मंगलवार, 23 जुलाई 2013

स्कूलों के मध्याह्न भोजन की समस्या

खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने वाली दुकानों का स्कूल के अधिकारियों से दूर-दूर का वास्ता न हो, इसका ध्यान रखा जाए. सप्लायर और स्कूल के गठबंधन पर नजर रखी जाए. यदि कोइ समिति बने तो उसमें स्कूल के छात्रों के पालक जरूर शरीक किए जाएं। क्योंकि अपने बच्चों के हित के लिए वे कुछ भी गलत होने से रोकेंगे। 

केंद्रीय तथा राज्य सरकारों ने देश में शिक्षा के गिरते ग्राफ को थामने के लिए स्कूलों में बच्चों को दोपहर का भोजन देने की योजना को 5 अगस्त 1995 से ही लागू कर दिया था. तब इसके तहत स्कूल में 80 '/.  उपस्थिति दर्ज करवाने वाले बच्चों को हर महीने तीन किलो अनाज देने का प्रावधान था. पर कहते हैं न की गाँव बसा नहीं लुटेरे हाजिर. अब निर्धन, अशिक्षित गरीब बच्चों और उनके माँ-बाप के लिए कहां संभव था की वे अनाज की उचित मात्रा तौलें, उसकी गुणवत्ता देखें। उन्हें तो जो मिल गया वही नियामत था. फिर चाहे उसमें आधा किलो रेत या कंकड़ ही क्यूँ न मिले हों. फिर उस देश में जहां मृत लोग सरकारी योजनाओं के कागजों में ज़िंदा हो उठते हों वहाँ बच्चों की उपस्थिति में हेरा-फेरी कर माल इधर से उधर करना कौन सी बड़ी बात थी. बातें उठीं शिकायतें हुईं जिससे 2004 से योजना में तब्दीली कर, पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं को पका हुआ खाना देने की शुरुआत की गयी. जिसे 2007 से बढ़ा कर आठवीं क्लास तक कर दिया गया. मकसद वही था खाने के बहाने बच्चों को स्कूल तक लाना.

हमारे यहाँ घपले तो किसी भी योजना के साथ ही शुरू हो जाते हैं या यूं कहिए कि घपलों को जामा पहनाने के लिए ही योजनाएं शुरू की जाती हैं. उसी तर्ज पर ज्यादातर सरकारी योजनाओं की तरह इसका फ़ायदा भी मानव रूपी गिद्धों ने उठाना शुरू कर दिया. पौष्टिकता तो बहुत दूर की बात थी, बाजार का घटिया, निकृष्टतम अनाज स्कूलों में खपाया जाने लगा. मुफ्त का होने तथा सदा की तरह रसूखदारों के सगे-संबन्धी-मित्रों के दबदबे की वजह से कोई जल्द शिकायत भी नहीं करता था. पर लालच की इंतहा ने जब मासूमों की जिंदगियों  से खेलना शुरू कर दिया तब भी मुख्य मुद्दा छोड़, उनकी लाशों पर पक्ष-विपक्ष ने गंदी राजनीति का मंचन अपने हितों के लिए करना शुरू कर दिया.  तरह-तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच इस योजना को बंद करने की आवाज तो उठी पर किसी ने इसे सुधारने या "फूड माफिया" से बचाने की पहल किसी ने नहीं की. 

अभी घटा बिहार जैसा काण्ड पहली बार नहीं हुआ है. सितम्बर 2008 में झारखंड में दूषित भिजन के कारण 60 बच्चों को अस्पताल में भर्ती करवाना पडा था. 2009 में देश की राजधानी दिल्ली में सवा सौ के करीब बच्चियां बीमार हो गयीं थीं. अब बिहार की ताजा घटना सब के सामने है, पर इन सब से किसी ने ना तो सबक लिया नाहीं कुछ सुधार के कदम उठाए। अब तो इस योजना पर ही प्रश्न चिन्ह लगने शुरू हो गए हैं, यहाँ तक कि इसे निरस्त करने की मांगें भी उठानी शुरू हो गयी हैं. पर जिस देश में लाखों बच्चे हर साल कुपोषण का शिकार हो दम तोड़ देते हों, वहाँ ऐसी योजना को बंद तो नहीं ही करना चाहिए. भले ही भोजन बहुत पौष्टिक न भी हो पर पेट भरने लायक तो होना ही चाहिए। भूख के कारण किसी की मौत ना हो इसका ख्याल रखना हर सक्षम नागरिक का कर्तव्य है.

