सोमवार, 29 दिसंबर 2014

एक तमाशा मेरे आगे

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा। 

होना तो यह चाहिए था कि जनता जनार्दन जितनी जागरूक यानी समझदार होगी उतना ही चुनाव खर्च कम होगा पर हो उल्टा ही रहा है। अभी 36 गढ़ के नगर निगमों के चुनाव को देख लग रहा था जैसे शहर चलाने  के लिए नहीं राज्य चलाने के लिए चुनाव हो रहे हों !  बीसियों दिन पहले से घेरा बंदी, मोर्चा बंदी, व्यूह रचना ऐसे शुरू हो गयी थी जैसे नगर निगम के पार्षद का नहीं विधान सभा के सदस्य का चुनाव होना हो। कद्दावर नेताओं की प्रतिष्ठा का भी यह प्रतीक बन गया था।  जैसे-जैसे चुनाव के दिन के सूर्य के उदय का समय नजदीक आता गया वैसे-वैसे गहमा-गहमी बढ़ती चली गयी। झंडे, बैनर, पोस्टर, पैंफ्लेट जैसी पुरातन प्रचार सामग्री तो थी ही इनके साथ-साथ नचैये-गवैयों को भी तरह-तरह के लोकप्रिय गानों की धुन पर फिट किए गए सामायिक शब्दों वाले गानों पर आलाप भरते-ठुमकते देखा जा सकता था। उनकी कला का फ़ायदा उठाने की भी पुरजोर कोशिश की जा रही थी।

पहले ऐसा होता था कि भीड़ इकट्ठा करने वाले को जमा हुए लोगों के हिसाब से उनके खाने-पीने के पैसे
पकड़ा दिए जाते थे या सारा सामान बाहर से मंगवाया जाता था। पर इस बार नई रणनीति के तहत ज्यादातर प्रत्याशियों ने अपने कार्यालय में ही भंडारा खोल दिया था, जहां सुबह के चाय-नाश्ते के साथ-साथ रात के डिनर तक की व्यवस्था कर दी गयी थी। वह भी कार्यकर्ताओं की पसंद-नापसंद पूछ-जान कर, जिसमें वेज और नॉनवेज  उपलब्ध करवाए गए थे। यह सब ताम-झाम इसलिए कि कार्यकर्ता सदा उम्मीदवार के साथ और पास बना रहे,  न खिसक जाए।  उनकी रूटीन भी बना-समझा दी गयी थी। सबेरे आते ही चाय-नाश्ता कर रैली में निकालो, घूम-फिर कर दोपहर को लौट खाना खाओ। कुछ देर आराम कर फिर अपने गले और शरीर के करतब दोहराओ, फिर वापस आ  चाय लेकर निकलो और फिर आ कर रात का भोजन पाओ।  

पर जाहिर है कि आजकल कोई भी सिर्फ खाने के लिए किसी से बंधा नहीं रहता।  इसलिए हरेक के लिए उसके काम के अनुसार मेहनताना भी निश्चित कर दिया गया था। हालांकि यह गोपनीय होता है पर स्थानीय अख़बारों की मानें तो अलग-अलग कामों के लिए यह 100 रुपये से शुरू हो 1000 रुपये तक  एक-एक सिर का रोज का भुगतान था।  अब हर पार्टी की "मीटरों लम्बी, चुनावी हथियारों से सजी" रैली के ऊपर रोज कितना खर्च आता होगा इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है।  जो पिछले चुनावों से और नहीं तो दोगुना तो हो ही चुका है।  किसी भी चीज को नष्ट या बर्बाद कर उसे दोबारा पाना बहुत मुश्किल या ना के बराबर ही होता है।  पर शायद पैसा ही ऐसी  चीज है जिसकी बढ़ोत्तरी के लिए उसे बेरहमी से खर्च (नष्ट या बर्बाद) किया जाता है।            

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा।  

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या अंग्रेजी में बोलने से अपशब्द स्वीकार्य हो जाते हैं ?

एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!

बहुत दिनों बाद ठाकुर जी का मेरे यहां आना हुआ। पर कुछ उखड़े-उखड़े लग रहे थे, ठंड के बावजूद पहले की तरह आते ही चाय की फरमाईश नहीं की। मैंने ही कहा, अच्छे वक्त पर आए चाय बन ही रही है, पर आज मूड ठीक नहीं लग रहा, क्या हो गया ? पर वे अनमने से बने रहे, लगा जैसे बात शुरू करने का कोई छोर ढूँढ रहे हों। तभी चाय आ गयी, उसने माहौल सामान्य करने में अपना पूरा योगदान दिया। तब तक वे  भी प्रकृतिस्त हो चुके थे, बोले मंदिर से आ रहा हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा कि मंदिर जाने से इनका मन परेशान क्यों हो गया, पर मैं बोला कुछ नहीं, उनके बोलने का इंतजार  करता रहा। चाय खत्म कर प्याला रख मुझे देखते हुए बोले, शर्मा जी, क्या आपने कभी आजकल की बातचीत में प्रयोग होने वाली भाषा पर ध्यान दिया है ?  मुझे लगा वो 'हिंग्लिश' के बारे में बोलना चाहते हैं। पर अपनी तरफ से कुछ न कहते हुए मैंने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि उन पर डाले रखी। तब उन्होंने अपने दिल की बात कहनी शुरू की, बोले मंदिर से दर्शन कर निकल ही रहा था कि अंदर दाखिल होती एक कन्या की पूजा की सामग्री किसी कारणवश गिर गयी, जिसके गिरते ही उसके मुंह से निकला  "शिट"……, सोचा कि उससे पूछूं कि इस शब्द का अर्थ तुम्हें मालुम भी है, पर फिर खिन्न मन लिए आप के पास चला आया। अब आप ही बताइये कि इन अर्ध-शिक्षितों को, जो मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उनको हिंदी नहीं आती और उनकी इस बात पर उनके अभिभावक भी गर्व करते हैं, पर क्या वे कभी ध्यान देते हैं कि उनके नौनिहाल या 'नौनिहालिनियों' की  पकड़ अंग्रेजी पर भी पच्चीस-पचास शब्दों से ज्यादा नहीं है। ऐसों को ना ढंग से हिंदी आती है नाही अंग्रेजी। खिचड़ी भाषा में बतियाते हुए अपने आप को मॉडर्न दिखाने के चक्कर में साधारण से 'ओह' की जगह जबरन 'आउच' उच्चारते ये कैसे अस्वाभाविक लगते हैं, ये इन्हें नहीं मालूम।
मैंने कहा, ठाकुर जी, क्यों परेशान होते हैं, आज का दौर ही ऐसा हो गया है। आप किसी भी प्रांत से निकलने वाले हिंदी के अखबार को उठा लें, सिनेमा को देख लें, टेलीविजन का जायजा ले लें, किसी सेमिनार में भाग ले लें,  सब जगह ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल होने लग गया है। इसमें वैसे कोई ख़ास बुराई भी नहीं है।
ठाकुर जी बोले, मैं दूसरी भाषा के शब्दों के उपयोग पर आपत्ति नहीं उठा रहा हूँ, मेरी परेशानी बात-चीत में अपशब्दों के प्रयोग से, वह भी बिना स्थान परिवेश या सामने वाले की उपस्थिति को देख उगल देने से है।आप तो टी. वी. बहुत कम देखते है, फिर भी शायद देखा होगा कि एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!
अब आप ही बताइये कि यह सब क्या है ?   मैं यह भी जानता हूं  कि कुछ लोग मुझे दकियानूस समझते हैं पर क्या बिना नंगाई या बेहयाई पर उतरे बिना बातचीत संभव नहीं है ?  ख़ास कर घर-घर तक पहुँच रखने वाले दृश्य मीडिया को तो अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।  हर जगह फूहड़ता का बोल-बाला हो गया है। इस पर विडंबना ये है कि अपने को सही साबित करने के लिए ये जनता की पसंद की दुहाई देने लग जाते हैं।

तभी उनके फोन की घंटी बज उठी, भाभी जी का था, इनके अभी तक घर न पहुँचने से ज़रा चिंतित थीं। ठाकुर जी तो चले गए पर अपनी बातों से मुझे सोच में डाल गए, तो मैंने सोचा कि आपसे पूछ कर देख लूँ कि आपका क्या विचार है ? क्या यह एक अस्थाई दौर है या सचमुच कोई  सोचनीय अवस्था दस्तक दे रही है ?                






