क्या नहीं कहर बरपा सकती। पर लोगों की, उचित दिशा निर्देश न होने के कारण,  मजबूरियां भी होती हैं।  इन्हीं सब बातों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के बाद जब मोदी जी ने सफाई के व्यापक अभियान का आह्वान किया तो जैसे लोगों में एक जोश की लहर दौड़ गयी। सब को ऐसा लगा कि बस हाथ में झाड़ू पकड़ा और गंदगी नौ-दो-ग्यारह हुई। कुछ लोग इच्छा से और कुछ 'एज यूजुअल' अनिच्छा से इस अभियान में जुटे। पर आशा के अनुरूप नब्बे प्रतिशत वही हुआ जिसका अंदेशा था। सांकेतिक अभियान के दौरान इधर-उधर का कूड़ा एकत्र कर किसी एक कोने में ढेर लगा लोग फोटो खिंचवा, प्रेस विज्ञप्ति भिजवा सब  खुशी-खुशी अपने  घर रवाना हो गए।                  

इरादा जरूर नेक है, अधिकांश लोग समझ भी रहे हैं, करना भी चाहते हैं, पर निराकरण और समापन कैसे किया जाए इसका उपाय नहीं है। नाही कोई 'गाइड लाइन" है कि उस एकत्र किए गए कूड़े-कर्कट को कैसे ठिकाने लगाया जाए।  दूसरी बात, करोड़ों लोगों को जिनको गंदगी फैलाना ज्यादा आसान लगता है उनको जागरूक करना टेढ़ी खीर होगा। आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती।  इसीलिए इस सफाई अभियान की सफलता को लेकर थोड़ी आशंका उत्पन्न हो रही है। जब तक  देश का एक-एक नागरिक जागरूक नहीं हो जाता, अपने कर्तव्य को धर्म नहीं मानने लगता तब तक इतने बड़े अभियान की सफलता प्रश्न चिन्ह के दायरे में ही रहेगी।  इसके लिए शुरुआत  बिल्कुल पहले पायदान से करना जरूरी है।  स्कूलों और घरों से ही बच्चों को इसकी अहमियत बतानी होगी। अपनी और अपने घर की सफाई के साथ उन्हें अपने माहौल की सफाई के प्रति जागरूक करना होगा।  इसके साथ ही सरकार को भी नई-नई तकनीकियों को तुरंत लागू कर लोगों के प्रयासों को उनकी मेहनत को जाया जाने से बचाना होगा।

दो अक्टूबर के दिन प्रधान मंत्री ने पहल कर सब को साथ ले जिस जोश के साथ राह दिखाई वह  कबीले तारीफ जरूर था पर ऐसा रोज-रोज तो हो नहीं सकता। प्रतिदिन मंत्री-संत्री अपना काम छोड़ सड़क पर नहीं उत्तर सकते।देश, समाज को चलाने के लिए, अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग महकमे और लोग नियुक्त किए जाते हैं। इसी के तहत देश के हर शहर, जिले, वार्ड, मोहल्ले के लिए सफाई-कर्मियों की नियुक्ति की जाती है।  जरूरत है कि यह ध्यान रखा जाए कि जिसे जो काम सौंपा गया है वह अपनी पूरी जिम्मेदारी से उसे पूरा करे। हर कोई यदि अपना काम पूरा करे तो भी एक हद तक कई परेशानियां दूर हो सकती हैं। पर कड़वी सच्चाई और विडंबना यह है कि हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति के तहत जाति, धर्म, अशिक्षा का भरपूर उपयोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों को बरगला कर देश और समाज के हित को अनदेखा कर दिया जाता है।      

इसी के संदर्भ में एक चीनी कहानी समीचीन है। एक खूबसूरत किताब में चूहों को पकड़ने की विधियां बताई गयी थीं। एक दिन चूहों ने उस पर धावा बोल दिया. किताब गरूर से बोली, भागो यहां से तुम जानते हो मैं कौन हूं और मुझ में क्या लिखा है ? चूहे बोले, अरे तुम एक कागज की बनी किताब ही तो हो।  पुस्तक गर्व से बोली, अरे बेवकूफो, मुझमें तुम्हें पकड़ने और मारने की विधियां बताई गयी हैं।  क्यूँ अपनी मौत को दावत दे रहे हो।चूहे जोर से हस पड़े और कुछ मिनटों में ही किताब को कतरनों में बदल दिया।  चूहे अक्लमंद थे वे जानते थे कि मात्र लिखा होने से कुछ नहीं होता जब तक उस पर अमल न किया जाए। कहीं ऐसा ही हाल हमारे सफाई अभियान का न हो जाए। फिर भी चाहे जो हो हमें अपनी तरफ से कोशिश करनी नहीं छोड़नी है ना ही हतोत्साहित होना है। हम कम से कम अपने स्तर पर अपने आस-पास का परिवेश तो स्वच्छ रख ही सकते हैं।  शुरुआत में इतना ही बहुत है। तो चलिए आज से एक कदम बढ़ाते हैं।     