अभी घटी घटनाओं का फ़ायदा उठाने के लिए डिब्बाबंद खाने की सिफारिशें भी सर उठाने लगी हैं. जाहिर है यह ऐसा खाना बनाने और बेचने वाले बड़े ठेकेदारों और कंपनियों की लाबी के दाँव-पेंच हैं. जो लाखों रुपये के इस बाजार को हथियाना चाहते हैं. जब कि चिकित्सा विज्ञान ऐसे "जंक फूड" से बच्चों को दूर रखने को कहता है.
   
फिर उपाय क्या है?
उपाय तो हैं, बशर्ते उन्हें दृढ प्रतिज्ञ हो कर लागू किया जाए. पहले तो सारी योजना का विकेंद्रीकरण किया जाए. खाद्य सामग्री उपलब्ध करवाने वाली दुकानों का स्कूल के अधिकारियों से दूर-दूर का वास्ता न हो, इसका ध्यान रखा जाए. सप्लायर और स्कूल के गठबंधन पर नजर रखी जाए. यदि कोइ समिति बने तो उसमें स्कूल के छात्रों के पालक जरूर शरीक किए जाएं। क्योंकि अपने बच्चों के हित के लिए वे कुछ भी गलत होने से रोकेंगे। किसी समर्पित एन. जी. ओ. को योजना से जोड़ा जाए तो निश्चित ही अच्छे परिणाम मिल सकते हैं.      
         

शनिवार, 20 जुलाई 2013

गरीबी के बंजर में खिलती कोंपलें


ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया।

एक-दो दिन पहले अखबार में पढ़ा कि गुजरात में एक ठेला लगाने वाले की बेटी ने अपने पहले प्रयास में ही सी.ए. की उपाधी पाने में सफलता हासिल कर ली. इसके बावजूद की अपनी पढाई के साथ-साथ वह अपने पिता का भी हाथ बंटाती थी. कम साधन, निम्न सुविधाओं और विपरीत परिस्थितियों में जब कोइ बच्चा ऐसी उपलब्धि हासिल करता है तो बहुत अच्छा लगता है. हालांकि ऐसे वाकये कम ही देखने-सुनने में आते हैं। ऐसा ही एक फेरीवाला  था जो खुद तो झाडू, झाडन इत्यादि घर-घर जा बेचता था पर उसने अपने दो बेटों को अच्छी तालीम दिलवाई जिसके फलस्वरूप एक सी.ए. बना और दूसरे को बैंक में नौकरी मिली.   

 संदर्भ वश वर्षों पहले की बातें और एक व्यक्ति की याद ताजा हो गयी है. कलकत्ते में हमारे पिताजी की एक मुंह बोली मौसी थीं. सगी माँ जैसॆ. मेरा बचपन खासा वहाँ बीता है. खुशहाल, समृद्ध परिवार था. दो-चार नौकर सदा घर पर रहते ही थे. उन्हीं में से एक थे रामदास। जिन्हें हम सब रामू काका कहा करते थे। उनकी अहमियत घर के अभिन्न सदस्य की तरह थी. एक तरह से सारे घर की जिम्मेवारी उनके ऊपर थी. मैंने उन्हें कभी गुस्सा होते या चिड़चिड़ाते नहीं देखा था. घर पर एक रसोईया होने के बावजूद हम उन्हीं के हाथ के "परौंठे" खाने के इच्छुक रहते थे. बनाते भी क्या लाजवाब थे, जैसे कोई कलाकार अपनी कला को मन से संवारता हो. मजाल है कि कभी अधसिका या ज्यादा सिक गया हो. एक-एक परत बनाने वाले के गुण का बखान करती थी.  कभी भी उनके मुख से ना नहीं सुनी, शायद खिलाने में उन्हें भी सुख मिलता था. घर एक चार कमरों का फ्लैट था. पर घर के पांच सदस्यों के अलावा कोई न कोई मेहमान आया ही रहता था. बाकी नौकर अपने समयानुसार आते-जाते थे पर रामू काका की रिहाइश वहीं थी, घर की बाल्कनी  में बने छोटे से कमरे में. वर्षों-वर्ष, जहां तक मुझे याद पड़ता है उनके 40-45 वर्ष वहीं कटे. किशोरावस्था से वहाँ पदार्पण करने वाले ने शरीर के अशक्त होने तक वहीं निवास किया बिना किसी गिले-शिकवे के. कभी कभी पुरानी फिल्मों में रामू काका जैसे अभिनेता को देख अक्सर उनकी याद आ जाती है, ऐसे लोगों का नाम रामू ही क्यों होता है? 
विषय से थोडा भटक गया था. साथ रहते-रहते उन्हें भी कारोबार की समझाइश दी जाती रही थी. समय के साथ उन्होंने भी इस परिवार की सहायता से अपना छोटा-मोटा काम शुरू कर दिया था. नेक इंसान पर खुदा की रहमत भी थी. साल में दो-तीन हफ्तों के लिए अपने गाँव जाने वाले इंसान ने कलकत्ते में रहते हुए ही अपनी बिटिया की शादी भले घर में की. एक बेटे को वकील बनाया तथा दूसरा सी.ए. बना. करीब सत्तर साल की उम्र में वे अपने घर चले गए थे जहां सात-आठ साल बाद उनका देहावसान हो गया.

ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया। आज के भटकन भरे समय में पथभ्रष्ट न होते हुए, खुद भी मेहनत की और अपने लक्ष्य को पाने के लिए दिए गए बलिदान को सार्थक किया.               

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

शम्मी कपूर की फिल्मों के विरोधाभासी नाम

शम्मी कपूर.  हिंदी फ़िल्म जगत का एक ऐसा नाम जो अपने अभिनय से ज्यादा अपनी अदाओं यानी "मैनरिज्म" के कारण याद किया जाता है. जिसने अपने समय के दिग्गजों, सर्वकालीन महान अभिनेताओं के बीच अपनी पहचान बनाई. अभिनय और नृत्य की अपनी अलग शैली विकसित की और "रिबेल" कहलाए.  भले ही उस समय के आलोचकों ने उन्हें ज्यादा भाव न दिया हो फिर भी उन्होंने अभिनय के विश्वविद्यालयों जैसे कलाकारों के बीच अपनी छोटी सी पाठशाला स्थापित की जिसकी लीक पर कई अभिनेता चले और आज तक चल रहे हैं या यूं कहें की उसी लीक को ज्यादा पसंद किया जा रहा है. 
 
पर शम्मी जी की एक ख़ास बात जिसकी मिसाल अपने ही नहीं दुनिया के किसी भी देश के फिल्मी  जगत में शायद ही मिले वह है उनकी फिल्मों के विरोधाभासी नाम, जो एक दो नहीं, दसियों हैं. यदि उन्होंने जंगली में काम किया तो वे प्रोफेसर भी बने. यदि बद्तमीज में काम किया तो राजकुमार भी बने.
आइये देखें उनकी ऐसी ही कुछ फिल्मों के नाम -

जंगली ----------------------------------राजकुमार
जानवर ---------------------------------प्रोफेसर
ब्लफमास्टर ---------------------------ब्रह्मचारी
बद्तमीज ------------------------------प्रिंस 
बंडलबाज ------------------------------लाट साहब
हम सब चोर हैं ------------------------मिर्जा साहब
डाकू ------------------------------------प्रीतम
हरजाई --------------------------------विवेकानंद
वांटेड ----------------------------------शहीद भगत सिंह
मुजरिम -------------------------------विधाता

सोचिए मिलेगा ऐसा उदाहरण कहीं  और?


 
  

रविवार, 14 जुलाई 2013

जिसे डायन कहलवाने पर गर्व है

कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें किसी भी प्रकार सिद्ध न कर पाने  के बावजूद वे करोंड़ों लोगों का विश्वास बनी रहती हैं। इस तरह की ज्यादातर धारणाएं परालौकिक जगत को ले कर प्रचलित हैं। ख़ासकर इंसान की मृत्यु के बाद  का रहस्य इन बातों का मुख्य मुद्दा रहता आया है। सदियों से या यूं कहें की मनुष्य के जन्म के साथ ही यह रहस्य उपजा और आज तक विद्यमान है. हजारों-हजार ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनका दावा है की मृत्युपरांत वे इंसान की आत्माओं के संपर्क में आए या आ सकते हैं।

इप्सिता राय चक्रवर्ती 
इस बात पर शायद ही कोई भरोसा करे कि एक ओर जहां विज्ञान भूत-प्रेत को अंधविश्वास और झूठ मानता है वहीं महान वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने भूतों से बात करने के लिए एक मशीन बनाई थी। अभी कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक खबर मीडिया में छाई रही जिसमें कोलकाता की इस्पिता राय चक्रवर्ती ने, जो विका संप्रदाय की एक अनुयायी हैं, इसी मशीन की मदद से भूतों से बात करने का दावा किया है। अपनी किताब "स्पिरिट्स आई हैव नोन" में इप्सिता रॉय चक्रवर्ती ने कहा मोशन पिक्चर कैमरा और फोनोग्राफ बनाने वाले मशहूर अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस एडिसन ने एक "स्पिरिट मशीन" भी बनाई थी। जो भूतों से बात करने के लिए बनाई गई थी और इसके बारे में कुछ चुनिंदा लोगों को ही पता है।  उनके अनुसार हमारा शरीर हजारों तत्वों से बना है जो शरीर के ख़त्म हो जाने के बावजूद नष्ट नहीं होते बल्कि अलग हो जाते हैं. इसलिए उन तरंगित तत्वों से फिर जुडा जा सकता है, इस मशीन से उन तरंगों को पकड़ा जा सकता है और इस तरह भूतों और आत्माओं से संपर्क हो सकता है।  सुनने में आता है कि एडिसन और उनके असिस्टेंट ने यह मशीन बनाई थी लेकिन वो बात करने में सफल हुए थे या नहीं ये बता पाना मुश्किल है।