शनिवार, 20 दिसंबर 2014

दिल्ली का "मजनू का टीला", ये मजनू वो मजनू नहीं है

कभी-कभी एक जैसे नाम से गलतफहमी हो जाती है। जैसे किसी अनजान से इंसान के नाम पर किसी जगह की पहचान बनी हो तो सच्चाई न जानने वालों को लगता है कि उस जगह का नाम कथा-कहानियों में प्रचलित ज्यादा मशहूर इंसान के नाम पर ही रखा गया होगा। खोज-खबर न होने पर यह धारणा मजबूत भी होती चली जाती है।

ऐसी ही एक जगह है दिल्ली में, मजनू का टीला। ज्यादातर लोगों की धारणा है कि लैला के प्रेमी मजनू के नाम पर ही इस जगह का नामकरण हुआ होगा, जबकी असलियत यह है कि वर्षों पहले चौहदवीं शताब्दी में सिकंदर लोधी की बादशाहत के समय यहां अब्दुला नाम का एक मस्त-मौला, खुदा के ख्यालों में खोया रहने वाला इंसान रहता था, जो लोगों को अपनी नाव में यमुना नदी के आर-पार बिना कोई शुल्क लिए लाया ले जाया करता था। उसका रंग-ढंग देख लोग उसे मजनू यानी बावला पुकारने लग गए। दैव-योग से एक बार गुरु नानक देव का यहां आना हुआ और अब्दुला की निष्ठा को देख वे यहां उसके पास कुछ दिन रुक गए। उनके यहां निवास के दौरान हर धर्म के लोग धर्म-चर्चा के लिए उनके पास आने लगे। इसी बीच अब्दुल्ला उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो गया। गुरु जी ने उसकी भक्ति देख उसे आशीर्वाद दिया की तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। वही हुआ उनकी कृपा अब्दुला पर देख लोग इस जगह को उसके प्रचलित नाम, मजनू के नाम से जानने लग गए।      

1783 में सिख सेना नायक बघेल सिंह ने जब दिल्ली फतह कर उसे कुछ दिन अपने कब्जे में रखा, उसी दौरान उन्होंने यहां एक गुरूद्वारे का निर्माण करवाया जो मजनू का टीला गुरुद्वारा कहलाया । जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने बाद में विस्तार दिया। यहीं छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी ने भी आकर निवास किया था। आज यह दिल्ली के पुराने सिख धर्मस्थलों में से एक है।
सबसे पहले सन 1900 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली के निर्माण में जुटे मजदूरों  यहां ला कर बसाया गया। फिर
आजादी मिलने के बाद अरुणा नगर के नाम से रिहायशी इलाका आबाद हुआ। धीर्रे-धीरे जगह-जगह से लोग यहां आकर बसते गए। फिर 1960 में भारत सरकार ने न्यू अरुणा नगर बस्ती बसा वहाँ तिब्बती शरणार्थियों को पनाह दी। धीरे-धीरे उनकी आबादी बढ़ती गयी और आज यह जगह छोटे तिब्बत के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। यहां का तिब्बती बाजार सदा ग्राहकों से भरा रहता है जो अपनी पसंद के शाल, जूते, घर सजाने का सामान, तिब्बती कलाकृतियां ढूंढते-ढूंढते यहां आ पहुंचते हैं। यहां एक बौद्ध मठ तथा मंदिर भी है। इसके अलावा खाने-पीने की अनेक दुकाने खुल चुकी हैं, जहां नार्थ कैम्पस के विद्यार्थी और यहां आने वाले ग्राहक उचित मूल्य पर अपनी भूख शांत कर सकते हैं।       

दिल्ली की बढ़ती आबादी ने यहां भी अपना असर, आस-पास फैली सैंकड़ों झुग्गी-झोपड़ियों के जमावडे के रूप में फैलाया है, और इन्ही तीनों रिहायशी जगहों से घिरा हुआ है यह ऐतिहासिक मजनू का टीला। जहां अंतर्राज्यीय बस अड्डे या कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन से आसानी से कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है।

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

एक होती है "ग्रे मनी यानी धूसर धन"

इसकी माया बड़ी विचित्र होती है। जनता की शुभ्र-धवल गाढ़ी कमाई को जब धीरे-धीरे इकट्ठा कर कोई अपने कब्जे में करता है तो उस धन की रंगत भी सफेद से धूसर हो जाती है। पर यह अपने स्वामी को उसकी तनख्वाह से ज्यादा प्रिय होता है, ठीक कढ़े हुए दूध की रबड़ी की तरह।

धन या पैसे इत्यादि का जब जिक्र होता है तो दो तरह की दौलत की बात होती है। सफेद धन और काला धन। सफेद-गोरा-चिट्टा धन वह होता है जिसे मेहनत की कमाई समझा जाता है। उसे आदमी बेखौफ प्रदर्शित करता है, काम में लाता है, जो सबको दिखाई पड़ता है। इसके स्वामी के सिवा इसके ज्यादा-कम होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है नाही किसी की भृकुटि टेढ़ी होती है ।
काला धन वह कहलाता है जिसे उसका मालिक धो-पौंछ कर अच्छी तरह "पैक" कर किसी सुरक्षित स्थान या इदेश-विदेश में संभाल  कर रख देता है, ज्यादातर यह किसी काम का नहीं होता, हाँ इसके साथ आईं आशंकाओं के कारण इसके मालिक का रक्त-चाप भले ही बढ़ा रहता हो पर उसका आत्म-बल और गुमान सातवें आसमान पर विचरण करता रहता है। वैसे यह तो एक जगह बंद पड़ा बिसूरता रहता है पर  इसका मालिकाना हक़ सदा चलायमान रहता है।              
इनके अलावा भी एक धन होता है, तीसरी तरह का धन। जो सफेद और काले का मिश्रण होता है इसे "धूसर धन या ग्रे मनी"  कहा जा सकता है। इसमें ऊपर उल्लेखित दोनों धनों के गुण मौजूद होते हैं।  इसे अपने देश में ही संजो कर पर छिपा कर रखा जाता है। इसकी माया बड़ी विचित्र होती है। जिस तरह सफेद दूध कढते-कढते अपनी रंगत खो कर कुछ गुलाबी-पीला सा हो जाता है पर उसके स्वाद में बढ़ोत्तरी हो जाती है, उसी तरह जनता की शुभ्र-धवल गाढ़ी कमाई को जब धीरे-धीरे इकट्ठा कर कोई अपने कब्जे में करता है तो उस धन की रंगत भी सफेद से धूसर हो जाती है। पर यह अपने स्वामी को उसकी तनख्वाह से ज्यादा प्रिय होता है, ठीक कढ़े हुए दूध की रबड़ी की तरह।  यह ज्यादातर सरकारी आबूओं-बाबूओं, इंजीनियरों, चपरासियों या रसूखदार लोगों के पास उनके घरों की दिवार-फर्श-बिस्तर इत्यादि में सहेजा रहता है। कई भक्त तो इसे ही असली लक्ष्मी मान अपने घर में बने देवस्थान में मूर्तियों के पीछे-नीचे छिपाने में भी गुरेज नहीं करते। पर ऐसा धन अपने मौसेरे भाई, काले धन की तरह किसी एक जगह समाधी लगा कर बैठा नहीं रह सकता। इसकी खुद को  उजागर करने की बुरी आदत है। इसकी यही "उजागरनेस" इसे इकट्ठा करने वाले को धर-दबोचवा देती है किसी न किसी "रेड" में।
इसकी मासूमियत ही इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसकी तादाद काले धन से कई गुना ज्यादा होने के बावजूद, लोग काले धन के पीछे ही हाथ धो कर पड़े रहते हैं, इसके नाम पर हाय-तौबा नहीं मचाते। जैसे आजकल फिल्मों में नायकों की इज्जत रखने के लिए उनके खलनायकी के रोल को नकारात्मक न कह कर "ग्रे शेड" वाला रोल कहते हैं वैसा ही कुछ चरित्र इस प्रकार के धन का भी होता है। यह इकठ्ठा होते समय तो बड़ा मजा देता है पर इसका मजा लेने पर पिटाई और बेइज्जत भी बहुत करवाता है।                

मंगलवार, 9 दिसंबर 2014

अमर्यादितता छिछलेपन को दर्शाती है

किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ?

कहावत है कि, यथा राजा तथा प्रजा।  पर समय बदल गया है और इसके साथ-साथ हर चीज में बदलाव आ गया है। कहावतें भी उलट गयी हैं। अब यथा प्रजा तथा राजा हो गया है। जैसे प्रजा में असहिष्णुता, असंयमिता, अमर्यादितता तथा विवेक-हीनता बढ़ रही है वैसे ही गुण लिए जनता से उठ कर सत्ता पर काबिज होने वाले नेता यानी आधुनिक राजा हो गए हैं। 
वर्षों से गुणीजन सीख देते आये हैं कि जुबान पर काबू रखना चाहिये। पर अब समय बदल  गया है। जबान की मिठास धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। खासकर राजनीति के पंक में लिथड़े अवसरवादी और महत्वाकांक्षी लोगों ने तुरंत ख़बरों में छाने और अपने दल की  अग्रिम पंक्ति में स्थापित होने के लिए यह रास्ता अख्तियार किया है। इसका फायदा यह है कि एक ही झटके में उस गुमनाम-अनजान अग्नि-मुख का नाम हरेक की जुबान पर आ जाता है, रातों-रात वह खबरों में छा अपनी पहचान बना लेता है। कुछ हाय-तौबा मचती है पर वह टिकाऊ नहीं होती। अगला हंसते-हंसते माफी-वाफी मांग दल की जरुरत बन जाता है। यह सोचने की बात है कि इस तरह की अनर्गल टिप्पणियों की निंदा या भर्त्सना होने के बावजूद लोग क्यों जोखिम मोल लेते हैं। समझ में तो यही आता है कि यह सब सोची समझी राजनीति के तहत ही खेला गया खेल होता है। इस खेल में ना कोई किसी का स्थाई दोस्त होता है नही दुश्मन। सिर्फ और सिर्फ अपने भले के लिए यह खेल खेला जाता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों में गहराई नहीं होती, अपने काम की पूरी समझ नहीं होती इन्हीं कमजोरियों को छुपाने के लिए ये अमर्यादित व्यवहार करते हैं।  इसका साक्ष्य तो सारा देश और जनता समय-समय पर देखती ही रही है।

