बुधवार, 21 मई 2014

काठ की हांडी एक बार तो आग पर चढ़ चुकी


 ।किसी जगह एक बहुत चतुर पर अनुभवहीन, मौका-परस्त, बड़बोला पर गैर जिम्मेदार, लोगों की भावनाओ से  खेलने वाला,  अपनी भूलों से कुछ न सीखते हुए दूसरे की गल्तियों का फ़ायदा उठाने वाला एक आदमी रहा करता था। जीवन भर हाथ-पैर मारने के बावजूद वह कुछ उल्लेखनीय नहीं कर पाया था सिवा इसके कि समाज में प्रचलित सारे मुहावरे उस पर सटीक बैठते थे। ऐसे ही अपनी गोटियां इधर-उधर करते उसे बैठे-बिठाए एक दिन भाग्य ने किसी और की करनी के बदले उसका दरवाजा खटखटा दिया। वह तो सदा मौके की ताड़ में रहता ही था,  उसने भी देर नहीं की, अपने द्वारा बनाई "कचरी दीवाल" को सहारा देने के लिए  अपने घोर विरोधी की मिन्नतें कर उसकी भैंस सहारे के लिए अपनी दिवार से बाँध, उसे अभेद्य दुर्ग समझ, समय का भरपूर फ़ायदा उठा उसी दिवार के साये में उसने आसान जमाया और समाज का कर्ता-धर्ता बन बैठा। लोग उसके पास अपनी समस्याएँ ले कर आते तो वह ठोस कदम उठाने के बजाए सतही तौर पर बिना उसका दूरगामी असर देखे निराकरण कर देता। क्योंकि उसे अपनी सीमित क्षमता की पूरी जानकारी थी और वह जानता था कि इस पद पर बने रहने की उसकी लियाकत नहीं है पर वहाँ बने रह कर पद की गरिमा को सहारा बना और ऊंची छलांग लगाने की तैयारी कर रहा था. फिलहाल लोग उसकी त्वरित कार्यवाही से उत्साहित हो उसके सपनों को हवा दे                      रहे थे।                                                                                                                              
उधर आए दिन भैंस अपनी आदत के अनुसार अपनी शरीर की खुजली मिटाने के लिए  रोज ही दीवाल को रगड़ते रहती थी.  वह आदमी भी जानता था कि किसी भी दिन सब भरभरा कर नेस्तनाबूद होने वाला है इसलिए वह भी इस जबरदस्ती की ओढ़ी हुई जिम्मेदारी से जल्द बच निकलना चाहता था।  एक दिन अपनी "कचरी दीवाल" की बदहाली का दोष पड़ोसी की भैंस के सर मढ़ वह वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गया. पर जाते-जाते उसने ऐसी हवा फैलाई कि वह गांव के सुधार के बाद शहर जा कर वहाँ लोगों की भलाई करना चाहता है। पर कोई कितनी देर लोगों को गुमराह कर सकता है? गांव की उसकी हरकतों की खबरें उसके पहले ही शहर पहुँच चुकी थीं। उसके खोखले वादे, सत्ता-माया के प्रति झूठी निरपेक्षता, जबरन छिपाई गयी लालसा, सत्ता के प्रति मोह अब किसी से छिपा नहीं था। सो उसके लाख धरने-प्रदर्शन-मेल-मुलाकातों-वादों, हवाई सपनों तथा आदतानुसार दूसरों की छिछालेदर के बावजूद किसी ने उसे तवज्जो नहीं दी। बुरी तरह भद्द पिटने के बाद वह फिर अपने गांव, सुबह के भूले की तरह नहीं बल्कि घर के बुद्धू की तरह लौट आया।  

पर उसके दिमाग में अभी भी यही बात थी कि वह गांव वालों को अपनी लच्छेदार बातों में फंसा कर अपना पुराना पद तो हासिल कर ही लेगा।  पर वह यह नहीं जानता था कि उसके ढोल की पोल ही नहीं उसका ढोल ही फट चुका है।  उसकी काठ की हांडी एक बार आग पर चढ़ चुकी है, लोगों के सामने ढपोल शंख की असलियत खुल चुकी है।  पर फिर भी वह बाज नहीं आ रहा था, दूसरों को शीशा दिखाने वाला बेशरमी की हद तक जा फिर सत्ता हथियाने का उपक्रम करने लगा  यहां तक कि लोगों की सहानुभूति पाने के लिए वह जेल जाने को भी तैयार हो गया पर नतीजा वही रहा, ढाक के तीन पात, उसे किसी ने घास तक नहीं डाली।

इसीलिए कहा गया है कि जो मिला है उस पर संतोष करो।  नहीं तो आधी मिलने पर पूरी पाने की लालच में पूरी तो मिलती नहीं जो आधी हासिल हुई थी वह भी हाथ से जाती रहती है। 

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