कौन हैं ये इप्सिता चक्रवर्ती  क्या है विका धर्म .....
आज के समय में जब डायन शब्द एक घोर नकारात्मक और बुरा अर्थ रखता है, जिसकी आड़ में पुरुष निर्देशित समाज महिलाओं पर अत्याचार करने का मौका ढूँढ़ता रहता है, आज भी जब हमारे गाँव-देहातों में औरतें इस शब्द से खौफ खाती हैं, वहीं इप्सिता अपने-आप को डायन कहलवाने में गर्व महसूस करती हैं। उनका कहना है कि पिछले जन्म में औरतों और उनके खुद के ऊपर हुए जुल्म का बदला लेने उन्होंने दोबारा यह जन्म लिया है. इस जन्म में वह सदियों से चले आ रहे स्त्रियों के विरुद्ध षडयंत्र को समाप्त करना चाहती हैं. उनका कहना है, हाँ! मैं डायन हूँ. मैं ही क्यूँ, दुनिया की हर वह स्त्री, जिसे अपने होने का गरूर और अपनी ताकत का एहसास है, डायन है. 
विका संप्रदाय के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि इसका मतलब है "क्राफ्ट आफ वाइल्ड, लर्निंग आफ द वाइल्ड". इसका सिद्धांत है कि प्रकृति में एक सर्वोच्च सत्ता विद्यमान है. जो सर्वव्यापी है. उसकी पूजा-आराधना, मन्दिर, मस्जिद, चर्च या खुले में, कहीं भी की जा सकती है। उस सत्ता का जब हमारी अंदरूनी ताकत, हमारी इच्छाशक्ति से मेल होता है तभी चमत्कार घटित होता है।  

तब के कलकत्ता में 1950 के एक सभ्रांत परिवार में जन्मी तथा विदेश में पली-बढी देश की स्वघोषित प्रिय  डायन  इप्सिता का कहना है कि बचपन में खुद को मिल रहे संकेतों को वह समझ नहीं पाती थी पर उसे एहसास होता रहता था कि उसके आस-पास किसी अनोखी शक्ति का प्रवाह है. धीरे-धीरे उस आनन्ददायक शक्ति की मौजूदगी का प्रमाण मिलने लगा. वे मानती हैं कि उनकी शक्तियों का अभी वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हुआ है. उन्हें खुद भी अपनी बातों को साबित करने में दिलचस्पी नहीं है. वे तो स्त्रियों के पक्ष में जो कुछ भी हो सकता है, जो कुछ भी संभव है, करने को तत्पर रहती हैं. 

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

चलें, पकौड़ियां खाने

आज ठाकुर जी मिले तो कुछ अनमने से थे। मैने पूछा भईये क्या बात है? तो उन्होनें अपनी समस्या बताई। "समस्या" बड़ी दिलचस्प थी। उनका कहना था कि बरसाती मौसम में चाट-पकौड़ी खाने की बड़ी इच्छा होती है पर सेहत बिगड़ने का भी डर लगता है। उनकी जिज्ञासा थी कि दोनों इच्छापूर्तियाँ कैसे की जा सकती हैं? 