कभी-कभी नक्कारखाने से तूती की आवाज उठती भी है कि क्या सियासतदारों की कोई मर्यादा नहीं होनी चाहिए, क्या देश की बागडोर संभालने वालों की लियाकत का कोई मापदंड नहीं होना चाहिए? जबकि किसी पद पर नियुक्ति के पहले, वर्षों का अनुभव होने के बावजूद, संस्थाएं नए कर्मचारी को कुछ दिनों का प्रशिक्षण देती हैं। नई नियुक्ति के पहले नौकरी पाने वाले को प्रशिक्षण-काल पूरा करना होता है। शिक्षक चाहे जब से पढ़ा रहा हो उसे भी एक ख़ास कोर्स करने के बाद ही पूर्ण माना जाता है। अपवाद को छोड़ दें तो किसी भी संस्था में ज्यादातर लोग निचले स्तर से शुरू कर ही उसके उच्चतम पद पर पहुंचते हैं। तो फिर राजनीति में ही क्यों अधकचरे, अप्रशिक्षित, अनुभवहीन लोगों को थाली में परोस कर मौके दे दिए जाते हैं ? कम से कम उन्हें संयम की, मर्यादा की, नैतिकता की, मृदु भाषिता की सीख तो दी ही जा सकती है।

यह जग जाहिर है कि किसी के कटु वचनों पर उनके पाले हुए लोग तो ताली बजा सकते हैं पर आम जनता को ऐसे शब्द और उनको उवाचने वाला नागवार ही गुजरता है। बड़े और अनुभवी नेताओं को ऐसे लोगों की अौकात पता भी होती है, पर चाह कर भी वे ऐसे लोगों को रोक नहीं पाते क्योंकि किसी न किसी  स्वार्थ के तहत इन लोगों को झेलना उनकी मजबूरी बन जाती है और यही बात ऐसे लोगों की जमात बढ़ते जाने का कारण बनती जा रही है।      



रविवार, 7 दिसंबर 2014

सीख तो किसी से भी ली जा सकती है

इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" परिवार द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते !


पचीसों साल बंगाल में रहने और अदम्य इच्छा के बावजूद कभी देश के नक़्शे में और ऊपर स्थित सप्त बहानियों के यहां जाना संभव नहीं हो पाया, फिर शस्य-श्यामला धरती छूटने के बाद तो वहाँ जाना और भी मुश्किल हो गया था। पर इस बार आगामी जनवरी माह में "परिकल्पना" द्वारा चौथे अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन का आयोजन  हमारे छोटे मगर प्यारे पड़ोसी देश भूटान में होने की वजह से मेरा एक स्वप्न जैसे साकार होने जा रहा है। है तो यह बेहद छोटा सा देश पर इसने अपने सुदृढ़ भविष्य के लिए जो किया है शायद वैसा करने की हम हिम्मत भी नहीं कर सकते। क्योंकि हम ज्यादातर भूत काल  में जीते हैं, अपने गौरवमय अतीत की दुहाई देते हैं, बातें ज्यादा करना हमारा शगल है, पर जब काम करने की बारी आती है तो हम दूसरों का मुंह जोहने लगते हैं। यहां तक कि यदि कोई कुछ अच्छा करना भी चाहता है तो उसकी टांग खींचने से बाज नहीं आते। यही कारण है कि सदियों से जगद्गुरु  होने का दावा करने वाला हमारा  देश आज कहां आ खडा हुआ है ?  चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, चोर-बाजारी का आलम है । कारण शीशे की तरह साफ है। साफ सुथरी छवि वाले, पढ़े-लिखे, ईमानदार, देश-प्रेम का जज्बा दिल में रखने वालों के लिए सत्ता तक पहुँचना एक सपना बन गया है। धनबली और बाहुबलियों के सामने सत्ता तक पहुँचना साधारण नागरिक के लिए  दुरूह कार्य हो गया है।

वहीं शायद हमारी राजनीति और लाल फीताशाही का दुष्प्रभाव देख भूटान ने  निचले स्तर से ही योग्य लोगों को अवसर देने के लिए कमर कस ली है। जिसके चलते  उसने अपने स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए भी कुछ मापदंड तय कर दिए हैं। उसके लिए पढ़े-लिखे योग्य व्यक्तियों को ही मौका देने के लिए पहली बार लिखित और मौखिक परीक्षाओं का आयोजन किया गया है। इसमें प्रतियोगियों की पढ़ने-लिखने की क्षमता, प्रबंधन के गुण, राजकाज करने का कौशल तथा कठिन समय में फैसला लेने की योग्यता को परखा जाएगा। इस छोटे से देश ने अच्छे तथा समर्थ लोगों को सामने लाने का जो कदम उठाया है, क्या हम उससे कोई सीख लेने की हिम्मत कर सकते हैं ?

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

बहुत टेंशन है

पति बोला,  देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नी भी कहां कम थी बोली, मैं भी गला फाड़ कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर बैठा था, गया मैं भी नहीं।

सब जानते हैं  कि तनाव सेहत के लिए ठीक नहीं होता पर आज की जीवन शैली ने परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बना दी हैं कि  हर दूसरा व्यक्ति इससे ग्रस्त  मिलता है। अपवाद भी हैं जैसे, कुछ लोग अपने-आप को व्यस्त दिखाने के लिए ऐसा दिखने की कोशिश करते हैं, तो कुछ ऐसा दिखावा करना अपना बड़पन्न समझते हैं तो कुछ महानुभाव एवंई बिना बात के ही, "काजी जी परेशान क्यों ? शहर के अंदेशे से" की तर्ज पर टेंशनाए घूमते रहते हैं। इनकी बात छोड़ें तो कोई भी इंसान तनाव को जान-बूझ कर मोल नहीं लेता यह बला तो खुद ब खुद गले आ पड़ती है। 
यह कहना बहुत आसान है कि अरे भाई टेंशन मत लो, पर कहने और होने में बहुत फर्क होता है। सभी जानते हैं , पर कोई क्या इसे जान-बूझ कर पालता है ? फिर भी कोशिश तो की जा सकती है इसे कम करने के लिये। मेरे एक डाक्टर मित्र ने मुझे तनाव मुक्त होने के पांच गुर बताये हैं। फायदा ज्यादा नुक्सान कुछ नहीं। बिना टेंशन के आप इन्हें आजमा सकते हैं। 

1 :- तनाव में सांस की प्रक्रिया आधी रह जाती है। इसलिये दिमाग में आक्सीजन की कमी को दूर करने के लिये गहरी सांस लें।

2 :- तनाव के क्षणों में चेहरा सामान्य बनाए रखें। क्योंकि स्नायुतंत्रं की जकड़न से शरीर पर बुरा असर पड़ता है। थोड़ा मुस्कुराने की चेष्टा करें। ऐसा करने से मष्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है।   भृकुटि तनने से 72 मांसपेशियों को काम करना पड़ता है। मुस्कुराने में सिर्फ 14 को। इसलिये ना चाहते हुए भी मुस्कुरायें। 

3 :- सर्वे में देखा गया है कि तनाव में शरीर खिंच जाता है, भृकुटि तन जाती है, गाल पर रेखायें खिंच जाती हैं। तनाव ग्रस्त इंसान कंधे झुका, सीने-गर्दन को अकड़ा, माथे पर हाथ रख, गुमसुम हो जाता है। इससे रक्त संचरण कम हो जाता है तथा तनाव और बढ़ जाता है। इससे बचने के लिये, करवट बदलिये, बैठने का ढ़ंग बदलिये। खड़े हैं तो बैठ जायें, बैठे हैं तो खड़े हो जायें या लेट जायें। कमर सीधी रखें। पेट को ढ़ीला छोड़ दें, आराम से सांस लें। इतने से ही राहत का एहसास होने लगेगा।

4 :- तनाव में अनजाने में ही जबड़े, गर्दन, कंधे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे शरीर में जकड़न आ जाती है। हर मनुष्य की यह जकड़न, गठान अलग-अलग होती है। इसे सामान्य रखने की कोशिश करनी चाहिये।

5 :- तनाव के क्षणों में कोई भी काम करने से पहले थोड़ा रुकें। क्या हो रहा है, इस पर थोड़ा सोचें। जल्दि या हड़बड़ी में निर्णय लेने से तनाव बढ़ सकता है। सबसे बड़ी बात, सकारात्मक सोच ही तनाव से मुक्ति दिलाने के लिये काफी है।

यह तो रही डाक्टर की सलाह। लगे हाथ मेरी भी सुन लें। आजमाया हुआ नुस्खा है। अपना बड़पन्न  भूल कर
कार्टून देखें, समय हो तो कोई हास्य फिल्म, पूरी ना सही उसका कुछ ही हिस्सा देख लें। नहीं तो यह चुटकुला तो है ही, जो  पंजाबी में लयबद्ध रूप में है, हिंदी में पढ़वाता हूं।  पूराना है पर असरकारक है :-

बंता के घर रात को अनचाहा मेहमान आ गया। पति-पत्नी ने उसे भगाने की एक तरकीब निकाली। मेहमान को बाहर बैठा दोनों अंदर कमरे में जा जोर-जोर से लड़ने लगे। फिर पत्नी  के पिटने और उसके जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। इसे सुन मेहमान उठ कर घर के बाहर चला गया। बंता ने झांक कर देखा तो मेहमान नदारद था। उसने पत्नी से कहा, देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नी भी कहां कम थी बोली, मैं भी तो गला फाड़-फाड़  कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर जा बैठा था, गया मैं भी नहीं।
(पति - देक्खी मेरी चतुराई, डांग नाल  कित्ती मंजी दी कुटाई, तैन्नू छूया बी नईं। 
पत्नी - मैं बी तां  संग फाड़  चिल्लाई,  रोई मैं बी नईं।   
तभी मेहमान कमरे में आ बोला -  मैं बार जा खलोत्ता, गया मैं बी नईं।)
डांग = डंडा,  नाल = साथ,  मंजी = खटिया, संग = गला, खलोत्ता = खड़ा      

