बुधवार, 29 जनवरी 2014

ये कैसी शिक्षा मिल रही है, भावी पीढ़ी को

देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed. करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते।  

शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमारी सरकार काफी अव्यवस्थित रहती है।  सरकारी कारिंदे सर से एड़ी का जोर लगा देते हैं कागजों में आंकड़ों को सुधारने में। पर यदि इसकी आधी ताकत भी सही ढंग से शिक्षा पद्यति को सुधारने में लगा दी जाए तो देश कागजों में नहीं, सही में साक्षर होना शुरू हो जाए। अभी तो अनपढ़ लोगों को सिर्फ अपना नाम लिखना सिखा उन्हें साक्षर घोषित कर दिया जाता है. देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। पर इससे सरकारी व्यवस्था को  किसी से लेना-देना नहीं है वहाँ तो सिर्फ आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर अपनी पीठ थपथपाने का खेल होता है। बड़े शहरों और कुछ राज्यों को छोड़ दें तो बाक़ी जगह की एक भयानक तस्वीर सामने आती है। साक्षरता के आंकड़ों को बढ़ाने के लिए स्कूलों में आठवीं तक की पढ़ाई में से परीक्षा का प्रावधान ही नही होने से स्कूल-कालेजों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि स्नातक की पढ़ाई करने वाले छात्रों को College और Collage या Principal और Principle तक का फर्क नहीं पता।   अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed.
क्या होगा ऐसी पढ़ाई का 
करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। यही लोग जब येन-केन-प्रकारेण स्कूलों-कालेजों में नौकरी जुगाड़ कर पैसे की खातिर पढ़ाना शुरू करेंगे तो अंदाजा लग सकता है कि स्तर कहाँ पहुंचेगा।
संलग्न फ़ोटो में एक B. Com के छात्र का प्रार्थना पत्र देख आश्चर्य होना स्वाभाविक है. यह तो एक बानगी है। सोचने की तथा मंथन की बात यह है कि दोष किसका है , छात्र का, अध्यापक का या शिक्षा-प्रणाली का ?
अभी  कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर छपी थी कि पांचवीं के छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तक नहीं पढ़ पाते। तो स्कूलों में कैसी पढ़ाई होती है? क्या पढ़ाया जाता है ? कैसे पढ़ाया जाता है?  इस पर कभी नियम-कानून बनाने वाले क्या ध्यान नहीं देते?
 
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहाँ क्या आशा की जा सकती है।  यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है। ऐसे में जरूरत है लोगों को जागरूक करने की. राजनीति से ऊपर उठ देश समाज की भलाई को प्राथमिकता देने की।  अपनी कुर्सी को बचाने के लिए ऊल-जलूल नीतियों को लागू करने की बजाए लायक बच्चों को "कुर्सी" दिलवाने में मदद करने वाली शिक्षा-प्रणाली को लागू करने की। इसमें बुद्धिजीवियो और शिक्षाविदों की सलाह ली जाए और उसको अमल में लाया जाए ना कि ऐसे लोगो को इसकी बागडोर सौंपी जाए जिनका इस विधा से कोई नाता ही न हो।                   

ऐसा नहीं है कि इन परिस्थितियों से लोग अनजान हैं, कोशिशें हो रही हैं उनका सकारात्मक परिणाम भी नजर आता है. पर वे बहुत धीमी और नगण्य हैं, उन पर भी सियासत की काली छाया पड़ती रहती है। इसलिए जो समितियां गठित की जाएं उनमें ऐसे शिक्षाविदों को रखा जाए जिन पर राजनीति का कोई दवाब न हो नाहीं सियासत से कोई लेना-देना। विद्या सर्वांगीण विकास में सहायक हो ना कि लकीर की फकीर। शिक्षा ग्रहण करने वाले में कहीं भी कैसी भी परीक्षा में उभर आने का माद्दा हो, उसे किसी भी संस्थान में ससम्मान दाखिला मिल सके इतनी क्षमता हो। जिससे नामी शिक्षा संस्थानों को अपने द्वार पर यह लिख कर लगाने कि जरूरत न हो कि फलांने राज्य या संस्थान वाले यहाँ अपना प्रार्थना पत्र न भेजें।          

बुधवार, 22 जनवरी 2014

ना वैसे सिंहासन रहे ना ही वैसे आरूढ़ होने वाले

पहले राजा-महाराजा, पंचपरमेश्वर या धर्माधिकारी इन गरिमामयी आसनों को अपनी लियाकत से हासिल कर उस पर बैठ अपने पराये को भूल न्याय करते थे। पर अब इन आसनों को अपनी योग्यता या काबिलियत से हासिल नहीं किया जाता। उसे पाने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद  हर तरह की नीति अपनाई जाती है। शायद इसी लिए उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है, जिससे आसनारूढ को सब अपना ही अपना दिखने लगता है।