मैंने कहा लो, कर लो बात यह तो बडा आसान काम है।              
ठाकुर जी चमके, बोले, वो कैसे?
मैंने कहा महाराज, अपने मुंह और जीभ दोनों साथ-साथ रहते हैं, पर जहां मुंह से लिया गया पौष्टिक आहार शरीर को पुष्ट तथा निरोग रखता है वहीं जीभ के चटोरेपन से वही शरीर रोगों का घर बन जाता है। पर इसका यह मतलब थोडे ही है कि बेचारी जीभ को ललचाते ही रहने दो। हां ! बरसात के मौसम में पाचन शक्ति जरूर कुछ कमजोर व मंद पड़ जाती है। इसीलिए ज्यादा तले, मसालेदार, भारी भोजन से हर चिकित्सा में परहेज रखने की सलाह दी जाती है। वैसे भी अति हर चीज की नुकसानदायक होती है। पर यदि संतुलित, कभी-कभार, स्वच्छता से बने ऐसे व्यंजन ले भी लिए जाएं तो कोई हानि नहीं है। और यदि ऐसे पदार्थ घर में बने हों तो बेहतर रहते हैं। पर यदि बाहर खाना ही पड़े तो उन पर बरती गयी सफाई और उनके ताजेपन पर ध्यान जरूर देना चाहिए। यदि कभी लगे कि खाना खाने के बाद कुछ परेशानी हो रही है तो एक चम्मच कच्चा जीरा या अजवायन पानी के साथ ले लें।  कुछ ही देर में अच्छा महसूस होने लगेगा। 
ठाकुर जी चौंके, बोले एकदम कच्चा?
मैंने कहा हां, भाई, आजमा कर तो देखो।
बोले, अभी ले लूं?
मैं बोला, भईये ये भी एक तरह की औषध ही है। फिर इस मौसम में सेहत को सबसे ज्यादा खतरा पीने के पानी के अशुद्ध होने से होता है। इस लिए उसका ख़ास ध्यान रखना चाहिए और हर कहीं के पानी को ना पीने में ही बेहतरी है। पीने का पानी साफ और स्वच्छ हो तो आधा खतरा यूं ही टल जाता है। घर पर पानी साफ करने के दसियों तरीके हैं पर एक सबसे सरल तथा सुरक्षित उपाय है कि पीने के पानी के बर्तन में रात को एक चम्मच अजवायन डाल दें जो पांच-सात लीटर पानी के लिए काफी है। पानी के साथ-साथ इसे भी बदलते रहें। पानी पूरी तरह सुरक्षित रहता है। 

ठाकुर जी आप तो विज्ञान के शिक्षक हैं, आप तो जानते ही हैं कि हमारा शरीर खुद ही अपने को निरोग बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम है। फिर भी यदि कुछ  बातें ध्यान में रख ली जाएं तो  स्वस्थ रहते हुए वर्षा ऋतु का पूरा आनंद उठाया जा सकता है। कुछ ज्यादा नही करना है, सुबह की चाय तीन-चार तुलसी के पत्तों के साथ बना कर पीएं। हल्का और सुपाच्य भोजन लें। भारी व्यंजन कम मात्रा और हफ्ते में एकाध बार ही लें।  देर रात या बेवक्त न खाएं। बासी तथा खुले भोजन से बचें। अपच तथा कब्ज न होने दें। स्वच्छ जल ग्रहण करें। बरसात में भीग गए हों तो तुरंत गीले कपडे बदल डालें। फिर देखिए मौसम कितना सुहाना लगता है। 

वैसे अभी क्या विचार है? बारिश की संभावना लग रही है, चलें! चाय के साथ भाभी जी के हाथ के गर्मा-गरम पकौडों का आनंद लेने?  
ठाकुर जी की तो जैसे मन की बात हो गयी, बोले भईये बढ लो, इसके पहले कि कपडे भीग जाएं। 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सौ साला फिल्मों में दोहरे किरदारों का रोल

अब तक 293 दोहरे या ज्यादा किरदार वाली हिन्दी फिल्में बन चुकी हैं। जिनमे सब से ज्यादा नब्बे के दशक में 79 फिल्मों का निर्माण हुआ। एक ही साल में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकार्ड 1974 का है जिस साल कुल 12 फिल्में इस विधा की बनीं। जबकि सबसे कम ऐसी फिल्में पचास के दशक में बनीं थीं जिनकी गिनती दस थी।

फिल्में खुद अपने आप में एक जादू भरा अजूबा हैं। दादा साहब फाल्के की हिम्मत, साहस, लगन और समर्पण से इस विधा ने हमारे देश में "राजा हरिश्चन्द्र" के रूप में पदार्पण किया। तब से सौ साल हो गये फिल्मों को हमें हंसाते, रुलाते, बहलाते। हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गयीं हो जैसे. इन्हीं की कूवत थी, जिसने थके - हारे - पीड़ित - नकारे,  सर्वहारा  आम आदमी को  एक दूसरी दुनिया  में  ले  जा  कर,  अपने ग़मों को भुला
राजा हरिश्चन्द्र का एक दृश्य 
सपनों के संसार मे जीना सिखाया, भले ही कुछ देर के लिए सही। यह इसी का जादू है कि अंधेरे कमरे में बैठा धनहीन-बलहीन-शोषित दर्शक भी इस के साथ एकाकार हो अपने आप को मुख्य पात्र से जोड खुद को वैसा ही समझने लगता है।  पर्दे पर चलती छायाओं से भरी कहानी में दर्शक अपना दर्द, खुशी यहाँ  तक कि  अपनी जिन्दगी को भी एकाकार कर लेता है। फ़िल्म की कहानी के पात्र के दुःख में आंसू बहाता है और उसकी सफलता पर खुश हो ताली बजाता है। ऐसा नहीं है कि यह बात सिर्फ सिनेमा के हाल तक ही रहती हो कई बार तो पात्र का दुःख-दर्द हफ्तों उस पर तारी रहता है। ऐसी अवस्था से सिर्फ दर्शक ही दो-चार नहीं होते बल्कि बहुतेरी बार अभिनेता को भी अपने निभाए गए चरित्र से निकलने में मशक्कत करनी पड जाती है। पृथ्वी राज कपूर, अशोक कुमार, मोती लाल, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, सुचित्रा सेन जैसे निष्णात कलाकार इसके अप्रतिम उदाहरण रहे हैं। 