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

बाबाओं से कब बाज आएंगे हम

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, तकरीबन साल भर पहले की ही बात है जब एक बाबा के कारण देश में हंगामा मचा हुआ था। तब भी लोगों को ऐसे तथाकथित संतों से बचने की समझाइश, सोच समझ कर किसी पर विश्वास करने की नसीहत दी गयी थी। पर हुआ कुछ नहीं पहले की तरह ही लोग फिर अपनी नित की परेशानियों, समस्याओं, कष्टों को फौरी तौर से  दूर करने की चाहत के चलते तिकड़मबाजों के चंगुल में फसते चले गए। 

आज फिर एक तथाकथित बाबा को ले कर कोहराम मचा हुआ है। प्रिंट और दृश् मीडिया होड ले रहे हैं उसकी बखिया उधेडने की। पर इसके पहले ढेरों विवादों, दसियों आरोपों के बावजूद उस पर किसी ने ऊंगली उठाने की जहमत या हिम्मत नहीं दिखाई ? कारण साफ है, उस आदमी का रसूख और असीमित जन-सहयोग, जो बाबा के एक इशारे से वोट बैंक बन जाता है, उसे हासिल होती है उच्च पदों पर बैठे हुओं की सरपरस्ती। तो कौन बेवकूफी करेगा बाबा रूपी छत्ते को छेड़ कर मधुमक्खियों के खौफ का सामना करने का। तिकड़मी, मौका-परस्त, बिना जनाधार के धन और बाहुबल से मुखिया बने लोगों की अपनी कुर्सी और सत्ता बचाने की लालसा जन्म देती है ऐसे ही लोलुप लोगों को जो अपनी रोटी सेकने के लिए कुछ भी करने और किसी हद तक जाने को तत्पर रहते हैं और आम इंसान वर्तमान की जद्दोजहद से त्रस्त हो सुखद भविष्य की चाह में इनके मकड़जाल में फसता चला जाता है। 

हमारे देश में परम्परा रही है, मठों, गद्दियों, मढियों की। वर्षों से ऐसे स्थानों से गरीबों, अशिक्षित लोगों, गांववालों के लिए शिक्षा, चिकित्सा तथा कुछ हद तक भोजन की भी व्यवस्था होती रहती थी धार्मिक कर्मकांडों के साथ-साथ। बहुत से सच्चे संतों ने निस्वार्थ भाव से अपना जीवन लोगों की हालत सुधारने में खपा दिया था। पर धीरे-धीरे गांववालों के भोलेपन का फायदा उठा ऐसी बहुतेरी जगहों पर अपना उल्लू सीधा करने वालों ने अपने पैर जमाने शुरु कर दिए। युवा पीढी के कुछ भटके नवजवान भी सहज ढंग से मिलने वाली सहूलियतों के लालच में ऐसे ढोगियों का साथ देने लगे। धीरे-धीरे पुरानी परम्राएं ध्वस्त होती गयीं और ऐसी जगहें असमाजिक तत्वों की गिरफ्त में आ बुराइयों का अड्डा बनती चली गयीं।

इसी संदर्भ में वर्षों पहले की एक सच्ची बात याद आ रही है। तब के कलकत्ता में मेरे कॉलेज में एक लड़का हुआ करता था जो शनैः - शनैः  नेता बनने के पथ पर अग्रसर था। पढ़ाई को छोड़ उसका दिमाग हर चीज में तेज था। उसने कॉलेज में यह फैला दिया था कि उसकी पहुँच विश्वविद्यालय में रसूख वाले लोगों तक है और वह वहाँ कोई भी काम करवा सकता है। काम होने पर ही पैसे लगेंगे न होने की सूरत में सब वापस हो जाएगा।  धीरे-धीरे उसके पास गांठ के पूरे दिमाग के अधूरे छात्रों का जमावड़ा लगने लगा जो किसी भी तरह पास हो डिग्री पाना चाहते थे। परीक्षा ख़त्म होते ही ये उनसे अच्छी-खासी रकम ले अपने घर जा बैठ जाता था। अब सौ-पचास छात्रों में बीस-तीस तो अपने बूते पर किसी तरह पास हो ही जाते थे।  ये उनके पैसे रख बाकियों के लौटा देता था। इस तरह इसने अच्छा-खासा व्यापार शुरू कर रखा था, जिसमें न हरड़ लगती थी नाहीं फिटकरी। पर जैसा कि होता है किसी तरह इसकी पोल खुल गयी, हुआ तो कुछ नहीं पर धंदा बंद हो गया।

ठीक यही कार्य-शैली इन तथाकथित बाबाओं की है। सीधे-साधे लोगों के अंधविश्वास, अकर्मण्यता, मानसिक कमजोरियों, भविष्य के डर, धर्मांधता का पूरा फ़ायदा उठा ये ढोंगी अपना वर्तमान और भविष्य संवारते चले जाते हैं।  बार-बार धोखेबाजों, अवसर परस्तों, ढोगियों द्वारा भोली-भाली जनता को ठगे जाने, उनकी भावनाओं का फायदा उठाने वालों की असलियत सामने आने पर भी ऐसे लोगों की जमात की बढोतरी चिंता का ही विषय है। कब हम समझ पाएंगे कि खुद को भगवान कहलवाने वाले की क्या मानसिकता है, क्या वह इस लायक भी है कि वह इंसान कहलवा सके ? कब हम इस तरह के स्वघोषित "भगवानों" की असलियत जानने की जहमत उठाएंगे, भगवान ही जाने।

शनिवार, 15 नवंबर 2014

बैंक लोन के साथ तनाव मुफ्त

पिछले शनिवार, 15 नवंबर को दैनिक भास्कर पत्र के "असंभव के विरुद्ध" कालम में श्री कल्पेश याग्निक जी का बैंक लोन पर लेख पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी ने दुखती राग पर हाथ रख दिया हो। वे दिन याद आ गए जब बैंकों के लुभावने इश्तहार देख कर 2006 में छोटे बेटे की शिक्षा के लिए बैंक से लोन लेने की हिमाकत की थी। तब यह भी हकीकत सामने आई कि यह बैंक बने किनके लिए हैं। 

"किसी तरह" हफ़्तों की दौड़-धूप के बाद ऋण प्राप्त हो गया। उस समय बैंक के अधिकारी महोदय ने लोन पर लगने वाले ब्याज के दो रूप बताए, पहला जो सदा एक सा रहता है।  दूसरा जो आर्थिक नीतियों के साथ घटता-बढ़ता रहता है। उन्होंने ही पहले वाले रूप को अख्तियार करने की सलाह भी दी। बात हो गयी। ऋण मिल गया। किश्तों का भुगतान भी संख्या को 'पूर्ण' करने के लिए  निर्धारित रकम से 25-50 रुपये ज्यादा ही दिए जाते रहे। छ: - सात साल निकल गए, कभी भी किस्त चुकाने में कोई गफलत नहीं हुई पर अचानक 2013 में बैंक के वकील की तरफ से एक नोटिस मिला कि आपकी तरफ 250000/- की रकम पेंडिग है, जिसे तुरंत न चुकाने पर आप पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। साथ ही चल-अचल संपत्ति की नीलामी की धमकी भी दी गयी थी। यहां तक कि बिना पूरी जांच  किए  इस मनगढ़ंत कार्यवाही के खर्च के रूप में 2600/- के भुगतान को भी मेरे सर डाल दिया गया था। जबकि अभी भी लोन की बाक़ी रकम को लौटाने में करीब चार साल बचे हुए थे। इस नोटिस की एक प्रति लोन लेते समय मेरी 'ग्रांटर' बनी मेरी बहन को भी भेज दी गयी, जिससे उनका तनाव ग्रस्त होना स्वाभाविक था। पूरा परिवार पेशोपेश में पड़ गया था। कानूनी पत्र का उत्तर भी कानूनी टूर से दिया जाना ठीक समझ अपने वकील द्वारा सारी बात बता कैफियत माँगने पर बैंक के तथाकथित जिम्मेदार अफसरों ने बताया कि मेरे ऋण पर ब्याज दर तीन प्रतिशत बढ़ा दी गयी है। उसी के कारण मुझे नोटिस भेजा गया है। मेरे द्वारा पूछने पर कि इस बढ़ोत्तरी के बारे में मुझे सूचित क्यों नहीं किया गया, तो बैंक में किसी के पास इसका जवाब नहीं था। एक बार मन तो हुआ कि मान-हानि का दावा कर दिया जाए, पर फिर मध्यम वर्ग की मजबूरी और मानसिकता, जिसका फायदा अक्सर उठाया जाता रहा है, के चलते मामला ख़त्म कर दिया गया। 

मन में आक्रोश तो बना ही रहता है, कल्पेश जी के लेख ने उसे फिर ताजा कर दिया। 

गगन शर्मा 
gagansharma09@gmail.com                                                

बुधवार, 5 नवंबर 2014

लंबा इतिहास है खूनी दरवाजे का

इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया।

दरवाजे की इमारत 
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला के पास बहादुरशाह जफ़र मार्ग के "डिवाइडर" पर एक दरवाजेनुमा इमारत खडी है। पर यह उन 14 दरवाजों में से नहीं है जिन्हें शाहजहाँ ने शाहजहांनाबाद (पुरानी दिल्ली) को दीवाल से घेरने के बाद उसमें बनवाए थे। इसका निर्माण तो वर्षों पहले 1540 में शेरशाह सूरी ने अपने राज्य के अंतर्गत आने वाले फीरोजाबाद के प्रवेश द्वार के रूप में करवाया था।  उस समय अफगानिस्तान से आने वाले व्यापारियों इत्यादि को इसी में से होकर गुजरना पड़ता था।  करीब 51 फ़ीट ऊंचे दरवाजे की तीन मंजिलें हैं जो अंदर बनी सीढ़ियों से जुडी हुई हैं। किसी अलग मकसद से बनाए
गए इस दरवाजे को और इसके बनाने वालों को भी कहाँ अंदाज था कि भविष्य में यह इमारत अभिशप्त कहलाने लग जाएगी।  

