शुक्रवार, 30 मई 2014

रेलें असमाजिक तत्वों की सैर-गाह हो गयी हैं

जैसे ही रात गहराती है, दिन भर का थका यात्री जब रात के ग्यारह-बारह बजते-बजते सोने की तैयारी करता है तभी डिब्बे की सारी बत्तियां बंद कर दी जाती हैं और अँधेरे में शुरू हो जाता है  कुछ लोगों का अपना काला धंदा। अभी तो कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब बाकायदा टिकट लेकर चोरी को अंजाम देने की कोशिश की जाती रही है.

गाड़ियां ही गाड़ियां 
मोदी जी ने आते ही देश में बुलेट ट्रेन चलाने की अपनी  इच्छा जाहिर की थी।  अच्छी बात है सफर में समय कम लगेगा, काम जल्द निपटेंगे, लोगों के समय की बचत होगी, तरक्की में इजाफा होगा, देश उन विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ जाएगा, जहां ऐसी तीव्रगामी ट्रेंने दौड़ती हैं।  पर उसके पहले जो गाड़ियां बदहाल अवस्था में जर्जर पटरियों पर चल रही हैं उनके सुधार के बारे में भी सोचना बहुत जरूरी है।  

हजारों करोड़ों के बजट के इस विभाग को सरकार भी निजी हाथों में नहीं देना चाहती। आमदनी के मामले में हमारी रेल कामधेनु के बराबर है।  दसियों सालों से देखा जा रहा है कि मिली-जुली सरकारें बनने पर इस विभाग को हथियाने के लिए तनातनी जरूर होती है।  सभी मलाई खाना चाहते हैं. पर इसकी बदहाली पर कोई ध्यान नहीं देता. दूध दुहने पर सब उतारू रहते हैं पर चारा देते समय पैसे का रोना ले बैठ जाते हैं. आज हाल यह है कि जिन गिनी-चुनी गाड़ियों पर रेल विभाग गर्व करता है वे भी बदहाली का शिकार हैं. फिर चाहे वो राजधानी एक्स. हो या फिर जन-शताब्दी, उनके डिब्बों के बाहरी और अंदरूनी हालात सोचनीय अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं.   

बदहाल हालत 
आज रेल गाड़ियां में तरह-तरह के गैर-कानूनी कार्यों को असामाजिक तत्वों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। एक-दो उच्च श्रेणियों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर में यात्री आशंकित हो कर ही यात्रा करते हैं. शायद ही कोई
दिन ऐसा जाता हो जब ऎसी खबर न मिलती हो की फलानी गाड़ी में फलाना घटना घट गयी।  शायद ही कोई ऐसा खुशनसीब हो जो सफर पूरा होने के बाद यात्रा को याद रखना चाहता हो।

आज ऐसा कौन सा दुष्कर्म नहीं है जो रात के अँधेरे में दौड़ती इन दूरगामी गाड़ी रूपी बस्तियों में नहीं होता. देह व्यापार से लेकर स्मगलिंग, उठाईगिरी, झपट-मारी, नशीले पदार्थों की उपलब्धी, आरक्षण के बावजूद लोगों की रेल-पेल, क्या कुछ नहीं झेल रहे यात्रा करते यात्री। जैसे ही रात गहराती है, दिन भर का थका यात्री जब रात के ग्यारह-बारह बजते-बजते सोने की तैयारी करता है तभी डिब्बे की सारी बत्तियां बंद कर दी जाती हैं और अँधेरे में शुरू हो जाता है  कुछ लोगों का अपना काला धंदा। अभी तो कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब बाकायदा टिकट लेकर चोरी को अंजाम देने की कोशिश की जाती रही है.  


जर्जरावस्था 
सबसे बुरा हाल स्लीपर श्रेणी का होता है। हालांकि गाहे-बगाहे किसी-किसी गाड़ी में पुलिस की गस्त होती है पर उसका होना न होने के बराबर ही होता है.  कहने को तो टिकट चेकर पर सारी जिम्मेदारी होती है लोगों की सुरक्षित यात्रा की पर सीटों का हिसाब पूरा हो जाने के बाद वह शायद ही कभी नजर आता हो. रात भर लोग चढ़ते-उतरते रहते हैं. कोई कहीं भी जगह देख-खोज अपनी रात काटने का इंतजाम कर लेता है. रात के अँधेरे में कौन यात्री है कौन उठाईगीर कोई कैसे पता कर सकता है. उधर सुबह भी कहाँ चैन मिलता है. लोगों का रेला, ख़ास कर रेल-कर्मियों का हुजूम, जो रेल को घर की संपत्ति समझता है और यात्रियों को मुफ्तखोर, जहां मन आए मुंह उठा कर किसी की तकलीफ को न समझते हुए घुसा चला जाता  है, कोई पैसे देकर भी तकलीफ सहे उनकी बला से. तो सबसे पहले तो सरकार को यात्रियों की सुरक्षा और पैसे के बदले पूरी सहूलियत देने का सुदृढ़ इंतजाम करना चाहिए. रेल-कर्मियों के लिए कुछ अलग इंतजामात होने चाहिए.  यात्री अपने माल-असबाब की चिंता में रात को जागते रहने के लिए मजबूर न हो. टिकट चेकर महोदय अपनी निर्धारित जगह पर उपलब्ध रहें न कि खाना पूर्ती होते ही वातानुकूलित श्रेणी में जा सोने के. 
किसी भी तरह गंत्वय तक पहुँचाने की मजबूरी 