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

बलिहारी BSNL की

ना कोई मेरा सगा मंत्रिमंडल में है और नहीं कोई संबंधी सरकारी अमले में।  तो क्यों एक आम आदमी के लिए ये लोग ख़ास प्रबंध करें ?   जहां  मेरे  फोन  के  तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है !             


जर्जर अवस्था वाले एक बांस में खुली तारों के सहारे मेरा फोन 
जबसे हुदहुद के आने की खबर सुनी थी तब से दिल धुक-धुक कर रहा था। तरह-तरह की आशंकाएं तूफानी हवाओं की तरह दिलो-दिमाग को मथ रही थीं। हालांकि उसके प्रभाव क्षेत्र में हम नहीं आ रहे थे पर उसका जो थोड़ा-बहुत असर होना था वही चिंता का विषय बना हुआ था। परेशानी अपने फोन के कनेक्शन को ले कर थी। क्योंकि इस बार तो हमारी सरकारी कंपनी ने ही खुद कह दिया था कि इस आने वाले तूफान से  BSNL की सेवाएं बाधित हो सकती हैं। यही मेरी चिंता का विषय था कि जब ये फोन वाले कुछ नहीं कहते तब तो मेरे "कोमा" में गए फोन को होश आने में 15 से 20 दिन लग जाते हैं, इस बार तो ये खुद ही पहले से हाथ खड़े कर रहे हैं।  पर तूफान आया और तटीय इलाकों में मजबूर लोगों पर अपना रोष तथा रौब जमा चला गया।  इधर फसलों को छोड़ कर उतनी तबाही नहीं हुई। आश्चर्य की बात यह भी रही कि मेरी फोन लाइन ने मेरा साथ नहीं छोड़ा।        

आप भी कहेंगे कि इसमें क्या बात है बहुतों के पास इसका कनेक्शन है और सब ठीक-ठाक रहा। कोई परेशानी नहीं हुई।  पर जब मेरे घर पहुंचती इनकी सेवा का जायजा लेंगे तो शायद आपकी धारणा बदल जाए। क्या है कि इस सरकारी उद्यम के "बेहतर काम" से अपनी बेहतरी चाहने वालों ने दूसरी प्रायवेट कंपनियों की शरण ले ली है।  पर अपने राम, पता नहीं क्यों, अभी भी इनसे किस उम्मीद की
ऐसे कनेक्शन देती है BSNL 
आशा लगा जुड़े हुए हैं। इस इलाके में मेरा अकेले का फोन सरकारी है, अब सीधी बात है कि ना कोई मेरा सगा मंत्रिमंडल में है और नहीं कोई संबंधी सरकारी अमले में।  तो क्यों एक आम आदमी के लिए ये लोग ख़ास प्रबंध करें ?  इसी लिए जहां मेरे तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है।  पता नहीं सरकारी काम, नियम, कानून ऐसे क्यों होते है ?  बैंक से लोन लेने वाले से प्रॉपर्टी दिखाने की मांग की जाती है। अरे भले लोगो उसके पास जायदाद होती तो तुम्हारे मुंह क्यों लगता ?  उनका कहना है कि इससे हैसियत देखी जाती है कि उनका पैसा कैसे वापस आएगा।  यह दूसरी बात है कि "हैसियत वालों"  से पैसा वापस लेने की इनकी हैसियत नही होती !!!