सीलबंद प्रवेश 

# इसकी बदकिस्मती तब शुरू हुई जब जहाँगीर ने अपने वालिद अकबर के नवरत्नों में से एक, अब्दुल रहीम खानखाना को अपने खिलाफ बगावत करने के दंड स्वरूप उसके  बेटों को  मरवा कर उनके शरीर को सड़ने के लिये यहां लटकवा दिया था। उसके बाद जो एक के बाद एक नृशंस घटनाएं यहां घटनी शुरू हुईं उनका अंत आज तक नहीं हो पाया है।   

# फिर नादिरशाह ने जब दिल्ली को लूटा और कत्ले-आम का हुक्म दिया तो सबसे ज्यादा रक्तपात भी इसी जगह हुआ था।

# समय के साथ जब औरंगजेब दिल्ली का शासक बना तो निरंकुश राज्य करने के लिए उसने अपने भाई दारा शिकोह को मार कर उसका सर भी यहीं टंगवा दिया था। 

# इतिहास अपने को दोहराता रहा। 22 सितम्बर 1857 को बहादुरशाह जफर के आत्मसमर्पण के बावजूद अंग्रेज कमांडर विलियम हडसन ने बहादुरशाह के तीन शहजादों, मिर्जा मुगल, मिर्जा खिज्र सुल्तान  और पोते मिर्जा अबू बकर को हुमायूँ के मकबरे से गिरफ्तार  करने के बाद अपने खिलाफ जनता के विरोध को देखते हुए हड़बड़ी में इसी जगह की सुनसानियत का फ़ायदा उठा उन्हें यहीं लाकर  उनका क़त्ल कर दिया  था।      

रख-रखाव का अभाव 
# इतने खून-खराबे के बाद भी इसकी बदनामी का अंत नहीं हुआ। देश को आजादी मिलने के पश्चात 1947 में हुए दंगों में भी इस दरवाजे पर काफी रक्तपात हुआ था। शरणार्थी शिवरों की ओर जाते अनेक लोगों को यहां  पर मौत के घाट उतार दिया गया था।


# इसे इसकी बदकिस्मती ही कहेंगे कि देश की राजधानी में स्थित होने के बावजूद 2002 में  फिर इस जगह को नापाक साबित करते हुए कुछ दरिंदों ने एक युवती के साथ यहां शर्मनाक कृत्य को अंजाम दिया।  उसी के बाद इस स्थान को पूरी तरह सील कर प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर  दिया गया है।   

बदहाल स्थिति 
इतनी रक्तरंजित घटनाओं का गवाह बनने का यह नतीजा निकला कि अवाम ने  इस जगह को अभिशप्त और मनहूस मान लिया और इसे "खूनी दरवाजे" का नाम अता कर दिया गया। इसे क्या कहेंगे कि जिस बहादुरशाह जफ़र के नाम पर इस मार्ग का नामकरण हुआ है उसी के शहजादों को इसी सड़क पर  क़त्ल कर दिया गया था।

आज यह दरवाजा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक है। पर उस रख-रखाव का पूर्णतया अभाव है जो की ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को मिलना चाहिए। 

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

हनुमान जी की स्वचालित प्रतिमा, नयी दिल्ली

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी चीज को हम अक्सर देखते हैं फिर भी उसके बारे में पूरी जानकारी नहीं रखते। ऐसी ही एक जानकारी जब करोल बाग मेट्रो स्टेशन के पास बनी हनुमान जी की विशाल प्रतिमा के बारे में पता लगी तो विस्मित होना स्वाभाविक ही था। इतनी बार इधर से गुजरना होता रहा पर यह नहीं पता था कि इस प्रतिमा में स्वचालन से भी कुछ होता है। दिल्ली में रहने वाले और रोज उधर से गुजरने वाले अधिकाँश लोगों को भी यह बात पता नहीं है।

कुछ दिनों पहले अपनी पोस्ट "भूली भटियारी"  की खोज-खबर के सिलसिले में जब करोल बाग में यहां आना हुआ तब पता चला कि हनुमान जी की 108 फुट की यह दुनिया की सबसे बड़ी स्वचालित प्रतिमा है। हनुमान जी की छाती में उनके हाथों के पीछे श्री राम-सीता विराजमान हैं।  मूर्ती के हाथ की उँगलियां स्वचालित हैं। जब वे हटती हैं तो ऐसा लगता है जैसे हनुमान जी ने अपनी छाती फाड़ कर श्री राम-सीता को प्रगट किया हो।

http://www.youtube.com/watch?v=_LO7uOVSuxE 
लिंक पर प्रतिमा का स्वचालन देखा जा सकता है। 

बताया जाता है कि अरसा पहले एक संत नागबाबा सेवागिरी जी महाराज घूमते-घूमते यहां आ पहुंचे। तब यहां शिवजी की धूनी और हनुमान जी की छोटी-छोटी मूर्तियां विद्यमान थीं।  प्रभुएच्छा से बाबा जी का मन यहां रम गया और वे यहीं अपनी तपस्या में लीन हो गए। वर्षों की आराधना के फलस्वरूप हनुमान जी ने उन्हें दर्शन दिए और वहां एक मंदिर के निर्माण का निर्देश दिया।  प्रभू के आदेशानुसार हनुमान जी की प्रतिमा और मंदिर का निर्माण 13.05.1994 से आरम्भ हुआ जो लगातार 13 वर्षों तक चलते हुए  02 अप्रैल, 2007 को सम्पन्न हुआ। हनुमान जी की प्रतिमा को नई तकनीक से बनाते हुए उसे स्वचालित रूप दिया गया है। इसमें हनुमान जी अपनी छाती फाड़ते हैं और भक्तों को  भगवान श्री राम व  सीताजी के दर्शन  होते हैं। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए अपार जन समूह के उमड़ने से होने वाली दिक्कतों को देखते हुए मंदिर के ट्रस्ट ने इस स्वचालन की क्रिया को केवल मंगलवार व शनिवार को प्रातः 8.15 बजे और सांय 8.15 बजे के लिए निर्धारित कर दिया है।

बाबाजी ने ज्वालाजी, हिमाचल प्रदेश, से  माँ की ज्योति 30 मार्च, 2006 को यहां लाकर स्थापित की जो तबसे  निरन्तर प्रज्जवलित है।  समय के साथ-साथ मंदिर का विस्तार होता चला गया और अब शिव जी की धूनी के अलावा माँ वैष्णव देवी, शनि देव के साथ ही शिरडी के सांई बाबा के दर्शन भी यहां भक्तों को  उपलब्ध हैं।                
अपने संकल्पानुसार सेवागिरी महाराज मंदिर निर्माण कार्य पूरा होते ही 25 जनवरी, 2008 को अपना शरीर त्याग कर प्रभू की शरण में चले गये।  मंदिर में उसी स्थान पर उनकी समाधि बना दी गयी जहां अब हर वर्ष 25 जनवरी के दिन उनकी याद में भण्डारा कराया जाता है।

तो यदि अभी तक सिर्फ मेट्रो रेल के अंदर से या सड़क मार्ग से गुजरते हुए ही इनके दर्शन किए हों तो अब ज़रा रुक कर इसकी भव्यता को निहारें और कोशिश करें की समयानुसार मंगल या शनिवार को सुबह या शाम 8. 15 पर वहाँ पहुँच प्रतिमा का स्वचालन देख सकें। 

शनिवार, 1 नवंबर 2014

दिल्ली की अभिशप्त "भूली भटियारी"

ऐसी जगहों के बारे में जैसा कि अक्सर होता है इस जगह के बारे में भी लोगों के जेहन में तरह-तरह की बातें और धारणाएं घर कर चुकी हैं और यह उजाड़ और सुनसान इलाका अभिशप्त माना जाने लगा है। 

दिल्ली स्मारकों का शहर है। करीब 1300 ऐतिहासिक जगहें यहां अभी भी अस्तित्व में हैं। पर इनमें से कुछ ही ऐसी हैं जिनका ढंग से रख-रखाव हो पा रहा है, बाकी तो धीरे-धीरे खंडहरों में तब्दील होती जा रही हैं। ऐसी ही एक इमारत है "भूली भटियारी का महल", जो कहने को ही महल है नहीं तो एक दीवाल और उसमें बनी कुछ  कोठरियों के सिवा वहाँ कुछ नहीं बचा है। 

करोल बाग स्थित हनुमान जी की विशाल प्रतिमा 
14 वीं शताब्दी में दिल्ली के तत्कालीन शासक फिरोज शाह तुगलक द्वारा इस शिकारगाह का निर्माण करवाया गया था। जो शिकार वगैरह के न होने के समय सराय के रूप में भी इस्तेमाल की जाती रही थी। इसके नामकरण की भी अलग-अलग कहानियां हैं। इतिहासकार इसकी रखवालन  बु-अली-भट्टी के नाम पर इसका नामकरण मानते हैं तो कुछ भटियारा परिवार की महिला जो जंगल में गुम हो गयी थी, के नाम पर इसकी पहचान को मानते हैं, तो कुछ इसकी देख-रेख करने वाली भूरी के नाम पर इसका नाम रखे जाने को अहमियत देते हैं। 

