बुधवार, 22 मई 2013

अच्छाई कभी मिट नहीं सकती


धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं,पर फिर भी इमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की। 

संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की। पर लगातार ठगे जाने, धोखा खाने के बावजूद सुदूर गांवों में, पहाडों पर अभी भी निश्छल मानवता जिंदा है। पर इसके साथ ही यह भी सही है कि लगातार बढते शहरीकरण, टी।वी।-सिनेमा में आए घातक बदलाव, बाजार की माल संस्कृति का जहरीला धूंआ धीरे-धीरे उस निष्कपटता को आच्छादित करता जा रहा है। धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं,पर फिर भी इमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं इसका उदाहरण या साक्ष्य आए दिन डरावनी खबरों से भरे अखबारों के किसी कोने में, तपते रेगिस्तान के नखलिस्तान के रूप में सद्भावना का संदेश देती कोई खबर मिल ही जाती है। जिसे पढ वर्षों पहले घटी इंसानियत की मिसाल की दो घटनाओं की सहसा याद आ जाती है। 

यह तब की बात है जब पहाडों का मतलब काश्मीर हुआ करता था।  मेरे पिताजी जिन्हें सब बाबूजी कहा करते थे, सदा काम में मशगूल रहने वाले इंसान थे। बहुत कम कहीं आते-जाते थे. हम दो भाई, माँ  तथा बाबूजी, छोटा सा संपन्न  परिवार। एक बार हमारे बहुत इसरार करने पर उन्होंने काश्मीर चलने की हमारी बात मान ली। हमें जैसे कोइ खजाना मिल गया हो.  कलकत्ते से दिल्ली ट्रेन द्वारा तथा वहां से सांयकालीन बस द्वारा श्रीनगर जाना तय हुआ। दिल्ली पहुंच अंतर्राजीय बस अड्डे से बस ली गयी।  सब तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हो रहा था। सुबह बस पहाडों में थी। ऐसे यात्रा का पहला मौका था सो एक-एक दृश्य को आंखों में समो लेने की तदबीर हो रही थी। इसी बीच कुछ जल-कलेवे के लिए ड्रायवर ने बस को एक ढाबे पर रोका। सभी यात्री उतर कर “रिलैक्स” होने लगे। हल्के-फुल्के जलपान के बाद सब बस में सवार हुए और बस फिर अपने गंतव्य की ओर बढ चली। कुछ ही मिनटों के बाद मां को पता चला कि उनका हैंड बैग पीछे ही छूट गया है। बस में गहमागहमी मच गयी, किसी भी शहराती यात्री को बैग मिलने की उम्मीद नहीं थी। पर कंडक्टर और ड्रायवर ने ढाढस बंधाया, बस लौटाई  गयी, ढाबे के मालिक को जैसे ही सब बताया उसने तुरंत अपने कांउंटर से बैग ला मां को थमा दिया, सारा सामान, नगदी यथावत थी। सुखद आश्चर्य ने जान में जान डाली। सभी यात्री हमारी तकदीर का गुणगान कर रहे थे पर कंडक्टर और ड्रायवर जो पहाडों के वासी थे उनके लिए इस में कोई अनहोनी बात नहीं थी। यह हमारी आम शहरी मान्यताओं के लिए एक सुखद झटका था।

दूसरा दिन,   होटल से निकल हम चारों जने तफरीह के मूड में घूम रहे थे  कि अचानक पीछे से एक आदमी को जोर-जोर से पुकारते-दौडते अपनी ओर आते देखा। पहले हमने सोचा कि वह किसी ओर को बुला रहा होगा पर वह हमें ही रुकने का इशारा कर रहा था। कुछ ही पलों में वह हमारे पास आ पहुंचा और अपने हाथ का पर्स बाबूजी को थमाने लगा। बाबूजी बिना अपनी जेब देखे मना कर रहे थे कि यह मेरा नहीं है पर वह मान ही नहीं रहा था। नई जगह, अनजाने लोग, मैदानी शहरों की मानसिकता कि कहीं कोई फंसा ही ना रहा हो। तभी वहां एक और व्यक्ति आया जो हिंदी बोल-समझ लेता था। उसने बताया कि आप का पर्स पिछली दूकान में गिर गया था यह उसी को वापस कर रहा है। तभी मां के कहने पर बाबूजी ने अपनी जेब टटोली तो वहां क्या होना था, जैसे ही सारी बात साफ हुई पर्स सही जगह पहुंचा वैसे ही लाने वाले के चेहरे पर पसरा तनाव गायब हो गया जैसे कोई भारी बोझ से मुक्ति मिली हो। बाबूजी ने उसे कुछ देना चाहा तो वहां से ऐसे सिर-हाथ हिलाते भाग लिया जैसे सांप देख लिया हो। 


दो दिनों में ये दो सुखद झटके हम तथाकथित समझदार शहरी लोगों की कई मान्यताओं को बदल कर रख गये। आज भी जब ऐसे लोगों की याद आती है तो वर्तमान के प्रति कडवाहट  कम तो होती ही है भविष्य भी आशा बंधाता नजर आता है। 

शनिवार, 11 मई 2013

कर्नाटक ने मुहावरे सार्थक किए



मुहावरे या लोकोक्तियां यूं ही नहीं बन जाते इनमें वर्षों के अनुभवों का निचोड होता है। अब देखिए कर्नाटक में सत्ता पलटते ही और कुछ सिद्ध हो ना हो पर एक साथ कई मुहावरे सार्थक हो गये, जैसे घर का भेदी लंका ढाए, दो की लडाई में तीसरे का भला, बिल्ली के भाग छींका टूटा, हम तो डूबेंगे तुम्हे भी ले डूबेंगे, दो नावों का सवार कहीं नहीं पहुंचता। 