एक बात आज तक समझ नहीं आई की BSNL इतना बड़ा उद्यम है, सर पर सरकार का हाथ है तो फिर क्यों ये लोग विदेशी उपकरणों का प्रयोग करते हैं, वह भी किसी भरोसेमंद देश के नहीं बल्कि चीन के।  जो अपने उत्पादों के कारण ऐसे ही बदनाम है। मेरे इंटरनेट के लिए जो  'मॉडम' उपलब्ध करवाया गया है वह भी चीन का बना हुआ है और अपने देश की ख्याति के अनुसार साल-डेढ़ साल में चीनी भाषा में  "टैं" बोल जाता है। फिर खड़काते रहो सरकारी दफ्तर के दरवाजे। आज के समय में उच्च तकनीकी उपकरणों की सहायता से जहां इनके प्रतिद्वंदी एक दो दिन में उपकरणों में जान डाल देते हैं वहीं सरकारी सहायता आने में हफ़्तों लग जाते हैं। यही हाल इनके मोबाइल कनेक्शन का है।  जो सबके सामने खुले में ही बात करवाता है,  घर के अंदर से बात करवाने में शर्माता है। जिन्होंने इसे छोड़ा है वे पूछने पर बतलाते है कि भाई उससे तो टावर के नीचे खड़े हो तो भी बात नहीं होती थी। अब ऐसा क्यों है कि प्रायवेट कंपनियां दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही हैं, लोग उनसे जुड़ते जाते हैं और
इसके नाम से नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं ?  वैसे चतुर-सुजान "जो सच" उजागर करते हैं उस पर अविश्वास भी नहीं होता।   


आजकल चारों ओर हल्ला है कि अच्छे दिन आने वाले हैं, सो इसी आशा में इसे गले में लटकाए बैठे हैं, कि और चीजों के साथ शायद हमारा बीएसएनलवा भी सुधर जाए ……… आमीन        

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

वह सांड को सर के ऊपर उठा कसरत करता था

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।

सोच के बाहर है कि अपने शारीरिक बल को बढ़ाने के लिए कोई इंसान एक सांड को अपने सर के ऊपर उठा कर कसरत करता होगा। पर ऐसा हुआ है।  करीब 600 साल ईसा पूर्व, इटली के क्रोटोन में एक बालक का जन्म हुआ।  बचपन में साधारण कद-काठी का  बच्चा ही था।  पर उसकी इच्छा दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बनने की थी।  परंपरागत तरीके की कसरतों से उसका मन नहीं भरता था।  एक दिन उसने अपने घर के पास मार्ग के बीचो-बीच एक नवजात बछड़े को पड़े देखा तो वह उसे उठा किनारे ले गया।  फिर पता नहीं उसे क्या सूझा वह रोज बिना नागा, बिना किसी की परवाह के निश्चित समय पर उस बछड़े को अपने सर के ऊपर उठाने लगा। समय बीतता गया दिन हफ्ते में और हफ्ते महीनों में बदलते गए पर उसने, आंधी हो, तूफान हो, गरमी हो, सर्दी हो, अपना नियम कभी नहीं बदला। उस बालक का नाम था मिलो। 

उधर बछड़ा भी  सांड बन गया था पर मिलो उसे ही उठा कर अपना रियाज पूरा करता था। देखने वाले
जब दांतों तले उंगलियां दबाते थे तो उसे और भी आनंद आता था।उसके शरीर में मानों ताकत का सागर ठाठें मारता था।  अपनी ताकत का प्रदर्शन करना उसका शौक था।  इसके लिए वह अपनी मुट्ठी में एक अनार रख लोगों से उसे छीनने को कहता था पर इसमें कोई सफल नहीं होता था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि ताकत से मुट्ठी भींचने के बावजूद कभी फल को नुक्सान नहीं पहुंचता था।  ऐसे ही कभी वह एक तैलीय फर्श पर खड़ा हो अपने को धकेल कर पर करने की चुन्नोती देता था पर इसमें भी कोई उसे हरा नहीं पाता था।  उसके हाथ में इतनी ताकत थी कि वह अपने मुक्के के एक ही प्रहार से अच्छे खासे भैंसे को मार गिराता था।  अपने एक पसंदीदा करतब में वह अपने माथे पर बंधी रस्सी को अपने सर की शिराओं को  फुला कर तोड़ डालने की क्षमता रखता था।  ऐसे महाबली और महान खिलाड़ी ने प्राचीन ओलंपिक खेलों में भी भाग लिया था और एक या दो बार नहीं छह-छह बार विजेता घोषित किया गया था।  अपने चौबीस वर्षीय खेल जीवन में वह कभी भी पराजित नहीं हुआ था।   

कहते हैं कि मिलो ने एक बार महान ग्रीक दार्शनिक और गणितज्ञ पाइथागोरस की जान बचाई थी, जिससे प्रभावित हो पाइथागोरस ने अपनी लड़की की शादी मिलो से करवा दी थी। अपनी ताकत के बलबूते पर उसने अपने देश की सेना में भी जगह बना ली थी और कई युद्धों में भाग लेकर जीत भी दिलवाई थी। 

