बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

पैन कार्ड


पैन कार्ड, अधिकांश को तो इसके बारे में अच्छी खासी जानकारी होगी, कुछ मुझ जैसे भी होंगे जिन्हें देर से इसकी जानकारी मिली और बहुतेरों ने शायद ध्यान ही ना दिया हो। जिसे धीरे-धीरे सरकार बहुत सारे कामों के लिए जरूरी बनाती जा रही है। तो आइए लेते हैं अपने इस अनोखे बहूद्देशीय कार्ड की कुछ जानकारी - 

आयकर विभाग ने देश के टैक्स देने वाले नागरिकों के लिए एक कार्ड जारी किया हुआ है, जिसे PAN CARD (परमानेंट अकाउंट नंबर) के नाम से जाना जाता है। जो आयकर खातों की जांच वगैरह में मदद तो करता ही है सरकार ने उसे और भी बहुतेरे कामों के लिए उपयोगी और आवश्यक बना दिया है।

इसमें संबंधित व्यक्ति की फोटो लगी होती है जिससे इसे पहचान पत्र के बतौर भी काम में लाया जा सकता है। इसमें दी गयी कूट संख्या अक्षरों और अंकों के मेल (Alphanumeric Combination) से बनी होती है। शुरुआती तीन अक्षरों का चयन कंप्यूटर द्वारा होता है। चौथा अक्षर स्टेटस दर्शाता है। जिसमें 'पी' व्यक्तिगत, 'सी' किसी कंपनी द्वारा, 'एच' हिंदू संयुक्त परिवार, 'एफ' साझेदार फर्म, 'टी' किसी 'ट्रस्ट' और 'जी' का मतलब सरकार से होता है। पांचवां अक्षर संबंधित व्यक्ति के नाम या उपनाम का पहला अक्षर होता है। जैसे किसी का नाम राधा रमण यादव है तो यहां आर या वाइ हो सकता है। छठे से नौवें अंक 0001 से लेकर 9999 तक हो सकते हैं, जो आवेदन करने वाले के दस्तावेजों के आधार पर होते हैं और दसवें अक्षर से आयकर विभाग कार्ड होल्डर के रेकार्ड की जानकारियां प्राप्त करता है। 

अब तो यात्रा, बैंकों आदि में खाता खोलने, एक निश्चित रकम जमा करने या निकालने में इसको दर्शाना आवश्यक हो गया है। 

6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत पहले बनवा लिया था, पर आधार का क्या होगा तब..

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यह तो हमारे 'आधार' पर निर्भर करता है कि वह सरकार के 'आधार' को 'आधार' दे पाता है कि नहीं :-)

gurpreet singh Butter ने कहा…

अच्छी जानकारी।


http://yuvaam.blogspot.com/2013_01_01_archive.html?m=0

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

पेनकार्ड तो शुरूआती दौर मे ही बन गया था पर इसके नंबर्स से किस प्रकार की जानकारी मिलती है यह आज जाना, बहुत आभार.

रामराम.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ताऊजी, राम, राम,
बहुत अच्छा लगा आपको यहां देख। बहुतेरी चीजें ऐसी होती हैं जो वर्षों से साथ देती और रहती हैं या जिन्हें देखते आते हैं पर उनके बारे में जानकारी लेने की जरूरत महसूस नहीं होती। वैसा ही इस कार्ड के साथ था। सालों साल बेचारा आल्मारी में बंद ही रहा। वह तो भला करे रेल्वे वालों का जो इसे साथ रखने को मजबूर कर दिया। ऐसी ही एक यात्रा के दौरान उलटते पलटते इसके नं इत्यादि को जाना तो 'शेयर' करने की हिमाकत कर डाली।

P.N. Subramanian ने कहा…

खेद है कि इसमे अपना पता नहीं होता अन्यथा हर जगह इस्तेमाल हो सकता था. "आधार" की भी आवश्यकता नहीं होती.