करोल बाग़ मेट्रो स्टेशन के पास हनुमान जी की विशाल प्रतिमा के बगल से एक रास्ता दिल्ली की 'हरी पट्टी' की ओर जाता है उसी पर लगभग 100 मी. की दूरी पर सड़क के दाहिने तरफ, पेड़ों के झुण्ड के पीछे इसके खंडहर खड़े हैं। सड़क की दाहिनी तरफ नौ-दस सीढ़ियां चढ़ इसका मुख्य द्वार पड़ता है जिससे अंदर जाते ही आठ-दस कदमों की घुमावदार जगह के बाद एक और वैसा ही दरवाजा अंदर बड़े से अहाते में पहुंचा देता है जिसकी आयताकार दीवाल में तीन छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई हैं। इस
भूली भटियारी 
अहाते के दक्षिणी  भाग में फिर पांच-छह 
सीढ़ियां चढ़ कर इसके ऊपरी भाग में जाया जा सकता है जहां एक दरवाजे और दीवाल की ओट में एक ऐसा निर्माण है जो  में शायद शौच के काम आता होगा।  सारा इलाका घनी घास और झाड़-झंखाड़ से अटा पड़ा है। लगता है जैसे वर्षों से सुध न ली गयी हो। यहां सबसे विचित्र बात यहां के पेड़ों की टहनियों की बनावट है जो किसी अजगर की तरह बल खाती टेढ़ी-मेढ़ी हुई पड़ी हैं। ऐसी जगहों के बारे में जैसा कि अक्सर होता है इस जगह के बारे में भी लोगों के जेहन में तरह-तरह की बातें और धारणाएं घर कर चुकी हैं और यह उजाड़ और सुनसान इलाका अभिशप्त माना जाने लगा है। संध्या समय में अन्धेरा गहराने के पहले इस तक आने वाली सड़क को पुलिस द्वारा बंद कर दिया जाता है। सुरक्षा के लिहाज से और असामाजिक तत्वों की कारगुजारी को रोकने के लिए भी यह जरूरी है। 


जीर्णोद्धार की सूचना देता बोर्ड 

प्रथम द्वार 
द्वितीय द्वार 
अहाता 
पूरा परिसर ऐसे ही भरा पड़ा है 
शौच स्थान 
दीवाल में बनी कोठरियां 
8 x 8 की कोठरी 
डाली है या एनाकोंडा 
इस सुनसान इलाके की इस सड़क से एक्का-दुक्का ही कोई गाड़ी निकलती है। इसके अलावा न आदम न आदमजात। इमारत में भी कोई दरबान वगैरह नहीं है। पर हम जैसे ही यहां पहुंचे यह कुत्ता पता नहीं कहाँ से नमूदार हुआ और अंदर-बाहर तब तक मूक रूप से साथ लगा रहा जब तक हम यहां से विदा नहीं हो गए।    
गाइड 
हालांकि यहां दिल्ली पर्यटन विभाग का एक बोर्ड इसकी मरम्मत की सूचना देता लगा है पर खुद उस बोर्ड की हालत भी इमारत जैसी जीर्ण-शीर्ण हो चुकी है और देखने से ही लगता कि उसे खुद मरम्मत की जरुरत है।समय की मार को झेलती यह उपेक्षित और लावारिस ऐतिहासिक धरोहर कितने दिन संघर्ष कर पाएगी यह कहना मुश्किल है।         

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

यहां आदमी और शेर आमने-सामने हैं

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जो करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।

संसार में सुंदरवन अकेली जगह है, जहां शेर लगातार आदमी का शिकार करते रहतें हैं। हर साल करीब 50 से 60 लोग यहां शेरों के मुंह का निवाला बन जाते हैं। वहां के लोग किन परस्थितियों में जी रहे हैं इसका रत्ती भर अंदाज भी बाहर की दुनिया को नही है। यहां आकर तो लगता है कि जानवर ही नहीं आदमी को भी बचाने, संरक्षण देने की जरूरत है।
             
सुंदरवन करीब 500 शेरों (बाघों) का आश्रय स्थल है। एक ही स्थान पर शायद ही इतने शेर कहीं और पाए जाते हों। पर यहां इंसान भी बसते हैं,  जो मजबूर हैं, यहां रहने के लिए, दहशत भरी जिंदगी जीने के लिए।  रोजी-रोटी, परिवार को पालने की जिम्मेदारी जो है सर पर। समुद्र के पास होने के कारण यहां ज्वार-भाटा काफी भयंकर रूप से उठता है जिससे शेरों को अपना शिकार खोजने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। दूसरी तरफ यहां रहने वाले लोगों का जीवनयापन नदी से प्राप्त होने वाली मछलियों और जंगल की वनोत्पजों पर निर्भर करता है। इसीलिए जंगलों से आना-जाना उनकी मजबूरी है जिसका  फ़ायदा यहां के वनराज को मिलता है। वैसे भी जंगली जानवरों के शिकार की बनिस्पत मानव को अपना भोजन बनाना बहुत आसान है, इसीलिए यहां के शेर आसानी से मनुष्य भक्षी बन जाते हैं। पानी के पास रहते-रहते ये अच्छे तैराक भी हो गए हैं। जिससे ये इतने निडर हो गए हैं कि मौका पाते ही नाव में सवार मछुआरों पर भी हमला करने से नहीं झिझकते।

सरकार ने और यहां के रहवासियों ने अपने-अपने स्तर पर इस आपदा से बचने के लिए कुछ इंतजाम किए भी हैं, जिससे हमले से मरने वालों की संख्या में कमी भी आई है। शेर हरदम मनुष्य पर पीछे से हमला करता है, खासकर रीढ़ की हड्डी पर।  इसीलिए सरकारी कर्मचारी कमर से लेकर गरदन तक का एक मोटा पैड सा पहने रहते हैं जिससे काफी हद तक हमले की गंभीरता कम हो जाती है। यहां के लोग जंगल में या नौका में आते-जाते समय अपने चहरे के पीछे, गरदन के ऊपर एक मुखौटा लगा कर चलते हैं। जिससे शेर को लगे कि सामने वाला मुझे देख रहा है, पर वह ज्यादा देर
धोखे में नहीं रहता और हमला कर देता है। इसके अलावा यहां के निवासी पूजा-पाठ में भी बहुत विश्वास करते हैं इसीलिए अपने रोजगार पर निकलने के पहले वनदेवी जिसे स्थानीय भाषा में "बोनदेवी" कहते हैं (बंगला भाषा में 'वन' का उच्चारण 'बोन' होता है ) की पूजा-अर्चना कर निकलते हैं। पर कहीं न कहीं, कभी न कभी भिड़ंत हो ही जाती है। दोनों की मजबूरी है, कोई भी पक्ष अपनी रिहाइश छोड़ और कहीं जा नहीं सकता। शेरोन पर तो यह एक तरह से दोहरी मार है।  इनकी प्रजाति पर पहले से ही "पोचरों"  से   खतरा बना  हुआ था,  उस पर अब  एक और गंभीर समस्या

बढ़ती जा रही है। धीरे-धीरे यहां के मनुष्यों और शेरों में एक अघोषित युद्ध शुरू हो चुका है। जैसे ही कोई मानव शेर का शिकार करता है वैसे ही शेर से बदला लेने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। यह बात दोनों ही पक्षों के लिए घातक हैं। इस आपसी भिड़ंत को ख़त्म या कम करने के लिए अभी तक आजमाए गए उपायों का बहुत ही कम असर हुआ है।  फिर भी कुछ न कुछ उपाय किए ही जा रहे हैं जैसे घने जंगल में तार का घेराव या फिर शेरों को उनके भोजन के लिए जानवरों की उपलब्धता इत्यादि। पर पूर्णतया कारगर कोई उपाय अभी सामने नहीं आ पाया है। तब तक अभिशप्त हैं दोनों प्राणी एक दूसरे के दुश्मन बने रहने के लिए।  

शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

आतिश का मायाजाल

एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो। 

दीपावली का शुभ दिन पड़ता है अमावस्या की घोर काली रात को।  शुरू होती है अंधेरे और उजाले की जंग। अच्छाई की बुराई पर जीत की जद्दो-जहद।  निराशा को दूर कर आशा की लौ जलाने रखने की पुरजोर कोशिश। इसमें अपनी छोटी सी जिंदगी को दांव पर लगा अपने महाबली शत्रु से जूझती हैं सूर्यदेव की अनुपस्थिति में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली रश्मियाँ। अंधकार कितना भी गहरा हो ये छोटे-छोटे रोशनी के सिपाही अपनी सीमित शक्तियों के बावजूद एक मायाजाल रच, विभिन्न रूप धर, चाहे कुछ क्षणों के लिए ही सही अंधकार को मात देने के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देते हैं। ताकि समस्त जगत को खुशी और आनंद मिल सके।

ऐसा होता भी है, इसकी परख निश्छल मन वाले बच्चों के चहरे पर फैली मुस्कान और हंसी को देख कर अपने-आप हो जाती है।  एक बार अपने तनाव, अपनी चिंताओं, अपनी व्यवस्तताओं को दर-किनार कर यदि कोई अपने बचपन को याद कर, उसमें खो कर देखे तो उसे भी इस दैवीय एहसास का अनुभव जरूर होगा। यही है इस पर्व की विशेषता, इसके आतिशी मायाजाल का करिश्मा, जो सबको अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें चिंतामुक्त कर देने की, चाहे कुछ देर के लिए ही सही, क्षमता रखता है।    
एक बार फिर आप सब मित्रों, परिजनों और "अनदेखे अपनों" को ह्रदय की गहराइयों से शुभकामनाएं।  हम सब के लिए आने वाला समय भी शुभ और मंगलमय हो।    

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

क्या सिर्फ झाड़ू उठा लेने से गंदगी नौ-दो-ग्यारह हो जाएगी ?

आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती।

साफ़-सुथरा माहौल, साफ-सफाई किसे अच्छी नहीं लगती। इसकी अच्छाइयों, इसके फायदों  से भी सभी वाकिफ हैं। पर नजरिया सब का तंग है।  'मैं साफ मेरा घर साफ' बस और इसी तंगख्याली के चलते अपने घर का कूड़ा लोग नुक्कड़ों या सड़क किनारे डाल निश्चिंत हो जाते हैं बिना यह सोचे कि वह एक जगह एकत्र हुई गंदगी, क्या नहीं कहर बरपा सकती। पर लोगों की, उचित दिशा निर्देश न होने के कारण,  मजबूरियां भी होती हैं।  इन्हीं सब बातों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के बाद जब मोदी जी ने सफाई के व्यापक अभियान का आह्वान किया तो जैसे लोगों में एक जोश की लहर दौड़ गयी। सब को ऐसा लगा कि बस हाथ में झाड़ू पकड़ा और गंदगी नौ-दो-ग्यारह हुई। कुछ लोग इच्छा से और कुछ 'एज यूजुअल' अनिच्छा से इस अभियान में जुटे। पर आशा के अनुरूप नब्बे प्रतिशत वही हुआ जिसका अंदेशा था। सांकेतिक अभियान के दौरान इधर-उधर का कूड़ा एकत्र कर किसी एक कोने में ढेर लगा लोग फोटो खिंचवा, प्रेस विज्ञप्ति भिजवा सब  खुशी-खुशी अपने  घर रवाना हो गए।                  

इरादा जरूर नेक है, अधिकांश लोग समझ भी रहे हैं, करना भी चाहते हैं, पर निराकरण और समापन कैसे किया जाए इसका उपाय नहीं है। नाही कोई 'गाइड लाइन" है कि उस एकत्र किए गए कूड़े-कर्कट को कैसे ठिकाने लगाया जाए।  दूसरी बात, करोड़ों लोगों को जिनको गंदगी फैलाना ज्यादा आसान लगता है उनको जागरूक करना टेढ़ी खीर होगा। आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती।  इसीलिए इस सफाई अभियान की सफलता को लेकर थोड़ी आशंका उत्पन्न हो रही है। जब तक  देश का एक-एक नागरिक जागरूक नहीं हो जाता, अपने कर्तव्य को धर्म नहीं मानने लगता तब तक इतने बड़े अभियान की सफलता प्रश्न चिन्ह के दायरे में ही रहेगी।  इसके लिए शुरुआत  बिल्कुल पहले पायदान से करना जरूरी है।  स्कूलों और घरों से ही बच्चों को इसकी अहमियत बतानी होगी। अपनी और अपने घर की सफाई के साथ उन्हें अपने माहौल की सफाई के प्रति जागरूक करना होगा।  इसके साथ ही सरकार को भी नई-नई तकनीकियों को तुरंत लागू कर लोगों के प्रयासों को उनकी मेहनत को जाया जाने से बचाना होगा।

दो अक्टूबर के दिन प्रधान मंत्री ने पहल कर सब को साथ ले जिस जोश के साथ राह दिखाई वह  कबीले तारीफ जरूर था पर ऐसा रोज-रोज तो हो नहीं सकता। प्रतिदिन मंत्री-संत्री अपना काम छोड़ सड़क पर नहीं उत्तर सकते।देश, समाज को चलाने के लिए, अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग महकमे और लोग नियुक्त किए जाते हैं। इसी के तहत देश के हर शहर, जिले, वार्ड, मोहल्ले के लिए सफाई-कर्मियों की नियुक्ति की जाती है।  जरूरत है कि यह ध्यान रखा जाए कि जिसे जो काम सौंपा गया है वह अपनी पूरी जिम्मेदारी से उसे पूरा करे। हर कोई यदि अपना काम पूरा करे तो भी एक हद तक कई परेशानियां दूर हो सकती हैं। पर कड़वी सच्चाई और विडंबना यह है कि हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति के तहत जाति, धर्म, अशिक्षा का भरपूर उपयोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों को बरगला कर देश और समाज के हित को अनदेखा कर दिया जाता है।      

इसी के संदर्भ में एक चीनी कहानी समीचीन है। एक खूबसूरत किताब में चूहों को पकड़ने की विधियां बताई गयी थीं। एक दिन चूहों ने उस पर धावा बोल दिया. किताब गरूर से बोली, भागो यहां से तुम जानते हो मैं कौन हूं और मुझ में क्या लिखा है ? चूहे बोले, अरे तुम एक कागज की बनी किताब ही तो हो।  पुस्तक गर्व से बोली, अरे बेवकूफो, मुझमें तुम्हें पकड़ने और मारने की विधियां बताई गयी हैं।  क्यूँ अपनी मौत को दावत दे रहे हो।चूहे जोर से हस पड़े और कुछ मिनटों में ही किताब को कतरनों में बदल दिया।  चूहे अक्लमंद थे वे जानते थे कि मात्र लिखा होने से कुछ नहीं होता जब तक उस पर अमल न किया जाए। कहीं ऐसा ही हाल हमारे सफाई अभियान का न हो जाए। फिर भी चाहे जो हो हमें अपनी तरफ से कोशिश करनी नहीं छोड़नी है ना ही हतोत्साहित होना है। हम कम से कम अपने स्तर पर अपने आस-पास का परिवेश तो स्वच्छ रख ही सकते हैं।  शुरुआत में इतना ही बहुत है। तो चलिए आज से एक कदम बढ़ाते हैं।     

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

बलिहारी BSNL की

ना कोई मेरा सगा मंत्रिमंडल में है और नहीं कोई संबंधी सरकारी अमले में।  तो क्यों एक आम आदमी के लिए ये लोग ख़ास प्रबंध करें ?   जहां  मेरे  फोन  के  तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है !             


जर्जर अवस्था वाले एक बांस में खुली तारों के सहारे मेरा फोन 
जबसे हुदहुद के आने की खबर सुनी थी तब से दिल धुक-धुक कर रहा था। तरह-तरह की आशंकाएं तूफानी हवाओं की तरह दिलो-दिमाग को मथ रही थीं। हालांकि उसके प्रभाव क्षेत्र में हम नहीं आ रहे थे पर उसका जो थोड़ा-बहुत असर होना था वही चिंता का विषय बना हुआ था। परेशानी अपने फोन के कनेक्शन को ले कर थी। क्योंकि इस बार तो हमारी सरकारी कंपनी ने ही खुद कह दिया था कि इस आने वाले तूफान से  BSNL की सेवाएं बाधित हो सकती हैं। यही मेरी चिंता का विषय था कि जब ये फोन वाले कुछ नहीं कहते तब तो मेरे "कोमा" में गए फोन को होश आने में 15 से 20 दिन लग जाते हैं, इस बार तो ये खुद ही पहले से हाथ खड़े कर रहे हैं।  पर तूफान आया और तटीय इलाकों में मजबूर लोगों पर अपना रोष तथा रौब जमा चला गया।  इधर फसलों को छोड़ कर उतनी तबाही नहीं हुई। आश्चर्य की बात यह भी रही कि मेरी फोन लाइन ने मेरा साथ नहीं छोड़ा।        

आप भी कहेंगे कि इसमें क्या बात है बहुतों के पास इसका कनेक्शन है और सब ठीक-ठाक रहा। कोई परेशानी नहीं हुई।  पर जब मेरे घर पहुंचती इनकी सेवा का जायजा लेंगे तो शायद आपकी धारणा बदल जाए। क्या है कि इस सरकारी उद्यम के "बेहतर काम" से अपनी बेहतरी चाहने वालों ने दूसरी प्रायवेट कंपनियों की शरण ले ली है।  पर अपने राम, पता नहीं क्यों, अभी भी इनसे किस उम्मीद की
ऐसे कनेक्शन देती है BSNL 
आशा लगा जुड़े हुए हैं। इस इलाके में मेरा अकेले का फोन सरकारी है, अब सीधी बात है कि ना कोई मेरा सगा मंत्रिमंडल में है और नहीं कोई संबंधी सरकारी अमले में।  तो क्यों एक आम आदमी के लिए ये लोग ख़ास प्रबंध करें ?  इसी लिए जहां मेरे तार जोड़े गए हैं वहाँ कोई जोर से छींक भी देता है तो मेरा फोन बेचारा किसी अनिष्ट की आशंका से अपने खोल में सिमट जाता है।  अब जब फोन बंद हो जाता है तो इन भले लोगों की शर्त है कि खराबी की शिकायत भी BSNL के फोन से ही होनी चाहिए। अब इस कंपनी का फोन तो चिराग लेकर ढूंढने से ही मिलता है।  पता नहीं सरकारी काम, नियम, कानून ऐसे क्यों होते है ?  बैंक से लोन लेने वाले से प्रॉपर्टी दिखाने की मांग की जाती है। अरे भले लोगो उसके पास जायदाद होती तो तुम्हारे मुंह क्यों लगता ?  उनका कहना है कि इससे हैसियत देखी जाती है कि उनका पैसा कैसे वापस आएगा।  यह दूसरी बात है कि "हैसियत वालों"  से पैसा वापस लेने की इनकी हैसियत नही होती !!!