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। एक बार घूमते-घूमते मिलो को एक मजबूत वृक्ष दिखाई पड़ा, जिसके तने में दरार पड़ी हुई थी।  मिलो ने उसे उखाड़ने  ली। उसने पेड़ को जड़ से हिला तो दिया पर इस जोर आजमाईश में उसके हाथ बुरी तरह पेड़ की दरार में फस गए और लाख कोशिशों के बाद भी मिलो उन्हें छुड़ा नहीं पाया और उसकी बेबसी का फ़ायदा जंगली जानवरों ने उसे मार कर उठाया।  इस तरह एक विश्व विजेता का दारूण अंत हो गया।       

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

फर्क है कुलू के दशहरे में और विजयादशमी में

सात दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों, सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता।
दशहरे का उत्सव 


आश्विन माह के दसवें दिन विजया दशमी या दशहरे का त्यौहार धूम-धाम से पूरे देश में मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाने के लिए सांकेतिक रूप से हर साल रावण का पुतला अग्नि को समर्पित किया जाता है। पर जब सारे देश में विजयादशमी के दिन दशहरा उत्सव संपन्न हो जाता है, ठीक उसके दूसरे दिन हिमाचल के कुल्लू शहर में शुरू होता है "कुल्लू का दशहरा।" यह अपने आप में एक ऐसा बड़ा उत्सव है जिसे देखने देश-विदेश से पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता। यहां के दशहरे के प्रारंभ होने और मनाने की एक अलग कथा है।  
वर्षों पहले 1637  में कुल्लू घाटी में राजा जगत सिंह का राज था।  वैसे तो राजा लोक-प्रिय था, प्रजा
दरबार में पधारे देवी-देवता 
का भला चाहने वाला था पर उसे बहुमूल्य चीजों का संग्रह करने का शौक पागलपन की हद तक था। उसी के राज के टिपरी गांव में दुर्गा दत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण पूजा-पाठ कर अपना गुजर-बसर किया करता था। ब्राह्मण से किसी बात पर खफा एक आदमी ने राजा के कान भर दिए कि दुर्गा दत्त के पास कटोरा भर अति सुन्दर, बहुमूल्य तथा नायाब मोती हैं, जिन्हें उसने छिपा कर रखा हुआ है। राजा ने तुरंत दुर्गा दत्त के पास उन मोतीयों को राज खजाने में जमा करवाने का आदेश भिजवाया। दुर्गा दत्त ने हर नाकाम कोशिश की राजा को समझाने की कि उसके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है पर राजा न माना। उसके

राजघराने के वंशज 
उत्पीड़न से तंग आ ब्राह्मण ने अपने परिवार सहित अपने को घर में बंद कर आग लगा कर प्राण त्याग दिए। उसके दुखी मन से निकली आह के कारण कुछ ही समय पश्चात राजा को कोढ़ की बीमारी ने आ दबोचा उसे हर ओर कीड़े ही कीड़े नजर आने लगे। उसका खाना-पीना सब मुहाल हो गया।  उसकी बीमारी की खबर आग की तरह चारों दिशाओं में फैल गयी। कई तरह के इलाज आजमाए गए, हकीम, वैद्यों, ओझाओं, साधू-संतों के उपाय किए गए पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंत में एक बैरागी बाबा जिनका नाम किशन दास था, उन्होंने राजा को अपने राज में रघुनाथ जी की मूर्ती की स्थापना कर अपना सब कुछ उनको अर्पित कर देने की सलाह दी। राजा ने अपने ख़ास आदमी दामोदर दास को अयोध्या भेज वहां के 'त्रेत नाथ' के मंदिर से रघुनाथ जी की मूर्ति को मंगवा कर कुल्लू के सुल्तानपुर इलाके में पूरे विधी-विधान से स्थापित करवाया। इसके लिए अयोध्या के विद्वान पंडितों को भी बुलवाया गया। पूजा-अर्चना के बाद प्रभु की मूर्ति के चरणामृत को ग्रहण करने के पश्चात राजा को
अपने आराध्यों को लाते भक्त 
बिमारी से मुक्ति मिली। 




इसके बाद राजा जगत सिंह ने वादे के अनुसार अपना सारा राज्य प्रभु को समर्पित कर उनका छड़ीबरदार बन प्रजा की सेवा करनी प्रारंभ कर दी। राजा ने घाटी के समस्त देवी-देवताओं को प्रभु रघुनाथ जी के दरबार में उनके सम्मान की खातिर हाजरी लगाने के लिए कुल्लू के ढालपुर इलाके में एकत्रित होने का आह्वान किया। 
तिल धरने को जगह नहीं रहती 