ऐसे ही अर्थों वाले और  मुहावरे भी  अपने औचित्य पर मुस्कुराने लगे हैं।



शनिवार, 4 मई 2013

“अंतिम यात्रा का ब्रांडेड पैकेज”


इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो  उसकी अंतिम यात्रा, उसके निर्वांण के मौके को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।

बिक्री हो ना हो पर हर छोटे-बडे शहर में नए-नए माल का अवतरित होना निर्बाध रूप से जारी है। ये होते भी करीब-करीब एक जैसे ही हैं। ग्राहकों से ज्यादा सेल्स ब्वाय या गर्ल्स द्वारा जगह घेरे रहने वही जूते-चप्पलों, कपडे-लत्तों की ढेरों दुकानें। इनके बीच-बीच में  खाने-पीने का जुगाड ले बैठे कुछ देसी, विदेशी खान-पान से जुडे लोग। किसी एक "फ्लोर" में एक बडी सी “मनीहारी” की दुकान। किसी एक तल पर जनता के मनोरंजन हेतु एकाधिक स्क्रीन लगाए बैठे फिल्म वाले। एक तल से दूसरे तल तक आने-जाने के लिए चलित नसैनियां। शहर, स्थान को छोड सब एक जैसा, मिलता-जुलता। फिए भी लोग आते हैं भीड लगी रहती है पर वे खरीदते कम वातानुकूलिता का आनंद लेते हुए समय बिताने ज्यादा आते हैं।  इनको रिझाने को तरह-तरह के उचित-अनुचित ढंग माल वालों की ओर से भी अपनाए जाते रहते हैं।

ऐसे ही एक दिन आफिस से एक नवनिर्मित, विशाल व भव्य,  बाजार द्वारा फेंके गये फंदे को देखने चला गया, लौटा तो बेहद थका हुआ था घर आते ही नींद पूरी तरह हावी हो गयी। पर माल की भव्यता सपने में भी तारी रही। खुद को वहीं घूमता पा रहा था। ऐसे में ही अचानक एक शो-रूम के सामने पैर ठिठक गये। कुछ नया और हट कर लग रहा था उसके प्रवेश द्वार पर बडे-बडे अक्षरों में लिखा हुआ था “अंतिम यात्रा का सुगम ब्रांडेड पैकेज”। नयी चीज देख जिज्ञासा जगी। इस बला को जानने अंदर बैठी बाला के पास गया। उसने मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया। फिर मेरे पूछने पर उसने जो बताया वह हैरतंगेज तो था ही बाजार की अनंत भूख के लिए आम जन की मेहनत की कमाई रूपी खून का निर्बाध प्रवाह जारी रखने के षडयंत्र का भयावह रूप भी सामने ला रहा था।   

बाला के अनुसार आज के भागा-दौडी के जमाने में जो चीज सबसे कम उपलब्ध है वह है समय। इसी कारण चाहते ना चाहते हुए हम अपने कई अनुष्ठानों को पूरा नहीं कर पाते। इसके अलावा बहुतेरे सम्पन्न घरों के माता-पिता वृद्धाश्रम में दिन गुजारते इहलोक से परलोक को रवाना हो जाते हैं। इसी सब को मद्दे नज़र रख हमने यह नया “कांसेप्ट शुरु किया है। जिस तरह आप शादी-ब्याह, जन्म दिन, मुंडन, जनेऊ आदि के मौकों पर पैकजों की सुविधा लेते हैं उसी तरह हम इंसान की अंतिम यात्रा को बिना किसी अडचन और असुविधा के पूरी करने की जिम्मेदारी लेते हैं। बस आपको शव का एड्रेस और अपनी जरूरतों का पूरा ब्योरा हमें देना होता है। बाकी माचिस से लेकर पंडित और अस्थी विसर्जन से लेकर पगडी तक का सारा जिम्मा हम ले लेते हैं।  हमारे पंडित भी अपने विषय में मास्टर या पी.एच.डी. डिग्री धारी होते हैं जो अपने काम को बखूबी समझ कर संबंधित परिवार की भावनाओं का ख्याल रखते हुए पूरी निष्ठा और विधी पूर्वक सम्पन्न करवाते हैं। इन दिनों परिवार में बाहर से आए लोगों के खाने-पीने-रहने की भी हम समुचित व्यवस्था करते हैं। इस कर्म-कांड में प्रयुक्त तमाम वस्तुएं “ब्रांडेड कम्पनियों” की ही प्रयोग में लाई जातीं हैं। जैसे बांस वगैरह हम सुदूर आसाम से मंगाते हैं। चिता की लकडियां भी करीने से तराशी हुई एक सार होती हैं जिनसे हमारे विशेषज्ञ अंतिम शय्या तैयार करते हैं जो देखने में बिल्कुल आरामदायक बिस्तर का एहसास करवाती है। दहन स्थल पर प्रयुक्त होने वाली सारी सामग्री शुद्ध और ब्रांडेड हो इसका पूरा ख्याल रखा जाता है। शव को श्मशान तक लाने हेतु वातानुकूलित वैन प्रयुक्त की जाती है। इतना ही नहीं घर से लोगों को लाने और छोडने के लिए वातानुकूलित बस भी मुहैय्या करवाई जाती है। बात हो ही रही थी कि तभी वहां कुछ "अप-टु-डेट सज्जन" बुकिंग के लिए आ गये और मेरी फिर ना आने वाली नींद खुल गयी। 

मैं बाकी रात भर सोचता रहा कि जब इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो उसके निर्वांण के मौके उसकी अंतिम यात्रा  को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।