अब तो खैर हर चीज में बहुत बदलाव आ गया है। इस कला को भी लोग बहुत हद तक समझने-बूझने लग गये
देवानंद 
हैं पर शुरुआत मे तो जैसे ही 'सिनेमा हाल' के दरवाजे पर लटके काले-भारी पर्दे को हटा दर्शक अंदर जाता था तो उसे लगता था जैसे किसी जादूनगरी में प्रवेश कर गया हो। सामने हंसती-गाती छायाओं को अपने आस-पास महसूस कर रोमांचित हो उठता था। डूब जाता था किरदारों के दुःख-सुख मे। सक्षम अभिनेता बहा ले जाते थे अपने अभिनय के द्वारा उसे किसी और लोक मे। भूल जाता था वह इस दुनिया को।

फिर समय, कहानी की मांग और कुछ नये की चाहत में पर्दे पर एक नये आविष्कार ने जन्म लिया, एक अनोखा माया जाल रचा गया। एक ही नायक या नायिका के दो रूप यानी "डबल रोल" का। इसने तो जैसे हंगामा ही मचा दिया। दर्शक भौंचक्का रह गया। फिल्म देखते हुए उसका ध्यान इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि आखिर ये दृश्य फिल्माया कैसे गया होगा। कैमरा ट्रिक का राज बाद

नरगिस 
में साफ होता तो चला गया। पर किरदारों का डबल रोल हिट फॉर्मूले के रूप में निर्माताओं द्वारा अपना लिया गया। क्योंकि डबल रोल का मतलब एक ही टिकट में डबल मजा। अपने चहेते नायक को और ज्यादा देर पर्दे पर देखने का मौका। दर्शक इसी लालच से सिनेमाघर तक खिंचने लगे। ये चलन बरसों चला। दशकों पहले के पारंगत तलवारबाज हीरो रंजन से लेकर अभी हालिया रीलीज औरंगजेब तक बीसीयों  अभिनेताओं ने  परदे पर दो - दो किरदार जीए.  देश की  हर  भाषा में  बनने  वाली फ़िल्म में ऐसे प्रयोग किए जाते रहे। जिनमे बहुतेरे सफल भी हुए और लोकप्रिय भी।  बीच में तीन-तीन किरदारों और एकाध बार नौ किरदारों को लेकर भी फिल्में रची गयीं पर ये प्रयोग उत्कृष्ट अभिनय के बावजूद सफल नहीं हो पाए।  

मगर यह सब इतना आसान भी नहीं था। हिन्दी फिल्मों में पुरुष और महिला कलाकारों द्वारा इस तरह की ढेरों कोशिशें की गयी हैं। पर दिलीप कुमार, देवानंद, संजीव कुमार, वैजंयती माला, साधना, हेमा मालिनी आदि कुछ चंद कलाकारों के ही रोल याद रखे जा सके। 

दिलीप कुमार 
वैसे डबल रोल की शुरुआत एक मजबूरी के तहत शुरू हुई थी। 1917 की फिल्म लंका दहन में मराठी फिल्मों के अभिनेता हरि सालुंके ने स्त्री पात्र ना मिलने की मजबूरी में और कोई उपाय न होने के कारण राम और सीता की दोहरी भूमिका की थी। पर उसे डबल रोल नहीं कहा जा सकता। 1932 की फिल्म "आवारा शहजादा" में पहली बार अभिनेता साहू मोदक ने राजा और रंक की दोहरी भूमिका की। कालांतर में यह प्रयोग कई कलाकारों के लिए बेहद आकर्षण का विषय बन गया। असल में डबल रोल हमेशा एक जिज्ञासा का विषय रहा है। हर अच्छा अभिनेता, जो कुछ हासिल करना चाहता है, इस चुनौती को कबूल करता है। अमिताभ, सलमान, अक्षय हो या शाहरुख, कोई भी इस सम्मोहन से नहीं बच पाया है। सिर्फ आमिर खान के विज्ञापनों को छोड दें तो उन्होंने अभी तक किसी फिल्म में डबल रोल नहीं किया है। 