किसी समय राजाओं के सिंहासन, न्यायाधीश की कुर्सी या पंचायतों के आसन की बहुत गरिमा होती थी। उस पर बैठने वाले का व्यवहार पानी में तेल की बूंद के समान रहा करता था। उसके लिए न्याय सर्वोपरी होता था। उस स्थान को पाने के लिए उसके योग्य बनना पड़ता था। समय बदला, उसके साथ ही हर चीज में बदलाव आया। पुराने किस्से-कहानियों में वर्णित घटनाएं कपोलकल्पित सी लगने लगीं। प्राचीन ग्रंथों को छोड़ दें तो 60-70 साल पहले की कथाओं को भी पढने से लोग आश्चर्यचकित होते हैं कि कहीं ऐसा भी हो सकता था।

राजा विक्रमादित्य का जितना बखान उनकी वीरता, न्याय प्रियता, उनके ज्ञान, चारित्रिक विशेषता, गुण ग्राहकता के लिए हुआ है वह शायद ही किसी सम्राट के लिए हुआ हो। कहते हैं उनके इन्हीं गुणों से प्रसन्न हो राजा इंद्र ने उनको एक विराट सिंहासन भेंट स्वरूप दिया था, जिस पर बैठ कर वे न्याय किया करते थे। उस आसन के उपर तक पहुंचने के लिए बत्तीस सीढियां चढनी पड़ती थीं। हर सीढी की रखवाली एक-एक पुतली करती थी जिससे कोई अयोग्य आसनारूढ ना हो जाए।
विक्रम ने राज-पाट छोड़ते वक्त उस सिंहासन को भूमि में गड़वा दिया था। कालांतर में जब राजा भोज ने शासन संभाला और उन्हें इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे जमीन से निकलवा, उस पर बैठ कर राज करने का निश्चय किया। शुभ मुहुर्त में जब उन्होंने उस पर पहला कदम रखा तब उस पायदान की रक्षक पुतली ने उन्हें राजा विक्रम से जुड़ी एक कथा सुनाई और पूछा कि राजन क्या आप अपने को इस सिंहासन के योग्य पाते हैं? राजा भोज ने विचार कर कहा, नहीं। फिर उन्होंने उस लायक बनने के लिए साधना की, अपने को उस योग्य बनाया। इस तरह उन्होंने बत्तीस पुतलियों को संतुष्ट कर अपने आप को उस सिंहासन के लायक बना उस को ग्रहण किया।

यह तो पुरानी बात हो गयी। अभी भी प्रेमचंदजी की कहानियों के पंचपरमेश्वर या और भी धर्माधिकारियों के किस्से मशहूर हैं, जो इन गरिमामयी आसनों पर बैठ अपने पराये को भूल सिर्फ न्याय करते थे। पर अब इन आसनों को अपनी योग्यता या काबिलियत से हासिल नहीं किया जाता। उसे पाने के लिए साम-दाम-दंड़-भेद  हर तरह की नीति अपनाई जाती है। शायद इसी लिए उस पर बैठते ही बैठने वाले पर कोई आसुरी शक्ति हावी हो जाती है, जिससे आसनारूढ को सब अपना ही अपना दिखने लगता है। वह अच्छे को छोड़ सिर्फ बुरा ही बुरा करने पर उतारू हो जाता है। अपनी गलत बातों का विरोध करने वाला उसे अपना कट्टर दुश्मन लगने लगता है। उस आसन पर बैठ सत्ता हासिल होते ही वह अपने आप को खुदा समझने लगता है।

हो सकता है कि तब गलत इंसान के गलत तरीके से सत्ता हथिया कर किए जाने वाले गलत कार्यों को उस आसन का श्राप मिलता हो कि जा निकट भविष्य में तेरा नाश अवश्यंभावी है? क्योंकि ऐसे अनगिनत उदाहरण इतिहास में मौजूद हैं।