आज भी रेल, यात्रा का सबसे सस्ता साधन है और लाख मुसीबतों के बावजूद लोगों के लिए इसमें सफर करने के अलावा कोई और बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं हैं.  शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसने अपने जीवन में इस सुविधा का लाभ न उठाया हो. पर इसमे यात्रा करने की सोचते ही आम आदमी को तरह-तरह के बखेड़ों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ जाता है, फिर चाहे वो टिकट का इंतजाम हो, चाहे जगह के लिए मारा-मारी करनी पड़ती हो, चाहे यात्रा के दौरान सुरक्षा और खाने-पीने के इंतजामात की हो, कुछ भी हो आम आदमी की मजबूरी है  इसमे अपने गंत्वय तक जाने के लिए इसके उपयोग की. सो पहले मौजूदा गाड़ियों को सुरक्षित करना पहला लक्ष्य होना चाहिए।
    

शुक्रवार, 23 मई 2014

गुरु तो गुरु ही होता है

"गुरू ने अपनी सात फिट की म्यान से तीन फिट की तलवार निकाल शिष्य की गरदन पर रख दी "


पूराने समय में शिष्य आश्रमों में रह कर शिक्षा ग्रहण किया करते थे। गुरू भी अपनी समस्त विद्याएं अपने होनहार विद्यार्थियों को सौंप उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर होने का पथप्रदर्शित कर संतोष का अनुभव करते थे। समय के साथ-साथ गुरू शिष्य के रिश्ते भी बदलते गये। कुछ "होनहार" अपने को गुरू से भी ज्यादा अक्लमंद समझने लग गये। आज कल तो ऐसे ही चेलों का बोलबाला है।  ऐसे ही एक शिष्य की यह कहानी है।

एक मठ में एक बहुत ही योग्य गुरूजी पूरे तन-मन से अपने शिष्यों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दिया करते थे। उनके यहां से शिक्षा प्राप्त युवकों को अनेक राज्यों में अच्छे पद प्राप्त हो जाते थे। उन्हीं के यहां सोमदत्त नाम का युवक शिक्षा ग्रहण किया करता था। वह काफी होनहार तथा मेधावी युवक था। गुरूजी भी उस पर विशेष ध्यान दिया करते थे। अपने लगाव के चलते उन्होंने उसे सर्वगुण संम्पन्न बना दिया। अब वह किसी भी तरह अपने गुरू से कम नहीं था। धीरे-धीरे उसमें घमंड ने स्थान बना लिया। उसे लगने लगा कि उम्र की ढलान पर खड़े गुरू से वह कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। लोग नाहक ही गुरू को सम्मान देते हैं। इसी द्वेष के मारे उसने अपने गुरू को द्वंद युद्ध की चुन्नौती दे दी। गुरूजी ने इस चुन्नौती को स्वीकार कर एक महीने बाद का दिन निश्चित कर दिया।                           

सोमदत्त ने अपने गुरू को ललकार तो दिया था पर उसके मन के किसी कोने में यह डर था कि शायद गुरू ने उसे सारे दांव ना सिखाये हों, इसीलिये वह छिप कर एक दिन अपने गुरू को अभ्यास करते देखने आया। उसने पाया कि उसके गुरू सात फुट की तलवार से अभ्यास कर रहे हैं। यह देख उसने भी वापस आ सात फुट की तलवार से अभ्यास करना शुरू कर दिया। निश्चित दिन अपार जन समुह के बीच दोनो योद्धा अपने अस्त्रों के साथ मैदान में उतरे। दोनों के हाथों में सात-सात फुट की म्यानें थीं। डंके पर चोट पड़ते ही सोमदत्त ने अपनी सात फुटी तलवार निकालने की कोशिश की, पर तब तक गुरूजी ने अपनी सात फुट की म्यान से तीन फुट की तलवार निकाल सोमदत्त की गरदन पर टिका दी। गुरूजी की जयजयकार होने लगी। सोमदत्त शर्मिंदगी से जैसे भूमी में गड़ा जा रहा था।