महमूद 
असल मे हीरोइनों से ज्यादा हीरो में यह डबल रोल करने की चाहत ज्यादा होती है। इसलिए ज्यादातर
हीरोज ने डबल रोल करने का अपना शौक पूरा किया है। जहां तक हीरोइन का सवाल है, उन्हें  इस मामले में ज्यादा मौके नहीं मिल पाए हैं फिर भी  नरगिस, शर्मिला टैगोर, राखी, हेमा मालिनी, नीतू सिंह, माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, काजोल आदि कुछ हीरोइन को यह मौका मिला और उन्होंने इसे भलीभांति निभाया भी। । एकाध अपवाद की बात जाने दें, तो डबल रोल में इनके अभिनय की खूब तारीफ भी हुई। हेमा मालिनी ने सीता और गीता में, वैजंती माला ने मधुमती में, साधना ने वह कौन थी में  अपने अभिनय की बुलंदीयों को छुआ था। बड़े कलाकारों ने ही नहीं बाल कलाकारों ने भी इस तरह के किरदार को बखूबी निभाया है। दो कलियाँ में बाल कलाकार के रूप में दोहरे अभिनय से नीतू सिंह ने सब का मन मोह लिया था। हास्य कलाकारों में एक ही फ़िल्म में महमूद ने तीन-तीन विभिन्न किरदारों को जीवंत कर डाला था।  

अंगूर में संजीव कुमार 
शुरू से अब तक 293 दोहरे किरदार वाली हिन्दी फिल्में बन चुकी हैं। जिनमे सब से ज्यादा नब्बे के दशक में 79 फिल्मों का निर्माण हुआ। एक ही साल में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकार्ड 1974का है जिस साल कुल 12 फिल्में इस विधा की बनीं। जबकि सबसे कम ऐसी फिल्में पचास के दशक में बनीं थीं जिनकी गिनती दस थी।

दोहरे किरदार में सबसे ज्यादा काम करने का श्रेय अमिताभ बच्चन को जाता है जिन्होंने अब तक ऐसे बाईस  किरदार निभाए हैं, जिनमे हिन्दी फिल्मों की संख्या पन्द्रह है। जानकार आश्चर्य होगा की दूसरे नम्बर पर कादर खान हैं, जिन्होंने चौदह ऐसी फिल्में की हैं। अभिनेत्रियों में हेमा मालिनी तथा श्रीदेवी ने दोहरे चरित्र की 6 - 6 फिल्में की हैं। एक ही फ़िल्म
अमिताभ 
में सर्वाधिक किरदार निभाने का कीर्तीमान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नाम है, जिन्होंने एक ही फ़िल्म में 12 रोल अदा किए थे। पुरुषों में एक ही फ़िल्म में सर्वाधिक 9 रोल संजीव कुमार ने निभाए हैं।  त्रिकाल एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें 5-5 लोगों ने ऐसे चरित्र निभाए हैं। दूसरे स्थान पर तुम्हारे लिए नाम की फ़िल्म है जिसमें ऐसे किरदारों की संख्या चार है।         

पर हर चीज का समय होता है  अब सितारों के डबल या ज्यादा रोल वाली कई फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाने के कारण इस फॉर्मूले का चलन भी कम हो गया है। कलाकार की प्रस्तुति और अच्छी कहानी होने पर ही किसी कलाकार का डबल रोल यादगार साबित होता है। डबल रोल का अर्थ है दो बिल्कुल विभिन्न किरदार। अच्छे अभिनेता और बिकाऊ हीरो में फर्क होता है। पर विडंबना है कि ज्यादातर डबल रोल समर्थ अभिनेता की बजाए बिकाऊ हीरो को ही मिलते हैं। बड़े हीरो दर्शकों को पसंद आने वाले अपने खुद के गढ़े  "मैनरिज्म" यानी अदाओं की कैद में ही रहना
हेमा 
चाहते हैं। इसीलिए उनके द्वारा निभाये गए दोहरे किरदार फ़िल्म में कहीं ना कहीं एक दूसरे में गड्ड-मड्ड हो अपना असर खो देते हैं। अक्सर ऐसी फिल्मों की यह चूक खुलकर सामने आ जाती है। 

अभी तक की श्रेष्ठ डबल रोल वाली यादगार कुछ फिल्मों पर नज़र डालें तो ये फिल्में भूले नहीं भूलाई जा सकतीं।
नीतू सिंह दो कलियाँ में 
देव आनंद-हम दोनों, दिलीप कुमार-राम और श्याम, संजीव कुमार-अंगूर और नया दिन नई रात, देवेन वर्मा-अंगूर, किशोर कुमार-असित सेन की दो दूनी चार, राजकुमार-कर्मयोगी, महमूद-हमजोली, धर्मेद्र-गजब, अमिताभ-आखिरी रास्ता, अनिल कपूर-कृष्ण कन्हैया, कमल हासन-अप्पू राजा,  नरगिस-अनहोनी, हेमा मालिनी-सीता और गीता, काजोल-दुश्मन,  शर्मिला टैगोर-मौसम आदि।

दिलीप कुमार  की "राम और श्याम" तथा  संजीव कुमार की "अंगूर"  को दो श्रेष्ठ उदाहरणों में गिना जा सकता है। 

शनिवार, 6 जुलाई 2013

क्या शिव सिर्फ उत्तर के हैं और विष्णू दक्षिण के ?