यह बात 1651 के आश्विन माह के पहले पखवाड़े की है। तब से यह प्रथा चलती आ रही है। चूँकि इसी समय देश भर में दशहरे के त्यौहार की धूम रहती है तो उसी कड़ी को थामते हुए इसका भी वैसा ही नामकरण हो गया। जिसने आज विश्व-व्यापी ख्याति हासिल कर ली है और इस अवसर पर यहां पैर धरने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।                       

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

कोलकाता की "सफ़ेद-पोश" पुलिस

पश्चिम -बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह के रंग की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। महानगरीय पुलिस के लिए सफेद तथा बाक़ी के लिए खाकी।  


पश्चिम-बंगाल और कोलकाता प्रवास के दौरान बाहर से आए पर्यटकों ने वहां की पुलिस में कुछ को खाकी और कुछ को सफेद रंग की वर्दी  में देखा होगा। देश के बाक़ी हिस्सों में रहने वालों के मन में भी फिल्मों में कोलकाता की पुलिस दिखाई जाते समय उसके खाकी के बदले सफेद कपड़ों के बारे में शायद ही जिज्ञासा उत्पन्न हुई हो। पर जब देश के सारे हिस्सों में खाकी-वर्दी का बोल-बाला है तो कोलकाता की पुलिस सफेद-पोश क्यों ?  ज्यादातर लोग इस बात पर गौर नहीं करते।  पर इसका भी  कारण है।    

जब कभी घूमने-फिरने की बात आती है तो कोलकाता का नाम बाकी जगहों के काफी बाद आता है। जबकी अंग्रेजों के राज में हर बात में अग्रणी बंगाल का यह भव्य नगर  1911 तक  देश की राजधानी रहा था। यह कहावत काफी दिनों तक लोगों की जुबान पर रही थी कि वर्तमान में जो  बंगाल सोचता है वही भविष्य में देश की सोच होती है। गुलामी का समय था, पर बंगाली नौजवानों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। उन्हें देश छोड़ने को बाध्य करने के लिए हिंसक और अहिंसक दोनों मार्ग अख्तियार किए जाते रहे थे। फिर भी अराजकता की स्थिति होने के बावजूद अंग्रेजों ने राजधानी "कलकत्ता" की शानो-शौकत को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  आज भी उस जमाने के बनी महलनुमा इमारतें दर्शनीय हैं। इसीलिए कोलकाता को "महलों का शहर" भी कहा जाता है।  
सहायक के रूप में 
इसके व्यवस्थित और संस्थागत रख-रखाव के लिए उन्नीसवीं सदी के मध्य में 1856 में पुलिस विभाग में भी कई आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। लंदन पुलिस की तरह गुप्तचरों को भर्ती किया गया। पुलिस को शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ख़ास अधिकार भी दिए गए। उसी समय प्रदेश की पुलिस से कलकत्ता पुलिस को अलग कर उसे एक अलग संगठन का रूप दे दिया गया तथा उस समय के मुख्य न्यायाधीश को इसका पहला कमिश्नर बनाया गया। इस तरह तब से कोलकाता में दो पुलिस फोर्स काम कर रहीं हैं, पहली वेस्ट-बेंगाल पुलिस तथा दूसरी कोलकाता पुलिस। कोलकाता पुलिस के अंतर्गत महानगरीय इलाका आता है जबकि वेस्ट-बेंगाल पुलिस बाकी इलाकों की देख-भाल करती है।       
प. बंगाल की खाकी वर्दी 
उसी समय कलकत्ता पुलिस को प्रदेश की पुलिस से अलग पहचान देने के लिए, खाकी के बदले सफेद वर्दी याने यूनिफार्म प्रदान की गयी।  बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। यहां की यातायात पुलिस को एक और सुविधा मिली हुई थी जो देश की किसी अन्य पुलिस को उपलब्ध नहीं थी, और वह है कमर की बेल्ट में छाते को लगाने की सुविधा। जिससे यातायात नियंत्रण के लिए हाथ भी खाली रहते थे  और सूर्य की तीखी रौशनी से भी बचाव हो जाता था।  पता नहीं देश के अन्य प्रदेशों की पुलिस के आला अफसर अपने जवानों को यह सुविधा क्यों नहीं प्रदान करते ?