बुधवार, 21 मई 2014

काठ की हांडी एक बार तो आग पर चढ़ चुकी


 ।किसी जगह एक बहुत चतुर पर अनुभवहीन, मौका-परस्त, बड़बोला पर गैर जिम्मेदार, लोगों की भावनाओ से  खेलने वाला,  अपनी भूलों से कुछ न सीखते हुए दूसरे की गल्तियों का फ़ायदा उठाने वाला एक आदमी रहा करता था। जीवन भर हाथ-पैर मारने के बावजूद वह कुछ उल्लेखनीय नहीं कर पाया था सिवा इसके कि समाज में प्रचलित सारे मुहावरे उस पर सटीक बैठते थे। ऐसे ही अपनी गोटियां इधर-उधर करते उसे बैठे-बिठाए एक दिन भाग्य ने किसी और की करनी के बदले उसका दरवाजा खटखटा दिया। वह तो सदा मौके की ताड़ में रहता ही था,  उसने भी देर नहीं की, अपने द्वारा बनाई "कचरी दीवाल" को सहारा देने के लिए  अपने घोर विरोधी की मिन्नतें कर उसकी भैंस सहारे के लिए अपनी दिवार से बाँध, उसे अभेद्य दुर्ग समझ, समय का भरपूर फ़ायदा उठा उसी दिवार के साये में उसने आसान जमाया और समाज का कर्ता-धर्ता बन बैठा। लोग उसके पास अपनी समस्याएँ ले कर आते तो वह ठोस कदम उठाने के बजाए सतही तौर पर बिना उसका दूरगामी असर देखे निराकरण कर देता। क्योंकि उसे अपनी सीमित क्षमता की पूरी जानकारी थी और वह जानता था कि इस पद पर बने रहने की उसकी लियाकत नहीं है पर वहाँ बने रह कर पद की गरिमा को सहारा बना और ऊंची छलांग लगाने की तैयारी कर रहा था. फिलहाल लोग उसकी त्वरित कार्यवाही से उत्साहित हो उसके सपनों को हवा दे                      रहे थे।                                                                                                                              
उधर आए दिन भैंस अपनी आदत के अनुसार अपनी शरीर की खुजली मिटाने के लिए  रोज ही दीवाल को रगड़ते रहती थी.  वह आदमी भी जानता था कि किसी भी दिन सब भरभरा कर नेस्तनाबूद होने वाला है इसलिए वह भी इस जबरदस्ती की ओढ़ी हुई जिम्मेदारी से जल्द बच निकलना चाहता था।  एक दिन अपनी "कचरी दीवाल" की बदहाली का दोष पड़ोसी की भैंस के सर मढ़ वह वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गया. पर जाते-जाते उसने ऐसी हवा फैलाई कि वह गांव के सुधार के बाद शहर जा कर वहाँ लोगों की भलाई करना चाहता है। पर कोई कितनी देर लोगों को गुमराह कर सकता है? गांव की उसकी हरकतों की खबरें उसके पहले ही शहर पहुँच चुकी थीं। उसके खोखले वादे, सत्ता-माया के प्रति झूठी निरपेक्षता, जबरन छिपाई गयी लालसा, सत्ता के प्रति मोह अब किसी से छिपा नहीं था। सो उसके लाख धरने-प्रदर्शन-मेल-मुलाकातों-वादों, हवाई सपनों तथा आदतानुसार दूसरों की छिछालेदर के बावजूद किसी ने उसे तवज्जो नहीं दी। बुरी तरह भद्द पिटने के बाद वह फिर अपने गांव, सुबह के भूले की तरह नहीं बल्कि घर के बुद्धू की तरह लौट आया।  

पर उसके दिमाग में अभी भी यही बात थी कि वह गांव वालों को अपनी लच्छेदार बातों में फंसा कर अपना पुराना पद तो हासिल कर ही लेगा।  पर वह यह नहीं जानता था कि उसके ढोल की पोल ही नहीं उसका ढोल ही फट चुका है।  उसकी काठ की हांडी एक बार आग पर चढ़ चुकी है, लोगों के सामने ढपोल शंख की असलियत खुल चुकी है।  पर फिर भी वह बाज नहीं आ रहा था, दूसरों को शीशा दिखाने वाला बेशरमी की हद तक जा फिर सत्ता हथियाने का उपक्रम करने लगा  यहां तक कि लोगों की सहानुभूति पाने के लिए वह जेल जाने को भी तैयार हो गया पर नतीजा वही रहा, ढाक के तीन पात, उसे किसी ने घास तक नहीं डाली।

इसीलिए कहा गया है कि जो मिला है उस पर संतोष करो।  नहीं तो आधी मिलने पर पूरी पाने की लालच में पूरी तो मिलती नहीं जो आधी हासिल हुई थी वह भी हाथ से जाती रहती है।