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

लोहड़ी का त्योहार और दुल्ला-भट्टी

कल लोहड़ी जलाने पर कुछ पड़ोसियों ने पूछा कि क्या आज कोई आप का (यानी पंजाबियों का) त्योहार है? मैंने कहा है तो पूरे देश का पर सिमट कर रह गया है देश के उत्तरी हिस्से में।  
हम सदा से उत्सव-धर्मी रहे हैं। इसी कारण हमारा देश तीज-त्योहारों का देश है। तीज-त्योहार यानी खुशियां मनाने, बांटने के मौके। जो संदेश देते रहते हैं कि हजार परेशानियां हों पर उन्हें भूल कर जीवन को चलायमान रखना जरूरी है। इसी को अपना मूल मंत्र मानता है हमारे देश का उत्तरी भाग, ख़ास कर पंजाब। वहाँ के लोगों की जिंदा-दिली का कोई जवाब नहीं है. जो छोटी-छोटी बातों में भी खुशियां ढूँढ निकालते हैं. उसी का उदाहरण है "लोहड़ी".
वैसे तो इसके बारे में कई कथाएं हैं पर मूल कारण शीत ऋतु का समापन है।  वैसे तो वैज्ञानिक सबसे छोटा दिन 21-22 दिसंबर को मानते हैं पर हमारे यहाँ सूर्य के उत्तरायण होने से दिनों के बड़ा होने की शुरुआत माना जाता है जिसे पूरा देश "मकर संक्रांति" के रूप में मनाता है. इसीलिए लोहड़ी को मकर संक्रांति के एक दिन पहले की रात को सर्द दिनों की विदाई और अगले दिन से दिनों के बड़े होने की खुशी में मनाया जाता है। हर साल तेरह जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार एक तरह से ऊर्जा के स्रोत आग का पूजन है।  
इस दिन सुबह से ही बच्चे लोहड़ी से संबंधित गीत, जो "दुल्ला भट्टी " से जुड़े होते हैं गाते हुए घर-घर जाते हैं जिसके बदले में उन्हें हर घर से मूंगफली, तिल, गुड, रेवड़ी, गजक के साथ-साथ पैसे भी दिए जाते हैं। बच्चों को खाली हाथ लौटाना अच्छा नहीं माना जाता। फिर रात होने पर हर घर के सामने या मोहल्ले में एक जगह, होलिका दहन की तरह छोटे-बड़े अलाव जलाए जाते हैं. उसके चारों और नाचते-गाते, परिक्रमा करते हुए उसमें तिल, गुड, मूंगफली की आहुति दी जाती है. यह कार्यक्रम देर रात तक चलता रहता है. यह उन परिवारों के लिए और ख़ास हो जाता है जहां हाल ही में शादी-ब्याह हुआ हो या नवजात का आगमन, क्योंकि दोनों उर्वरता और फलप्रद स्थिति के द्योतक होते हैं और प्रकृति भी तो उसी दिन से ऊर्जा यानी सूर्य की और रुख करती है।

पंजाब में बंगाल की तरह ही दूसरा दिन नए साल की शुरुआत का होता है। जब पंजाब और हरियाणा का किसान फिर अपने खेतों को नए सिरे से संवारता है, तैयार करता है नयी फसल और अपने उज्जवल भविष्य के लिए। जिससे फिर वह अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्रों के साथ खुशियां मना सके, दुल्ला-भट्टी के गीत गा सके।

पर यह दुल्ला-भट्टी है कौन? जिससे लोग इतनी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। जिसका नाम हर लोहड़ी के गीत की आवश्यकता है।  
कहते हैं बादशाह अकबर के जमाने में पंजाब में अराजकता फैल गयी थी। हिंदू कन्याओं का जबरन अपहरण कर उन्हें खाडी के देशों में बेच दिया जाता था. पिंडी भट्टियां के शासकों भट्टी सरदारों के खानदान के युवक दुल्ला-भट्टी को यह नागवार गुजरा। वह एक दिलेर इंसान था जिसने ग़रीबों की सहायता के लिए अमीरों को तंग कर रखा था। अपहरण की गयी हिंदू कन्याओं को बचा कर उनका सम्मान पूर्वक विवाह करवाना तथा उनकी गृहस्ती बसाना उसका मुख्य उद्देश्य हुआ करता था। ऐसी ही दो लड़कियों के नाम सुंदरी और मुंदरी थे, जिनका उसने पूरी शानो-शौकत से विवाह करवाया था। य़े वही सुंदरी-मुंदरी हैं जिनका नाम लोहड़ी के गीतों में शामिल होता आ रहा है।       

सोमवार, 6 जनवरी 2014

उस दिन तो प्रभू ही हमारे साथ थे

कोई माने या ना माने मेरा दृढ़ विश्वास है कि उस दिन सच्चे मन से निकली गुहार के कारण ही प्रभू ने हमारी सहायता की थी। प्रभू कभी भी अपने बच्चों की अनदेखी नहीं करते और यह मैने सुना नहीं देखा और भोगा है।