एक बात आज तक समझ नहीं आई की BSNL इतना बड़ा उद्यम है, सर पर सरकार का हाथ है तो फिर क्यों ये लोग विदेशी उपकरणों का प्रयोग करते हैं, वह भी किसी भरोसेमंद देश के नहीं बल्कि चीन के।  जो अपने उत्पादों के कारण ऐसे ही बदनाम है। मेरे इंटरनेट के लिए जो  'मॉडम' उपलब्ध करवाया गया है वह भी चीन का बना हुआ है और अपने देश की ख्याति के अनुसार साल-डेढ़ साल में चीनी भाषा में  "टैं" बोल जाता है। फिर खड़काते रहो सरकारी दफ्तर के दरवाजे। आज के समय में उच्च तकनीकी उपकरणों की सहायता से जहां इनके प्रतिद्वंदी एक दो दिन में उपकरणों में जान डाल देते हैं वहीं सरकारी सहायता आने में हफ़्तों लग जाते हैं। यही हाल इनके मोबाइल कनेक्शन का है।  जो सबके सामने खुले में ही बात करवाता है,  घर के अंदर से बात करवाने में शर्माता है। जिन्होंने इसे छोड़ा है वे पूछने पर बतलाते है कि भाई उससे तो टावर के नीचे खड़े हो तो भी बात नहीं होती थी। अब ऐसा क्यों है कि प्रायवेट कंपनियां दिन-दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही हैं, लोग उनसे जुड़ते जाते हैं और
इसके नाम से नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं ?  वैसे चतुर-सुजान "जो सच" उजागर करते हैं उस पर अविश्वास भी नहीं होता।   


आजकल चारों ओर हल्ला है कि अच्छे दिन आने वाले हैं, सो इसी आशा में इसे गले में लटकाए बैठे हैं, कि और चीजों के साथ शायद हमारा बीएसएनलवा भी सुधर जाए ……… आमीन        

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

वह सांड को सर के ऊपर उठा कसरत करता था

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।

सोच के बाहर है कि अपने शारीरिक बल को बढ़ाने के लिए कोई इंसान एक सांड को अपने सर के ऊपर उठा कर कसरत करता होगा। पर ऐसा हुआ है।  करीब 600 साल ईसा पूर्व, इटली के क्रोटोन में एक बालक का जन्म हुआ।  बचपन में साधारण कद-काठी का  बच्चा ही था।  पर उसकी इच्छा दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बनने की थी।  परंपरागत तरीके की कसरतों से उसका मन नहीं भरता था।  एक दिन उसने अपने घर के पास मार्ग के बीचो-बीच एक नवजात बछड़े को पड़े देखा तो वह उसे उठा किनारे ले गया।  फिर पता नहीं उसे क्या सूझा वह रोज बिना नागा, बिना किसी की परवाह के निश्चित समय पर उस बछड़े को अपने सर के ऊपर उठाने लगा। समय बीतता गया दिन हफ्ते में और हफ्ते महीनों में बदलते गए पर उसने, आंधी हो, तूफान हो, गरमी हो, सर्दी हो, अपना नियम कभी नहीं बदला। उस बालक का नाम था मिलो। 

उधर बछड़ा भी  सांड बन गया था पर मिलो उसे ही उठा कर अपना रियाज पूरा करता था। देखने वाले
जब दांतों तले उंगलियां दबाते थे तो उसे और भी आनंद आता था।उसके शरीर में मानों ताकत का सागर ठाठें मारता था।  अपनी ताकत का प्रदर्शन करना उसका शौक था।  इसके लिए वह अपनी मुट्ठी में एक अनार रख लोगों से उसे छीनने को कहता था पर इसमें कोई सफल नहीं होता था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि ताकत से मुट्ठी भींचने के बावजूद कभी फल को नुक्सान नहीं पहुंचता था।  ऐसे ही कभी वह एक तैलीय फर्श पर खड़ा हो अपने को धकेल कर पर करने की चुन्नोती देता था पर इसमें भी कोई उसे हरा नहीं पाता था।  उसके हाथ में इतनी ताकत थी कि वह अपने मुक्के के एक ही प्रहार से अच्छे खासे भैंसे को मार गिराता था।  अपने एक पसंदीदा करतब में वह अपने माथे पर बंधी रस्सी को अपने सर की शिराओं को  फुला कर तोड़ डालने की क्षमता रखता था।  ऐसे महाबली और महान खिलाड़ी ने प्राचीन ओलंपिक खेलों में भी भाग लिया था और एक या दो बार नहीं छह-छह बार विजेता घोषित किया गया था।  अपने चौबीस वर्षीय खेल जीवन में वह कभी भी पराजित नहीं हुआ था।   

कहते हैं कि मिलो ने एक बार महान ग्रीक दार्शनिक और गणितज्ञ पाइथागोरस की जान बचाई थी, जिससे प्रभावित हो पाइथागोरस ने अपनी लड़की की शादी मिलो से करवा दी थी। अपनी ताकत के बलबूते पर उसने अपने देश की सेना में भी जगह बना ली थी और कई युद्धों में भाग लेकर जीत भी दिलवाई थी। 

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। एक बार घूमते-घूमते मिलो को एक मजबूत वृक्ष दिखाई पड़ा, जिसके तने में दरार पड़ी हुई थी।  मिलो ने उसे उखाड़ने  ली। उसने पेड़ को जड़ से हिला तो दिया पर इस जोर आजमाईश में उसके हाथ बुरी तरह पेड़ की दरार में फस गए और लाख कोशिशों के बाद भी मिलो उन्हें छुड़ा नहीं पाया और उसकी बेबसी का फ़ायदा जंगली जानवरों ने उसे मार कर उठाया।  इस तरह एक विश्व विजेता का दारूण अंत हो गया।       

शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

फर्क है कुलू के दशहरे में और विजयादशमी में

सात दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों, सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता।
दशहरे का उत्सव 


आश्विन माह के दसवें दिन विजया दशमी या दशहरे का त्यौहार धूम-धाम से पूरे देश में मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाने के लिए सांकेतिक रूप से हर साल रावण का पुतला अग्नि को समर्पित किया जाता है। पर जब सारे देश में विजयादशमी के दिन दशहरा उत्सव संपन्न हो जाता है, ठीक उसके दूसरे दिन हिमाचल के कुल्लू शहर में शुरू होता है "कुल्लू का दशहरा।" यह अपने आप में एक ऐसा बड़ा उत्सव है जिसे देखने देश-विदेश से पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता। यहां के दशहरे के प्रारंभ होने और मनाने की एक अलग कथा है।  
वर्षों पहले 1637  में कुल्लू घाटी में राजा जगत सिंह का राज था।  वैसे तो राजा लोक-प्रिय था, प्रजा
दरबार में पधारे देवी-देवता 
का भला चाहने वाला था पर उसे बहुमूल्य चीजों का संग्रह करने का शौक पागलपन की हद तक था। उसी के राज के टिपरी गांव में दुर्गा दत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण पूजा-पाठ कर अपना गुजर-बसर किया करता था। ब्राह्मण से किसी बात पर खफा एक आदमी ने राजा के कान भर दिए कि दुर्गा दत्त के पास कटोरा भर अति सुन्दर, बहुमूल्य तथा नायाब मोती हैं, जिन्हें उसने छिपा कर रखा हुआ है। राजा ने तुरंत दुर्गा दत्त के पास उन मोतीयों को राज खजाने में जमा करवाने का आदेश भिजवाया। दुर्गा दत्त ने हर नाकाम कोशिश की राजा को समझाने की कि उसके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है पर राजा न माना। उसके

राजघराने के वंशज 
उत्पीड़न से तंग आ ब्राह्मण ने अपने परिवार सहित अपने को घर में बंद कर आग लगा कर प्राण त्याग दिए। उसके दुखी मन से निकली आह के कारण कुछ ही समय पश्चात राजा को कोढ़ की बीमारी ने आ दबोचा उसे हर ओर कीड़े ही कीड़े नजर आने लगे। उसका खाना-पीना सब मुहाल हो गया।  उसकी बीमारी की खबर आग की तरह चारों दिशाओं में फैल गयी। कई तरह के इलाज आजमाए गए, हकीम, वैद्यों, ओझाओं, साधू-संतों के उपाय किए गए पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंत में एक बैरागी बाबा जिनका नाम किशन दास था, उन्होंने राजा को अपने राज में रघुनाथ जी की मूर्ती की स्थापना कर अपना सब कुछ उनको अर्पित कर देने की सलाह दी। राजा ने अपने ख़ास आदमी दामोदर दास को अयोध्या भेज वहां के 'त्रेत नाथ' के मंदिर से रघुनाथ जी की मूर्ति को मंगवा कर कुल्लू के सुल्तानपुर इलाके में पूरे विधी-विधान से स्थापित करवाया। इसके लिए अयोध्या के विद्वान पंडितों को भी बुलवाया गया। पूजा-अर्चना के बाद प्रभु की मूर्ति के चरणामृत को ग्रहण करने के पश्चात राजा को
अपने आराध्यों को लाते भक्त 
बिमारी से मुक्ति मिली। 




इसके बाद राजा जगत सिंह ने वादे के अनुसार अपना सारा राज्य प्रभु को समर्पित कर उनका छड़ीबरदार बन प्रजा की सेवा करनी प्रारंभ कर दी। राजा ने घाटी के समस्त देवी-देवताओं को प्रभु रघुनाथ जी के दरबार में उनके सम्मान की खातिर हाजरी लगाने के लिए कुल्लू के ढालपुर इलाके में एकत्रित होने का आह्वान किया। 
तिल धरने को जगह नहीं रहती 

यह बात 1651 के आश्विन माह के पहले पखवाड़े की है। तब से यह प्रथा चलती आ रही है। चूँकि इसी समय देश भर में दशहरे के त्यौहार की धूम रहती है तो उसी कड़ी को थामते हुए इसका भी वैसा ही नामकरण हो गया। जिसने आज विश्व-व्यापी ख्याति हासिल कर ली है और इस अवसर पर यहां पैर धरने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।