 ऐसा लगता है जैसे धर्माधिकारियों में आपस में अलिखित समझौता हो गया हो कि अपने-अपने हिस्से में आए प्रभुओं की देख-रेख, रख-रखाव, हानि-लाभ सब अपने-अपने हिसाब से करेंगे। उत्तर के देव के काम में दक्षिण के प्रभू कुछ नहीं बोलेंगे। मध्य के देव, पूर्व की देवियों के मामले में चुप रहेंगे। पश्चिम वाले खुद अपना मामला निपटायेंगे !!! 

उत्तराखंड की आपदा ने अनेक कटु सत्यों को उजागर कर दिया है। जैसे रिसते घाव पर से पट्टी हटा, सेना के जवानों के अथक परिश्रम के बावजूद मवाद बह निकला हो। हमारी बेवकूफियां, मतलबपरस्ती, ह्रदयहीनता, धन-लोलूपता, दो मुंही चरित्रता, लंपटता, मौकापरस्ती यह सब, छोटी-मोटी मानवीय सद्भावनाओं और कोशिशों के बावजूद, दुनिया के सामने उजागर हो गयी हैं।

हमने अभी तक अपने-आप को ही बांट रखा था, दिशा के हिसाब से, भूगोल के हिसाब से, धर्म के हिसाब से, जाति और हैसियत के हिसाब से। पर अब तो इस त्रासदी से लगता है कि हमने अपने-अपने भगवानों को भी बांट लिया है। जैसे छोटे-छोटे क्षेत्रों की हमने अपनी सुविधानुसार पार्टियां बना देश की ऐसी की तैसी कर दी है, वैसे ही अलग-अलग भगवानों को अलग-अलग क्षेत्रों तक सिमित कर छोड़ा है.  अब तो ऐसा एहसास हो रहा है कि आज इंसान भगवान के वश में नहीं, भगवान इंसान के वश में हो गया है। हमने उसके पूजा-पाठ, दर्शन, अर्चना सब का समय निर्धारित कर दिया है। जब चाहे उसे उठाते हैं, जब चाहे सुलाते हैं और जब इच्छा हो ताले में बंद कर रुख्सत हो लेते हैं। उसके नाम का दुर्पयोग कर अथाह धन-राशि एकत्रित करते रहते हैं और उसे अपनी बपौती मान उसका उपयोग सिर्फ अपना भविष्य  संवारने और अपने मन-मुताबिक खर्च करने  में  जुटे रहते हैं।

हमारे धर्म प्रधान देश में धर्म-भीरुता के चलते छोटे-बडे लाखों धर्म स्थल जगह-कुजगह मिल जाएंगे। उनमें से हजारों ऐसे हैं जिनकी साल भर की आमदनी से देश का भविष्य सुधर जाए। और कुछ तो ऐसे हैं जिनकी संपत्ति का कोई पार नहीं है, वे साक्षात कुबेर का निवास स्थान हैं। ठीक है उससे किसी को कोई गुरेज या परेशानी नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए, सब आस्था का खेल है। पर विडंबना यह है कि ऐसी भयंकर विपदा के समय, जब देश के हर कोने और हर समुदाय से सहायता की पेशकश की जा रही है तो ये धर्मस्थान चुप्पी साधे बैठे हैं। अपने-अपने स्वार्थों और हितों के चलते हमने सर्वोच्च सत्ता का भी शायद बंटवारा कर दिया है। ऐसा लगता है कि जैसे आपस में अलिखित समझौता हो गया हो कि अपने-अपने हिस्से में आए प्रभुओं की देख-रेख, रख-रखाव, हानि-लाभ सब अपने-अपने हिसाब से करेंगे। उत्तर के देव के काम में दक्षिण के प्रभू कुछ नहीं बोलेंगे। मध्य के देव, पूर्व की देवियों के मामले में चुप रहेंगे। पश्चिम वाले खुद अपना मामला निपटायेंगे।   

भगवान ना करे ऐसा हो, पर क्या कारण है कि दुर्घटना के इतने दिनों बाद भी हर तरह से सक्षम इन देव स्थलों से किसी तरह की भी राहत की पेशकश नहीं की गयी। क्यों कोई सुगबुगाहट अभी तक सुनाई नहीं पड रही?