घटना करीब तीस साल पुरानी है। शादी को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे। तब हम दिल्ली के राजौरी गार्डेन में रहते थे। मेरी बुआ जी की बेटी यानि मेरी फुफेरी बहन का रिश्ता हरियाणा के करनाल शहर में तय हुआ था। उसी के सिलसिले मे वहां जाना था। मैने नया-नया स्कूटर लिया था, जो अभी तक दो सौ कि. मी. भी नहीं चला था. सो शौक व जोश में मैंने अपने चाचाजी से गुजारिश की कि स्कूटरों पर ही करनाल चला जाए. उन दिनों सडकों पर इतनी भीड़-भाड़ नहीं होती थी। सो थोड़ी सी ना-नुकुर के बाद उन्होंने स्वीकृति तो दी ही खुद भी स्कूटर पर चलना तय कर लिया। परिवार के आठ जनों ने जाना था। जिसमें छह लोग तीन स्कूटरों पर और मेरी दो बुआओं का बस से जाना तय हुआ। सबेरे सात बजे हम सब करनाल के लिए रवाना हो लिए। यात्रा बढ़िया रही, वहां भी सारे कार्यक्रम खुशनुमा माहौल में संपन्न होने के बाद हम सब करीब पांच बजे वापस दिल्ली के लिए वापस हो लिए।

लौटने का क्रम भी सुरक्षा और सावधानी हेतु सुबह की तरह ही रखा गया था। सबसे आगे चाचाजी तथा चाची जी अपने स्कूटर पर, बीच में  मैं सपत्निक, तथा तीसरे स्कूटर पर मेरे दोनों फूफाजी। सब ठीकठाक ही चल रहा था कि अचानक दिल्ली से करीब 35किमी पहले मेरा स्कूटर बंद हो गया। मेरे आगे एक स्कूटर तथा पीछे एक स्कूटर था. आगे वालों का ध्यान कोशिशों के बावजूद हैम आकर्षित नहीं कर सके। सो वे तो चलते चले गये। पर मन में संतोष था कि पीछे दो लोग आ रहे हैं। पर देखते-देखते, मेरे आवाज देने और हाथ हिलाने के बावजूद उनका ध्यान मेरी तरफ नहीं गया, एक तो शाम हो चली थी दूसरा हेल्मेट और फिर उनकी आपसी बातों की तन्मयता की वजह से वे मेरे सामने से निकल गये।

इधर लाख कोशिशों के बावजूद स्कूटर चलने का नाम नहीं ले रहा था। जहां गाडी बंद हुए थी, उसके पास एक ढ़ाबा था वहां किसी मेकेनिक मिलने की आशा में मैं वहां तक स्कूटर को ढ़केल कर ले गया, परंतु वहां सिर्फ़ ट्रक ड्राइवरों का जमावड़ा था। अब कुछ-कुछ घबडाहट होने लगी थी। ढ़ाबे में मौजूद लोग सहायता करने की बजाय हमें घूरने में ज्यादा मशरूफ़ थे। मैं लगातार मशीन से जूझ रहा था। मेरी जद्दोजहद को देखने धीरे-धीरे तमाशबीनों का एक घेरा हमारे चारों ओर बन गया था। कदमजी मन ही मन (जैसा कि उन्होंने मुझे बाद में बताया) लगातार महामृत्युंजय का पाठ करे जा रहीं थीं। हम दोनो पसीने से तरबतर थे, मैं स्कूटर के कारण और ये घबडाहट के कारण। अनजान जगह, ढाबे को छोड़ दूर-दूर तक किसी बस्ती का नामोनिशान नहीं। वहाँ मौजूद  दस-पंद्रह जनों में आधे से ज्यादा बंदे नशे की गिरफ्त में. अंधेरा घिरना शुरु हो गया था. 

