शनिवार, 20 जुलाई 2013

गरीबी के बंजर में खिलती कोंपलें


ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया।

एक-दो दिन पहले अखबार में पढ़ा कि गुजरात में एक ठेला लगाने वाले की बेटी ने अपने पहले प्रयास में ही सी.ए. की उपाधी पाने में सफलता हासिल कर ली. इसके बावजूद की अपनी पढाई के साथ-साथ वह अपने पिता का भी हाथ बंटाती थी. कम साधन, निम्न सुविधाओं और विपरीत परिस्थितियों में जब कोइ बच्चा ऐसी उपलब्धि हासिल करता है तो बहुत अच्छा लगता है. हालांकि ऐसे वाकये कम ही देखने-सुनने में आते हैं। ऐसा ही एक फेरीवाला  था जो खुद तो झाडू, झाडन इत्यादि घर-घर जा बेचता था पर उसने अपने दो बेटों को अच्छी तालीम दिलवाई जिसके फलस्वरूप एक सी.ए. बना और दूसरे को बैंक में नौकरी मिली.   

 संदर्भ वश वर्षों पहले की बातें और एक व्यक्ति की याद ताजा हो गयी है. कलकत्ते में हमारे पिताजी की एक मुंह बोली मौसी थीं. सगी माँ जैसॆ. मेरा बचपन खासा वहाँ बीता है. खुशहाल, समृद्ध परिवार था. दो-चार नौकर सदा घर पर रहते ही थे. उन्हीं में से एक थे रामदास। जिन्हें हम सब रामू काका कहा करते थे। उनकी अहमियत घर के अभिन्न सदस्य की तरह थी. एक तरह से सारे घर की जिम्मेवारी उनके ऊपर थी. मैंने उन्हें कभी गुस्सा होते या चिड़चिड़ाते नहीं देखा था. घर पर एक रसोईया होने के बावजूद हम उन्हीं के हाथ के "परौंठे" खाने के इच्छुक रहते थे. बनाते भी क्या लाजवाब थे, जैसे कोई कलाकार अपनी कला को मन से संवारता हो. मजाल है कि कभी अधसिका या ज्यादा सिक गया हो. एक-एक परत बनाने वाले के गुण का बखान करती थी.  कभी भी उनके मुख से ना नहीं सुनी, शायद खिलाने में उन्हें भी सुख मिलता था. घर एक चार कमरों का फ्लैट था. पर घर के पांच सदस्यों के अलावा कोई न कोई मेहमान आया ही रहता था. बाकी नौकर अपने समयानुसार आते-जाते थे पर रामू काका की रिहाइश वहीं थी, घर की बाल्कनी  में बने छोटे से कमरे में. वर्षों-वर्ष, जहां तक मुझे याद पड़ता है उनके 40-45 वर्ष वहीं कटे. किशोरावस्था से वहाँ पदार्पण करने वाले ने शरीर के अशक्त होने तक वहीं निवास किया बिना किसी गिले-शिकवे के. कभी कभी पुरानी फिल्मों में रामू काका जैसे अभिनेता को देख अक्सर उनकी याद आ जाती है, ऐसे लोगों का नाम रामू ही क्यों होता है? 
विषय से थोडा भटक गया था. साथ रहते-रहते उन्हें भी कारोबार की समझाइश दी जाती रही थी. समय के साथ उन्होंने भी इस परिवार की सहायता से अपना छोटा-मोटा काम शुरू कर दिया था. नेक इंसान पर खुदा की रहमत भी थी. साल में दो-तीन हफ्तों के लिए अपने गाँव जाने वाले इंसान ने कलकत्ते में रहते हुए ही अपनी बिटिया की शादी भले घर में की. एक बेटे को वकील बनाया तथा दूसरा सी.ए. बना. करीब सत्तर साल की उम्र में वे अपने घर चले गए थे जहां सात-आठ साल बाद उनका देहावसान हो गया.

ऐसे हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जिसमें एक इंसान ने अपने जीवन को परिवार के लिए होम कर दिया। पर ऐसे लोगों के साथ-साथ उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता के समर्पण को समझा, उनके त्याग को व्यर्थ नहीं जाने दिया। आज के भटकन भरे समय में पथभ्रष्ट न होते हुए, खुद भी मेहनत की और अपने लक्ष्य को पाने के लिए दिए गए बलिदान को सार्थक किया.               

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

धैर्य से जीवनक्रम में लगे रहने से जीवन संवरता है। ऐसे सभी लोग साधुवाद के पात्र हैं।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सही है। पर उनके बच्चे भी प्रशंसा के पात्र हैं जिन्होंने अपने माँ-बाप के त्याग को समझा और उसे व्यर्थ नहीं जाने दिया।