अचानक स्पार्क प्लग में एक चिंगारी छूटी और इंजिन में जान आ गयी। मैने वैसे ही चालू हालत में स्कूटर को कसा-ढ़का और प्रभू को याद कर सड़क पर आ गया। उन दिनों दिल्ली में बाढ़ आई हुई थी। उस समय स्कूटरों में तकनीकी उतनी अच्छी नहीं होती थी सो गति धीमी होते ही हेड लाइट भी हलकी पड़ जाती थी सो चलते हुए कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतनी पड रही थी ऊपर से यह आशंका कि कहीं गाड़ी फिर बंद ना हो जाए. राम-राम करते  रात करीब साढ़े दस बजे जब घर पहुंचे तो घर वालों की हालत खस्ता थी। उन दिनों मोबाइल की सुविधा तो थी नहीं और गाडी फिर ना बंद हो जाए इसलिए रास्ते से मैने भी फोन नहीं किया था। जैसा भी था हमें सही सलमात देख सबकी जान में जान आई।

दूसरे दिन मेकेनिक ने जब स्कूटर खोला तो सब की आंखे फटी की फटी रह गयीं क्योंकी स्कूटर की पिस्टन रिंग टुकड़े-टुकड़े हो चुकी थी जो कि नये स्कूटर के इतनी दूर चलने का नतीजा था। ऐसी हालत में गाडी कैसे स्टार्ट हुई कैसे उसने दो जनों को 50-55किमी दूर तक पहुंचाया कुछ पता नहीं। यह एक चमत्कार ही था। उस दिन को और उस दिन के माहौल के याद आने पर आज भी मन कैसा-कैसा हो जाता है।

कोई माने या ना माने मेरा दृढ़ विश्वास है कि उस दिन सच्चे मन से निकली गुहार के कारण ही प्रभू ने हमारी सहायता की थी। प्रभू कभी भी अपने बच्चों की अनदेखी नहीं करते और यह मैने सुना नहीं देखा और भोगा है।

शनिवार, 4 जनवरी 2014

पूजन के बाद आरती, क्यूँ और कैसे


अपने यहाँ सबसे ज्यादा की जाने वाली  आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है।  यह जितनी लोक प्रिय है उतनी ही इसकी एक लाईन को गलत पढ़ा जाता है, वह है "नारद करत निरांजन" जिसे अधिकाँश महिला-पुरुष  "नारद करत निरंजन" उच्चारण करते हैं। 

आरती लेते  लोग 
अपने यहाँ हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के बाद उनकी आरती, जिसे निरांजन, आरात्रिक या आरातिर्क भी कहते हैं,  करने का विधान है। जो पूजा के षोडशोपचार का एक अंग है। जिसमे गायन, वादन और करतल ध्वनी  के साथ-साथ दीप या बाती जला कर देवी या देवता के हर अंग को ध्यान में रख प्रतिमा के दायीं ओर से बाईं ओर घुमाते हुए किया जाता है और अंत में बाती की लौ पर वहाँ उपस्थित सारे लोग अपने दोनों हाथों की हथेलियों को घुमा कर अपने सर और आँखों से स्पर्श करवाते हैं। यह क्रिया घर, मंदिर, या सार्वजनिक पूजा या उत्सवों में कमोबेश ऐसे ही या तो कपूर या घी की बाती को प्रज्जवलित कर की जाती है। आरती करना और लेना पुण्य का काम माना जाता है।  

आरती जहां पूजा की समाप्ति की द्योतक है वहीं यह अंत में प्रभू के साथ अपने को जोड़ने के लिए किए गए ध्यान की भी क्रिया है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि अपने आराध्य की पूजा, मंत्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमे पूर्णतया आने के साथ-साथ त्रुटि कि भी कमी पूरी हो जाती है। इसे अपने आराध्य को उनके मूल मंत्र से तीन बार पुष्पांजली दे कर जय-जयकार करते हुए वाद्यों के साथ कपूर या विषम संख्या की घी की बातियों, जिन्हें साधारणतया पांच की संख्या में लिया जाता है, को प्रज्जवलित कर गायन करते हुए किया जाता है। मन्त्र या स्तुति में शब्दों का शुद्ध उच्चारण होना आवश्यक है।  

लौ को प्रतिमा के चरणों में चार बार, नाभी परदेश में दो बार, मुख मंडल पर एक बार तथा समस्त अंगों पर सात बार घुमाने का विधान है। आरती के पांच अंग होते हैं।  दीप माला के द्वारा, जलयुक्त शंख से, कोरे वस्त्र से, आम या पीपल के पत्तों से और साष्टांग दंडवत से। इसके कर लेने से अपने द्वारा की गयी अपने आराध्य की पूजा अर्चना में पूर्णतया का भाव आ जाता है।    

अपने यहाँ सबसे ज्यादा की जाने वाली  आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है।  यह जितनी लोक प्रिय है उतनी ही इसकी एक लाईन को गलत पढ़ा जाता है, वह है "नारद करत निरांजन" जिसे अधिकाँश महिला-पुरुष "नारद करत निरंजन" उच्चारण करते हैं।     

@मंदिर के पुजारी श्री रामजी महाराज से ली गयी जानकारी पर आधारित।